युद्ध के बीच ग़ज़ा में कितनी सहायता पहुँच रही है?

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इसराइल और ग़ज़ा में चल रहे संघर्ष के बीच सहायता एजेंसियों का कहना है कि ग़ज़ा भुखमरी की कगार पर है.
एजेंसियों का कहना है कि ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि वो ग़ज़ा में पर्याप्त मात्रा में सहायता पहुंचाने में असमर्थ हैं.
दरअसल, इसराइली सेना ने रफ़ाह शहर में सैन्य अभियान शुरू करने के बाद रफ़ाह क्रॉसिंग को बंद कर दिया था, जो कि सहायता पहुंचाने वाले ट्रकों के लिए मुख्य रास्ता है.
ग़ज़ा को कितनी सहायता की ज़रूरत है?
ग़ज़ा के लिए दक्षिण में रफ़ाह क्रॉसिंग और केरेम शेलोम, साथ ही उत्तर में इरेज़ क्रॉसिंग से सहायता आती है.
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी UNRWA, ग़ज़ा में फ़लस्तीनी आबादी को सहायता पहुंचाती है. ये एजेंसी यहां के लोगों के लिए क़रीब 40 फ़ीसदी राहत सामाग्री पहुंचा रही है.
UNRWA की कम्युनिकेशन डायरेक्टर जूलियट टुमा का कहना है कि ग़ज़ा की 23 लाख की आबादी को हर दिन कम से कम 500 ट्रकों की मदद की ज़रूरत है.

वहीं ग़ज़ा को सहायता पहुंचाने वाले स्वतंत्र संगठनों में से एक एक्शनएड यूके का कहना है कि ग़ज़ा में सहायता न पहुंचने का मतलब है:
- यहां की पूरी आबादी यानी 23 लाख लोगों के सामने खाने का संकट.
- पांच साल से कम उम्र के तीन लाख 46 हज़ार बच्चों में कुपोषण.
- पांच साल से कम उम्र के 50 हजार 400 बच्चों में गंभीर रूप से कुपोषण.
- 1 लाख 60 हजार गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को कुपोषण से बचने के लिए पर्याप्त भोजन की जरूरत.
ग़ज़ा को अभी कितनी सहायता मिल रही है?
UNRWA के आँकड़ों के मुताबिक़, मई से पहले के दो महीनों में ग़ज़ा में आने वाली सहायता अपने उच्चतम स्तर पर थी. मार्च में केरेम शेलोम और रफ़ाह क्रॉसिंग से 4,993 सहायता ट्रक गुजरे यानी हर हर रोज़ औसतन 161 ट्रक. वहीं अप्रैल में 5,671 ट्रक गुजरे यानी हर दिन औसतन 189 ट्रक.
मई की शुरुआत में इसराइली सेना ने रफ़ाह पर हमला शुरू कर दिया. सेना का तर्क था कि वो हमास की बची हुई ब्रिगेड को ख़त्म करना चाहती है. इसराइली सेना ने 6 मई को रफ़ाह क्रॉसिंग बंद कर दिया.
UNRWA के मुताबिक़, इसी के साथ केरेम शेलोम के आसपास लड़ाई की वजह से वहां से भी आने वाली सहायता कम हो गई.
ऐसे में सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए एक मई से 28 मई के बीच सहायता सामाग्री पहुँचने वाले ट्रकों की संख्या घटकर 1,479 रह गई, यानी हर रोज़ औसतन 53 ट्रक.

UNRWA का कहना है कि उनके ट्रकों को भी कई बार अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई.
मई के आंकड़े ज़्यादा भी हो सकते हैं क्योंकि UNRWA इस महीने की शुरुआत से केवल अपने सहायता ट्रकों की जानकारी रखने में सक्षम है.
एक्शनएड का कहना है कि मई की शुरुआत से वो जो सहायता भेज रहे हैं, उसे या तो ग़ज़ा जाने नहीं दिया जा रहा है या बिल्कुल कम मात्रा में भेजा जा रहा है. इस वजह से खाद्य पदार्थ सड़ने भी लगा है.

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एक्शनएड में ह्यूमेनिटेरियन पॉलिसी के प्रमुख ज़ियादा इस्सा बताते हैं, ''रफ़ाह क्रॉसिंग बंद है, केरेम शेलोम क्रॉसिंग इसराइल की तरफ़ से खुली हुई है लेकिन इसके बावजूद ग़ज़ा मदद भेजने में इस क्रॉसिंग का इस्तेमाल सहायता संगठनों के लिए ख़तरनाक है.''
वो कहते हैं, ''इस वजह से एक अजीब सी स्थिति बन जाती है और सीमा की दूसरी ओर जीवन रक्षक सहायता से भरे ट्रक फंस जाते हैं.''
हालांकि, इसराइली सैन्य एजेंसी (COGAT) जो ग़ज़ा को मिलने वाली सहायता का समन्वय करती है, वो इन बातों को मजबूती से ख़ारिज़ करती है.
COGAT के प्रवक्ता शनी सैशन कहती हैं, ''हमारे पास दो क्रॉसिंग खुले हुए हैं- उत्तरी ग़ज़ा में इरेज़ और दक्षिण में केरेम शेलोम.'' वो कहती हैं, ''हर दिन, क़रीब 400 ग़ज़ा जाते हैं.''
तैरता हुए घाट से ग़ज़ा को कितनी मदद मिल रही है?

अमेरिकी सशस्त्र बलों ने ग़ज़ा शहर के ठीक दक्षिण में समुद्र तट से जुड़ा हुआ कई 100 मीटर लंबा घाट तैयार किया है. इस तैरते हुए घाट का इस्तेमाल समुद्र के रास्ते सहायता सामाग्री लाने के लिए किया जाता है.
इसे 17 मई को खोला गया था.
साइप्रस से सहायता सामाग्री से भरे ट्रक को जहाज़ों से घाट तक पहुंचाया जाता है. फिर इसे समुद्र तट पर एक यार्ड में उतारा जाता है.
अमेरिकी सेना का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि एक दिन में क़रीब 90 ट्रक सहायता यहां पहुंचे. सेना का कहना है ये आंकड़ा बाद में बढ़कर 150 का हो जाएगा.
हालांकि, 28 मई को समुद्री तूफ़ान की वजह से घाट टूट गया था और इसके कुछ हिस्से को मरम्मत के लिए इसराइली बंदरगाह अशदोद ले जाना पड़ा.
सहायता एजेंसियों का कहना है कि ग़ज़ा में सहायता पहुंचाने के लिए ये घाट उतनी भी कामयाब नहीं है.
ज़ियादा इस्सा कहते हैं, ''ये जब पूरी तरह से चालू भी हो जाएगा तब भी 150 ट्रक ही एक दिन में ले जा सकेगा. हालांकि, ग़ज़ा में पहुंचने वाली किसी भी अतिरिक्त सहायता का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन ये संख्या ग़ज़ा की ज़रूरत से काफी कम है.''
मदद में कमी का नतीजा क्या हो सकता है?
दुनियाभर में खाद्य संकट पर नज़र रखने वाली संस्था आईपीसी का कहना है कि ग़ज़ा में 11 लाख लोग भयानक खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं.
आईपीसी का कहना है कि उत्तरी ग़ज़ा अकाल के कगार पर है और 210,000 लोग इसके शिकार हो सकते हैं.
इंटरनेशनल रेस्क्यू कमिटी के मुताबिक़, अकाल वो स्थिति है, जिसमें गंभीर स्तर पर खाने की कमी हो जाती है, जो कुपोषण, भुखमरी और मौत का कारण बनती है.
संस्था के मुताबिक़, अब से लेकर जुलाई तक मध्य और दक्षिणी ग़ज़ा में अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है और लाखों लोग इसके शिकार हो सकते हैं.
यूरो-मेड ह्यूमन राइट्स मॉनिटर जो कि एक मानवाधिकार संगठन है, इसके मुताबिक़, ग़ज़ा में हमास की तरफ़ से चलाए जा रहे है स्वास्थ्य केंद्रों के अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर अकाल से हुई 30 मौतों को दर्ज़ किया है. ये आंकड़ा रफ़ाह पर हमले के बाद का है. संगठन का कहना है कि हर रोज़ अब लोग भूख से मर रहे हैं.
संगठन ने संयुक्त राष्ट्र और दूसरी संस्थाओं से मांग की है कि गज़ा पट्टी में औपचारिक रूप से अकाल की घोषणा की जाए.
हालांकि, COGAT का कहना है कि हालात इतने भी ख़राब नहीं हैं.
COGAT की प्रमुख कहती हैं, ''अकाल कैसे हो सकता है जब हर रोज़ 400 ट्रक भेजे जा रहे हैं.''
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