ग़ज़ा से ग़ायब हुए 13,000 लोगों का क्या हुआ?

ग़ायब होने से पहले मुस्तफ़ा एंबुलेंस ड्राइवर थे.

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    • Author, अमीरा महादबी
    • पदनाम, बीबीसी अरबी

एक तरफ़ ग़ज़ा में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, दूसरी ओर 13,000 से अधिक लोगों के लापता होने के अनुमान लगाया जा रहा है. ऐसा लगता है कि ये लोग गायब हो गए हैं.

माना जा रहा है कि इनमें से अधिकांश मलबे में दफ़्न हो गए हैं लेकिन मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बहुत से लोगों को ‘ज़बरदस्ती ग़ायब’ कर दिया गया है.

महीनों से अहमद अबू डूके अपने भाई मुस्तफ़ा की तलाश कर रहे हैं.

लड़ाई से बचने के लिए परिवार ने दक्षिणी शहर ख़ान यूनिस में नासेर अस्पताल के परिसर में पनाह ले रखी थी. लेकिन जब उन्हें पता चला कि पड़ोस में स्थित उनके घर में आग लग गई है, और मुस्तफ़ा वहां देखने गए थे. तबसे वो वापस नहीं लौटे.

अहमद कहते हैं, "जितना संभव हो सका हमने उन्हें तलाशा."

वे बताते हैं, "जहां कभी घर हुआ करते थे, वहां अब जला हुआ मलबा बचा है. पूरा इलाक़ा बुलडोज़ और कई माले की इमारतों को ज़मींदोज़ कर दिया गया है."

मुस्तफ़ा एम्बुलेंस ड्राइवर थे. परिवार ने उन लाशों में भी उनकी तलाश की जो ग़ज़ा में हमास संचालित सिविल डिफ़ेंस की टीम ने मलबे से बाहर निकाली थीं. यहां तक कि आस पड़ोस की सामूहिक कब्रों में भी तलाश की, लेकिन वे कहीं नहीं मिले.

अहमद कहते हैं, "हमें आज भी उम्मीद है कि हम अस्पताल में आने वाली किसी न किसी एंबुलेंस में उन्हें खोज लेंगे."

ग़ज़ा में हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि इस संघर्ष में अब तक मारे गए लोगों की संख्या 35,000 के पार पहुंच गई है लेकिन यह आंकड़ा भी अस्पतालों में दर्ज की गई मौतों पर ही आधारित है.

10,000 लोग मलबे में दबे?

रफ़ाह में तीन मार्च को इसराइली हमले के बाद मलबे में दबे लोगों की तलाश करते फ़लस्तीनी

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मुस्तफ़ा की तरह ही कई परिवार हैं जो ग़ायब हुए अपने प्रियजनों को लेकर पिछले सात महीनों से अनिश्चितता की स्थिति में हैं.

सात अक्टूबर को हमास ने इसराइल में सीमा पार हमला किया था जिसमें 1,200 लोग मारे गए थे और 252 लोगों को अगवा कर ग़ज़ा पट्टी में ले जाया गया था.

इसके बाद इसराइल ने ग़ज़ा में सैन्य अभियान शुरू किया था.

जेनेवा स्थित एक गैर लाभकारी संस्था यूरो-मेड ह्यूमन राइट्स मॉनिटर का आकलन है कि इसके बाद से 13,000 लोग लापता हुए हैं और उनके लापता होने के पीछे कोई सुराग नहीं है. इस आंकड़े में नागरिक और हमास के लड़ाके भी शामिल हैं.

ग़ज़ा में सिविल डिफ़ेंस, फ़लस्तीनी अथॉरिटी की सुरक्षा सेवा का हिस्सा है और उसका दावा है कि इनमें से 10,000 के क़रीब लोग मलबे में दबे हुए हो सकते हैं.

ग़ज़ा पट्टी में मलबे को लेकर संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि यह 3.7 करोड़ टन हो सकता है, जिसके नीचे कई शव दबे हुए हैं. इसके अलावा ग़ज़ा पट्टी में लगभग 7,500 ज़िंदा बम और गोला बारूद हैं, जो राहत कर्मियों और वॉलंटियर्स के लिए अतिरिक्त ख़तरा बने हुए हैं.

सिविल डिफ़ेंस का कहना है कि मलबे के नीचे दबी लाशों को निकालने के लिए उसके सदस्य वॉलंटियर्स की मदद लेते हैं, लेकिन उनके पास बिल्कुल साधारण उपकरण हैं और अक्सर पीड़ित तक पहुंचना मुश्किल होता है.

इसके अलावा ये भी चिंता है कि लाशों को मलबे में दबा हुआ छोड़ने और सड़ने से महामारी के फैलने का ख़तरा है क्योंकि इस बार ग़ज़ा बहुत गरम महीने से होकर गुजर रहा है.

इसराइली सेना के कब्ज़े में?

ग़ज़ा पट्टी के उत्तरी हिस्से में जबालिया से लगे सुरक्षा बाड़ के पास गस्त करते इसराइली टैंक.

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अब्दुल रहमान याग़ी भी अपने परिजनों को मलबे से निकालने की चुनौती से जूझ रहे हैं.

सेंट्रल ग़ज़ा में दीर अल-बलाह शहर में उनके परिवार का एक तीन माले का मकान था. बीती 22 फ़रवरी को इस मकान पर मिसाइल गिरी, उस समय उनके परिवार के 36 सदस्य घर के अंदर मौजूद थे.

वे कहते हैं कि इसके बाद 17 शवों को निकाला गया लेकिन शव इतने क्षत विक्षत थे कि उनकी पहचान नहीं की जा सकी.

यागी कहते हैं, "घर में मौजूद अधिकांश बच्चों के शव हमें नहीं मिले."

शवों को निकालने में मदद के लिए सिविल डिफ़ेंस ने संयुक्त राष्ट्र और ऐसे देशों से अंतरराष्ट्रीय मदद की गुहार लगाई, जो राहत बचाव कार्य में अनुभवी हैं.

इसने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से ‘तुरंत हस्तक्षेप’ करने और राहत एवं बचाव कार्य में मदद के लिए ग़ज़ा में भारी उपकरणों को लाने की इजाज़त देने के लिए इसराइल पर दबाव डालने को कहा. लेकिन उसका कहना है कि उसे अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है कि अन्य लोग, जिनके लापता होने का अनुमान है, वे बिना घरवालों की जानकारी के इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्सेज (आईडीएफ) की हिरासत में हो सकते हैं. इसे वे ‘ज़बरदस्ती ग़ायब’ किया जाना कहते हैं.

यूरो-मेड ह्यूमन राइट्स मॉनिटर का आकलन है कि ग़ज़ा से सैकड़ों फ़लस्तीनियों को आईडीएफ़ ने अपनी हिरासत में ले रखा है और उनके परिवारों को इसका जानकारी भी नहीं दी है.

इसराइल जेनेवा कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता है. इसके अनुसार जिस देश ने हिरासत में लिया है, उसे नागरिकों की पहचान और जगह के बारे में आवश्यक रूप से जानकारी देनी चाहिए.

सात अक्टूबर के हमलों के बाद इसराइली प्रशासन ने डिटेंशन सेंटरों में रेड क्रॉस की इंटरनेशनल कमेटी (आईसीआरसी) के दौरे को भी निलंबित कर दिया है.

‘ज़बरिया ग़ायब’ किए गए लोग

अमेरिका ने ग़ज़ा में बढ़ती मौतों की संख्या पर चिंता जताई है. (फ़ाइल फ़ोटो)

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ग़ज़ा में आईसीआरसी से जुड़े हिशाम मुहान्ना का कहना है कि संगठन ने "हिरासत में लिए गए फ़लस्तीनी नागरिकों से मुलाक़ात करने के लिए लगातार अपील की है...लेकिन अभी तक कमेटी को वहां जाने की इजाज़त नहीं मिली है. "

आईसीआरसी ने ये भी कहा है कि उसे हमास की ओर से इसराइली बंधकों से मिलने की भी इजाज़त नहीं मिली है.

बीबीसी ने आईडीएफ़ से इस पर टिप्पणी मांगी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर इसराइली राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर ने लिखा, "जब इसराइल को अपहरण करके ग़ज़ा में ले जाए गए लोगों की किसी तरह की जानकारी नहीं मिलती तो रेड क्रॉस को इसराइल में बंद हमास के लड़ाकों के बारे में जानकारी नहीं इकट्ठा करनी चाहिए: मानवीयता के बदले मानवीयता."

सेंट्रल ग़ज़ा के एक और शहर अल-ज़वैदा में एक अन्य परिवार अपने दूसरे ग़ायब बेटे की तलाश कर रही है. उन्हें डर है कि उनका बेटा ‘ज़बरिया ग़ायब’ किए गए लोगों में से एक हो सकता है.

अपने बेटे की तस्वीर हाथों में लिए मोहम्मद अली की मां तब तक तलाश करती रहीं जब तक कि उन्हें किसी ने नहीं बताया कि उनका बेटा आईडीएफ़ के कब्ज़े में है.

लोगों ने बताया कि अंतिम बार जब उन्होंने उनके बेटे को देखा था, वो ज़िंदा था, लेकिन उसके बाद क्या हुआ उन्हें नहीं पता.

ज़िंदा रहने के उम्मीद

नासेर अस्पताल में मिली सामूहिक कब्र

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मोहम्मद 23 दिसम्बर से ही लापता हैं जब उनका परिवार भारी बमबारी के बीच पनाह पाने के लिए उत्तरी ग़ज़ा में जबालिया के एक स्कूल में शरण लेने अपने घर से निकले थे.

लेकिन इसराइली सैनिक स्कूल में दाख़िल हो गए. मोहम्मद की पत्नी अमानी अली कहती हैं कि उन्होंने महिलाओं और बच्चों को वहां से जाने का आदेश दिया.

वो कहती हैं कि उस रात सभी पुरुष अपने परिवारों के पास लौट आए, सिवाय मोहम्मद के.

वो कहां हैं और उनके साथ क्या हुआ, ये किसी को नहीं पता है.

अमानी कहती हैं कि वो समझ नहीं पा रहीं कि पति को मरा हुआ मानें या आईडीएफ़ के कब्ज़े में. हालांकि वो कहती हैं कि अगर आईडीएफ़ के कब्ज़े में हुए तो उनके ज़िंदा रहने की थोड़ी उम्मीद है.

हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय ने मृतकों और ग़ायब हुए लोगें के परिवारों के लिए एक ऑनलाइन फ़ॉर्म बनाया है जिसे परिवार भर सकते हैं और इस तरह सात अक्टूबर के बाद ग़ायब हुए लोगों का एक अधिक पुख़्ता रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है कि उनके साथ क्या हुआ.

तब तक अधिकांश परिवार अपने प्रियजनों को तलाशना जारी रखेंगे.

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