अमेरिकी डॉक्टर की आपबीती जो ग़ज़ा की त्रासदी को कभी नहीं भूल पाएगा

ग़ज़ा-इसराइल युद्ध

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इमेज कैप्शन, युद्ध शुरू होने के बाद से डॉ. सैम तीन बार ग़ज़ा जा चुके हैं.
    • Author, फ़र्गल कीन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, यरूशलम से

चेतावनी: इस लेख में कुछ ऐसी तस्वीरें और ब्योरा है जो आपको विचलित कर सकता है.

सैम अटर मानते हैं कि वो अपनी आत्मा का एक हिस्सा ग़ज़ा में छोड़ आए हैं. ये सैम का वो हिस्सा है जिसने बहुत कुछ सहा है और इससे वो मुंह नहीं मोड़ सकते. ये वो हिस्सा है जिसे वो कभी नहीं भूल सकते.

सैम को अपने घर शिकागो आए तीन हफ़्ते हो गए हैं लेकिन ऐसा लगता है वो कल की ही बात है. दूसरी दुनिया का वो चेहरा उनके साथ ही है: जेना, डरी सहमी वो लड़की जो और बीमार होती जा रही थी, अस्पताल के एक बेड पर पड़ी हुई थी, वहीं उसकी मां सैम को जेना के पिछले जन्मदिन की तस्वीरें दिखा रही थीं, ये तस्वीरें त्रासदी से पहले की खुशनुमा यादें थीं.

एक और मां यहां थी जिसके 10 साल के बेटे की मौत हो गई थी.

हर तरफ दुख, दर्द और मायूसी

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"उस मां ने मुझे बताया कि उनके बेटे की अभी पांच मिनट पहले ही मौत हुई है.अस्पताल के कर्मचारी बच्चे के शरीर को कंबल से ढकने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मां मना कर रही थी, वो अपने बच्चे के साथ और समय बिताना चाहती थी. वो बेहद दुखी थी, रो रही थी और लगभग 20 मिनट तक वैसे ही बैठी रही, वो अपने बच्चे का साथ नहीं छोड़ना चाह रही थी.''

वहीं एक कमरे में क़रीब 50 साल के एक शख़्स अकेले बिस्तर पर पड़े हुए थे, उनके दोनों पैर कटे हुए थे.

सैम याद करते हैं, ''उस शख़्स ने अपने बच्चों, पोते-पोतियों, अपना घर सब खो दिया था. अब वो एक अस्पताल के अंधेरे कमरे में पड़े हुए थे. उनके घाव से कीड़े निकल रहे थे और वो दर्द से चीख रहे थे-'ये कीड़े मुझे ज़िंदा खा रहे हैं, मेरी मदद करो' वो इकलौते ऐसे शख़्स नहीं थे वहां, मैंने तो गिनती करना ही छोड़ दिया था. लेकिन वो लोग ऐसे लोग हैं जिनके बारे में मैं अब भी सोचता हूं, वो वहीं पड़े हुए हैं.''

ग़ज़ा के कई अस्पतालों में काम कर चुके हैं सैम

क़रीब 40 साल के सैम एक विचारशील और संवेदनशील व्यक्ति हैं. शिकागो में जन्मे सैम के माता-पिता भी डॉक्टर थे. वो शहर के एक अस्पताल में काम करते हैं. ग़ज़ा में सैम ने अपने अनुभवों को वीडियो में कैद किया है.

एनजीओ फ़लस्तीन-अमेरिका ब्रिज़ की तरफ़ से उन्होंने मार्च-अप्रैल में दो हफ़्ते के लिए ग़ज़ा के अस्पतालों में काम किया था.

उन अस्पतालों में बुरी तरह से घायल मरीजों के अलावा हर चीज़ की बेहद कमी थी. जिस दिन सैम ग़ज़ा पहुंचे, सबसे पहले उन्हें खाद्यान संकट की वजह से भूख से जूझते लोग दिखे.

वो बताते हैं, ''वहां बड़ी संख्या में लोग कारों के आगे-पीछे थे, कुछ लोग तो कार पर कूदने की कोशिश कर रहे थे. ड्राइवरों को ये बात समझ में आती थी, इसलिए वो रुकते नहीं थे क्योंकि अगर वो रुकते तो लोग कार पर कूद जाते. वो लोग हमें नुकसान पहुंचाना नहीं चाहते थे, वो बस खाना मांग रहे थे, वो भूखे थे.''

'ऐसे डर के माहौल को भूला नहीं जा सकता'

सैम बड़ी ही शांति से अपना अनुभव बता रहे थे, जैसा कि आप मरीजों को आराम देने के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति से उम्मीद कर सकते हैं.

उनका हर रोज़ बेहद दबाव में बीतता था, ये तय करना मुश्किल था कि किसे बचाया जाए और किसे नहीं. खून और पट्टियों के बीच मरीज अस्पताल के फर्श पर लेटे हुए थे, पूरा माहौल दर्द, दुख और चीखों से गूंज रहा था.

ऐसे डर के माहौल को भूला नहीं जा सकता. भले ही आपके पास यूक्रेन, सीरिया और इराक जैसी जगहों पर काम करने का अनुभव ही क्यों न हो.

सैम कहते हैं, ''मैं उन सभी मरीजों के बारे में सोचता हूं जिनकी देखभाल मैंने की थी और उन डॉक्टरों के बारे में भी जो अब भी वहां काम करते हैं. वहां से वापस आ जाने को लेकर मेरे अंदर थोड़ा अपराधबोध भी है, वहां अब भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है और आप उन लोगों को वहां तड़पता छोड़कर वापस आ गए हैं.''

कुपोषण से जूझ रहा है ग़ज़ा

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इमेज कैप्शन, ग़ज़ा का बड़ा हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया है, उत्तरी ग़ज़ा में सहायता भी कम पहुंच रही है.
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युद्ध जबसे शुरू हुआ है तब से सैम का तीसरा और आख़िरी दौरा अंतरराष्ट्रीय डॉक्टरों की टीम के साथ हुआ. ये उत्तरी ग़ज़ा का एक ऐसा अस्पताल था जहां कुपोषण की वजह से हालात ख़राब थे.

ये मिशन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की तरफ़ से आयोजित था. बताया गया कि यहां दो साल के कम उम्र के क़रीब 30 फ़ीसद बच्चे कुपोषित थे. उत्तरी ग़ज़ा की 70 फ़ीसद आबादी एक ऐसा ख़तरा झेल रही थी जिसे यूनाइटेड नेशंस 'विनाशकारी भुखमरी' कहता है.

ग़ज़ा के खाद्यान संकट को देखते हुए पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के प्रमुख वोल्कर तुर्क ने इसराइल पर संभावित युद्ध अपराध का आरोप लगाया था.

उन्होंने कहा था, ''जिस तरह से इसराइल ने युद्ध जारी रखा है और ग़ज़ा में किसी तरह की सहायता के आने पर प्रतिबंध लगा रहा है, उससे ऐसा लगता है कि भुखमरी को युद्ध के तरीके के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.''

इसराइल ने इन आरोपों से इनकार किया है. साथ ही सहायता में किसी भी तरह की देरी को लेकर संयुक्त राष्ट्र और सहायता पहुंचाने वाली एजेंसियों को दोषी ठहराया है.

इसराइली सरकार की तरफ़ से कहा गया, ''हम ऐसे किसी भी आरोप को सिरे से ख़ारिज़ करते हैं कि इसराइल जानबूझकर ग़ज़ा में नागरिकों को भूख से मार रहा है.''

सैम ने कई लोगों को मरते देखा

सैम को कुपोषण से जूझ रही एक 32 साल की महिला भी याद है, जो अस्पताल के एक कमरे में अपने बेटे, अपनी मां और पिता के साथ भर्ती थी. उसे सीपीआर दिया गया लेकिन बचाया नहीं जा सका.

वो याद करते हैं कि किस तरह से वो महिला बेंच पर लेटी हुई थी उसका बायां हाथ फर्श की ओर लटका हुआ था, मौत के वक्त वो ऊपर की ओर देख रही थी. अस्पताल की नर्स उसकी रोती हुई मां को सांत्वना दे रही थी.

वहां एक सात साल की बच्ची जेना अय्यद थी, उसके शरीर में बस हड्डी और कंकाल बचा हुआ था. जेना की मां को दक्षिण के इलाक़े में जाने की उम्मीद थी, क्योंकि वहां पर बेहतर चिकित्सकीय सुविधाएं थी.

युद्ध की वजह से जेना सदमे में थी. वो बेहद कुपोषित लग रही थी. जेना सिस्टिक फाइब्रोसिस से जूझ रही थी, जिससे पाचन शक्ति का काम करना कठिन हो जाता है. युद्ध से पनपे हालात की वजह से जेना की हालत और खराब हो गई थी और वो आघात से जूझ रही थी. बीबीसी कैमरामेन ने जेना की जो फुटेज ली थी, उसमें वो खोई हुई सी लगती है और सिर्फ़ अपनी मां से ही बात करती है.

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इमेज कैप्शन, जेना का ट्रांसफर कर दिया गया और अब वो राफा के इंटरनेशनल मेडिकल कॉर्प्स हॉस्पिटल में भर्ती है.

'मैं उसकी मां हूं लेकिन कुछ नहीं कर सकती'

निस्मा अय्यद कहती हैं, ''मैं क्या कर सकती हूं? उसका इलाज नहीं किया जा सकता है, वो मानसिक आघात से जूझ रही है. वो किसी से बात नहीं करती है, उसकी हालत खराब है. मैं उसकी मां हूं लेकिन कुछ नहीं कर सकती.''

सैम कहते हैं कि जैसे ही उनकी टीम ने दक्षिणी ग़ज़ा जाने के लिए सामान पैक किया, जेना की मां उनके पास आ गई.

''जेना की मां ने मुझसे कहा, 'मुझे लगा कि हम तुम्हारे साथ चल रहे हैं...क्या हो रहा है? आप लोग क्यों जा रहे हैं और हम लोग क्यों यहीं हैं?''

सैम को ये समझाना पड़ा कि दक्षिण ग़ज़ा के लिए जो काफिला जा रहा है उसमें केवल फ्यूल और खाना ले जा सकता था, मरीजों को नहीं.

लेकिन जाने से पहले सैम और उनके साथियों ने जेना के ट्रांसफर के लिए ज़रूरी काग़जात भर दिए. ट्रांसफर में कई दिन लगेंगे लेकिन सैम और उनके साथी ये सुनिश्चित करेंगे कि काग़जात सही कार्यालयों में पहुंचे.

सैम जब जेना की मां के पास बात करने पहुंचे तो वहां मौजूद कई महिलाओं ने इसे देखा. वो कहते हैं, ''दिक्कत ये थी कि ये खुला और साझा कमरा था, जहां एक कमरे में 10 मरीज़ थे. तो जब सभी महिलाओं ने मुझे जेना की मां से बात करते देखा तो वो मुझपर हावी हो गईं.''

बाद में जेना का ट्रांसफर कर दिया गया और अब वो राफा के इंटरनेशनल मेडिकल कॉर्प्स हॉस्पिटल में भर्ती है.

युद्ध में महिलाओं और बच्चों को सबसे ज़्यादा नुकसान

संयुक्त राष्ट्र के पिछले महीने में जो अनुमान बताए थे, उसके मुताबिक़, युद्ध में ज़्यादातर महिलाओं और बच्चों की मौत हुई है. 13 हज़ार बच्चे और 9 हज़ार महिलाएं युद्ध में मारे जा चुके हैं.

युद्ध अब सातवें महीने में पहुंच चुका है. युद्धविराम और बंधकों की रिहाई के लिए बातचीत रुकी हुई है. ग़ज़ा के बचे हुए अस्पतालों में हर रोज़ बड़ी संख्या में घायल और कुपोषित लोग पहुंच रहे हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन का कहना है कि ग़ज़ा के 36 अस्पतालों में से केवल 10 ही अब भी काम कर रहे हैं.

सहायताकर्मियों के लिए ग़ज़ा में सफर करना भी बेहद ख़तरनाक है. 1 अप्रैल को इसराइली सेना ने उनके काफिले पर जब हमला किया तो 7 सहायताकर्मियों की मौत हो गई.

सैम इसराइली चेक प्वाइंट्स पर घंटों लगी कतार का भी ब्योरा देते हैं. वो कहते हैं, ''हम अक्सर एक घंटे से लेकर चार घंटे तक का इंतजार करते थे, क्योंकि इसराइली सेना अपना अभियान चला रही होती है ऐसे में कतार का ख़त्म होने इस बात पर निर्भर करता है कि सेना कब तक हमें मंजूरी दे रही है.''

'उत्तरी ग़ज़ा में हालात बदतर'

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इमेज कैप्शन, डॉक्टर सैम चाहते हैं कि उत्तरी ग़ज़ा के लिए भेजी जा रही सहायता को और बढ़ाया जाए.

डॉक्टर सैम चाहते हैं कि उत्तरी ग़ज़ा के लिए भेजी जा रही सहायता को और बढ़ाया जाए.

वो कहते हैं, ''उत्तर को बस और अधिक पहुंच की ज़रूरत है, इस इलाक़े को ज़्यादा खाना, पानी, ईंधन और खुले रास्तों की ज़रूरत है...साथ ही बहुत सारे ऐसे मरीज़ हैं जिन्हें उत्तर से दक्षिण ले जाने की आवश्यकता है लेकिन दक्षिण पहले से ही भरा पड़ा है. मेरा मतलब है कि अस्पतालों में बड़ी संख्या में लोग भर्ती हैं.''

सैम को उम्मीद है कि वो बहुत जल्द वहां वापस जाएंगे. वहां कई ऐसे दोस्ती के रिश्ते हैं जो उन्हें बुला रहे हैं.

पैरामेडिक नबील, जिसे सैम हर रोज़ घायलों को इलाज के लिए लाते देखते थे. नबील खुद ही युद्ध के शिकार हो गए, उन्हें उनके सहयोगियों ने एक मलबे से बाहर निकाला. वो ज़िंदा है लेकिन ग़ज़ा से बाहर नहीं जा सकते.

एक डॉक्टर, जिसकी बेटी की हत्या कर दी गई थी लेकिन तब भी उसने एक ऐसी मां की मदद करने की कोशिश कि जिसका नवजात बच्चा बम के छर्रे की वजह से अस्पताल में भर्ती है.

और वहां कई सारे ऐसे मरीज़ और उनके परिवार जो डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिक में न सिर्फ़ मदद की आस देखते हैं, साथ ही वो आतंक के इस दौर में उन्हें मानवता की किरण के तौर पर भी पाते हैं.

ये सभी लोग सैम अटर के अपने लोग हैं.

(ऐलिस डोयार्ड, एनी डंकनसन, हनीन अबदीन, निक मिलार्ड ने भी इस रिपोर्ट में सहयोग दिया है.)

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