अमेरिका के विश्वविद्यालयों में छात्रों का ग़ुस्सा इतना क्यों उबल रहा है

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अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में घुसकर न्यूयॉर्क पुलिस ने फ़लस्तीनियों का समर्थन कर रहे प्रदर्शनकारी छात्रों को गिरफ़्तार किया है.
यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने कैंपस स्थित हैमिल्टन हॉल को क़ब्ज़े में ले लिया था, जिसके बाद पुलिस को बुलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था.
पुलिस ने बीबीसी को बताया कि ये हॉल अब खाली करवा लिया गया है. यूनिवर्सिटी छात्र गिरफ़्तार किए जा चुके प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ाते हुए न्यूयॉर्क की सड़कों पर देखे गए हैं.
इस बीच अमेरिका के लॉस एंजीलिस शहर की एक यूनिवर्सिटी कैंपस में फ़लस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों की एक विरोधी गुट के साथ झड़प की रिपोर्टें मिली हैं.
फ़लस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों का विरोध कर रहे समूह के लोगों ने मास्क पहन रखे थे और वे इसराइल के समर्थक थे. वे लोग आधी रात के बाद यूसीएलए (यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफॉर्निया, लॉस एंजीलिस) कैंपस में पहुंचे जहां उन्होंने फ़लस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों के कैंपों पर हमला किया.
यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने कहा है कि कैंपस में हिंसा की डराने वाली घटना हुई है और इस सिलसिले में पुलिस को बुलाया गया है.
ग़ज़ा में इसराइल के हमलों के ख़िलाफ़ बीते हफ़्तों में अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं. इस कहानी में हम यही समझने की कोशिश करेंगे कि आख़िर अमेरिकी विश्वविद्यालयों में छात्र, छात्राओं को गुस्सा क्यों इतना बढ़ गया है? इन छात्रों की मांग क्या है और ये प्रदर्शन कहां-कहां हो रहे हैं?

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ग़ज़ा युद्ध के ख़िलाफ़ छात्र प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं
सात अक्तूबर, 2023 को हमास ने इसराइल पर हमला किया था. हमास के हमले में क़रीब 1200 लोग मारे गए थे.
इसके बाद इसराइल ने ग़ज़ा और वेस्ट बैंक पर सैन्य कार्रवाई शुरू की. इस सैन्य कार्रवाई में अब तक 33 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. मरने वालों में बड़ी संख्या बच्चों और महिलाओं की है.
इसराइल के इन हमलों के विरोध में छात्रों ने रैलियां की हैं, हड़तालें बुलाई हैं. हाल ही में छात्रों ने ग़ज़ा में युद्ध के ख़िलाफ़ घेराबंदी शुरू की है.
इन छात्रों की मांग है कि अमेरिका के शैक्षणिक संस्थान इसराइल से वित्तीय दूरियां बनाएं. इनमें से काफ़ी संस्थानों को बड़ी आर्थिक सहायता हासिल है.
वित्तीय दूरियां बनाने से मतलब ये है कि संस्थानों के इसराइली कंपनियों में मौजूद स्टॉक्स बेचे जाएं या वित्तीय नाते ख़त्म किए जाएं.
इन स्टूडेंट्स एक्टिविस्ट का कहना है कि ग़ज़ा में युद्ध चल रहा है और ये संस्थान इसराइल या इसराइली कंपनियों के साथ कारोबार कर रहे हैं.
इनमें कई ऐसे कॉलेज भी शामिल हैं, जिन्होंने इन कंपनियों में निवेश किया है.
यूनिवर्सिटी इंडोमेंट्स से रिसर्च लैब से लेकर स्कॉलरशिप तक दी जाती है.
यूनिवर्सिटी इंडोमेंट्स यानी वो रक़म या संपत्ति होती है जो यूनिवर्सिटी को दान में मिली होती है. इसमें वो राशि भी होती है, जो यूनिवर्सिटी की ओर से निवेश किए जाने पर मिली होती है. ये निवेश करोड़ों-अरबों रुपयों का होता है.

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कोलंबिया यूनिवर्सिटी में क्या हुआ
इस महीने की शुरुआत में कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेसिडेंट मिनोशे शफ़ीक ने कैंपस में 'यहूदी विरोधी भावना' को लेकर कांग्रेस के सामने बयान दिया था.
इसके बाद सैकड़ों स्टूडेंट्स ने न्यूयॉर्क के सिटी कैंपस में कैंप लगा लिए थे.
इन स्टूडेंट्स की मांग है कि ग़ज़ा में सीज़फायर लागू किया जाए और यूनिवर्सिटी नेता इसराइल में किए अपने निवेश को ख़त्म करें.
यूनिवर्सिटी का कहना है कि इन प्रदर्शनों ने नीतियों का उल्लंघन किया है और पुलिस को इस प्रदर्शन को हटाने के लिए बुलाया गया.
इसके बाद 100 से ज़्यादा स्टूडेंट्स को अतिक्रमण करने को लेकर गिरफ़्तार किया गया.
इस गिरफ़्तारियों के बाद छात्र नेता फिर से एकजुट हुए और अब इन प्रदर्शनों का तीसरा हफ़्ता चल रहा है. यूनिवर्सिटी कैंपस में क्लासें भी रुकी हुई हैं.
यूनिवर्सिटी की ओर से प्रदर्शनकारियों से बात की जा रही है. कुछ को निलंबित भी किया गया है.
इसके बाद ताज़ा वाकये में मंगलवार रात (भारत में एक मई की सुबह) न्यूयॉर्क पुलिस यूनिवर्सिटी कैंपस में घुसती है और हैमिल्टन हॉल को खाली करवा लेती है.
प्रदर्शनकारियों की ओर से इस कैंपस का नाम 'हिंद' हॉल रखने की बात कही जा रही है. हिंद छह साल की उस फ़लस्तीनी बच्ची का नाम है, जो इसराइल के हमले में फ़रवरी में मारी गई थी.

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अमेरिका में और कहां विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं?
अमेरिका में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के बाद विरोध प्रदर्शन कई और सरकारी, निजी विश्वविद्यालयों तक पहुंच गए हैं. ये प्रदर्शन वॉशिंगटन समेत कम से कम 22 राज्यों में हो रहे हैं.
जिन कॉलेज, यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन हो रहे हैं, उनके नाम हैं-
- जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी, ब्राउन यूनिवर्सिटी, येल यूनिवर्सिटी, इमरसन कॉलेज, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी, अमेरिकन यूनिवर्सिटी
- यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड, जॉन्स हॉप्किन्स, टफट्स, कॉर्नैल यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, टेम्पल यूनिवर्सिटी
- नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी, एमआईटी, द न्यू स्कूल, यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर, यूनिवर्सिटी ऑफ पीटर्सबर्ग, कैलिफॉर्निया स्टेट पॉलिटेक्निक.
- यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफॉर्निया- लॉस एंजेलिस, यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन
- यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट लुईस, इंडियाना यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन, यूनिवर्सिटी ऑफ मिनिसोटा, यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो
- मियामी यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ जॉर्जिया, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस
अमेरिका के बाहर भी कुछ देशों की यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे देश शामिल हैं.

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विरोध प्रदर्शनों पर अमेरिकी यूनिवर्सिटी क्या कुछ कर रही हैं?
छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए कुछ विश्वविद्यालयों की ओर से स्टूडेंट एक्टिविस्ट से बात की जा रही है और कुछ की ओर से स्टूडेंट्स को चेतावनी दी जा रही है.
इन चेतावनियों के बाद पुलिस को भी कैंपस में बुलाया जा रहा है, जैसा कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मामले में हुआ है.
सोमवार से लेकर अब तक अमेरिका में टेक्सस, यूटा और वर्जिनिया में प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी हुई है.
बॉस्टन में नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी और प्रदर्शनकारियों के बीच बात एक समझौते तक पहुंच सकी है. इस समझौते के तहत कैंपों की संख्या सीमित करने की बात कही गई.
कई नेताओं की ओर से इन प्रदर्शनों के दौरान यहूदी विरोधी भावना को लेकर कदम उठाने के लिए कहा है.
कई कैंपस में मौजूद यहूदी छात्रों ने बीबीसी से कहा कि वो इन घटनाओं के बात असहज और ख़ौफ़ में हैं.
इन प्रदर्शनों में हमास के समर्थन नारे लगाने जैसी बातें भी सामने आई हैं.

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इन प्रदर्शनों का क्या कोई असर हुआ है?
कई विश्वविद्यालय परिसरों में सालों से फ़लस्तीन समर्थक संगठन सक्रिय रहे हैं. इन संगठनों की ओर से अपने संस्थानों से इसराइल का बॉयकॉट, विनिवेश और प्रतिबंध लगाए जाने जैसी मांगें की जाती रही हैं.
इसे 'बीडीएस' कहा जाता है. यानी 'बॉयकॉट, डाइनसमेंट और सेंक्शस.'
अब तक अमेरिका के किसी विश्वविद्यालय ने 'बीडीएस' को स्वीकार नहीं किया है. हालांकि अतीत में वित्त से जुड़े संबंधों में कुछ कमी आई है.
अगर 'बीडीएस' को मांग को मान भी लिया जाए तो इससे ग़ज़ा में युद्ध पर असर नहीं होगा.
मगर प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इससे उन लोगों के बारे में पता चलेगा, जिन्हें युद्ध से मुनाफ़ा हो रहा है और इस मुद्दे पर जागरूकता फैलेगी.
वियतनाम युद्ध में अमेरिका भी भूमिका को लेकर 1960 के दौर में विरोध प्रदर्शन हुए थे.
तब हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार किया गया था और पुलिस के साथ हिंसक झड़पें भी हुई थीं.
साल 1970 में नेशनल गार्ड की चलाई गोली में ओहायो में चार स्टूडेंट्स मारे गए थे. इन मौतों के बाद प्रदर्शन पूरे देश में फैल गए थे.
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