वैभव काले: ग़ज़ा में मारे गए भारतीय सेना के रिटायर कर्नल कौन थे

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- Author, जान्हवी मुले
- पदनाम, बीबीसी मराठी
"जब वे ग़ज़ा गए थे, मैंने उन्हें व्हाट्सएप पर संदेश भेजा था - ग़ज़ा में शांति करवा कर लौटना. कभी न कभी ग़ज़ा में शांति तो आएगी पर मेरा भाई वापस नहीं आएगा."
ये शब्द हैं चिन्मय काले के. चिन्मय ग़ज़ा में मारे गए रिटायर कर्नल और संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी वैभव काले के कज़िन हैं.
काले संयुक्त राष्ट्र की डिपार्टमेंट ऑफ़ सेफ्टी एंड सिक्युरिटी (यूएनडीएसएस) में काम करते थे.
13 मई को वैभव काले रफ़ाह के पास यूरोपियन हॉस्पिटल की ओर जा रहे थे. उसी दौरान उनके वाहन पर गोलीबारी हो गई. गोलीबारी में काले की मौत हो गई और उनके एक सहकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए.
इस घटना की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूतावास की ओर से गई है.
अब तक किसी ने भी इस हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है. इसराइली डिफ़ेंस फ़ोर्सज़ (आईडीएफ) ने कहा है कि वो घटना का मूल्यांकन कर रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि ये ग़ज़ा में चल रहे युद्ध के दौरान किसी भी अंतरराष्ट्रीय यूएन कर्मचारी की पहली मौत है.

कौन है वैभव काले?

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वैभव के परिवार से कई लोग भारतीय सेना में जुड़े रहे हैं. उनकी पत्नी का नाम अमृता है और उनके दो बच्चे हैं - 16 वर्षीय राधिका और 14 वर्षीय वेदांत.
महाराष्ट्र में जन्मे वैभव काले ने अपना बचपन नागपुर में बिताया. उनकी पढ़ाई नागपुर के सोमालवार और भवन जैसे स्कूलों में हुई.
12वीं के बाद वैभव काले ने पूणे स्थित नेशनल डिफ़ेंस एकेडमी जॉइन की. कमिशन के बाद काले जम्मू-कश्मीर राइफ़ल्स रेजिमेंट में तैनात थे.
चिन्मय बताते हैं कि वैभव को सेना में भेजना उनके पिता और चाचा का एक सपना था. उन्होंने इस बारे में समाचार एजेंसी एएनआई से बात की.
चिन्मय ने बताया, "जब भी वैभव वर्दी में होते थे तो वे एक सख़्त मिजाज अफ़सर होते थे. कोई उनसे सवाल तक नहीं पूछ सकता था. लेकिन यही आदमी घर पर अपने परिवार के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करता था. हमारे साथ वो कभी तनाव में नहीं होते थे. वे सभी का सम्मान करते थे चाहे व्यक्ति की उम्र कुछ भी हो. वे सबकी बातें बड़े ध्यान से सुनते थे."
बतौर सैन्य अधिकारी वे दुनिया की सबसे ऊंची बैटलफ़ील्ड सियाचिन पर भी तैनात रहे थे.
साल 2009-10 वैभव काले अफ़्रीकी देश कांगो में संयुक्त राष्ट्र की शांतिसेना में एक साल के लिए तैनात रहे थे.
22 साल सेना की नौकरी के बाद वैभव ने वक्त से पहले रिटायरमेंट ले ली थी. उसके बाद उन्होंने प्राइवेट फ़र्म में काम किया. लेकिन दफ़्तर में बैठकर नौकरी उन्हें भाई नहीं. वे हमेशा फ़ील्ड में जाना चाहते थे.
'योगदान को भुलाया नहीं जा सकता...'

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अप्रैल, 2024 में वैभव यूएनडीएसएस में नौकरी करने लगे थे. ग़ज़ा में उनकी पहली पोस्टिंग थी.
संयुक्त राष्ट्र के अंडर जनरल सेक्रेटरी जिएल्स मिचौ ने ग़ज़ा में वैभव काले की तैनाती को अपने बयान में याद किया है.
वे लिखते हैं, "उन्होंने मुझसे कहा कि वे संयुक्त राष्ट्र में इसलिए शामिल हुए हैं क्योंकि यही बदलाव लाने का सबसे अच्छा तरीका है. और वैभव ने फर्क तो डाला. उन्होंने उन लोगों की मदद करने की हामी भरी जिन्हें मदद की सख्त ज़रूरत है. और वो भी एक संकट भरे वक्त में, सबसे खतरनाक जगह पर.ये उनके चरित्र के बारे में बहुत कुछ बताता है. उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा."
वैभव को परिजनों को अब उम्मीद है कि ग़ज़ा जल्द ही शांति बहाल होगी.
चिन्मय काले कहते हैं, "वैभव का हमास और इसराइल इस जंग से कोई वास्ता नहीं था लेकिन उन्होंने शांति के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी. अब वहाँ शांति बहाल होनी चाहिए."
सहायताकर्मियों के लिए ख़तरा

- ये पहली बार है जब संयुक्त राष्ट्र के किसी अंतरराष्ट्रीय कर्मचारी की ग़ज़ा की जंग में मौत हुई हो. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के अनुसार, अब उसके 190 सहायताकर्मी इस संकट की शुरुआत के बाद मारे गए हैं.
- अप्रैल में वर्ल्ड सेंट्रल किचन नामक एक संस्था पर इसराइली सेना ने हमला कर दिया था. उस हमले में सात लोग मारे गए थे.
- संयुक्त ने जो 30 अप्रैल तक के आंकड़े जारी किए हैं. उनके मुताबिक़, अब तक इसराइल हमास युद्ध में कुल 250 सहायताकर्मी मर चुके हैं.
- ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक़, अधिकतर मौतें डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर, यूएन रिफ्यूजी एजेंसी और रेड क्रॉस जैसी संस्थाओं से जुड़े लोगों की हुई हैं.
- 14 मई इसराइली अधिकृत वेस्ट बैंक में इसराइली प्रदर्शनकारियों ने वहां रह रहे फ़लस्तीनियों की भेजी जा रही मदद को रोक दिया था. प्रदर्शनकारियों ने अनाज की बोरियां और खाने के पैकेट फाड़ कर, सड़कों पर फेंक दिए थे.
- सात अक्तूबर 2023 को हमास ने इसराइल पर हमला किया था जिसमें 1200 लोग मारे गए ते और 252 लोंगो को अग़वा कर लिया गया था.
- हमास नियंत्रित ग़ज़ा के स्वास्थ्य विभाग ने बताया है कि उसके बाद इसराइल की जवाबी कार्रवाई में अब तक ग़ज़ा में 35,090 लोगों की जान गई है.
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