भारत का संविधान 75 साल में क्या सही तरीके़ से लागू हो पाया?

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संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाया था. उसके 75 वर्ष पूरे होने पर नवंबर में भारतीय संसद में एक लंबी बहस भी हुई थी, जिस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक टिप्पणी विवाद का विषय बनी थी.
दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान, जिसमें नागरिकों के अधिकार, कर्तव्य और उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी प्रावधान शामिल हैं.
अब तक संविधान में 100 से अधिक बार संशोधन हो चुके हैं. संविधान के अलग-अलग प्रावधान देश में समय-समय पर चर्चा का विषय बनते रहे हैं.
इसमें हाल के समय का एक अहम पड़ाव पिछले साल हुआ आम चुनाव भी है, जहां संविधान में परिवर्तन से लेकर उसे ख़त्म करने तक की बात एक चुनावी मुद्दे के तौर पर उठी और कई चुनावी विश्लेषकों ने माना कि भारतीय जनता पार्टी को उस मुद्दे के चलते अकेले दम पर पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका.

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तो अब जबकि देश भर में संविधान लागू होने के 75 वर्ष पर कार्यक्रम हो रहे हैं, हम भी समझने की कोशिश करेंगे कि देश के विकास में, सामाजिक न्याय, शिक्षा, जागरूकता, आर्थिक विकास, धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों में संविधान की भूमिका के बारे में.
साथ ही टेक्नोलॉजी के विकास के साथ जो चुनौतियां सामने आ रही हैं, उसे भी जानने-समझने की कोशिश होगी.
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन सभी सवालों पर चर्चा की.
इस चर्चा में दिल्ली विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अदिति नारायणी पासवान, लखनऊ विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफ़ेसर रविकांत और लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर शामिल हुए.
75 सालों में संविधान से हमें क्या मिला?

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दिल्ली विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अदिति नारायणी पासवान ने कहा, "हमारे लिए संविधान का मतलब है हमारी पहचान."
उन्होंने कहा, "संविधान ने हमें सुविधाएं दी हैं पर यह सुनिश्चित किया है कि उन सुविधाओं में समानता और समावेशिता हो."
उन्होंने आगे कहा, "सबके लिए संविधान का मतलब है अस्पृश्यता का उन्मूलन. हम सबके लिए संविधान का मतलब है अवसर की समानता और संविधान हम सबके लिए आरक्षण है, जिसके कारण आज सभी पिछड़े, शैक्षिक रूप से पिछड़े या सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की आवाज़ को हम सुन पा रहे हैं."
इस पर लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर ने कहा, "अगर आप भारत की संस्कृति के इतिहास को देखेंगे, तो इसमें नायक पूजा बहुत ज़्यादा थी, राजा-महाराजाओं का महत्व था. संवैधानिक लोकतंत्र और कार्यात्मक लोकतंत्र को स्थापित करने के लिए जो कुछ भी हुआ है, वह सब संविधान की वजह से हुआ है."
उन्होंने आगे कहा, "अगर संविधान नहीं होता, तो ब्रिटिश काल से पहले के भारत और आज के भारत में ज्यादा फ़र्क नहीं रहता."
लखनऊ विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफे़सर रविकांत ने कहा, "भारत के करोड़ों दलितों, महिलाओं और वंचितों के लिए संविधान उन्हें नागरिक अधिकार देता है."
उन्होंने आगे कहा, "इन 75 सालों में जिस तरह से लोकतंत्र का विकास हुआ है, उसमें यह साफ़तौर पर दिखता है कि दलितों, पिछड़ों और महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. जो देश पहले कर्मकांडों और धर्म ग्रंथों के आधार पर चलता था, वह अब एक संविधान की उस किताब के आधार पर चलता है, जिसमें समानता, न्याय, बंधुत्व और मनुष्यता है."
आर्थिक आधार पर आरक्षण

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आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) एक श्रेणी है, जिसे भारत सरकार ने उन व्यक्तियों और परिवारों के लिए पहचाना है जिनकी आय और संपत्ति एक निश्चित सीमा से नीचे है.
यह वर्ग सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए उन लोगों को शामिल करता है, जो ग़रीबी की रेखा से ऊपर तो होते हैं, लेकिन फिर भी आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं होते.
आज के समय में, जब आर्थिक आधारित आरक्षण की बात हो रही है और दलितों के वर्ग में भी और अधिक वंचितों के मुद्दे को उठाया जा रहा है, तो ऐसे में क्या संविधान ने सामाजिक असमानता के पहलू को सही तरीके़ से संबोधित किया है या इसमें अभी और सुधार की ज़रूरत है?
इस पर अदिति नारायणी पासवान ने कहा, "जहां तक आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग की बात है, तो मैं वास्तव में आभारी हूं कि ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग) आया, क्योंकि अब उससे वह लांछन हट गया है कि मुझे यह साबित करना पड़े कि मैं योग्य हूं या नहीं."
उन्होंने कहा, "क्योंकि अगर आप आम लोगों से बात करें तो लोग हमेशा आपसे पूछते हैं कि क्या आप आरक्षण से हो, मतलब अगर आप 90 प्रतिशत में नहीं, तो 70 प्रतिशत में हो गए. अब जो सवाल पूछने वाले थे, वो भी ईडब्ल्यूएस में आ गए हैं."
उन्होंने आगे कहा, "अगर उप वर्गीकरण होता है, तो यह दलितों के संवाद को कमज़ोर करेगा, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में ही दलितों का योगदान राष्ट्रीय विमर्श में जगह बना पाया है. अब अगर उसमें आप उप वर्गीकरण लाएंगे, तो आपस में एक टकराव शुरू हो जाएगा."
संविधान पर राजनीति

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संविधान पर राजनीति एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, जो समय-समय पर देश की राजनीति और सामाजिक चर्चा का हिस्सा बनता रहा है. विभिन्न राजनीतिक दल अक्सर संविधान की रक्षा की बात करते हैं और इसे बचाने का वादा करते हैं.
चुनाव के दौरान संविधान का मुद्दा खासतौर पर उठाया जाता है. हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में भी संविधान से जुड़े मुद्दे प्रमुख रूप से चर्चा में रहे थे.
इस पर प्रोफ़ेसर रविकांत ने कहा, "मुझे लगता है कि जब इस देश में जातियां हैं, तो जाति की राजनीति भी होगी, और जाति की चेतना और अस्मिता की बात भी होगी."
उन्होंने आगे कहा, "जहां तक आरक्षण की बात है, तो आरक्षण कोई ख़ैरात नहीं है और न ही यह ग़रीबी उन्मूलन का कार्यक्रम है. इसके पीछे जो दो मूल कारण थे, वह थे शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ापन. एक तो ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग) लागू करके संविधान के ख़िलाफ़ काम किया गया है, और दूसरा वर्गीकरण का मामला है, जो कहीं न कहीं प्रश्नांकित होता है."
रविकांत ने कहा, "कांशीराम जी ने जातियों के भीतर चेतना पैदा करके, उनके अपने आइकन्स पैदा करके, उनके भीतर सम्मान और स्वाभिमान पैदा किया और बहुजन एकता बनाने की कोशिश की थी, जो असल में भारत की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण कारण था. लेकिन उसके बाद जो हिंदुत्व का हमला हुआ, उसने उन जातियों की अस्मिता को ख़त्म करने की कोशिश की."
इस पर गिरीश कुबेर ने कहा, "चुनावी नतीजे के बाद लाडली बहना जैसी योजनाओं की चर्चा हो रही थी, लेकिन एक अहम बात थी जिसे बहुत सारी राष्ट्रीय मीडिया ने नज़रअंदाज़ किया और वह था उप वर्गीकरण. इसके कारण राजनीतिक माहौल पूरी तरह से बदल गया."
उन्होंने आगे कहा, "जाति को दूर करने की बात अगर सचमुच समानता की दिशा में होती तो उसे स्वीकार करना आसान होता. लेकिन जाति के मुद्दे ने एक राजनीतिक चुनौती पैदा की, जिसे ढकने के लिए धर्म को लाया गया है."
गिरीश ने कहा, "अब अगर धर्म में भी परेशानी आने लगी, तो कुछ और करना पड़ रहा है. यह मुझे एक बड़ी चुनौती लगती है और दुर्भाग्य से मुझे नहीं लगता कि दलित नेतृत्व इस चुनौती को महसूस कर रहा है."
संविधान को लेकर लोगों में जागरूकता

संविधान को लेकर लोगों में जागरूकता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो समय-समय पर चर्चा का विषय बनता है. हालांकि भारत में संविधान के महत्व को लेकर लोगों में समझ बढ़ी है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस बारे में जानकारी की कमी अभी भी देखी जाती है.
खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां संविधान के मौलिक अधिकार और कर्तव्यों के बारे में लोगों को कम जानकारी होती है.
अदिति ने कहा, "अब भी ज़मीनी स्तर पर मौलिक कर्तव्य, मौलिक अधिकार जैसे विषयों के बारे में लोगों को कम जानकारी है. मुझे लगता है कि सोशल मीडिया का उपयोग हमें इस तरह से करना चाहिए कि संविधान के हर पहलू के बारे में लोगों तक जानकारी पहुंचे."
उन्होंने कहा, "आर्थिक स्तर पर जब आपको आरक्षण ही नहीं मिला, तो आप आरक्षण को हटा नहीं सकते क्योंकि अब हमारी लड़ाई आर्थिक स्थिति के लिए नहीं है, हमारी लड़ाई हमारी गरिमा के लिए है."
"अगर ऐसा होता, तो आज भी एक आईपीएस अधिकारी को घोड़ी पर चढ़ने के लिए पुलिस सुरक्षा की ज़रूरत नहीं पड़ती."
उन्होंने आगे कहा, "एक शेष समाज की महिला का मुद्दा, एक दलित समाज की महिला का मुद्दा अलग है. एक शेष समाज के पुरुष का और एक दलित पुरुष का मुद्दा अलग है. दोनों शायद आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से एक जैसे हों, लेकिन पहचान को लेकर एक पीढ़िगत ट्रॉमा होता है, जो आत्मविश्वास का निर्माण करता है. यह कहना कि 'मैं इस समाज से आती हूं', यह आज भी हमारे समाज के लोगों में नहीं आया है."
अदिति का कहना है, "मुझे नहीं लगता कि आरक्षण का जो भी आख़िरी लक्ष्य था, वह पूरा हो पाया है."
संविधान को लेकर न्यायपालिका और सोशल मीडिया की भूमिका

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संविधान को लेकर न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों ही लोकतंत्र के स्तंभों के रूप में कार्य करते हैं और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं. इसी संदर्भ में सोशल मीडिया की भूमिका भी अहम हो जाती है.
इस पर लखनऊ विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफे़सर रविकांत ने कहा, "हमारा संविधान सबको बोलने की आज़ादी देता है, लेकिन उसमें कुछ पाबंदियां भी हैं कि आपको क्या बोलना है और कितना बोलना है."
रविकांत ने कहा, "सोशल मीडिया पर अक्सर हम लोग देखते हैं कि कई बार लोग उन पाबंदियों का ख्याल नहीं रखते हैं और उस वजह से समाज में एक गुस्सा भी पैदा हुआ है और थोड़ा सा नुकसान भी हुआ है. लेकिन बहुत सारे लोगों को जहां अवसर नहीं मिलता था, वह अवसर सोशल मीडिया के ज़रिए मिला है."
"मुझे लगता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी और सोशल मीडिया दोनों ही चीज़ें लोगों के व्यक्तित्व विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं, लेकिन कई बार यह चुनौतियां भी पैदा कर रही हैं, जैसे कि झूठी ख़बरें वगैरह."
उन्होंने कहा, "पिछले वर्षों में हम लोगों ने यह देखा कि खुद सुप्रीम कोर्ट के चार जज निकल कर यह कहते हैं कि उनके ऊपर दबाव है और उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा है."
"फिर कुछ फैसले हम लोगों ने देखे और फैसलों के बाद उन जजों की नियुक्ति को देखें कि वे कहां जा रहे हैं, उससे कहीं ना कहीं उस न्यायपालिका पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं."
उन्होंने आगे कहा, "अगर आज सुप्रीम कोर्ट चाहे, तो इस तरह की खबरें नहीं दिखाई जाएंगी, जैसे कि दो हज़ार के नोट में चिप लगी है. ये सब बकवास खबरें खत्म हो जाएंगी. मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में वह सक्रियता नहीं दिखाई पड़ रही है जिसकी उम्मीद है और जो संविधान उससे अपेक्षा करता है."
"अगर हम बाबा साहब आंबेडकर का वह आखिरी भाषण देखें, तो उसमें उन्होंने जो चेतावनियां दी थीं, मुझे लगता है कि वे आज सामने हैं."

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इस पर अदिति नारायणी पासवान ने कहा, "हमारे देश में हर नागरिक को सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट पर बहुत भरोसा है और जब भी उन्हें लगा है कि उनके किसी भी अधिकार या कर्तव्य को खतरा महसूस हुआ है, तो सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा एक उचित हस्तक्षेप किया है."
अदिति ने कहा, "सोशल मीडिया पर अब ऐसे बहुत सारे पेज आ रहे हैं जो मुख्यधारा की कथा पर सवाल कर रहे हैं और यह सवाल उठाते हैं कि मुख्यधारा क्या है."
उन्होंने कहा, "मैं बच्चों को पढ़ाती हूं और उन्हें राजनीति, धर्मनिरपेक्षता, संप्रभुता, गणतंत्र इन सभी का मतलब इंस्टाग्राम से ही पता चलता है."
इस पर लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर ने कहा, "पाकिस्तान से हम कैसे अच्छे, बांग्लादेश से कैसे अच्छे, यह बात तो ठीक है, लेकिन जो वास्तविक संवैधानिक लोकतंत्र के ऊपर चलने वाले देश हैं, उनके मुकाबले हम कहां खड़े हैं?"
"मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि वह संवैधानिक भावना जो एक देश में होनी चाहिए, वह अभी तक हमारे यहां नहीं हुई है."
गिरीश ने कहा, "अगर मैं सबसे ज़्यादा किसी को दोष देना चाहता हूं तो वह है मीडिया. मुझे नहीं लगता कि हम इसे ठीक से कर रहे हैं. हम असफल हो रहे हैं, हम संविधान को विफल कर रहे हैं. मीडिया की ज़िम्मेदारी बहुत है, लेकिन वह नहीं हो रही है."
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि पत्रकारिता भी जवाबदेह होनी चाहिए, क्यों न पत्रकारिता के अंतर्गत आरटीआई (सूचना का अधिकार) लाया जाए?"
उन्होंने आगे कहा, "जिस समाज को हमें ज़िम्मेदार समझना चाहिए, उन्हें हमें जवाबदेह ठहराना चाहिए, लेकिन वह समाज यह नहीं कर रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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