अमेरिका में घर में रहकर बच्चों का ध्यान रखने वाले पिताओं का चलन आम, भारत में क्यों नहीं

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- Author, पायल भुयन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक महिला का घर ,बच्चा और परिवार संभालना आमतौर पर सामान्य माना जाता है लेकिन अगर कोई पुरुष ये कहे कि वो घर और बच्चे की ज़िम्मेदारी निभाता है तो कुछ लोगों को इस पर यक़ीन नहीं होगा या फिर अटपटा भी लगे.
लेकिन कई देशों में ''स्टे-एट-होम डैड'' चलन बढ़ते हुए देखा जा रहा है. स्टे-एट होम डैड का मतलब हुआ वे पिता जो घर में रहकर अपने बच्चों का ख़्याल रखते हैं.
हालांकि जानकार ये कहते हैं कि ऐसा समाज में पहले भी होता था, अब भी होता है. फ़र्क़ बस इतना है कि लोग अब इस बारे में बात करते हैं.
लेकिन क्या इस पर वाकई खुल कर बात होती है? क्या आज भी लोग ये सुनकर कि कोई पुरुष घर पर रहता है, घर का ध्यान रखता है और बच्चों की देखभाल करता है - हम दो सेकंड के लिए चुप नहीं हो जाते या फिर हमारी प्रतिक्रिया कई बार ये नहीं होती कि अरे वाह! क्या बात है!
''मैं अपना परिचय 'स्टे-एट-होम डैड' नहीं दूंगा''

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तमिलनाडु के विल्लुपुरम ज़िले के रहने वाले वेंकट चलापति बताते हैं, ''मैं घर पर रहता हूं. मैं एक स्टे-एट-होम डैड हूं.''
वेंकट बताते हैं कि वह 2010 से स्टे-एट-होम डैड की भूमिका निभा रहे हैं. 2006 में बेटी के जन्म और 2010 में अपने तलाक़ के बाद वेंकट ने सोचा कि अब वह जो करेंगे अपनी बेटी के लिए ही करेंगे.
वह कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि मैं कभी अपना एक परिचय बतौर स्टे एट होम डैड की तरह दूंगा. पहले लोग मेरे घर में रहने के बारें में बाते करते थे लेकिन मैं इसे अनसुना कर देता हूं. वह बाते परेशान तो करती थीं. लेकिन वक्त के साथ-साथ सब शांत हो गए हैं.''
अमेरिका में स्टे-एट-होम डैड का चलन आम बात है. भारत में भी ऐसे वेंकट जैसे पिता मिल जाएंगे लेकिन कितने पुरुष घर में रहकर काम करते हैं, इसका कोई आधिकारिक आकंड़ा नहीं है. लेकिन बीबीसी वर्क लाइफ़ में छपी बीबीसी संवाददाता अमैंडे रगेरी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1989 से 2012 आते-आते अमेरिका में 'स्टे-एट-होम' डैड्स की संख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ी है. लेकिन फिर भी ऐसे परिवारों की संख्या ज़्यादा नहीं है.
- अमेरिका में 5.6 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जहाँ कामकाज़ी महिलाएं हैं और घर में पुरुष रहते हैं.
- 28.6 प्रतिशत परिवारों में कामकाज़ी पिता और घर पर रहने वाली माँएं हैं.
हालांकि इन आंकड़ों में वो लोग भी शामिल हैं, जो बेरोज़गार है और काम की तलाश कर रहे हैं.
वहीं यूरोपीय यूनियन की बात करें तो ये संख्या और भी कम है. एक अनुमान के मुताबिक़ 100 में से एक पुरुष बच्चों की देखभाल के लिए अपने करियर को छह महीने का ब्रेक देते हैं जबकि तीन में से एक महिला ऐसा करती हैं.
पिता की बदली हुई भूमिका

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ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न विश्वविद्यालय में वरिष्ठ लेक्चरार ब्रेंडन चर्चिल कहते हैं, ''पहले के मुक़ाबले अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में एक आदर्श पिता से ये उम्मीद की जाती है कि वह अपने बच्चों की परवरिश में पहले के मुक़ाबले ज़्यादा दिलचस्पी लें''
ब्रेंडन चर्चिल समाजशास्त्र पढ़ाते हैं. उन्होंने पैरेंटिंग विषय पर शोध किया है.
वेंकट पहले एक नौकरी करते थे लेकिन उनके जीवन ने ऐसा मोड़ लिया कि उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी.
वो बताते हैं, ''बेटी को रखने का मतलब था कि मैं ऐसी कोई नौकरी नहीं कर सकता था, जिसमें रोज़ दफ़्तर जाना पड़े. मैं पैसे कमाने के लिए छोटा-मोटा काम घर से ही करता रहता हूं. लोग पूछते थे कि मैं दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेता घर संभल जाएगा. लेकिन लोगों की इन बातों का मैंने कभी जवाब नहीं दिया''
वर्क फ़्रॉम होम डैड

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बेंगलुरु में एक डॉक्टर और पेरेंटिंग कंसल्टेंट डॉक्टर डेबमिता दत्ता ने बताया कि अमेरिका में ये ज़्यादा आम है कि कोई पिता पूरी तरह से स्टे-एट-होम हो लेकिन भारत में अब भी बहुत ज़्यादा ऐसे पुरुष नहीं हैं पर धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है.
वे कहती हैं, ''स्टे-एट-होम' डैड की संख्या पिछले कुछ सालों में कई गुना बढ़ी है ख़ासकर कोविड के बाद. मैं उन्हें स्टे-एट-होम नहीं बल्कि उन्हें वर्क फ़्रॉम होम डैड कहूंगी. मैं जिन पुरुषों के साथ काम करती हूं वो ज़्यादातर घर से काम करते हैं और ये तमाम पुरुष घर की बहुत सारी ज़िम्मेदारी संभालते हैं.''
अमेरिका के सेंट लूइस में रहने वाले मयंक भागवत पेशे से एक पत्रकार हैं. वो बीस सालों तक पत्रकारिता करने के बाद अब अमेरिका में रहते हैं.
वह बताते हैं,'' मेरी पत्नी यहां रिसर्च कर रही हैं. मैं उनको सपोर्ट करने यहां आया हूं. मैं घर पर रहता हूं और वर्क फ़्रॉम होम करता हूं.''
मयंक भागवत अपनी पत्नी के साथ 2021 में अमेरिका आ गए थे.
वे बताते हैं, ‘’हमने यहां आने के बाद सोच समझ कर ये फ़ैसला लिया कि हमें कुछ चीज़ों में बदलाव लाना होगा. मैं अपने वर्क फ्रॉम होम के फ़ैसले से खुश हूं.’’
घर पर रहने की चुनौतियां

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डॉक्टर देबमिता दत्ता के ये देखा जा रहा है कि घर से काम करने वाले पिता न केवल नौकरी कर रहे हैं बल्कि घर की ज़िम्मेदारी भी निभा रहे हैं.
देबमिता दत्ता पेशे से डॉक्टर होने के साथ-साथ पेरेंटिंग कोच भी हैं.
वो कहती हैं, ''हमारे समाज में पुरुषों की परवरिश इस तरह नहीं की गई है कि उन्हें घर का बहुत काम आता हो. कई बार ये शिकायत भी आती है कि घर का काम उनके लिए थोड़ा ज़्यादा हो जाता है.''
''लेकिन मैंने देखा है कि नए ज़माने के पति और पिता घर का काम सीखने की हर संभव कोशिश करते हैं. मेरे पास जो लोग आते हैं, उनमें सबसे ज्यादा वर्क फ़्रॉम होम डैड हैं. वो सच में सारी चीज़े सीखना चाहते है. लेकिन ये ट्रेंड मैंने शहरों में ज़्यादा देखा है. ''
वर्क लाइफ़ में छपे लेख के मुताबिक इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि पुरुष देखभाल करने में महिलाओं की तुलना में किसी भी पैमाने पर कम हों.
हाल में हुए एक शोध से पता चलता है कि महिलाओं की तरह पुरुषों में भी अभिभावक बनने के बाद हॉरमोनल चेंज आते हैं. शरीर में आया ये परिवर्तन इंसान को बहुत नर्चरिंग या बच्चों की देखभाल करने वाला और सहानुभूतिपूर्ण बनाने में मदद करता है.
वेंकट कहते हैं कि शुरुआत में जब उन्होंने पूरा समय घर पर रहना शुरू किया तो सारी चीज़े बहुत मुश्किल लगती थीं.
उनके अनुसार, 'रोज़ खाना बनाना इतना बड़ा काम लगता था. पहले तो इतना समय लगा कर आप खाना बनाओ और फिर खाना खाने लायक ना बने. मां-बाप साथ रहते थे तो थोड़ी मदद हो जाती थी. लेकिन अब इतने सालों बाद सब धीरे धीरे आसान हो गया है. अब मैं बेटी की पसंद का खाना भी बना लेता हूं और घर के बाक़ी काम भी कर लेता हूं.''
इधर मंयक अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, ‘’अमेरिका में सारी चीज़ें ख़ुद करनी पड़ती हैं. पिछले दस महीनों में मैं वर्क फ़्रॉम होम के साथ साथ घर की पूरी ज़िम्मेदारी संभाल रहा हूं. पत्नी भी घर के काम में साथ देती है. कई बार मैं थक जाता हूं तो वो काम कर लेती हैं. लेकिन ये कोशिश रहती है कि दफ़्तर से आने के बाद उनको ज़्यादा काम ना करना पड़े. लेकिन एक बात तो साफ़ है कि घर चलाना कोई आसान काम नहीं होता बहुत मेहनत लगती है.''
समाज का नज़रिया

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डॉक्टर देबमिता दत्ता बताती हैं कि सेट्-एट-होम डैड या वर्क फ़्रॉम होम डैड का कॉन्सेप्ट ज़्यादा बड़े और छोटे शहरों में देखा गया है. जहां घर के पुरुष घर से काम करते हैं या अपना बिज़नेस चलाते हैं और महिलाएं दफ़्तर जाती हैं.
मयंक कहते हैं कि अमेरिकी समाज बहुत खुला है, यहां लोग छोटे छोटे परिवारों में रहते हैं. यहां दोनों अभिभावक को हर चीज़ करने की ज़रूरत है चाहे घर पर रहने की बात हो या बाहर जाकर काम करने की. हालांकि मेरे इस फ़ैसले पर परिवारवालों ने कोई सवाल नहीं किया.
लेकिन सबकी कहानी एक जैसी नहीं होती.
वेंकट कहते वो कहते हैं, ''मेरी बेटी अब 12वीं में आ गई है. वो समझती है कि मैंने घर पर रहने का फैसला क्यों लिया. जब लोग इस तरह की बात हमसे करते हैं तो हम उनकी बातों को अनसुना कर देते हैं उस पर ध्यान नहीं देते. मैं पूछता हूं क्या किसी पुरुष को घर में रह कर अपने बच्चे को देखभाल करने का हक़ नहीं.''
मंयक और वेंकट इस बात पर सहमत और संतुष्ट दिखते हैं कि वो अपनी बेटियों को ज़्यादा वक्त दे पा रहे हैं.
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