स्कूली बच्चों की सुरक्षा के लिए माता-पिता और स्कूल के स्तर पर क्या होना चाहिए?

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गुड़गांव के रायन इंटरनेशनल स्कूल में सात साल के बच्चे की हत्या ने अभिभावकों को अंदर से हिलाकर रख दिया है. लोगों में ग़ुस्सा तो है ही, पर साथ ही अभिभावक ख़ुद को लाचार भी महसूस कर रहे हैं.
उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वो करें तो क्या करें. गुड़गांव में इस बच्चे की हत्या के बाद पूर्वी दिल्ली में रघुवरपुरा के एक निजी स्कूल में पांच साल की बच्ची से रेप का मामला सामने आया है. दिल्ली सरकार ने इसकी जांच का आदेश दिया है
पिछले चार दिनों के भीतर दिल्ली-एनसीआर में इस तरह की दो घटनाओं ने एक साथ कई चीज़ों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. टीच फ़ॉर इंडिया की जसमीत बवालिया कहती हैं कि इन घटनाओं के लिए किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है.
उनका कहना है कि सबको एक साथ मिलकर काम करना होगा. इसमें स्कूल, प्रशासन और अभिभावक सबको अपनी भूमिका अदा करनी होगी. उनका कहना है कि नीति बनाना आसान है, लेकिन इसे लागू करना सबसे अहम काम है. जसमीत का कहना है कि 'हम बिना कोई जुर्म हुए उसके बारे में सोचते तक नहीं हैं.'

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दुनिया भर में बच्चे स्कूल और घरों में सबसे सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन भारत में ये जगहें भी बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं रह गई हैं. आख़िर इन घटनाओं में सबसे ज़्यादा नाकामी किनकी होती है?
ऐसी घटनाओं के बाद अभिभावकों का भरोसा स्कूलों पर कैसे फिर से बहाल हो सकता है? इन्ही सारे सवालों को लेकर बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार ने पूर्वी दिल्ली के एल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल के प्रिंसिपल अशोक कुमार पांडे से बात की. उन्हीं के शब्दों में पढ़िए-
दोनों घटनाएं झकझोरने वाली हैं. समाज में जो कुछ भी हो रहा है उसका तो अलग विश्लेषण है, लेकिन बच्चों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए. जब ऐसा होता है तो भय और अविश्वास अभिभावकों के मन में घर कर जाते हैं.
बच्चों के लिए घर और उनका विद्यालय सबसे सुरक्षित जगह माने जाते हैं. अगर विद्यालय में ही सात साल के बच्चे की हत्या हो जाए तो इससे दुखद घटना मेरे हिसाब से नहीं हो सकती.

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आख़िर ये कैसे हुआ और कैसे रोका जा सकता है इसकी विवेचना बहुत ज़रूरी है. इस मामले में स्कूल और अभिभावकों को साथ बैठकर बात करनी चाहिए कि वो कौन सी कमी है जिसकी वजह से ऐसी घटनाएं घट जा रही हैं.
स्कूल में जिन लोगों को नियुक्त किया जाता है उस पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है. उनका वेरिफ़िकेशन और रिकॉर्ड की उपेक्षा किसी भी सूरत में नहीं की जानी चाहिए. उनकी ट्रेनिंग पर ख़ास ध्यान दिया जाना चाहिए और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी नज़र होनी चाहिए. वे किस माहौल से आए हैं, इस पहलू को दरकिनार नहीं किया जा सकता है.
किसी व्यक्ति का स्कूल के कैंपस में आना, वॉशरूम में जाना या कॉरिडोर में घूमना इन सारी चीज़ों पर निगरानी करने की ज़रूरत है. जहां-जहां बच्चे जाते हैं वहां बाहरी लोगों के जाने पर नज़र रखनी होगी. विदेशों में तो यही होता है कि वहां पर जितने कर्मचारी होते हैं ख़ास कर शिक्षक के अलावा उनकी आवाजाही स्कूल के प्रांगण में बिल्कुल सीमित होती है.

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बच्चों की निगरानी
आज के बदले हुए माहौल में स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर फिर से सोचने की ज़रूरत है. हमें बच्चों को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए. हमेशा इन पर निगरानी ज़रूरी है. कभी बच्चा अकेले कहीं ना जाए. चाहे वो शौचायल हो, खेल का मैदान हो या फिर स्कूल पहुंचाने वाली गाड़ी हो.
इन सारे पलों में शिक्षकों की भागीदारी बहुत ज़रूरी है. अभिभावकों और विद्यालयों को मिलकर निगरानी थोड़ी बढ़ानी होगी. इस मामले में अभिभावकों और सतर्क होना होगा. अभिभावक अपने बच्चों के साथ भागीदारी बढ़ाएं. वो इनसे बचने की कोशिश नहीं करें.
बच्चों की सुरक्षा को लेकर बहुत सारी चीज़ें की जा सकती हैं. आज के वक़्त में शिक्षा का पूरा परिवेश बदल गया है. दिल्ली जैसे शहर में बच्चे 20 से 40 किलोमीटर तक की दूरी तय कर बस से स्कूल पहुंचते हैं. ऐसे में बसों में सुरक्षा की मुकम्मल व्यवस्था तो होनी ही चाहिए.

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आने वाले वक़्त में अभिभावकों के मन में इस तरह की आशंका बनी रहेगी. हमें स्कूल के साथ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके. अगर हम इस बात को मानकर बैठ जाएं कि यह आख़िरी प्रद्युम्न था तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी.
हर विद्यालय को यह फिर से सोचना होगा कि उन्होंने बच्चों की सुरक्षा को लेकर क्या प्रोटोकॉल बनाया है और उसे किस स्तर पर लागू किया जा रहा है. अभिभावक आएं और स्कूलों में आकर सवाल पूछें. उन्हें ख़ुद को आश्वस्त करना चाहिए.
अगर हम एक घटना होने के बाद सबक नहीं लेते हैं तो दूसरी घटना को आमंत्रित करते हैं. हमे नई गाइडलाइन तैयार करनी होगी और उन्हें सख्ती से लागू भी करना होगा. औचक निरीक्षण की व्यवस्था हो और साथ ही अध्यापक, अभिभावक और विद्यालय अपनी प्रतिबद्धता दिखाएं.
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