क्या माता-पिता अपने बच्चों में ही भेद करते हैं?

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- Author, फ़ातिमा फ़हरीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
आपने अपनी फ़ैमिली, मिलने जुलने वाले या आस-पड़ोस के बच्चे से ये ज़रूर सुना होगा कि ‘मेरी मम्मी या पापा मुझे प्यार नहीं करते हैं, दीदी या भइया को करते हैं.’
एक से अधिक बच्चे वाले ज़्यादातर परिवार में घर का कोई ना कोई बच्चा दिल में इस तरह की शिकायत ज़रूर रखता है.
दिल्ली में रहने वाली 26 साल की रश्मि (बदला हुआ नाम) कहती हैं, ''हम पांच भाई-बहन हैं. मेरे माता-पिता हमें प्यार तो करते हैं लेकिन उनका झुकाव मेरे मंझले भाई साहिल की तरफ़ ज़्यादा रहता है. हमें डांट मार पड़ जाती है, लेकिन मजाल है कि वो कभी साहिल को नज़र से घूरें भी. खाना-पीना, घूमना-फिरना चाहे कोई भी वजह हो साहिल को कभी एडजस्ट नहीं करना पड़ता.''
वजह पूछे जाने पर रश्मि कहती हैं, ''बचपन में मेरा भाई बहुत बीमार रहता था. यही वजह है कि उसे अब भी कमज़ोर समझा जाता है. इसलिए घर में हर फ़ैसले में साहिल की मर्ज़ी ज़रूर शामिल होती है.''
पटना में रहने वाले 45 साल के सरवर कहते हैं, ''मैं और मेरे दो भाई पढ़ाई-लिखाई में एवरेज थे लेकिन मेरे मंझले भाई को दुनिया से कोई मतलब नहीं होता था, वो हर वक़्त किताब में घुसा रहता था. यही वजह थी कि वो मेरे माता-पिता का चहेता बेटा था. उसकी राय लेना, उसके खाने पीने से लेकर कपड़े-लत्ते सब पर मां-बाप का पूरा ध्यान रहता था. मुझे और दूसरे भाइयों को इस बात पर बहुत ग़ुस्सा आता था.''
एक बच्चे पर झुकाव होता है

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ज़्यादातर मां-बाप शायद इसे स्वीकार नहीं करें, लेकिन एक शोध के अनुसार माता-पिता का एक बच्चे की तरफ़ झुकाव आम है.
लेकिन ऐसा करना ना सिर्फ़ फ़ैमिली लाइफ़ में फ़र्क़ डालता है बल्कि कई बार यह हानिकारक हो सकता है और इसका असर लंबे वक़्त तक देखा जा सकता है.
इस तरह का रवैया लगभग 65 फ़ीसद परिवारों में देखा जाता है. कई अलग-अलग संस्कृतियों और देशों में इसका अध्ययन किया गया है.
इसे बच्चों में होने वाली कई इमोशनल प्रॉब्लम की एक महत्वपूर्ण वजह मानी जाती है.
मनोवैज्ञानिकों ने इसका नाम दिया है पैरेंटल डिफ़रेंशियल ट्रीटमेंट (पैतृक विभेदक उपचार). इसे शॉर्ट में पीडीटी भी कहा जाता है.
बच्चों पर असर

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अमेरिका की नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर लॉरी क्रेमर कहती हैं, "यह बहुत से लोगों का अनुभव है कि माता-पिता उनके मुक़ाबले उनके दूसरे भाई या बहन को ज़्यादा पसंद करते हैं.''
कई बार एक ही परिवार में बच्चों का अनुभव अलग-अलग होता है. किसी बच्चे को इस बात का एहसास होता है, किसी को नहीं.
लेकिन परिवार के जिस बच्चे को यह लगने लगता है कि उसके माता-पिता उसकी तुलना में उसके किसी दूसरे भाई या बहन को अधिक मानते हैं, उसे बच्चे पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है. यह ज़िंदगी भर रह सकता है.
शोध से पता चलता है कि ऐसा महसूस करने वाले बच्चों में आत्मविश्वास की कमी (लो सेल्फ़-इस्टीम) देखी जाती है. वो बचपन में होने वाली एंग्ज़ाइटी और डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. और कई बार तो उनका अपना व्यवहार भी ख़तरनाक हो जाता है.
कैसा प्रभाव पड़ता है?

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चीन के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में पाया है कि मां-बाप के ज़रिए बचपन में किए जाने वाले भेदभाव का एक असर यह होता है कि किशोरावस्था में उन बच्चों को मोबाइल फ़ोन की लत (एडिक्शन) लग जाती है.
मां-बाप का यह रवैया ज़िंदगी भर भाई-बहन के आपसी रिश्ते को नुक़सान पहुंचा सकता है.
इस बारे में बीबीसी ने तीन अलग अलग एक्सपर्ट से बात की.
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के डिपार्टमेंट ऑफ़ मेंटल हेल्थ और बिहेवियरल साइंसेज़ के डायरेक्टर डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं, ''कभी-कभी कुछ बच्चे बीमार रहते हैं तो मां-बाप का ज़्यादा ध्यान बीमार बच्चे की तरफ़ रहता है. बच्चा हॉस्टल में रहता है और बहुत दिनों के बाद घर आने पर मां-बाप बच्चे की ख़ातिर में लग जाते हैं तो दूसरे बच्चे को ये महसूस होने लगता है कि उन्हें कम तरजीह दी जा रही है. जबकि ऐसा नहीं है. मां-बाप के लिए सभी बच्चे बराबर होते हैं.''
डॉ मल्होत्रा के अनुसार,अधिकतर हालात में ये बच्चे की मनोस्थिति पर भी निर्भर करता है.
वो कहते हैं, ''अगर एक बच्चा थोड़ा बिगड़ैल होता है और दूसरा थोड़ा संभला हुआ होता है तो मां-बाप संभले हुए बच्चे का उदाहरण दे देते हैं. क्योंकि बच्चे का दिल बहुत नाज़ुक होता है, ग़ुस्से में भी मां-बाप अगर कोई ऐसी बात कह देते हैं तो वो बच्चे के दिल पर छाप छोड़ जाती है.''
'नेगलेक्टेड' बच्चों में नाकारात्मक असर

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डॉ समीर मल्होत्रा कहते हैं इससे कई बार बच्चों पर नाकारात्मक असर पड़ता है
- हीन भावना का शिकार होना
- नींद की गोलियां खाने का आदी होने की आशंका
- जल्द गुस्सा आना
- चिड़चिड़ापन होना
- ध्यान खींचने के लिए तोड़फोड़ करना
- डिप्रेशन और एंग्ज़ाइटी का शिकार होना
- खुद को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश करना
दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल में रह चुके मनोवैज्ञानिक डॉ शेख़ बशीर कहते हैं, ''भारत एक पित्तृसत्तात्मक समाज है. भारत में मां-बाप के द्वारा बच्चों में फ़र्क़ करने की सबसे बड़ी वजह लिंग भेद है. बहुत सारे घरों में लड़कियों को लड़कों के मुक़ाबले कम तरजीह दी जाती है. लिंग भेद पढ़ाई लिखाई से लेकर हर निर्णय तक में शामिल होता है.''
डॉक्टर शेख़ हालांकि यह भी कहते हैं कि बहुत से घरों में बिल्कुल उल्टा मामला देखने को मिलता है, जहां लड़कियों की तरफ़ मां-बाप का झुकाव ज़्यादा होता है.
दूसरी वजहों की ज़िक्र करते हुए डॉ. शेख़ कहते हैं, ''बच्चों में गैप कम होने से सिबलिंग राइवरली हो जाती है. ऐसे में बच्चे को ये लगता है कि हम लोग तो एक बराबर हैं तो मुझ पर कम ध्यान क्यों दिया जा रहा है.''
भारत में स्किन कलर की वजह से जो प्रीज्यूडिसेज़ हैं उसकी वजह से भी पक्षपात होता है.
एक बच्चा अगर काला है और एक गोरा है तो रंग की वजह से किसी बच्चे को कम, किसी को ज़्यादा तरजीह दी जाती है.
डॉक्टर शेख़ के अनुसार 'फ़ेवरिट चाइल्ड' को आगे जा कर बहुत दिक़्क़तों का भी सामना करना पड़ सकता है.
वो कहते हैं, ''हमेशा से वो बच्चे तारीफ़ सुनने के आदी होते हैं, लेकिन जब उन्हें बाद में तारीफ़ नहीं मिलती है तो उसके बहुस सारे साइड इफ़ेक्ट्स नज़र आ सकते हैं. इससे उनकी पर्सनल, प्रोफ़ेशनल लाइफ़, लव लाइफ़ यहां तक कि शादीशुदा लाइफ़ पर भी असर पड़ सकता है.''
माता-पिता की भूमिका

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प्रोफ़ेसर लॉरी क्रेमर के अनुसार इसके लिए परिवार में संवाद सबसे ज़्यादा ज़रूरी है.
वो कहती हैं कि जैसे ही किसी मां-बाप को इस बात का पता चलता है कि उनके किसी बच्चे को लगता है कि उसके मां-बाप उसे नज़रअंदाज़ करते हैं और दूसरे भाई या बहन को ज़्यादा तवज्जो देते हैं तो मां-बाप को उस बच्चे से फ़ौरन बात करनी चाहिए.
मां-बाप को उस बच्चे को बताना चाहिए कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और अगर ऐसा है भी तो उसकी कोई ख़ास वजह है, जैसे हो सकता है कि उनका कोई भाई या बहन किसी ख़ास तरह की बीमारी का शिकार हो और उसे विशेष देख-रेख की ज़रूरत हो.
प्रोफ़ेसर क्रेमर का मानना है कि संवाद क़ायम करने से इस मसले का हल ढूंढा जा सकता है.
पेरेंट्स एजुकेशन पर काम करने वाली रिद्धि देवरा कहती हैं कि मां-बाप कभी भी ये जुमला इस्तेमाल ना करें कि आपका भाई या बहन ऐसे कर रहा है तो आप भी ऐसे करिए.
उनके अनुसार एक ही माता-पिता के बच्चों के आपसी रिश्ते में मां-बाप का सबसे बड़ा रोल होता है.
वो कहती हैं कि मां-बाप अपने हर बच्चे को अपने पहले बच्चे की तरह की ट्रीट करें.
देवरा कहती हैं कि मां-बाप को ये समझना ज़रूरी है कि हर बच्चा अपने में ख़ास होता है. उसे एक अलग इंसान के रूप में देखें ना कि दूसरे बच्चों से कंम्पेयर कर के.
वो कहती हैं, बड़े बच्चों को ये ना समझाएं कि वो बड़े हैं तो उनके ऊपर सारी ज़िम्मेदारी डाल दी जाए कि तुम अपना सामान शेयर करो, तुम बड़े हो तुम ऐसा करो, ऐसा करने से बड़े बच्चे में ये भावना आ सकती है कि मुझे ही क्यों दबाया जा रहा है.”
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