भारत की चुनावी राजनीति में क्या महिलाएँ नया वोट बैंक बन गई हैं?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले महीने हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी, शिवसेना (शिंदे) और एनसीपी (अजित पवार) के गठबंधन महायुति को शानदार जीत मिली.
इस साल (2024) जून में शुरू हुई 'लाडकी बहिण' योजना को भी इस जीत की एक बड़ी वजह माना गया.
साल 2023 में भी भारतीय जनता पार्टी ने जब मध्य प्रदेश विधानसभा का एक ऐसा चुनाव जीता, जिसे जीतना उसके लिए मुश्किल माना जा रहा था तो बड़ी चर्चा इस बात की हुई कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की 'लाड़ली बहना' और 'लाड़ली लक्ष्मी' योजनाओं ने पार्टी को एक हारा हुआ चुनाव जिता दिया.
हाल ही में जब दिल्ली विधानसभा चुनावों से कुछ ही हफ़्ते पहले आम आदमी पार्टी ने 'मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना' के लिए रजिस्ट्रेशन की घोषणा की तो महिला वोटरों को ठीक चुनावों से पहले अपनी ओर खींचने की राजनीतिक कोशिश में एक कड़ी और जुड़ती दिखी.

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लेकिन 'महिला सम्मान' योजना उस वक्त विवादों में आ गई, जब दिल्ली सरकार का महिला एवं बाल विकास विभाग, अख़बारों में इस योजना का विज्ञापन देकर इससे दूरी बनाता दिखा.
हालांकि इस योजना के एलान की टाइमिंग ने साफ संकेत दे दिया है कि अन्य राज्यों की तरह राजनीतिक दल आगामी दिल्ली चुनावों में महिला वोटरों को लुभाने की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ रहे.
'आप' की महिला सम्मान योजना क्या है?

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कुछ ही दिन पहले, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री 'महिला सम्मान योजना' की घोषणा करते हुए कहा था कि इस योजना के तहत दिल्ली सरकार दिल्ली में रहने वाली 18 साल या उससे ज़्यादा उम्र की सभी महिलाओं को हर महीने 1000 रुपये देगी और इस राशि को चुनावों के बाद बढ़ाकर 2100 रुपये कर दिया जाएगा.
पार्टी के मुताबिक़, इस योजना का फ़ायदा दिल्ली में रहने वाली उन महिलाओं को मिलेगा जो दिल्ली में पंजीकृत मतदाता हैं, जिनकी सालाना पारिवारिक आमदनी तीन लाख रुपये से ज़्यादा नहीं है और जो पहले से दिल्ली सरकार से कोई पेंशन या वित्तीय सहायता नहीं ले रही हैं.
आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस योजना की घोषणा 2024-25 के लिए अपने बजट को पेश करते समय की थी. उस वक्त इस योजना के लिए 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे.
केजरीवाल के मुताबिक़, इस योजना को लागू करने में देरी इसलिए हुई क्योंकि उन्हें एक "फ़र्ज़ी मामले" में गिरफ़्तार कर लिया गया था.
आम आदमी पार्टी ने ये उम्मीद जताई थी कि इस योजना का फ़ायदा 45 लाख महिलाओं को मिलेगा.
इस योजना की घोषणा के साथ ही आम आदमी पार्टी के कैडर्स ने महिलाओं का रजिस्ट्रेशन भी शुरू कर दिया था.
आम आदमी पार्टी के सूत्रों ने यहाँ तक दावा कर दिया था कि मुख्यमंत्री 'महिला सम्मान योजना' के तहत 10 लाख से ज़्यादा महिलाएं रजिस्ट्रेशन करवा चुकी हैं.
लेकिन महिला सम्मान योजना तब विवाद में आ गई, जब दिल्ली सरकार के महिला और बाल विकास विभाग ने अखबारों में विज्ञापन देकर ये साफ़ कर दिया कि दिल्ली सरकार की तरफ से ऐसी किसी योजना का नोटिफ़िकेशन जारी नहीं किया गया.
अगर कोई भी निजी व्यक्ति या राजनीतिक दल इस योजना के नाम पर लोगों से जानकारी इकट्ठा कर रहा है तो ये धोखाधड़ी है.
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया, जब दिल्ली के उप-राज्यपाल वीके सक्सेना ने महिला सम्मान योजना के नाम पर महिलाओं की निजी जानकारी इकट्ठा करने वाले व्यक्तियों के ख़िलाफ़ जांच के आदेश दे दिए.
चुनावों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

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भारत के चुनाव आयोग के मुताबिक़, देश में हुए पहले चुनाव में महिलाओं की भागीदारी 7.8 करोड़ यानी 45 फ़ीसदी थी.
सात दशक और 17 राष्ट्रीय चुनावों के बाद, साल 2019 में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से ज़्यादा हो गई.
ये अंतर न केवल कम हुआ बल्कि 2019 में महिला वोटरों की संख्या पुरुष वोटरों से 0.17 फ़ीसदी ज़्यादा हो गई.
चुनाव आयोग का कहना है कि भारत में 1971 के चुनाव के बाद से महिला मतदाताओं की तादाद में 235.72 फ़ीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है.
साल 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद जारी किए गए डेटा में चुनाव आयोग ने कहा है कि 2024 में प्रति 1000 पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या 946 थी, जो कि साल 2019 लोकसभा चुनाव के 926 के आंकड़े से भी ज़्यादा है.
इस डेटा के मुताबिक़, साल 2024 में 65.78 फ़ीसदी महिला मतदाताओं ने मतदान किया, जबकि पुरुष मतदाताओं ने 65.55 फ़ीसदी मतदान किया.
चुनाव आयोग का कहना है कि साल 2019 की तरह, 2024 में भी महिला वोटरों की संख्या पुरुषों से अधिक रही और लोकसभा चुनावों के इतिहास में ये केवल दूसरी बार हुआ है.
तो ये साफ है कि महिला वोटरों को अब कोई भी राजनीतिक दल नज़रअंदाज नहीं कर सकता है.
डायरेक्ट कैश ट्रांसफर और चुनाव

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साल 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने घोषणा की थी कि अगर वो सत्ता में आई तो गृह-लक्ष्मी योजना के तहत परिवार की महिला मुखिया को हर महीने 2,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी.
जब चुनाव के नतीजे आए तो कुल 224 सीटों में से 135 सीटें जीतकर कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसने अगली सरकार बनाई.
सरकार बनाने के कुछ ही दिन बाद गृह-लक्ष्मी योजना की शुरुआत कर दी गई.
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2024 तक इस योजना के तहत 1.25 करोड़ लाभार्थियों का रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है.
जनवरी 2023 में मध्य प्रदेश सरकार ने 'लाड़ली बहना' योजना की घोषणा की, जिसके तहत आने वाली महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाने लगी.
मध्य प्रदेश में नवंबर 2023 में चुनाव होने थे, और चुनाव से करीब छह महीने पहले कांग्रेस पार्टी ने नारी सम्मान योजना की घोषणा की और कहा कि अगर वो सत्ता में आई तो हर महिला को हर महीने 1500 रुपये दिए जाएंगे. साथ ही घरेलू गैस सिलेंडर 500 रुपये में उपलब्ध कराया जाएगा.
इसके जवाब में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने 'लाड़ली बहना' की राशि को 1000 रुपये से बढ़ाकर 1250 रुपये प्रति माह कर दिया था.
जब दिसंबर 2023 में चुनाव का नतीजा आया तो शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को कुल 230 सीटों में से 163 सीटों पर जीत मिली और फिर एक बार भाजपा मध्य प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब रही.
ये भी माना जाता है कि मध्य प्रदेश में 'लाड़ली लक्ष्मी' योजना का फ़ायदा भी भारतीय जनता पार्टी को मिला.
इस योजना के तहत बालिका के नाम पर पंजीकरण के वक़्त से लगातार पांच सालों तक हर साल 6 हजार रुपये जमा किए जाते हैं और लाभार्थी को पांच साल बाद 30 हजार रुपये मिलते हैं.
फिर आया महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव.
अगस्त के महीने में महाराष्ट्र सरकार ने लाडकी बहन योजना की शुरुआत की, जिसके तहत राज्य की 21 से 65 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये दिए जाने लगे.
चुनाव प्रचार के दौरान महायुति गठबंधन ने इस राशि को बढ़ाकर 2100 रुपये महीना करने का वादा किया था.
नवंबर में जब चुनाव का नतीजा आया, तो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने कुल 288 सीटों में से 231 सीटें जीतीं और राज्य में फिर से सरकार बनाई.
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक़, 'लाडकी बहिण' योजना में करीब 2.4 करोड़ महिलाओं का पंजीकरण हुआ है. महाराष्ट्र में महिला वोटरों की कुल संख्या करीब 4.5 करोड़ है.
अगस्त 2024 में झारखंड सरकार ने 'मैया सम्मान' योजना शुरू की, जिसके तहत महिला लाभार्थियों को हर महीने 1000 रुपये देने का प्रावधान है.
झारखंड में नवंबर 2024 में विधानसभा चुनाव होने थे और चुनावों से पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एलान किया कि अगर दोबारा उनकी सरकार बनी तो इस योजना के तहत दी जाने वाली राशि को 1000 रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 2500 रुपये प्रति माह कर दिया जाएगा.
नवंबर 2024 में झारखंड चुनाव का नतीजा आया और हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा विधान सभा की कुल 81 सीटों में से 34 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और फिर एक बार सरकार बनाई.
महिलाओं के लिए योजनाओं पर कितना खर्चा?

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'स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया' की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ अलग-अलग राज्यों में महिलाओं को 'डायरेक्ट कैश ट्रांसफर' के जरिये दी जाने वाले धनराशि कुल मिलाकर 2 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर गई है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक़, महिलाओं को 'लाडकी बहिण' योजना के ज़रिये पैसा देने के लिए महाराष्ट्र ने सबसे ज़्यादा 46,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है.
दूसरे नंबर पर कर्नाटक है, जिसने 'गृह-लक्ष्मी' योजना के तहत महिलाओं को सालाना 28,608 करोड़ रुपये देने का प्रावधान किया है.
इसी तरह, मध्य प्रदेश ने 'लाड़ली बहन' योजना के तहत 18,984 करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल ने 'लक्ष्मीर भंडार' योजना के तहत 14,400 करोड़ रुपये, गुजरात ने 'नमो श्री योजना' के तहत 12,000 करोड़ रुपये, और ओडिशा ने 'सुभद्रा योजना' के तहत 10,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है.
छत्तीसगढ़ सरकार ने विवाहित महिलाओं को सालाना 12,000 रुपये की सहायता देने के लिए 'महतारी वंदना योजना' शुरू की है.
पश्चिम बंगाल की 'लक्ष्मीर भंडार' योजना के तहत समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की महिलाओं को एकमुश्त 1,000 रुपये का अनुदान देने का प्रावधान है.
ओडिशा में 'सुभद्रा' योजना के तहत 21-60 वर्ष की आयु की सभी पात्र महिलाओं को 5 वर्षों में 50,000 रुपये देने का प्रावधान है.
गुजरात में 'नमो श्री' योजना में एससी, एसटी और बीपीएल श्रेणियों से संबंधित गर्भवती महिलाओं को 12,000 रुपये की एकमुश्त वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है.
हिमाचल प्रदेश सरकार ने भी 2024 में घोषणा की कि 18 से 60 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं को 1,500 रुपये प्रति माह दिया जाएंगे.
महिलाएं एक बड़ा वोट बैंक?

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तो क्या राजनीतिक दल ये योजनाएं सिर्फ़ महिलाओं को एक बड़ा वोट बैंक समझकर ला रहे हैं?
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, "महिलाएं एक बहुत बड़ा वोट बैंक हैं. वे बड़ी संख्या में मतदान करती हैं और कई मामलों में पुरुषों से भी ज़्यादा संख्या में मतदान करती हैं.बहुत सारी पहलों ने महिलाओं को सशक्तिकरण का एहसास दिलाया है. संसद और राज्य विधानसभाओं में अगले दस साल में उन्हें आरक्षण देने की बात हो रही है."
"लेकिन इस सशक्तिकरण का क्या फ़ायदा है? ये महिलाएँ अर्थव्यवस्था और जीडीपी वृद्धि में योगदान नहीं दे पाएंगी."
विनोद शर्मा कहते हैं कि भारत में कल्याणवाद की राजनीति काफ़ी पुरानी है और सबसे पहले इसने दक्षिण भारत में जड़ें पकड़ीं, जिसके बाद ये उत्तर भारत में आई और पिछले कुछ सालों में उत्तर भारत के राजनीतिक दलों ने इसे परवान चढ़ाया.
वो कहते हैं, "सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद देश में ग़रीबी और अभाव है. इस तरह की राजनीति से ये चिंता पैदा होती है कि क्या हम मुफ़्तखोरों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जो बिना मेहनत किए मुफ़्त में चीजें लेते रहेंगे."
वो कहते हैं "मनरेगा एक ऐसी योजना थी, जिसमें आपको ग्रामीण इलाकों में काम करने के लिए भुगतान मिलता था. लेकिन, इन योजनाओं में ऐसा कुछ नहीं है. ये हालात को बदतर बनाने जैसा है. मुझे नहीं पता कि हमारी अर्थव्यवस्था इसे लंबे समय तक चला सकती है या नहीं."
विनोद शर्मा मानते हैं कि कल्याणकारी राज्य में गरीबों को मदद की ज़रूरत होती है.
लेकिन साथ ही वो कहते हैं, "ये मदद नहीं है. ये लोगों को मुफ़्तखोरी के रास्ते पर डालने जैसा है. मुफ़्तखोरी लोगों के दिमाग़ पर नशे जैसा असर डालती है."
उनका कहना है "लोगों को नौकरी दें, उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं. ऐसी योजनाओं से आप मुफ़्तखोरों की पीढ़ी तैयार कर रहे हैं."
सही अर्थशास्त्र या महज़ राजनीति?

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प्रोफ़ेसर रीतिका खेड़ा एक जानी-मानी अर्थशास्त्री हैं, जो फिलहाल दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में कार्यरत हैं.
वो कहती हैं, "राजनीतिक दल इन योजनाओं का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि कैश ट्रांसफर्स का कोई आर्थिक औचित्य नहीं है. मुझे लगता है कि पूरी बहस के राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही पहलू हैं."
वो कहती हैं "लेबर फ़ोर्स में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है और सरकारें ऐसे अवसर और वातावरण बनाने में विफल रही हैं, जहाँ महिलाएँ बाहर आ सकें, काम कर सकें, पैसा कमा सकें और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकें."
प्रोफ़ेसर खेड़ा कहती हैं कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र न होना महिलाओं के लिए कई तरह की दिक्कतें पैदा करता है. बहुत सी महिलाएँ सभी घरेलू काम करती हैं, जिनका आर्थिक मूल्य है, लेकिन समाज, परिवार, या अर्थव्यवस्था में उन्हें कोई महत्व नहीं दिया जाता."
उनका कहना है "तो उस तरह से देखें, तो महिलाओं को ये कैश ट्रांसफ़र बाज़ार में अवसरों की कमी के लिए एक तरह का आर्थिक मुआवजा देने के रूप में देखा जा सकता है."
क्या ये योजनाएं आर्थिक रूप से टिकाऊ हैं?

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खेड़ा कहती हैं, "ये योजनाएँ सस्ती नहीं हैं. अगर आप इन योजनाओं को एक बड़ी आबादी तक पहुंचाते हैं और अगर आप एक ऐसी राशि देते हैं, जो उनके लिए मायने रखती है, तो ये एक महंगा कार्यक्रम है."
वो कहती हैं "फिर आपको इन योजनाओं के लिए पैसा जुटाने के लिए ज़्यादा संसाधन जुटाने की बात करनी होगी, जो कोई भी राजनीतिक दल किसी भी राज्य स्तर पर करता हुआ नहीं दिखता है.और अगर वे इसके लिए अधिक संसाधन नहीं जुटा रहे हैं तो साफ तौर पर वे इस तरह के कैश ट्रांसफ़र के लिए पैसा जुटाने के लिए अन्य योजनाओं के बजट में कटौती करेंगे."
खेड़ा कहती हैं "ये चिंता की बात है. ये एक हाथ से लेने और दूसरे हाथ से देने जैसा होगा."
बहुत से राज्य इन योजनाओं के लिए हज़ारों करोड़ रुपयों का प्रावधान कर रहे हैं. तो क्या इन योजनाओं से भविष्य में राज्यों को वित्तीय समस्याओं का सामना करना होगा?
प्रोफेसर खेड़ा कहती हैं, "अभी कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि ये योजनाएँ बहुत नई हैं.अगर सरकारें योजनाओं के लिए ज़्यादा संसाधन जुटाने में कामयाब होती हैं, तो ये ज़रूरी नहीं है कि इससे वित्तीय समस्या पैदा हो."
उनका कहना है "लेकिन, अगर वे ऐसा नहीं करते और बजट में कहीं और कटौती नहीं कर पाते, तो ऐसी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं."

राजनीतिक दलों को कितना फ़ायदा?

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संजय कुमार, दिल्ली स्थित 'सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज' (सीएसडीएस) में प्रोफ़ेसर हैं और एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक हैं.
हमने उनसे पूछा कि क्या महिलाओं को 'डायरेक्ट कैश ट्रांसफर' योजनाओं से राजनीतिक दलों को फ़ायदा हो रहा है?
उन्होंने कहा, "निश्चित तौर पर फ़ायदा हो रहा है. इन योजनाओं के जो लाभार्थी हैं, अगर उनके वोट को देखें तो उनका वोट सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में झुका हुआ दिखाई पड़ेगा...राज्य दर राज्य, चुनाव दर चुनाव."
वो कहते हैं "लेकिन क्या हम ऐसा मान लें कि जो सारे लाभार्थी हैं, वे सब सत्ताधारी पार्टी को वोट दे रहे हैं? ऐसा नहीं होता है. कुछ ऐसे लाभार्थी भी होते हैं, जो सत्ताधारी पार्टी को वोट नहीं देते लेकिन ट्रेंड एकदम साफ दिखाई पड़ता है."
"लाभार्थियों में से ज़्यादा का झुकाव आपको सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में दिखाई पड़ता है. इसका सीधा-सीधा मतलब है कि योजनाओं का फ़ायदा सत्ताधारी पार्टी को मिल रहा है."
संजय कुमार कहते हैं कि अगर आप किसी भी समुदाय के लिए टार्गेटेड स्कीम्स लेकर आते हैं और उस समुदाय को उनका फायदा मिलता है, तो इसका फायदा राजनीतिक दलों को मिल रहा है.
लेकिन साथ ही वे ये भी कहते हैं कि ये कहना अतिशयोक्ति होगी कि केवल इसी वजह से पार्टियां चुनाव जीत जाती हैं.

तो क्या इस तरह की योजनाओं की वजह से चुनावों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है?
संजय कुमार कहते हैं, "सीधा-सीधा संबंध निकाल पाना तो बहुत मुश्किल है. कई अन्य कारण भी हैं."
वो कहते हैं "मुझे लगता है सोशल मीडिया महिला वोटरों को मोबिलाइज़ और उत्साहित करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. इसके अलावा जो स्थानीय निकायों के चुनाव या पंचायत चुनाव कई राज्यों में हुए हैं उसकी वजह से महिलाएं राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक और सक्रिय हुई हैं."
"ये भी एक नया कारण जुड़ गया है उसमें कि महिलाओं को सीधे सुविधाएं मिल रही हैं, सीधे उनके खाते में पैसे मिल रहे हैं तो उन्हें लगता है कि वोट देना चाहिए."
संजय कुमार कहते हैं "महिलाओं के बढ़ते टर्नआउट में एक फैक्टर ये भी है. कितना है कह पाना बहुत मुश्किल है. लेकिन ये फैक्टर एक ज़रूरी भूमिका निभा रहा है. क्योंकि आप अगर दस साल के चुनावी इतिहास को देखें तो हर चुनाव में महिलाओं का वोट बढ़ता हुआ दिखा है चाहे वो राज्य का चुनाव हो या लोकसभा का."
ज़रूरी बात ये भी है कि भले ही चुनावों में ये पता चल जाता है कि महिलाओं की वोट देने में भागीदारी बढ़ी लेकिन ये कैसे पता लगाया जाए कि कितनी महिलाओं ने किस पार्टी के पक्ष में वोट दिया.
संजय कुमार कहते हैं, "सीधा-सीधा संबंध तो नहीं निकाल सकते. सर्वे के आधार पर हम आकलन करने की कोशिश करते हैं."
"अगर किसी पार्टी को पुरुष वोटरों की तुलना में महिला वोटरों में दो या तीन फ़ीसदी की बढ़त है और अगर महिला वोटरों का टर्नआउट ज़्यादा हो रहा है, तो निश्चित तौर पर पार्टियों को उसका फ़ायदा मिल रहा है."
क्या ये वोट ख़रीदने जैसा है?

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इस तरह की योजनाओं की एक बड़ी आलोचना ये भी रही है कि इनके ज़रिये लालच देकर वोट हासिल करना वोट ख़रीदने जैसा है.
विनोद शर्मा कहते हैं कि एक मज़बूत तर्क ये रहता है कि संसाधनों का समान वितरण हो और इसे सुधारों का मानवीय चेहरा कहा जाता है.
वो कहते हैं, "लेकिन सुधारों का मानवीय चेहरा अब बिगड़ गया है. क्योंकि सत्ता में बैठी पार्टियों को लगता है कि नकदी हाथ में देने से वे सरकारी मोर्चे पर नाकामियों से जनता का ध्यान भटकाने में सफल हो सकते हैं."
विनोद शर्मा कहते हैं " ये ऐसा ही है कि पैसा देकर वोट ले लो. इससे ज़्यादा पीछे ले जाने वाली सोच क्या हो सकती है?"
संजय कुमार कहते हैं, "एक आलोचनात्मक विश्लेषण तो यही कहेगा कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर के ज़रिये वोट जुटाए जा रहे हैं. ये मूलभूत ज़रूरत की बात नहीं है. ये बिजली, पानी, सड़क की बात नहीं हो रही है. आप सीधे तौर पर पैसे दे रहे हैं तो इसकी आलोचना में कहा जा सकता है कि ये सही नहीं है. आप लेवल प्लेइंग फील्ड (समान अवसर) उपलब्ध नहीं करा रहे हैं."
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