यूक्रेनी महिलाओं की टोली जो मार गिरा रही हैं रूसी ड्रोन

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- Author, सारा रैंसफोर्ड
- पदनाम, पूर्वी यूरोप संवाददाता, बुचा के पास
यूक्रेन का एक शहर है बुचा. यहां अंधेरा छाते ही रूस के हमलावर ड्रोन के झुंड आने शुरू हो जाते हैं. लेकिन ठीक उसी समय निकलती हैं कुछ बेखौफ़ महिलाएं.
बात हो रही है यूक्रेन की एयर डिफ़ेंस यूनिट की, जिसमें ज्यादातर महिलाएं ही शामिल हैं.ये महिलाएं खुद को 'विचेज़ ऑफ़ बुचा' कहती हैं. ये एयर डिफेंस यूनिट की वॉलंटियर हैं.
चूंकि पुरुषों को ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में युद्ध के अग्रिम मोर्चे पर भेजा जा रहा है. ऐसे में महिलाएं यूक्रेन के आसमान की हिफ़ाजत के लिए आगे आ रही हैं.
यूक्रेन के सैनिक अक्सर रूस के उन ड्रोन्स पर निगाह रखते हैं, जिन्हें उनके मिसाइल हमलों से पहले एक साथ एक लहर के तौर भेजा जाता है ताकि यूक्रेनी सैनिकों की प्रमुख सुरक्षा पंक्ति पर हावी हुआ जा सके.

ये महिलाएं रात में यूक्रेन के आसमान की हिफ़ाजत करती हैं लेकिन दिन में वो टीचर और डॉक्टर के तौर पर काम करती हैं.
कई लोग कहते हैं कि यह एक तरीका है, उस विवशता से बाहर आने का, जो उस वक़्त महसूस हुई थी जब रूसी सेना ने बड़े पैमाने पर हमले कर बुचा पर कब्जा कर लिया था.
ये उन दिनों की डरावनी कहानियाँ हैं, जिनमें हत्या, यातना और अपहरण जैसी घटनाएं शामिल हैं.
ये तब बाहर आना शुरू हुईं, जब मार्च 2022 के अंत में यूक्रेनी सेनाओं ने इस इलाक़े को आज़ाद करवा लिया.
हवाई हमले और पुराने जमाने के हथियार

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वेलेंतिना एक पशु चिकित्सक हैं, जो इन गर्मियों में ड्रोन बस्टर्स के तौर पर जुड़ी थीं, उनका कॉलसाइन (पुकारे जाने वाला नाम) वाल्किरी है.
वह याद करते हुए बताती हैं,'' मैं 51 साल की हूं. मेरा वजन 100 किलो है. मैं दौड़ नहीं सकती हूं. मुझे लगा था कि वो मुझे पैकिंग का काम सौपेंगे मगर उन्होंने ड्रोन बस्टर्स टीम में ले लिया.''
वह उन दोस्तों के बारे में बात करती हैं, जिन्हें मोर्चे पर तैनात किया गया था और वो भी जो इस जंग में मारे गए हैं. वह बताती हैं कि यही वो वजह है, जो उनको इस भूमिका के लिए खींच लाई.
वेलेंतिना कहती हैं, '' मैं यह काम कर सकती हूं. यह किट भारी है, लेकिन हम महिलाएं ये कर सकती हैं.''
वेलेंतिना को ऐसा करके दिखाने का मौका मिलता है, क्योंकि कुछ घंटों बाद पूरे इलाक़े में हवाई अलर्ट जारी हो जाता है.
उनकी यूनिट अपने बेस से जंगल की ओर भागती है और हम अंधेरे में उनके पिक-अप ट्रक के पीछे चलते हैं, जो मैदान के बीच से आगे बढ़ रहा है.
चार लोगों की टीम अपने हथियार तैनात करने के लिए आगे बढ़ती है.
लेकिन इनकी मशीनगें किसी और जमाने की हैं. दो मैक्सिम मशीनगनें जो 1939 के बनी हैं. हथियारों के बक्सों में सोवियत संघ के जमाने के लाल सितारों वाली मुहरें लगी हैं.
सैरी, इस टीम में एक मात्र पुरुष हैं, जिन्हें इनमें कूलेंट के तौर पर हाथ से बोतलबंद पानी डालना पड़ता है.
लेकिन बाबा-आदम के जमानों के इन हथियारों का रखरखाव काफी अच्छा है. इन महिलाओं ने बताया कि उन्होंने इन्हीं हथियारों से अब तक तीन ड्रोन मार गिराए हैं.
ड्रोन से मुकाबला

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वेलेंतिना बताती हैं, ''मेरी भूमिका ड्रोन की आवाज़ ध्यान से सुनने की है. यह परेशान करने वाला काम है, लेकिन हमें हर पल हल्की सी आवाज़ को सुनने के लिए भी सतर्क रहना होता है.''
उनकी दोस्त इना लगभग 50 साल की हैं. और वह अपनी पहली तैनाती पर बाहर गई हैं.
वह कहती हैं, '' यह डरावना है. लेकिन बच्चों को जन्म देना भी तो डरावना अनुभव है. और मैंने तीन बच्चों को जन्म दिया है."
वह हंसते हुए बताती हैं कि उनका कॉल साइन 'चेरी' है.
चेरी गणित पढ़ाती हैं और कई बार उनको जंगल से सीधे क्लास लेने के लिए दौड़ना पड़ता है.
वह कहती हैं, ''मैं अपने कपड़े कार में रखती हूं. जूते भी. लिपिस्टक लगाती हूं और फिर कार में बैठ जाती हूं. कोने में जाकर कपड़े बदलती हूं और फिर चल पड़ती हूं पढ़ाने. फिर लौट कर आती हूं. कार में बैठती और चल पड़ती हूं जंग के मैदान में.''
''पुरुष जा चुके हैं. लेकिन हम यहां मौजूद हैं. यूक्रेनी महिलाएं क्या नहीं कर सकतीं. हम हर काम कर सकते हैं.''

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दूर कुछ रोशनी दिखती है, जो किसी दूसरे ग्रुप की लगती है. वो खुद के इलाक़े में आसमान में ख़तरे को भांप रहा है.
वॉलंटियर यूनिट पर कोई सार्वजनिक डेटा नहीं है. ये नहीं मालूम कि इसमें कितनी महिलाएं शामिल हैं.
मगर जैसे ही रूस रात को विस्फोटकों से भरे ड्रोन भेजता है, तो ये यूनिट्स बड़े कस्बों और शहरों के ऊपर एक अतिरिक्त ढाल के इर्द-गिर्द सुरक्षा की एक बड़ी ढाल बनाने में मदद करती हैं.
इन महिलाओं ने अपनी तैनाती वाली जगह से अपने टैबलेट पर दो ड्रोन ट्रैक किए. ये दोनों पड़ोसी इलाके के ऊपर मंडरा रहे थे.इसका मतलब बुचा पर फिलहाल कोई ख़तरा नहीं था.
कोई पुरुष नहीं बचा

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वॉलंटियरों का कमाडंर एक लंबा-चौड़ा शख्स है. वह पूर्वी डोनबास इलाक़े के पोक्रोवस्क से लौटा है, जहां अब तक की सबसे भीषण लड़ाई चल रही है.
उनका नाम एंद्रेई वर्लेती है. वह हंसते हुए कहते हैं,''वहां लगातार गोलीबारी हो रही थी.''
उनके पास लगभग 200 लोग थे, जो बुचा इलाक़े में मोबाइल एयर डिफ़ेंस यूनिटों का संचालन करते थे और रात में कर्फ्यू के दौरान गश्त करते थे. वो पूर्ण सैन्य सेवा के अयोग्य थे.
इसके बाद यूक्रेन ने अपने सैन्य लामबंदी क़ानून में बदलाव किया. बदले नियमों की वजह से अब ज्यादा सैनिकों की जरूरत थी. लिहाजा कर्नल की टीम में से कइयों ने पाया अब वे अग्रिम चौकियों में लड़ने की योग्यता रखने लगे हैं.
कर्नल वर्लेती ने बगैर किसी लागलपेट के कहा,'' मेरे 90 फ़ीसदी आदमी सेना में चले गए जबकि 10 फ़ीसदी छिप गए. हमारे पास मुश्किल से कोई बचा. ऐसे पुरुष बचे हैं जिनके पैर नहीं हैं, या फिर आधी खोपड़ी ही गायब है.''
उसके पास ये विकल्प था. या तो भूमिका (सैनिक के तौर पर मोर्चा संभालना) के लिए तय उम्र से कम आयु के पुरुषों को भर्ती करें या फिर महिलाओं को शामिल करें.
''शुरुआत में महिलाओं को शामिल करने की बात को पहले मजाक समझा जा रहा था. महिलाओं पर कम भरोसा किया जाता था. लेकिन अब ये सोच पूरी तरह बदल गई है.''
अपने हाथ में कमान

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महिलाएं वीकेंड का अधिकतर वक्त व्यापक मिलिट्री ट्रेनिंग लेने में बिताती हैं. जिस दिन हम वहां पहुंचे उस दिन उन्हें किसी इमारत को उड़ाने के बारे में पहला सबक दिया जा रहा था.
इन्हें एक खेत के आउटहाउस में सिखाया जा रहा था, जो पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था.
कुछ लोग अपनी प्रतिबद्धता को लेकर ज्यादा भरोसे के साथ बात करते हैं. मगर महिलाओं की प्रतिबद्धता और फोकस साफ है. वो अपनी निजी और गहरी वजहों की वजह से ऐसा कर रही हैं.
वेलेंतिना ने मुझे बताया,''मुझे मेरा पेशा याद है.. मुझे अपने बच्चों की दहशत याद है. वो गहरी सांस लेकर कहती हैं. हम जब भाग रहे थे और बिखरी लाशें याद आ रही थीं. ''
उनका परिवार मारे गए सैनिकों और नागरिकों और जले हुए टैंकों के बीच से होकर बुचा से भागा था और नागरिकों के जलने के बाद उनका परिवार बुचा से बच कर निकल गया था.
उन्होंने बताया कि एक रूसी चेक पॉइन्ट पर तैनात एक सैनिक ने उनको कार का शीशा नीचे करने के लिए कहा और उनके बेटे के सिर पर बंदूक तान दी. वो अंदर ही अंदर गुस्से से उबल पड़ीं.
यही वजह है कि वेलेंतिना ने अब यूक्रेन की जीत पर भरोसा करना बंद कर दिया है. जबकि रूस से
यही वजह है कि वेलेंतिना ने यूक्रेन की जीत पर विश्वास करना बंद करने से इनकार कर दिया, जबकि रूस से लड़ाई शुरू हुए लगभग एक हजार दिनों के बाद उनके देश के ज्यादातर हिस्से पर निराशा के बादल छाए हुए हैं.
वो कहती हैं,'' हमारी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है. हमारी भविष्य की योजनाएं तार-तार हो चुकी हैं. मगर मैं यहां इस जंग को जल्दी ख़त्म करने में मदद करने के लिए मौजूद हूं. जैसे हमारी लड़कियाँ कहती हैं, यह जंग हमारे बिना ख़त्म नहीं होगी.''
'अब ताकतवर महसूस करती हूं'

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ऑफिस मैनेजर आन्या हाथों में राइफल उठाए और आर्मी बूट पहने हुए आन्या टूटे हुए कांच और पत्थरों के टुकड़ों के ऊपर से गुजर रही हैं.
52 साल की आन्या को लग रहा है कि मिलिट्री ट्रेनिंग ने उन्हें ज्यादा सशक्त बनाया है.
वो कहती हैं, ''अपने पेशे में मुझे ये लगता था कि मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. ना तो मैं किसी को मदद कर पा रही थी और ना ही अपना बचाव कर पा रही थी. मैं हथियार चलाना सीखना चाहती थी ताकि मैं किसी काम के लायक तो बनूं.''
ट्रेनिंग देने वालों के साथ खुल कर बातें हो रही थीं. महिलाएं ट्रेनिंग का आनंद ले रही थीं. लेकिन रात में जंगलों में उनके बेस में उनमें से एक और ज्यादा खुलती हैं और ज्यादा दहशत भरा अनुभव सुनाती हैं.
वो कहती हैं, ''बुचा पर कब्जे के बाद रूसी सैनिकों ने घर-घर जाना शुरू किया. उन्होंने हत्याओं और बलात्कार को अंजाम दिया. फिर एक दिन अफवाह फैली कि हमलावर बच्चों को मारने आ रहे हैं.’’
इस महिला ने बताया, '' फिर मैंने उस दिन फैसला लिया- मैं रूसियों को कभी माफ़ नहीं करूंगी.''
मैं ये नहीं बताऊंगी कि उस महिला ने मुझे क्या बताया. लेकिन उनके इस फैसले के बाद रूसी सैनिक फिर कभी नहीं आए और उन्हें कार्रवाई नहीं करनी पड़ी.
लेकिन अभी भी ये महिला उन यादों की दहशत में रहती हैं. उन्हें शर्मिंदगी भी होती है.
पहली बार उन्हें राहत तब महसूस हुई जब उन्होंने अपनी,अपने परिवार और देश की रक्षा के गुर सीखने शुरू किए.
उन्होंने मुझसे चुपके से कहा, '' यहां आकर सचमुच काफी मदद मिली. क्योंकि अब किसी घटना की शिकार होकर चुपचाप बैठी नहीं रहूंगी और ना ही इतनी डरी हुई रहूंगी.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित


















