यूक्रेन युद्ध: बूचा पर भारत की टिप्पणी, रूस, US और दुनिया के लिए क्या संकेत

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने मंगलवार शाम यूक्रेन के बूचा में आम नागरिकों की हत्याओं की निंदा की है.
उन्होंने बूचा से आईं ख़बरों को 'भीतर तक परेशान करने वाला' बताया है और संयुक्त राष्ट्र से मांग की है कि इस मामले की स्वतंत्र जांच की जाए.
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तिरुमूर्ति की ओर से दिए गए इस बयान को यूक्रेन युद्ध पर भारत की ओर से आई अब तक की सबसे कड़ी प्रतिक्रिया माना जा रहा है.
कई लोग इसे रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत के रुख में बदलाव के संकेत के रूप में भी देख रहे हैं. लेकिन भारत की इस टिप्पणी में रूस का ज़िक्र नहीं किया गया है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत के रुख में कोई बदलाव आ रहा है?
बीबीसी ने यूक्रेन के मुद्दे पर भारत के रुख में आए कथित बदलाव को समझने के लिए दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजन कुमार और पूर्व भारतीय राजदूत अचल कुमार मल्होत्रा से बात की है.
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यूक्रेन मुद्दे पर भारत का रुख
रूस और यूक्रेन के बीच बीती 24 फरवरी को शुरू हुई जंग को अब लगभग डेढ़ महीना पूरा होने जा रहा है.
इस बीच अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी समेत तमाम पश्चिमी देशों ने संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस की निंदा की और उसके ख़िलाफ़ अलग-अलग तरह के कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं.
लेकिन भारत ने अब तक इस मामले में तटस्थ रुख़ अपनाया है.
भारत सरकार ने अब तक अपने किसी भी बयान में रूस की निंदा नहीं की है. भारत ने इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में लाए गए तमाम प्रस्तावों पर मतदान से दूरी बनाए रखी है.
लेकिन बीती शाम बूचा में हुई मौतों के मामले में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति के बयान को भारत के इस रुख से अलग माना जा रहा है.
इसे ऐसा पहला मौका बताया जा रहा है जब भारत ने निंदा करने का फ़ैसला किया है.
लेकिन सवाल उठता है कि इस मुद्दे पर भारत ने जो कुछ कहा है, उसे कैसे देखा जाना चाहिए.
जॉर्जिया और आर्मेनिया में भारत के राजदूत रहे अचल कुमार मल्होत्रा मानते हैं कि इस बयान को बारीक़ी से देखे जाने की ज़रूरत है.
वे कहते हैं, "बूचा में जो कथित नरसंहार हुआ है, उसकी तस्वीरें आई हैं. उसके बाद यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि की ओर से बयान आया है. मेरा मानना है कि इस बयान को दो तरह से समझा जा रहा है. कुछ लोगों का मानना है कि भारत के रुख में बदलाव आ रहा है. आपको याद होगा कि 24 फरवरी से पहले भारत ने रूस की वैध सुरक्षा चिंताओं की बात उठाई थी."
"लेकिन रूस के सैन्य दखल के बाद से भारत ने इस मामले में तटस्थ रुख अख़्तियार किया हुआ है और यूएन में जितने भी प्रस्ताव सामने आए हैं, उसमें भारत ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया है. और रूस की नाम लेकर निंदा नहीं की है. लेकिन हम साथ ही साथ संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात करते रहे हैं. कूटनीति और बातचीत से इस समस्या का समाधान निकालने की बात भी की गयी है."
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क्यों ख़ास है भारत का ये बयान
भारत की ओर से लगातार ये कहा जा रहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय जगत में कूटनीतिक दबाव नहीं झेल रहा है. भारत सरकार ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय समूह क्वाड के सदस्य देश जैसे ऑस्ट्रेलिया और जापान भारत की स्थिति को समझ रहे हैं.
इसी पृष्ठभूमि में इस बिंदू पर चर्चा हो रही है कि भारत इस मुद्दे पर तटस्थ रहते हुए और क्या कर सकता है.
मल्होत्रा कहते हैं, "इस बयान में सबसे अहम बिंदु इसकी पंचलाइन है जिसमें कहा गया है कि भारत इस मामले में स्वतंत्र जांच की मांग करता है. ये मांग इसलिए उठाई गयी है क्योंकि जहां तक पश्चिमी देशों का नैरेटिव है, उस हिसाब से वे इस नतीज़े पर पहुंच गए हैं, और फ़ैसला भी सुना दिया है कि जो कुछ हुआ है, वो रूस ने किया है."
"रूस ने भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा है. उनका कहना है कि जब वे बूचा को अपनी मर्ज़ी से खाली करके जा रहे थे तो वह इस तरह की हरक़त क्यों करेंगे. ऐसे में भारत का इस मुद्दे पर खुलकर बयान देना और ये कहना महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर भारत को वैश्विक पटल पर एक सक्रिय भूमिका निभानी है तो ऐसे मौकों पर भारत ख़ामोश नहीं रह सकता."
वो आगे कहते हैं, "लेकिन देखने वाली बात ये है कि भारत ने किसी भी बयान का समर्थन नहीं किया है. न उन्होंने पश्चिमी देशों के मत का समर्थन किया है और न रूस के बचाव में कोई बयान दिया है. ऐसे में जो होना चाहिए वो यही है कि इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. और इसके बाद जो भी नतीज़े आते हैं, उसके हिसाब से ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिए. ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता है कि इस मुद्दे पर भारत के रुख कोई बड़ा बदलाव हुआ है. भारत अभी भी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की बात कर रहा है और कह रहा है कि इस मुद्दे को बातचीत से सुलझाया जाए."
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भारत कब तक तटस्थ बना रह सकता है?
भारत के इस रुख को कूटनीतिक भाषा में 'टाइट रोप वॉक' यानी संतुलन बनाते हुए चलने की मुश्किल कोशिश कहा जा रहा है. क्योंकि पश्चिमी देशों, विशेष रूप से, अमेरिकी अधिकारी भारत को लेकर अहम बयान दे रहे हैं.
हाल ही में दिल्ली आए अमेरिका के डिप्टी एनएसए दलीप सिंह ने एक निजी टीवी चैनल के साथ इंटरव्यू में कहा कि अगर 'चीन ने एलएसी का उल्लंघन किया तो रूस भारत के बचाव में नहीं आएगा.'
इससे पहले बीते महीने 'क्वाड' की बैठक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने ज़ोर देते हुए कहा था कि रूस के यूक्रेन पर हमले को लेकर 'कोई बहाना या टालमटोल नहीं चलेगा.'
और सबसे ताजा बयान अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन का है जिन्होंने बुधवार को भारत को आगाह किया है कि रूस के हथियारों में निवेश करना भारत के हित के लिए ठीक नहीं है.
इसके बाद भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में बताया है कि भारत इस मामले में किसके साथ खड़ा है.
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उन्होंने कहा, "यह ध्यान में रखना चाहिए कि समकालीन वैश्विक व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर आधारित है जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सम्मान, सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए बनाई गई है. अगर भारत ने एक पक्ष चुना है, तो यह शांति का पक्ष है और हिंसा को तत्काल ख़त्म करने का पक्ष है."
"सबसे महत्वपूर्ण है कि भारत यूक्रेन में संघर्ष के ख़िलाफ़ हैं. हमारा मानना है कि ख़ून बहाकर और मासूमों की जान की क़ीमत पर कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता है, आज के समय में संवाद और कूटनीति किसी भी विवाद का सही जवाब है."

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ऐसे में सवाल उठता है कि भारत आख़िर कब तक कूटनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील रुख बनाए रख सकता है. क्योंकि ये बात सही है कि रूस और भारत के बीच व्यापारिक साझेदारी अमेरिका की अपेक्षा कम है. अमेरिका के डिप्टी एनएसए ने इसका ज़िक्र भी किया है.
लेकिन देखने वाली बात ये है कि भारत ने साल 2018 में रूस के साथ दूर तक मार करने की क्षमता रखने वाली सर्फेस टू एयर मिसाइल की आपूर्ति के लिए 500 करोड़ अमेरिकी डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किया है.
यही नहीं भारत रक्षा क्षेत्र से जुड़े साजो-सामान की आपूर्ति के लिए भी रूस पर निर्भर है.
रूसी मामलों के जानकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर राजन कुमार भी भारत की इस निर्भरता का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि भारत फिलहाल अपने रुख पर बना रहेगा.
वे कहते हैं, "ये मानकर चलना चाहिए कि भारत अपने इस रुख पर बना रहेगा. क्योंकि मुझे नहीं लगता है कि भारत अगले पांच सालों में रूस के साथ अपने सामरिक हितों से अलग हो पाएगा. क्योंकि सामरिक सहयोग दीर्घकालिक होते हैं. और अमेरिका फिलहाल रूस का विकल्प नहीं हो सकता है. दलीप सिंह ने कहा था कि चीन आक्रमण करेगा तो रूस मदद करने नहीं आएगा, इस पर भारतीय विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि जब चीन ने आक्रमण किया था तो क्या अमेरिका भारत की मदद के लिए आगे आया था, क्या उसने चीन के साथ अपना व्यापार कम कर लिया था, या किस तरह की मदद की थी?"
"और चीन के साथ भारत के जो सीमा विवाद है, उसमें ये बहुत ज़रूरी हो जाता है कि रूस अगर भारत को सीधा समर्थन न दे तो कम से कम तटस्थ रहे. और चीन को समर्थन न दे. क्योंकि अगर वह चीन को सीधा समर्थन दे तो वो स्थिति भारत के लिए काफ़ी दिक्कत तलब हो जाएगी. भारत इन मजबूरियों को समझता है. ब्रह्मोस से लेकर अंतरिक्ष समेत सबमरीन आदि तमाम मुद्दों पर रूस के साथ हमारे संबंध गहरे हैं."
रक्षा क्षेत्र से जुड़ी आपूर्ति को लेकर अमेरिकी रक्षा मंत्री के बयान और भारत की रूस की निर्भरता पर मल्होत्रा कहते हैं, "अमेरिका चाहेगा है कि हम रूस से बिलकुल दरकिनार हो जाएं और अमेरिका पर निर्भर हो जाएं. हम ये नहीं चाहते हैं. हम अगर किसी पर अपनी निर्भरता को कम करेंगे तो आत्मनिर्भरता के आधार पर कम करेंगे."
वहीं, एशिया की भूराजनीतिक स्थितियों का ज़िक्र करते हुए राजन कुमार कहते हैं, "ये बात भी ध्यान रखने वाली है कि भारत ये अच्छी तरह समझता है कि एशियाई देशों में अमेरिकी प्रभाव पहले की तुलना में अब कम हो रहा है और इस क्षेत्र के देशों में अच्छे संबंध बनाने के लिए उसे रूस की ज़रूरत पड़ेगी. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि भारत कभी भी रूस को ये संकेत देगा कि भारत तटस्थ न होकर अमेरिका के साथ जा रहा है. क्योंकि भारत ये कभी नहीं चाहेगा की रूस, चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत के ख़िलाफ़ कोई समझौता कर लें क्योंकि वो स्थिति भारत के लिए काफ़ी ख़तरनाक हो जाएगी."
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