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'व्हाइट हाउस पर है हमारी नज़र', उत्तर कोरिया के इस दावे में कितना दम
- Author, फ्रांसिस माओ
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर कोरिया ने दावा किया है कि अपनी जासूसी सैटेलाइट की मदद से वो अमेरिकी राष्ट्रपति के आवास और दफ्तर, व्हाइट हाउस पर नज़र रख रहा है.
पश्चिमी मुल्कों को संदेह है कि इस साल नवंबर में छोड़ा गया उत्तर कोरिया का जासूसी सैटेलाइट काम भी कर रहा है. लेकिन उत्तर कोरिया का दावा है कि ये सैटेलाइट सही तरीके से काम कर रहा है.
उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन अपने नए जासूसी उपकरण के बारे में बताते नहीं थकते, वो इस सैटेलाइट से मिलने वाले नतीजे साझा कर रहे हैं.
उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया ने मंगलवार को कुछ जगहों की एक लिस्ट छापी और लिखा कि सैटेलाइट ने इन जगहों को देखा है.
इस लिस्ट में व्हाइट हाउस, अमेरिकी रक्षा विभाग का मुख्यालय पेंटागन, अमेरिका के उत्तर और पूर्वी हिस्से में तट के आसपास बने वायुसेना के ठिकाने और गुआम प्रांत का नाम है.
लिस्ट में दक्षिण कोरिया के सैन्य टार्गेट और बंदरगाह शहर बुसान भी शामिल हैं. इसके अलावा एक और नाम जो चौंकाने वाला है वो है इटली की राजधानी रोम.
लिस्ट में शामिल जगहों के नाम देखें तो ये गंभीर मामला लगता है, लेकिन शायद ऐसा न हो.
इस रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर अमेरिकी सेना के एक अधिकारी ने मंगलवार को कहा, "मैं ये कहूंगा कि व्हाइट हाउस और पेंटागन की हज़ारों तस्वीरें इंटरनेट पर ऑनलाइन मौजूद हैं. इस मसले को यहीं छोड़ते हैं."
ये बात सच भी है कि कोई भी गूगल अर्थ या फिर इंटरनेट लाइवस्ट्रीम पर व्हाइट हाउस को देख सकता है और उसकी तस्वीरें ले सकता है. बीबीसी ने भी ऐसा कर के देखा है. यूट्यूब पर खोजने पर हमें पहला परिणाम मिला- व्हाइट हाउस का लाइव कैम.
तो फिर सवाल ये है कि किम जोंग-उन इस तरह का दावा कर क्या साबित करना चाहते हैं?
वो इसे बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे हैं या फिर वास्तव में उन्हें कुछ इस्तेमाल लायक मिला है?
क्या काम कर रहा है सैटेलाइट?
उत्तर कोरिया का जासूसी सैटेलाइट काम कर भी रहा है या नहीं, इसे लेकर शक़ जताया जा रहा है.
सप्ताह भर से अधिक वक्त से ये सैटेलाइट अंतरिक्ष में तैर रहा है और अब तक इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है कि ये सैटेलाइट धरती पर तस्वीरें भेज रहा है.
अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान का कहना है कि उन्हें अब तक केवल ये पता है कि ये सैटेलाइट अपनी कक्षा में है.
सोल की कूकमिन यूनिवर्सिटी में उत्तर कोरिया की राजनीति मामलों पर शोध कर रहे फ्लोदोर तेरतितस्की का कहना है कि उत्तर कोरिया के बारे में जो एक बात हमें पता है वो ये है कि "वो हमेशा झूठ कहता रहता है."
वो कहते हैं, "अगर वो कोई दावा करते हैं तो ज़रूरी नहीं कि वो सही हो. उनके उठाए कदमों को हमेशा ध्यान से देखें."
फर्जी तस्वीरों को शेयर करते हुए अपनी सैन्य शक्ति के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर कहना और अपने हथियारों की काबिलियत के बारे में दावा करना उत्तर कोरिया का इतिहास रहा है. ये राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रोपेगैंडा का हिस्सा रहा है.
उत्तर कोरिया ने इस बार कथित तौर पर सैटेलाइट से मिल रही तस्वीरों को साझा नहीं किया है.
ये हो सकता है कि वो तस्वीर जानबूझकर इसलिए साझा नहीं कर रहा है क्योंकि वो नहीं चाहता कि उसके दुश्मनों को ये पता न चल सके कि उसका जासूसी सैटेलाइट क्या-कुछ देख सकता है.
सामरिक महत्व
लेकिन अगर ऐसा हो कि उत्तर कोरिया का सैटेलाइट काम कर रहा है, तो भी जानकार मानते हैं कि सर्विलांस से जो तस्वीरें उत्तर कोरिया को मिली होंगी, उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होगी.
जानकार कहते हैं कि उत्तर कोरियाई सैटेलाइट का रिज़ॉल्यूशन सीमित है, ये 3एम से 5एम की रेंज में है.
सोल में एशियन इंस्टीट्यूट फ़ॉर पॉलिसी स्टडीज़ में उत्तर कोरियाई सेना पर शोध कर रहे यूक यांग कहते हैं, "अगर वो व्हाइट हाउस को देख भी सकते हैं तो भी इसका उनके लिए कोई सामरिक महत्व नहीं है."
वो कहते हैं, "कम रिज़ॉल्यूशन होने के बावजूद, उत्तर कोरिया का सक्रिय सैटलाइट ये साबित करता है कि वो अब परमाणु हमलों के लिए टार्गेट को चिन्हित कर सकता है. ऐसे में इस सैटलाइट के रणनीतिक तौर पर अहम मायने हैं."
दूसरी अहम बात ये है कि ये सैटलाइट शायद अभी ज़रूरी ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा न कर पा रहा हो, लेकिन उसका दावा ये ज़रूर बताता है कि उत्तर कोरिया तकनीक के मामले में खुद को आगे ले जा रहा है.
लेफ़ एरिक एसले, सोल की इव्हा यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर हैं. वो कहते हैं, "उसका लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन करते हुए अपनी क्षमता बढ़ाना और अपने लॉन्च को सामान्य बनाना है."
वो कहते हैं कि "अपने सैटलाइट कार्यक्रम को लेकर उत्तर कोरिया हमेशा से बचाव की मुद्रा में रहता है. वो कहता है कि ये उसका संप्रभु अधिकार है, उसकी सेना की ज़रूरत है और घरेलू राजनीति में लोगों से किया वादा है."
जेम्स मार्टिन सेन्टर फ़ॉर नॉन प्रॉलिफ़रेशन स्टडीज़ में सैटेलाइट इमेजरी विशेषज्ञ डेव श्रमेरलर कहता हैं, "मुझे लगता है कि उनके लिए ये बड़ी उपलब्धि है, शून्य से आगे बढ़कर कुछ हासिल करने जैसा."
रॉयटर्स समाचार एजेंसी से उन्होंने कहा, "लेकिन जब तक हम उन तस्वीरों को न देख लें जो उन्होंने एकत्र की हैं, हम केवल उनके इस्तेमाल को लेकर अंदाज़ा लगा रहे हैं."
बाइडन और दुनिया को संदेश देने की कोशिश?
उत्तर कोरिया का लंबे वक्त से राजनीतिक लक्ष्य रहा है कि उसके पास दूसरों पर नज़र रखने के लिए आसमान में आंखें हों. वो जानता है कि पश्चिमी मुल्क दशकों पहले से उसके पूरे क्षेत्र को देख पाने में सक्षम हैं.
प्रोफ़ेसर लेफ़ एरिक एसले कहते हैं, " उत्तर कोरिया को डर है और वो इस बात से नाराज़ है कि अमेरिकी सैटेलाइट उसे देख सकते हैं. वो दक्षिण कोरिया के साथ अंतरिक्ष की रेस और हथियारों की होड़ में शामिल है."
फ्लोदोर तेरतितस्की कहते हैं कि ये रिपोर्ट उत्तर कोरिया के मुख्य अख़बार रोडोंग सिनमुन में छपी है, जो अपने आप में इस बात का इशारा है कि इसका लक्ष्य घरेलू के साथ अंतरराष्ट्रीय पाठक भी हैं.
वो कहते है कि पश्चिमी मुल्कों के लिए उत्तर कोरिया "अपनी ताकत का प्रदर्शन" कर रहा है भले ही उसकी ताकत सही हो या नहीं. ये पश्चिम को उनका सीधा संदेश है कि वो उत्तर कोरिया के सैन्य ठिकानों और परमाणु ठिकानों पर अपनी नज़र न रखे.
वो कहते हैं, "वो ये संदेश दे रहा है कि अगर आपने हमारे ठिकानों पर हमला करने की कोशिश की तो हम आपको तबाह कर देंगे."
"और व्हाउट हाउस उनका पागलपन क्यों है इसकी भी एक वजह है. ये अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को निजी तौर पर संदेश देने की उनकी कोशिश कि हमारी नज़र आप पर है. हम केवल अमेरिका पर नहीं आप पर भी नज़र रख रहे हैं बाइडन. हम आपको देख रहे हैं और आपको मार सकते हैं."
प्रगति दिखाने का प्रयास
इसके साथ-साथ उत्तर कोरिया का ये कदम उन लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश है जो दुनिया से अलग-थलग एक कम्युनिस्ट तानाशाह के शासनकाल में रह रहे हैं. ये बताने की कोशिश है कि देश तकनीक के क्षेत्र में प्रगति कर रहा है और तरक्की की राह पर है.
नवंबर के आख़िरी सप्ताह में सैटेलाइट लॉन्च करना और फिर हाल में अमेरिकी ठिकानों की लिस्ट साझा करना, ये ऐसे वक्त हुआ है जब उत्तर कोरिया में स्थानीय असेंबली के लिए चुनाव संपन्न हो चुके हैं.
यूके की शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी में कोरियाई स्टडीज़ की लेक्चरार डॉक्टर सारा सन कहती हैं, "मुझे शक़ है कि व्हाइट हाउस और पेंटागन जैसी महत्वपूर्ण जगहों को देखने का उत्तर कोरिया का दावा घरेलू पाठकों के लिए होगा."
"इसे इस आधार पर देखा जाना चाहिए कि उत्तर कोरिया में सामान्य नागरिक की पहुंच इंटरनेट तक नहीं है और ये भी संभव है कि उन्हें सैटेलाइट इमेजरी के ज़रिए दूसरी जगहों को देखने के लिए इंटरनेट उपलब्ध संसाधनों के बारे में कम ही जानकारी होगी."
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