हथियारों के सौदे से उत्तर कोरिया और रूस को क्या हासिल होगा

    • Author, जॉर्ज राइट और जीन मैकेंजी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन की रूस यात्रा की कथित योजना की ख़बरों से अमेरिका और उसके सहयोगी देश सावधान हो गए हैं.

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक़ किम और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच यूक्रेन युद्ध में उत्तर कोरिया द्वारा रूस को हथियार देने पर चर्चा हो सकती है.

ऊपरी तौर पर देखें तो दोनों देशों के बीच हथियारों का सौदा होने की संभावनाओं के कारण स्पष्ट नज़र आते हैं.

यूक्रेन के साथ युद्ध में रूस को हथियारों की सख़्त ज़रूरत है, ख़ासकर बम और तोपों में इस्तेमाल होने वाले गोला बारूद की. उत्तर कोरिया के पास इन दोनों की ही कोई कमी नहीं है. दूसरी ओर, प्रतिबंधों की मार से तंगहाल उत्तर कोरिया को हथियार भी चाहिए और पैसा भी.

तीन साल से सीमाएं बंद रहने और ख़ासकर 2019 में अमेरिका के साथ वार्ता के विफल होने के बाद से उत्तर कोरिया पहले से भी ज़्यादा अलग-थलग पड़ गया है.

वहीं, गहराई से देखें तो रूस और उत्तर कोरिया के बीच कोई भी सौदा हुआ तो दोनों देशों के और क़रीब आने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी.

अमेरिका पिछले कुछ समय से लगातार चेता रहा है कि इन दोनों देशों के बीच हथियारों का सौदा हो सकता है. लेकिन दोनों देशों के नेताओं की मुलाक़ात उनकी साझेदारी को नए स्तर पर ले जाएगी.

क्या है दांव पर

भले ही यह नज़र आ रहा हो कि फ़िलहाल अमेरिका की प्राथमिकता उत्तर कोरियाई हथियारों को यूक्रेन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होने से रोकना है.

मगर दक्षिण कोरिया में चिंता इस बात को लेकर है कि इन हथियारों को बेचने के बदले उत्तर कोरिया को रूस से क्या मिलेगा.

जिन ख़राब हालात में रूस को यह समझौता करना पड़ रहा है, उसे देखते हुए किम जोंग को बड़ी क़ीमत मिल सकती है. जैसे कि वह रूस से और सैन्य मदद मांग सकते हैं.

मंगलवार को ही दक्षिण कोरिया की ख़ुफ़िया एजेंसी ने बताया है कि रूस के रक्षा मंत्री सरगेई शोइगु ने उत्तर कोरिया के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास करने का सुझाव दिया है.

ठीक वैसा युद्धाभ्यास, जैसा अमेरिका ने दक्षिण कोरिया और जापान के साथ किया था, जो किम जोंग उन को रास नहीं आया था.

परमाणु हथियारों का डर

रूस को अभी हथियार देने के बदले किम भविष्य में रूसी हथियार भी ख़रीद सकते हैं.

लेकिन चिंता इस बात की जताई जा रही है कि वह पुतिन से हथियारों की तकनीक साझा करने की मांग भी कर सकते हैं ताकि परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकें.

उत्तर कोरिया अभी भी रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माने जाने वाले हथियारों, जैसे कि जासूसी करने वाले उपग्रह और परमाणु पनडुब्बी को विकसित करने में जूझ रहा है.

हालांकि, दक्षिण कोरिया में रूस और उत्तर कोरिया के बीच इस स्तर के सहयोग की संभावनाएं कम ही देखी जा रही हैं क्योंकि ऐसा करना रूस के लिए रणनीतिक तौर पर ख़तरनाक साबित हो सकता है.

एशियन इंस्टिट्यूट फ़ॉर पब्लिक पॉलिसी स्टडीज़ में शोधकर्ता यांग उक कहते हैं कि रूस भले ही बदले में उत्तर कोरिया को हथियार न बेचे मगर वह उसके परमाणु कार्यक्रम का समर्थन कर सकता है.

वह कहते हैं, ''रूस अगर तेल और खाने के रूप में इस मदद को चुकाता है तो इससे उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था उबर सकती है.''

उक कहते हैं, ''इससे उसे अपने परमाणु कार्यक्रम को मज़बूत करने में मदद मिलेगी. यह उत्तर कोरिया के लिए अतिरिक्त आमदनी होगी जो पहले उसे नहीं मिल पा रही थी.''

सैन्य और आयुध रणनीति के विशेषज्ञ यांग कहते हैं, ''हम पिछले 15 साल से उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों का एक ढांचा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उसे सामूहिक तबाही करने वाले हथियारों का विकास और प्रसार करने से रोका जा सके. अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य रूस इस पूरे ढांचे को नष्ट कर सकता है.''

उत्तर कोरिया और चीन

जैसे-जैसे प्रतिबंध बढ़े हैं, उत्तर कोरिया चीन पर निर्भर होता चला गया है. चीन भी उसकी नीतियों को नज़रअंदाज़ करते हुए खाद्यान्न की आपूर्ति कर रहा है.

पिछले साल हथियारों के परीक्षण की वजह से उत्तर कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रतिबंध लगाने से चीन ने इनकार कर दिया था.

इससे उत्तर कोरिया को किसी बड़े ख़ामियाज़े की चिंता किए बग़ैर अपने हथियारों के ज़ख़ीरे को बढ़ाने की छूट मिल गई थी.

दक्षिण कोरिया में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी को देखते हुए उत्तर कोरिया अपने यहां चीन के लिए बफ़र ज़ोन मुहैया करवाता है. मगर चीन पर बहुत ज़्यादा निर्भर होना उत्तर कोरिया के लिए ठीक नहीं है.

ऐसे में रूस में एक दोस्त तलाशकर किम अपने लिए और समर्थन जुटाना चाहते हैं. रूस की बेताबी को देखते हुए किम को लग सकता है कि उनके देश को चीन के मुक़ाबले रूस से ज्यादा फ़ायदे मिल सकते हैं.

पुतिन उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु परीक्षण करने पर चुप रहने को राज़ी हो सकते हैं जबकि ऐसा करना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए आसान नहीं होगा.

विदेश जाना पसंद नहीं करते किम

किम जोंग उन उत्तर कोरिया से बाहर निकलने के लिए इच्छुक नहीं रहते हैं. वह अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं. वो विदेश जाने को ख़तरनाक समझते हैं.

उनकी पिछली विदेश यात्राएं 2019 में हुई थीं. पहले वह फ़रवरी 2019 में डोनाल्ड ट्रंप से मिलने हनोई गए थे और अप्रैल 2019 में व्लादिवोस्तोक में पुतिन से मिले थे.

उन्होंने यह यात्रा बख़्तरबंद ट्रेन से की थी. चीन होते हुए हनोई जाने में दो दिन लगते हैं.

यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों नेता अपनी मुलाक़ात को छिपाने के लिए किस हद तक बेताब होंगे.

मगर संभव है कि इस बारे में अमेरिका ने एक रणनीति के तहत पहले ही बात खोल दी हो ताकि किम डर जाएं जिससे यह मुलाक़ात और संभावित हथियार समझौता परवान ना चढ़ सके.

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ही ख़ुफ़िया सूचनाओं को सार्वजनिक करना अमेरिका की रणनीति का हिस्सा रहा है ताकि इस तरह के सौदों को रोका जा सके.

उत्तर कोरिया और रूस ने अभी तक इन ख़बरों को ख़ारिज किया है कि वे हथियारों का आदान-प्रदान करने जा रहे हैं.

वैसे भी इस बात की बहुत कम संभावना है कि दोनों में से कोई भी पक्ष इस तरह के समझौते को सार्वजनिक करना चाहेगा.

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