यूक्रेन की जंग से ऐसे जुड़ा है रूसी राष्ट्रपति पुतिन का भविष्य

    • Author, स्टीव रोज़ेनबर्ग
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

मैं बार बार उस बात के बारे में सोचता रहता हूं, जो मैंने तीन साल पहले रूस के सरकारी टेलीविज़न चैनल पर सुनी थी.

उस वक़्त रूसी जनता से अपील की जा रही थी कि वो देश के संविधान में उस बदलाव का समर्थन करें, जिससे व्लादिमीर पुतिन को अगले 16 बरस तक सत्ता में और बने रहने का हक़ हासिल हो जाएगा.

इस बदलाव पर जनता को राज़ी करने के लिए सरकारी टीवी चैनल के न्यूज़ एंकर ने राष्ट्रपति पुतिन को समंदर में एक ऐसे कप्तान के तौर पर पेश किया था, जो रूस जैसे शानदार जहाज़ को उठा-पटक भरी दुनिया की ख़तरनाक और तूफ़ानी लहरों के बीच से सुरक्षित निकाल रहे हैं.

उस एंकर ने कहा, 'रूस स्थिरता का एक नखलिस्तान है. एक सुरक्षित बंदरगाह है. अगर पुतिन नहीं होते, तो ज़रा सोचिए हमारा क्या होता?'

कहां वो स्थिरता के नखलिस्तान और सुरक्षित बंदरगाह की बड़ी बड़ी बातें, और कहां आज का मंज़र.

24 फरवरी 2022 को रूस के इस कप्तान ने अपने जहाज़ रूपी मुल्क को एक ऐसे तूफ़ान में धकेल दिया, जो उनका ख़ुद का पैदा किया हुआ था, और वो जहाज़ सीधे जाकर बर्फ़ की चट्टान से टकरा गया.

यूक्रेन पर हमले के व्लादिमीर पुतिन के फ़ैसले से रूस के पड़ोस में मौत और तबाही मची है. इस जंग में ख़ुद रूस को भी भारी फ़ौजी नुक़सान उठाना पड़ा है: कुछ अनुमानों के मुताबिक़, इस युद्ध में रूस के दसियों हज़ार सैनिक मारे गए हैं.

लाखों रूसी नागरिकों को फ़ौज में भर्ती किया गया है और रूस की जेलों में क़ैद लोगों (जिनमें सज़ायाफ़्ता हत्यारे भी शामिल हैं) को यूक्रेन में जंग लड़ने के लिए भर्ती किया गया है.

इस बीच, इस युद्ध के चलते पूरी दुनिया में ईंधन और खाने-पीने के सामान में आग लग गई है और इससे यूरोप और बाक़ी दुनिया की सुरक्षा को ख़तरा पैदा हुआ है.

ये सारी समस्याएं बहुत बड़ी हैं.

अब सवाल ये है कि रूस के राष्ट्रपति ने अपने मुल्क को युद्ध और दूसरे की ज़मीन पर क़ब्ज़े की राह पर क्यों धकेला?

राजनीति वैज्ञानिक एकाटेरिना शुलमन इसकी वजह बताते हुए कहती हैं, 'उस वक़्त रूसी राष्ट्रपति के ज़हन में 2024 का राष्ट्रपति चुनाव था.'

वो बताती हैं, 'इस चुनाव से दो साल पहले राष्ट्रपति पुतिन कोई विजयी घटना रचना चाहते थे. अगर 2022 में वो अपने मक़सद में कामयाब हो जाते, तो 2023 में वो रूसी जनता के ज़हन में ये बात भरते कि वो कितने ख़ुशक़िस्मत हैं कि उनके मुल्क की कमान एक ऐसे शख़्स के हाथ में है, जो उनके देश रूपी जहाज़ को न केवल मुश्किल हालात से बाहर निकाल लेते हैं."

"बल्कि, उसे एक नए और समृद्ध ठिकाने पर भी पहुंचाते हैं. इसके बाद 2024 में लोग मतदान देकर उन्हें जिता देते. बस. इस योजना में क्या ही ग़लत हो सकता था?'

2022 और 2024 के बाद बहुत कुछ हो सकता था, अगर आप की योजनाएं ग़लत हिसाब किताब और अंदाज़ों पर आधारित हों.

पुतिन को ये उम्मीद थी कि उनका 'विशेष सैन्य अभियान' बिजली जैसी तेज़ी वाला होगा. उन्होंने सोचा था कि रूस की सेनाएं कुछ हफ़्तों के भीतर यूक्रेन को जीत लेंगी और उसे वापस रूस के प्रभाव क्षेत्र में ले आएंगी.

राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन के विरोध और उसके मुक़ाबला करने की क्षमता को बहुत कम करके आंका था. इसके अलावा उन्होंने जंग की सूरत में यूक्रेन को मदद देने के पश्चिमी देशों के मज़बूत इरादों का भी ग़लत अंदाज़ा लगाया था.

हालांकि, अभी भी व्लादिमीर पुतिन ने ये स्वीकार नहीं किया है कि यूक्रेन पर हमले का उनका फ़ैसला ग़लत था. पुतिन का तरीक़ा ये है कि वो अभी भी आगे बढ़ने पर ही ज़ोर दे रहे हैं. जंग को लंबा खींचकर अपना दांव और बढ़ाने पर आमादा हैं.

ऐसे में मेरे ज़हन में दो अहम सवाल पैदा होते हैं: युद्ध के एक साल बाद पुतिन, हालात को किस नज़र से देखते हैं? और, यूक्रेन में उनका अगला क़दम क्या होगा?

इस हफ़्ते उन्होंने हमें इसके कुछ इशारे दिए.

राष्ट्र के नाम उनका इस साल का संदेश, पश्चिम विरोधी ज़हर से भरा हुआ था. वो अभी भी यूक्रेन में युद्ध के लिए अमेरिका और नेटो को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं, और रूस को एक बेगुनाह किरदार के तौर पर पेश कर रहे हैं.

पुतिन ने अमेरिका और रूस के बीच बचे परमाणु हथियारों के नियंत्रण के आख़िरी समझौते, न्यू स्टार्ट में अपने देश की भागीदारी को स्थगित करने का एलान किया.

इससे पता चलता है कि पुतिन का यूक्रेन से सेना वापस बुलाने का कोई इरादा नहीं है. और, न ही वो पश्चिमी देशों के साथ अपने टकराव को ख़त्म करने वाले हैं.

अगले ही दिन मॉस्को में एक फुटबॉल स्टेडियम में पुतिन ने जंग के मोर्चे से लौटे सैनिकों के साथ कुछ वक़्त बिताया. पुतिन के समर्थन में बुलाई गई ये रैली बहुत सुनियोजित थी.

इसमें जुटी भीड़ को राष्ट्रपति पुतिन ने कहा, 'इस वक़्त रूस की ऐतिहासिक सरहदों पर एक जंग चल रही है', और उन्होंने रूस के बहादुर योद्धाओं के साहस की तारीफ़ भी की.

निष्कर्ष: ये उम्मीद बिल्कुल न करें कि पुतिन अपने फ़ैसले से पलटने वाले हैं. रूस के मौजूदा राष्ट्रपति अपने निर्णय बदलने में यक़ीन नहीं रखते हैं.

राष्ट्रपति पुतिन के पूर्व आर्थिक सलाहकार आंद्रेई इल्लारियोनोव कहते हैं, 'अगर कोई उनका विरोध नहीं करता, तो वो जब तक मुमकिन होगा तब तक आगे बढ़ते रहेंगे. उनको रोकने के लिए सैन्य ताक़त के इस्तेमाल के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.'

लेकिन, युद्ध के बजाय अगर बातचीत हो तो? क्या राष्ट्रपति पुतिन के साथ अमन के लिए बातचीत करना मुमकिन है?

आंद्रेई इल्लारियोनोव कहते हैं, 'बातचीत तो किसी के साथ भी बैठकर की जा सकती है. लेकिन, हमारा तो ऐतिहासिक रिकॉर्ड ये बताता है कि पुतिन के साथ आप बैठकर बातचीत करें, और उनके साथ समझौते कर लें.'

मगर, 'पुतिन ने उन सभी दस्तावेज़ों में किए गए वादे तोड़ डाले. स्वतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रमंडल के गठन का समझौता हो, रूस और यूक्रेन के बीच द्विपक्षीय संधि हो, या फिर रूस और यूक्रेन के बीच अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरहदें तय करने का समझौता हो, संयुक्त राष्ट्र का चार्टर हो, 1975 का हेलसिंकी समझौता हो, बुडापेस्ट का सहमति पत्र हो या दूसरे बहुत से समझौते. ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं है, जिसका उन्होंने उल्लंघन नहीं किया.

जब बात समझौते तोड़ने की आती है, तो रूसी अधिकारियों की पश्चिमी देशों से शिकायतों की अपनी एक लंबी फ़ेहरिस्त है. इस सूची में पहले नंबर पर रूस का ये दावा है कि पश्चिमी देशों ने 1990 के दशक में किया गया वो वादा तोड़ डाला कि वो, नेटो गठबंधन का पूरब में विस्तार नहीं करेंगे.

और फिर भी सत्ता में आने के बाद, शुरुआती वर्षों में व्लादिमीर पुतिन, नेटो को एक ख़तरे के रूप में नहीं देखते थे. साल 2000 में तो उन्होंने इस बात से भी इनकार नहीं किया था कि एक दिन रूस भी इस सैन्य गठबंधन का हिस्सा बन सकता है.

दो साल बाद जब उनसे यूक्रेन के नेटो का सदस्य बनने के इरादे के बारे में सवाल किया गया, तो राष्ट्रपति पुतिन ने जवाब दिया कि, 'यूक्रेन एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने आप को महफ़ूज़ रखने के लिए उसे कोई भी फ़ैसला करने का पूरा हक़ है...'

पुतिन ने ज़ोर देकर कहा था कि इससे रूस और यूक्रेन के रिश्तों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा.

लेकिन, आज 2023 में पुतिन बहुत अलग किरदार बन चुके हैं. 'पश्चिमी गिरोह' के प्रति ग़ुस्से से भरे हुए पुतिन ख़ुद को एक ऐसे क़िले के सरदार के तौर पर पेश करते हैं, जो चारों तरफ़ से घिरा हुआ है, और अपने दुश्मनों की रूस को तबाह करने की कोशिशों का डटकर मुक़ाबला कर रहा है.

अगर हम पुतिन के भाषणों और बयानों पर ग़ौर करें और उनके भाषणों में पीटर महान और कैथरीन महान जैसे रूस के शाही शासकों के बार बार होते ज़िक्र को देखें, तो ऐसा लगता है कि पुतिन को इस बात का पूरा यक़ीन है कि उनकी क़िस्मत में पुराने रूसी साम्राज्य को किसी न किसी रूप में दोबारा क़ायम करना लिखा है.

लेकिन, ऐसा किस क़ीमत पर होगा?

कभी पुतिन की छवि एक ऐसे नेता की थी, जिन्होंने अपने देश में स्थिरता क़ायम की थी. लेकिन, यूक्रेन युद्ध में रूस की सेना के बढ़ते नुक़सान, फ़ौज में अनिवार्य भर्ती और आर्थिक प्रतिबंधों के चलते वो स्थिरता तो न जाने कब गुम हो चुकी है.

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से, हज़ारों रूसी नागरिक अपना देश छोड़कर भाग चुके हैं. इनमें से बहुत से नौजवान, हुनरमंद और शिक्षित लोग थे: कुशल और क़ाबिल लोगों की इस भगदड़ से रूस की अर्थव्यवस्था को और ज़्यादा नुक़सान होगा.

युद्ध के चलते अचानक रूस में बहुत से हथियारबंद समूह उभर रहे हैं. इनमें येवगेनी प्रिगोज़िन के वैगनार समूह जैसी निजी फौजी कंपनियां और इलाक़ाई बटालियनें शामिल हैं.

रूस की नियमित सेना के साथ इनके रिश्ते भी अच्छे तो नहीं ही हैं. रूस के रक्षा मंत्रालय और वैगनार समूह के बीच खटपट से, रूस के सामंती तबक़े की अंदरूनी लड़ाई खुलकर सामने आ गई है.

अस्थिरता और निजी सेना का ये घालमेल बहुत ख़तरनाक है.

मॉस्को स्थित अख़बार नेज़ाविसिमाया गज़ेटा के मालिक और संपादक कोंस्टैंटिन रेमचुकोव मानते हैं, "अगले एक दशक में रूस के गृह युद्ध के दलदल में धंसने की आशंका है."

"ऐसे बहुत से हित समूह हैं, जो ये मानते हैं कि इन हालात में संपत्ति को दूसरे तबक़ों के बीच बांटने का एक मौक़ा निकल सकता है.'

वो कहते हैं, 'गृह युद्ध से बचने का असली मौक़ा तभी हो सकता है, जब पुतिन के फ़ौरन बाद कोई सही इंसान सत्ता में आ जाए.

कोई ऐसा शख़्स जिसका कुलीन वर्ग के ऊपर दबदबा हो और जिसके पास उन लोगों को अलग थलग करने का मज़बूत इरादा हो, जो ऐसे हालात का फ़ायदा उठाना चाहेंगे.'

मैंने कोंस्टैंटिन से पूछा कि, 'क्या रूसी सत्ताधारी वर्ग इस बात पर चर्चा कर रहा है कि वो कौन इंसान होगा, जो पुतिन के बाद हुकूमत चला सके?'

वो जवाब देते हैं, 'हां, बड़ी ख़ामोशी से. वो लोग ऐसी बातें बत्तियां बुझाकर सरगोशियों में करते हैं. बाद में उनकी अपनी राय ज़रूर होगी.'

तो, मैंने पूछा कि 'क्या पुतिन को ये मालूम है कि ऐसी बातें उनके देश में चल रही हैं?'

कोंस्टैंटिन ने कहा, 'उन्हें पता है. मुझे लगता है कि उन्हें सब कुछ मालूम है.'

इसी हफ़्ते रूस की संसद के निचले सदन के स्पीकर ने एलान किया, 'जब तक पुतिन हैं, तब तक रूस है.'

वैसे तो ये वफ़ादारी दिखाने वाला बयान था. मगर ये हक़ीक़त नहीं है. रूस, पुतिन के बग़ैर भी बचा रहेगा.

रूस सदियों से ऐसा करने में कामयाब होता रहा है. हालांकि, व्लादिमीर पुतिन का अपना भविष्य इस बात पर पूरी तरह निर्भर है कि यूक्रेन युद्ध का क्या नतीजा निकलता है.

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