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किम जोंग-उन और पुतिन की पहली मुलाक़ात
उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता किम जोंग-उन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच पहली मुलाकात हुई है. इस दौरान दोनों नेताओं ने आपसी संबंधों को मज़बूत करने की प्रतिबद्धता जताई.
किम बुधवार को ट्रेन से रूस पहुंचे. दोनों नेताओं के बीच ये मुलाकात रूस के बंदरगाह शहर व्लादिवोस्तॉक के नज़दीक रस्की द्वीप पर हुई.
रूस का कहना था कि दोनों नेताओं के बीच कोरियाई प्रायद्वीप की परमाणु समस्या पर चर्चा होगी, लेकिन ये भी कहा जा रहा था कि अमरीका के साथ बातचीत विफल होने के बाद किम रूस से सहयोग की मांग कर सकते हैं.
किम और पुतिन के बीच ये मुलाकात एक कॉलेज कैंपस में हुई. इस मद्देनज़र कॉलेज की कक्षाएं रद्द की गईं लेकिन कुछ उत्सुक छात्र दोनों नेताओं के देखने के लिए सम्मेलन स्थल पर इकट्ठा हो गए.
किम और अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के बीच इस साल की शुरुआत में वियतनाम की राजधानी हनोई में मुलाकात हुई थी, जिसमें उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम पर चर्चा हुई थी.
हालांकि दोनों नेताओं के बीच हुआ ये दूसरा सम्मेलन बिना किसी समझौते के ही खत्म हो गया था.
अपने शुरुआती भाषण में रूस और उत्तर कोरिया के नेताओं ने दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तों पर बात की और पुतिन ने कहा कि वो कोरिया में तनाव कम करने में मदद करना चाहते थे.
पुतिन ने कहा, "मुझे विश्वास है कि आपकी रूस यात्रा से हमें ये समझने में मदद मिलेगी कि हम कोरियाई प्रायद्वीप के हालात को सुलझाने के लिए क्या कुछ कर सकते हैं और रूस मौजूदा वक्त में चल रही सकारात्मक प्रक्रिया को सहयोग करने के लिए क्या कर सकता है."
वहीं किम ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि "ऐतिहासिक रिश्तों वाले दोनों देशों के बीच की ये मुलाकात सफल रहेगी."
रूस पहुंचने पर उत्तर कोरिया के नेता ने रूस के अधिकारियों से गर्मजोशी से मिले.
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रूस ने किम का बैंड के साथ स्वागत किया. जिसके बाद किम कार में बैठकर रवाना हुए.
इससे पहले किम ने रूसी टीवी से कहा था, "उम्मीद है कि ये यात्रा क़ामयाब रहेगी और मैं आदरणीय राष्ट्रपति पुतिन के साथ कोरियाई प्रायद्वीप के हालात से जुड़े मुद्दों और दोनों देशों के रिश्तों को मज़बूत करने पर कोई ठोस चर्चा कर सकूंगा."
सम्मेलन के बारे में अबतक जो पता है
रूस के राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव के मुताबिक, रूस का मानना है कि सिक्स-पार्टी टॉक्स के ज़रिए ही कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु हथियारों से जुड़े मसले को सुलझाया जा सकता है. फिलहाल ये बातचीत ठप है.
2003 में शुरू हुई इस बातचीत में दोनों कोरियाई देशों के अलावा चीन, जापान, रूस और अमरीका भी शामिल हैं.
पेसकोव ने पत्रकारों से कहा, "इस वक्त इसके अलावा कोई और बेहतर अंतरराष्ट्रीय तंत्र मौजूद नहीं है. लेकिन, दूसरी तरफ, दूसरे देश की ओर से कोशिशें भी की जा रही हैं. लेकिन ये कोशिशें तभी कामयाब हो सकती हैं जब वो सच में दोनों कोरियाई देशों की समस्याओं को सुलझाना और परमाणु निशस्त्रीकरण करना चाहते हों."
दोनों पक्ष क्या चाहते हैं?
बीबीसी की दक्षिण कोरिया संवाददाता लॉरा बिकर का कहना है कि इस यात्रा को उत्तर कोरिया के लिए एक अवसर के तौर पर देखा जा रहा है.
अमरीका के साथ बातचीत विफल होने के बाद वो दिखा सकता है कि उसके पास अब भी शक्तिशाली सहयोगी हैं.
उत्तर कोरिया ने अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो को हनोई की बातचीत विफल होने का ज़िम्मेदार ठहराया था.
इस महीने की शुरुआत में उत्तर कोरिया ने पॉम्पियो को परमाणु बातचीत से अलग करने की मांग की थी.
उत्तर कोरिया का आरोप था कि वो "बकवास करते हैं", इसलिए उनकी जगह किसी "ज़्यादा सतर्क" व्यक्ति को शामिल किया जाना चाहिए.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये सम्मेलन उत्तर कोरिया के लिए ये दिखाने का एक अवसर है कि वो अपने आर्थिक भविष्य के लिए अमरीका पर पूरी तरह से निर्भर नहीं है.
किम रूस पर प्रतिबंधों में ढील देने का दबाव बनाने की कोशिश भी करेंगे.
रूस और उत्तर कोरिया के संबंध
विश्लेषकों का मानना है कि ये सम्मेलन रूस के लिए भी ये दिखाने का एक मौका है कि वो कोरियाई प्रायद्वीप में एक अहम किरदार है.
राष्ट्रपति पुतिन पिछले कुछ वक्त से उत्तर कोरिया के नेता से मिलना चाह रहे थे. लेकिन ट्रंप और किम की मुलाकात के बीच रूस कहीं दरकिनार हो गया.
अमरीका और चीन की तरह रूस भी उत्तर कोरिया के परमाणु राष्ट्र होने से असहज है.
शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के उत्तर कोरिया से नज़दीकी सैन्य और व्यापारिक संबंध थे. इसके पीछे वैचारिक और रणनीतिक कारण थे.
1991 में सोवियत के टूटने के बाद, रूस और उत्तर कोरिया के बीच व्यपारिक संबंध कमज़ोर हो गए और उत्तर कोरिया ने चीन को अपनी मुख्य सहयोगी बना लिया.
राष्ट्रपति पुतिन के शासन में रूस आर्थिक रूप से मज़बूत हुआ और 2014 में उन्होंने उत्तर कोरिया का सोवियत काल में लिया ज़्यादातर कर्ज़ माफ कर दिया. हालांकि इस बात को लेकर बहस है कि मौजूदा वक्त में उत्तर कोरिया पर रूस का कितना कर्ज़ है.
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