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पुतिन और किम की मुलाक़ात, अमेरिका और दक्षिण कोरिया के लिए क्या संकेत हैं?
- Author, स्टीव रोज़नबर्ग और जीन मेकेंज़ी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यूक्रेन पर रूस के आक्रमण को 567 दिन हो गए हैं. इसी बीच उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग-उन अपनी ट्रेन से रूस पहुंचे हैं और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाक़ात की है.
पुतिन और किम ने रूस के वास्तोचनी कोस्मोड्रोम में मुलाक़ात की है. दोनों नेता बुधवार दोपहर यहां पहुंचे और पुतिन ने किम को ये जगह दिखलाई.
जब पुतिन से पूछा गया कि क्या रूस उत्तर कोरिया की सैटेलाइट निर्माण में मदद करेगा, तो पुतिन ने कहा, "इसीलिए हम यहां वोस्तोचनी कोस्मोड्रोम आए हैं."
पुतिन और किम के साथ अपने-अपने देश के शीर्ष अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल भी है. क्या दोनों देशों के बीच हथियारों को लेकर भी कोई समझौता होगा, पुतिन ने कहा, "हम हर मुद्दे पर चर्चा करेंगे."
दोनों नेताओं ने वार्ता से पहले पत्रकारों को संबोधित किया है. पुतिन ने कहा है कि किम जोंग-उन के साथ वार्ता आर्थिक और मानवीय मुद्दों पर केंद्रित रहेगी. वहीं, दुभाषिये की मदद से किम जोंग-उन ने कहा, "रूस एक पवित्र युद्ध के लिए खड़ा हुआ है. हम हमेशा राष्ट्रपति पुतिन और रूस के नेतृत्व के फ़ैसले का समर्थन करेंगे और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में हम साथ-साथ रहेंगे."
रूस-उत्तर कोरिया संबंध
किम जोंग-उन ने कहा है कि रूस के साथ संबंध उनके देश की पहली प्राथमिकता होंगे.
किम ने कहा, "हम रूस-उत्तर कोरिया रिश्तों को प्राथमिकता देंगे और अब से इसे अपनी विदेश नीति की नंबर एक प्राथमिकता बनाएंगे."
इससे पहले किम ने वोस्तोचनी की विज़िटर बुक में टिप्पणी दर्ज करते हुए लिखा, "पहले अंतरिक्ष विजेताओं को जन्म देने वाले रूस की महिला हमेशा अमर रहेगी."
किम जोंग-उन अपनी ख़ास ट्रेन के ज़रिये ही कोस्मोड्रोम पहुंचे हैं.
उनकी पीली पट्टी वाली हरे रंग की इस ख़ास ट्रेन के कोस्मोड्रोम के भीतर आने दिया गया. जब ट्रेन यहां पहुंची तो उससे विशेष सीढ़ियां लगाई गईं और किम जोंग उन नीचे उतरे.
किम की बहन किम यो जोंग भी उनके साथ हैं और रूस के मीडिया में उनकी इस यात्रा की तस्वीरें प्रकाशित हो रही हैं.
ऐतिहासिक यात्रा
किम की ये रूस यात्रा ऐतिहासिक है. जब दुनिया के अधिकतर देशों ने यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस से दूरी बनाई है, किम खुलकर पुतिन के क़रीब आ रहे हैं.
लेकिन ये सिर्फ़ दो नेताओं के बीच दोस्ती नहीं है, बल्कि इसके ठोस भू-राजनैतिक कारण भी हैं.
इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि इन दोनों के पास कुछ ना कुछ ऐसा है जो वो एक दूसरे को दे सकते हैं. उदाहरण के लिए उत्तर कोरिया रूस को यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल करने के लिए तोप के गोला-बारूद और अन्य हथियार दे सकता है.
वहीं दूसरी तरफ़ उत्तर कोरिया कई सालों से आर्थिक प्रतिबंध झेल रहा है और उसकी सीमाओं पर सख़्त पहरा है. इसकी वजह से उत्तर कोरिया में गंभीर खाद्य संकट है.
उत्तर कोरिया तेल और पैसे की कमी का भी सामना कर रहा है. यही नहीं उत्तर कोरिया रूस से संवेदनशील तनकी भी मांग सकता है ताकि वो अपने परमाणु कार्यक्रम को और बेहतर कर सके.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध
दोनों नेताओं के क़रीब आने का दूसरा बड़ा कारण ये है कि उनका 'दुश्मन' एक ही है. दोनों ही पश्चिमी देशों और अमेरिका को अपना दुश्मन मानते हैं.
उत्तर कोरिया और रूस दोनों ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं और एक तरह से दोनों ही अंतरराष्ट्रीय जगत में अलग-अलग थलग हैं.
जहां तक बात रूस की है, यूक्रेन के युद्ध ने उसे पश्चिम से और अधिक दूर कर दिया है. लेकिन इसकी शुरुआत पहले से ही हो चुकी थी.
उदाहरण के तौर पर ब्रिटेन में हुई सेल्सबरी ज़हरकांड की घटना ने पश्चिमी देशों में रूस के प्रति नज़रिया सख़्त कर दिया था.
साल 2019 में किम जोंग-उन और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के बीच वार्ता टूट गई थी. इसके बाद से ही उत्तर कोरिया अंतरराष्ट्रीय जगत में एक तरह से बहिष्कृत ही है.
एशिया में अमेरिका की मौजूदगी
पिछले कुछ सालों में अमेरिका दक्षिण कोरिया के और अधिक क़रीब आ रहा है और एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है.
उत्तर कोरिया को अकेले बैठकर ये सब देखना पड़ रहा है. दोनों के क़रीब आने का तीसरा कारण है चीन.
दरअसल पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद चीन के क़रीब आना रूस की मजबूरी बन गया है.
वहीं, उत्तर कोरिया का भी यही हाल है. चीन के अलावा अंतरराष्ट्रीय जगत में उसका कोई अच्छा दोस्त नहीं है.
उत्तर कोरिया चीन पर और अधिक निर्भर होता जा रहा है. उत्तर कोरिया चीन पर इस निर्भरता को लेकर बहुत सहज नहीं है.
एक से अधिक दोस्त होना हमेशा बेहतर होता है.
पुतिन और किम ने अपनी मुलाक़ात से पहले संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच समझौते हो सकते हैं.
लेकिन समझौता हो या ना हो, पुतिन यहां अमेरिका को ये संदेश ज़रूर दे रहा है कि रूस अब अपने दोस्त चुनेगा और कोई भी उसके इस फ़ैसले को प्रभावित नहीं कर सकता है.
वहीं, इस मुलाक़ात से उत्तर कोरिया दूसरी तरफ़ दक्षिण कोरिया के ये संदेश दे रहा है कि अमेरिका के ज़्यादा क़रीब मत आओ.
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