मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू को भारतीय सैनिकों से दिक़्क़त क्या है?- प्रेस रिव्यू

मोहम्मद मुइज़्ज़ू

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सितंबर 2023 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से ही मोहम्मद मुइज़्ज़ू भारतीय सेना को मालदीव से बाहर करने पर ज़ोर देते नज़र आ रहे हैं.

द हिंदू ने मोहम्मद मुइज़्ज़ू के इसी इरादे से संबंधित एक रिपोर्ट की है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने एक इंटरव्यू में कहा कि राष्ट्रपति का कार्यभार संभालने के बाद उनकी पहली प्राथमिकता ये होगी कि 'पहले ही दिन' भारतीय सैनिकों को बाहर किया जाए.

भारतीय सैनिकों को मालदीव से बाहर करने के लिए मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने इंडिया आउट अभियान चलाया था.

ये अभियान चुनावों में हारे राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के ख़िलाफ़ भी था, जिनकी विदेश नीति को 'इंडिया फर्स्ट' माना जाता था.

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मालदीव में कितने भारतीय सैनिक हैं?

द हिंदू ने मालदीव नेशनल डिफेंस फोर्स यानी एमएनडीएफ के हवाले से बताया है कि मालदीव में 75 भारतीय सैनिक मौजूद हैं.

ये सैनिक उन डोर्नियर एयरक्राफट और दो हेलिकॉप्टर्स को चलाते हैं, जो भारत सरकार ने मालदीव को तोहफे में दिए थे.

ये हेलिकॉप्टर एक दशक से ज़्यादा वक़्त से मालदीव में हैं.

हेलिकॉप्टर सत्ता से बाहर हुए इब्राहिम मोहम्मद के चुनाव जीतने से पहले से मालदीव में हैं. 2018 में इब्राहिम मोहम्मद ने अब्दुल्ला यामीन को हराया था.

जिस विपक्षी गठबंधन से जीतकर मोहम्मद मुइज़्ज़ू राष्ट्रपति बने हैं, उसके मुखिया यामीन हैं.

मालदीव के अनुरोध पर साल 2020 में डोर्नियर एयरक्राफ्ट भारत ने तोहफे में दिया था.

भारत की तरफ़ से दिए एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल मेडिकल इमरजेंसी, सर्च, बचाव कार्य, ट्रेनिंग, निगरानी रखने के लिए किया जाता है.

मोहम्मद मोइज़्जू

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मोहम्मद मुइज़्ज़ू को भारतीय सैनिकों से दिक़्क़त क्या है?

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द हिंदू अपनी रिपोर्ट में लिखता है कि मोहम्मद मुइज़्ज़ू, यामीन और उनके राजनीतिक कैंप के लिए भारत से रिश्ता एक संवेदनशील मसला है.

यामीन के कार्यकाल के दौरान चीन के प्रति झुकाव किसी से छिपा नहीं है. यामीन के कार्यकाल के दौरान 2013 से 2018 तक मालदीव और भारत के रिश्ते तनावपूर्ण रहे थे.

इस कार्यकाल के बाद यामीन इस बात पर भी ज़ोर देते रहे हैं कि भारत अपने हेलिकॉप्टर वापस ले जाए.

हालांकि मुइज़्ज़ू ये कहते दिखते हैं कि वो पहले मालदीव समर्थक हैं और चीन, भारत या किसी भी देश की सैन्य मौजूदगी को अनुमति नहीं देंगे.

मुइज़्ज़ू कई बार चीन से मालदीव को मिली मदद पर बोलते रहे हैं. हालांकि वो चीन समेत दूसरे देशों से मालदीव के लिए क़र्ज़ पर कुछ नहीं बोलते हैं.

द हिंदू लिखता है कि मुइज़्ज़ू के बार-बार भारतीय सैनिकों को हटाने की बात के पीछे दो कारण नज़र आते हैं.

पहला- अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने मालदीव चुनाव को भारत बनाम चीन की जीत के रूप में पेश किया. ये बात मालदीव के राजनीतिक पर्यवक्षकों के लिए भी चिंता का सबब रही कि कैसे राष्ट्रपति चुनाव में किसी घरेलू मुद्दे से ज़्यादा भारत और चीन की भू-राजनीतिक प्रतिद्वंदिता पर बात हुई.

दूसरा- मालदीव से भारतीय सैनिकों को हटाने पर मुइज़्ज़ू अपनी बात को दोहरा इसलिए भी रहे हैं ताकि चुनाव से पहले समर्थकों से जो वादा किया था, उसे पूरा कर सकें.

हालांकि नवंबर में राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद मुइज़्ज़ू की विदेश नीति का पता चलेगा.

अब्दुल्ला यामीन

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मुइज़्ज़ू पर दबाव होगा?

द हिंदू अपनी रिपोर्ट में लिखता है कि मुइज़्ज़ू ने जो वादा किया है, उसे पूरा करने का दबाव उन पर होगा.

भारतीय सैनिकों के अलावा ऐसे कई मुद्दे हैं, जो मुइज़्ज़ू का इंतज़ार कर रहे हैं.

मालदीव बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है. मालदीव को 2024 और 2025 में सालाना 570 मिलियन डॉलर विदेशी क़र्ज़ चुकाना है.

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़, 2016 में मुइज़्ज़ू सरकार को 1.7 बिलियन डॉलर विदेशी क़र्ज़ चुकाना होगा.

भारत और चीन की मदद के बिना इस बड़े क़र्ज़ को चुकाना मालदीव के लिए एक चुनौती भरा काम रहेगा.

ये दोनों देश मालदीव के बड़े सहयोगी हैं.

पिछले साल निवर्तमान राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह भारत दौरे पर आए थे

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भारत के क्या हित हैं?

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते चार सालों में भारत मालदीव का बड़ा सहयोगी बनकर उभरा है.

भारत मुख्य तौर पर सुरक्षा, आर्थिक मोर्चे पर मालदीव की मदद करता है. मालदीव की समाजिक आर्थिक विकास से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भारत ने 1.4 बिलियन डॉलर से मदद की है.

हिंद महासागर के इस द्वीप देश मालदीव से भारत के अपने सुरक्षा संबंधी हित भी हैं. इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल को लेकर भारत की चिंताएं भी हैं.

मालदीव कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव का सदस्य है. भारत, श्रीलंका के साथ शुरू की इस त्रिपक्षीय पहल के साथ बाद में मॉरिशिस भी जुड़ा.

इस समूह का मकसद हिंद महासागर में समुद्री सहयोग को बढ़ावा देना है.

सुप्रीम कोर्ट

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चुनावी बॉन्ड पर सरकार सुप्रीम कोर्ट में क्या बोली

द इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़, चुनावी बॉन्ड को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सोलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार नागरिकों की निजता की रक्षा कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है.

मंगलवार को मेहता ने कोर्ट में कहा कि राजनीतिक झुकाव किसी व्यक्ति की निजी ज़िंदगी के बारे में बताता है और सरकार चुनावी बॉन्ड के ज़रिए नागरिकों के प्राइवेसी के अधिकार की रक्षा कर रही है.

कोर्ट में जमा किए 123 पेज के नोट में तुषार मेहता ने कहा- राजनीतिक अभिव्यक्ति चाहे वोट के ज़रिए हो या डोनेशन के ज़रिए हो, ये किसी नेता के लिए हो या किसी पार्टी के लिए हो... ये निजता के तहत आती है और सरकार की ये संवैधानिक ज़िम्मेदारी है कि वो इसकी रक्षा करे.

चुनावी बॉन्ड योजना की क़ानूनी वैधता का मामला सुप्रीम कोर्ट में आठ साल से ज़्यादा वक़्त से लंबित है.

माना जा रहा है कि 2024 चुनाव से पहले इस मामले में फ़ैसला अगर आया तो इसका असर चुनावों में भी देखने को मिल सकता है.

इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय ज़रिया है. यह एक वचन पत्र की तरह है जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से ख़रीद सकता है और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीक़े से दान कर सकता है.

ऑनलाइन गेमिंग

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ऑनलाइन गेमिंग पर नियम बनाने की तैयारी?

द इकोनॉमिक टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़, केंद्र सरकार ऑनलाइन गेमिंग पर नियम बनाने की तैयारी में है.

अखबार लिखता है कि केंद्र सरकार मंत्रियों के एक समूह को ऑनलाइन गेमिंग पर विनियामक ढांचा बनाने के काम में लगा सकती है.

इन मंत्रियों में अमित शाह, निर्मला सीतारमण, अश्विनी वैष्णव और अनुराग ठाकुर जैसे नाम शामिल होंगे.

इन लोगों को ये काम दिया जाएगा कि वो ऑनलाइन गेमिंग संबंधी नियमों समेत दूसरे अहम मुद्दों पर एक फ्रेमवर्क बनाएं.

एक अधिकारी ने अखबार को बताया कि एक सेल्फ रेगुलेटरी ऑर्गेनाइजेशन बनाने की दिशा में काम जारी है. इंडस्ट्री के लोगों से भी बात की जा रही है. पर मंत्रियों के समूह को ये ज़िम्मेदारी किए जाने पर सहमति बनती दिख रही है.

पूरी दुनिया में ऑनलाइन गेमिंग का कारोबार क़रीब 82 बिलियन डॉलर का है और भारत में ये क़रीब तीन बिलियन डॉलर का है.

पूरी दुनिया में क़रीब 3.9 बिलियन गेमर हैं. भारत में ये संख्या 421 मिलियन हैं.

सड़क हादसे

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सड़क पर स्पीड के कारण हुईं सबसे ज़्यादा मौतें

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते साल सड़क हादसों में हुई मौतों का सबसे अहम कारण तेज़ गति से गाड़ी चलाना रहा.

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2022 में सड़क हादसे में लगभग एक लाख 68 हज़ार लोगों की मौत हुई. इसमें 71 फ़ीसदी मामलों में तेज गति से गाड़ी चलाए जाने के बाद हुआ सड़क हादसा मौत का कारण बनी.

शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण 4201 मौतें हुईं.

उल्टी दिशा से गाड़ी चलाने के कारण हुए हादसों में लगभग नौ हज़ार लोगों की जान गई.

मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हुए गाड़ी चलाने के चलते हुए हादसों में 3400 लोगों की जान गई.

ट्रैफिक सिग्नल तोड़कर जाने पर हुए हादसों में 1462 लोगों की जान गई.

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