ऑनलाइन गेमिंग की लत में ऐसे फंस जाते हैं युवा, क्या है बाहर निकलने का रास्ता?

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- Author, गणेश पोल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“हमारा बेटा एक भी पैसा खर्च करने से पहले हमसे सलाह लेता था लेकिन पिछले छह महीने से उसे अपने दोस्तों की वजह से एक अजीब सी लत लग गई. वो अपनी सैलरी के सारे पैसे इसी में खर्च कर देता है. अब वो घर पर एक पैसा भी नहीं देता है."
"न केवल ये, बल्कि उसने अपने पिता और अपने नाम पर डेढ़ लाख रुपये कर्ज़ भी लिए हैं और वो उसे भी उड़ा चुका है. थक हार कर हम उसे पुलिस के पास ले गए, जहां उन्होंने उसकी काउंसलिंग की.”
पुणे की रहने वाली अराधना (बदला हुआ नाम) अपने बेटे की कहानी बता रही थीं.
कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म करने के बाद उनका बेटा एक पार्ट टाइम जॉब कर रहा था लेकिन उसी दौरान उसे ऑनलाइन जुए की लत लग गई.
महाराष्ट्र समेत देश भर के कई युवा इस नए चलन की ओर आकर्षित हो रहे हैं और दावा किया जा रहा है कि यह लत अब एक महामारी की तरह फ़ैल रही है.
आपने सेलिब्रिटी क्रिकेटरों और फ़िल्मी दुनिया के सितारों को ऑनलाइन जुए के ऐप का प्रचार करते ज़रूर देखा होगा.
यहां तक कि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की टीमों की जर्सी पर भी आपने उनके प्रचार देखे होंगे.
ऐसे भारी भरकम और असरदार प्रचार से ऑनलाइन गेमिंग की लोकप्रियता बढ़ रही है.
आपने ऐसे विज्ञापन ज़रूर देखे होंगे जिसमें ये प्रचार किया जाता है, “घर बैठे लाखों, करोड़ों रुपये कमाएं”

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हालांकि जानकारों के मुताबिक ऐसे विज्ञापनों की मंशा उनके प्रचार से बिल्कुल उलट होती है.
जानकार कहते हैं कि ये न केवल अपने ग्राहकों को लाखों रुपये का चूना लगाते हैं बल्कि उन्हें ऑनलाइन जुए की लत भी लगा देते हैं.
वो कहते हैं कि आज कम कीमत पर मोबाइल फ़ोन और कनेक्टिविटी मौजूद हैं और इसकी वजह से ऑनलाइन जुए की लोकप्रियता पूरी दुनिया में फ़ैल रही है जो कि यह एक चिंता का विषय बन गया है.
इंटरनेट के माध्यम से होने वाला ऑनलाइन जुआ कई रूप में मौजूद है.
जब आप शुरू शुरू में इस तरह के ऑनलाइन जुए से जुड़ते हैं तो पैसे कमा भी सकते हैं जो कि आपको पैसे कमाने का एक आसान तरीक़ा लगने लगता है.
फिर आप इस पर और अधिक पैसे खर्च करने लगते हैं लेकिन तब आपको कुछ नहीं मिलता.
कई युवा दोबारा पैसे जीतने की उम्मीद से ऑनलाइन जुए में अपने हाथ आजमाते हैं लेकिन उनमें से अधिकतर को निराशा हाथ लगती है.
इससे उन्हें आर्थिक परेशानियों के साथ साथ मानसिक तनाव के दौर से भी गुज़रना पड़ता है.
कुछ मामले में ऑनलाइन जुए में हारने की वजह से लोगों ने आत्महत्या तक कर ली.
चलिए जानते हैं कि आखिर ऑनलाइन जुआ है क्या और कैसे पता लगता है कि किसी को इसकी लत लग गई है? इस पर पूरी तरह प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता?

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ऑनलाइन जुए की लत
जब किसी इंटरनेट लिंक, वेबसाइट या मोबाइल ऐप के ज़रिए पैसे दांव पर लगाए जाते हैं तो इसे ऑनलाइन गैम्बलिंग या ऑनलाइन जुआ कहते हैं.
इसमें पोकर, ब्लैकजैक, स्लॉट मशीन और कई अन्य तरह की सट्टेबाज़ी शामिल हैं.
जब कोई ऑनलाइन जुआ खेलता है तो आपके सामने एक कंप्यूटर प्रोग्राम या एक व्यक्ति हो सकता है.
नए यूज़र्स को ऑनलाइन जुए की ओर आकर्षित करने के लिए शुरू शुरू में उन्हें मुफ़्त गेम खेलने की पेशकश की जाती है और सोशल मीडिया के ज़रिए उन्हें टारगेट किया जाता है.
ऐप को इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि जुआ खेलने वाले लंबे समय तक खेलते रहें. वो खेल के दौरान इससे पूरी तरह चिपके रहते हैं.
जब फ़्री क्रेडिट ख़त्म हो जाते हैं तब इसमें अपने पैसे लगाने पड़ते हैं. जब आप पहली बार ये जुआ खेलते हैं तो इसके बाद आपको इससे जुड़े विज्ञापन मिलने लगते हैं जो आपको वापस गेमिंग वेबसाइट पर आने के लिए आकर्षित करते हैं.

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एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
डिजिटल एक्सपर्ट कहते हैं कि युवा पीढ़ी पारंपरिक जुए की तुलना में ऑनलाइन जुए की ओर बड़ी तेज़ी से आकर्षित होती है.
युवा पीढ़ी को जिस तरह से डिजिटल दुनिया की जानकारी है वो इस तरह के गेम्स से आसानी से जुड़ जाते हैं जिसकी भनक उनके माता-पिता को नहीं लगती है.
एक ऑनलाइन जुए से जुड़ने के लिए आपको घर के बाहर अपने क़दम निकालने की ज़रूरत तक नहीं पड़ती क्योंकि सब कुछ ऑनलाइन ही तो है.
इस पूरी प्रक्रिया में आपको किसी के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव या आमने- सामने खेल में शामिल होने की ज़रूरत नहीं पड़ती लिहाजा जब आप ऑनलाइन जुआ खेल रहे होते हैं तो आपको कोई नहीं देखता है.
चूंकि यह पूरी तरह से ऑनलाइन जुआ है तो इसमें पैसे भी ऑनलाइन ही लगाने होते हैं.

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ऑनलाइन जुए की लत का ज़िंदगी पर असर
कई लोग सिर्फ़ अपने मनोरंजन के लिए ऑनलाइन जुआ खेलना शुरू करते हैं, लेकिन जल्द ही उन्हें इसकी लत लग जाती है.
धीरे धीरे इसका असर उनकी ज़िंदगी पर पड़ने लगता है और कुछ लोगों पर इसका प्रतिकूल असर इतना होता है कि वो कंगाल तक हो जाते हैं.
वे न केवल अपनी जमा पूंजी खोते हैं बल्कि अपना पूरा जीवन भी गंवा देते हैं क्योंकि कइयों ने इससे परेशान हो कर अपनी ज़िंदगी ही ख़त्म कर दी है.
दूसरी तरफ़, एक शोध के मुताबिक, जैसे जैसे लोगों के लिए मोबाइल फ़ोन रखना आसान हो रहा है वैसे ही वो इंटरनेट का भी बहुत तेज़ी से इस्तेमाल कर रहे हैं.
जो लोग ऑनलाइन जुए में लगे हैं वो इसकी जानकारी बग़ैर किसी को दिए ऐसा कर रहे होते हैं. ख़ास कर जब इसका ख़राब असर उन पर पड़ता है तब वो इसे किसी अन्य व्यक्ति से साझा तक नहीं करते.

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ऑनलाइन विज्ञापनों की बाढ़
तकनीक और मनोविज्ञान के क्षेत्र की एक्सपर्ट मुक्ता चैतन्य कहती हैं, “ऑनलाइन जुआ खेलने वाले पर नकारात्मक असर पड़ता है. इससे आपसी संबंध बिगड़ने लगते हैं और पारिवारिक जीवन बोझ लगने लगता है. समय के साथ साथ कर्ज़ बढ़ने लगता है."
"जो शख़्स इसमें अपने पैसे गंवाता है वो इस उम्मीद में आगे और भी खेलना जारी रखता है कि वो हारे हुए पैसे भी वापस ले आएगा."
मुक्ता चैतन्य के मुताबिक़, "जब आपको ऑनलाइन जुए की लत लग जाती है तब इसे खेले बग़ैर आप चिंता, तनाव और अवसाद से ग्रसित होने लगते हैं."
"जिन्हें इसकी लत लग जाती है उन्हें दिन रात की चिंता नहीं रहती. उनके दिमाग में हमेशा जुए का ही ख़्याल आता रहता है.”
वे कहती हैं, " जुए से कुछ लोगों को मानसिक तनाव से अस्थायी राहत मिल सकती है. वो इसे एक अच्छा टाइमपास और मनोरंजन के रूप में देखते हैं. लेकिन ऐसी सोच लंबे वक़्त तक नहीं रहती.”
आज पूरे महाराष्ट्र और समूचे देश में ऑनलाइन रमी विज्ञापनों की बाढ़ सी आई है. चिंता इस बात से और बढ़ गई है कि इसके विज्ञापन खेलों और फ़िल्मों की जानी मानी हस्तियां कर रही हैं.
हाल ही में ऑनलाइन रमी से जुड़ी एक ख़बर आई जिसमें ये दावा किया गया कि ऐसे ही किसी ऑनलाइन जुए में हुए नुक़सान की वजह से तमिलनाडु में 42 लोगों ने आत्महत्या कर ली.
ऐसे ऑनलाइन जुए के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फ़ड़णवीस ने ऐसे विज्ञापनों को नहीं करने की अपील की है.

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18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नियम
साइबर कानून विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि दिल्ली उच्च न्यायालय में टेक कम्पनियों के खिलाफ उनकी बहस के बाद डिजिटल जगत में बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक आदेश पारित किये गये.
के. एन. गोविन्दाचार्य मामले में केन्द्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि 13 साल से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया में शामिल नहीं हो सकते.
16 साल से कम उम्र के बच्चे माता-पिता और अभिभावकों के संरक्षण में ही सोशल मीडिया पर सक्रिय हो सकते हैं.
गेमिंग में पैसे का लेन-देन और कारोबार होता है, इसलिए इंडियन कांट्रेक्ट एक्ट, मिजोरिटी एक्ट और डेटा सुरक्षा के प्रस्तावित बिल के अनुसार 18 साल से ऊपर की उम्र के बच्चे ही वैध एग्रीमेंट कर सकते हैं.
इसलिए गेमिंग कम्पनियों का 18 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ कारोबार ग़लत और ग़ैर-क़ानूनी है.
गेमिंग से जुड़े मामलों के कई पहलू संविधान के अनुसार राज्य सरकारों के क्षेत्राधिकार में आते हैं.
तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जिसकी रिपोर्ट के अनुसार ऑनलाइन गेम और गैम्बलिंग ने लाखों परिवारों को तबाह करने के साथ बच्चों के स्वास्थ्य को भी चौपट कर दिया है.
समिति की सिफारिश के अनुसार राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया था.
तेलंगाना, कर्नाटक, राजस्थान, असम और छत्तीसगढ़ में भी ऑनलाइन गेमिंग के कहर को रोकने के लिए सख्त कानून बनाने की शुरुआत हुई थी.
लेकिन केन्द्र सरकार ने पिछले साल अप्रैल में ऑनलाइन गेमिंग के बारे में एक बिल पेश किया था लेकिन उस पर अभी तक ठोस कानून नहीं बना.
उसकी बजाए गाइडलाइंस और इंडस्ट्री के स्वनियमन पर जोर देने से ये कंपनियां बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी कर रही हैं.
ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चों और बड़ों के साथ ठगी होने पर इन कंपनियों का भारत में शिकायत निवारण तंत्र नहीं है.
ऑनलाइन गेम को करोड़ों लोग खेलते हैं उसके बावजूद भारत सरकार ने भी इस बारे में प्रभावी नियामक नहीं बनाया.
संविधान के अनुसार पुलिस का मामला राज्यों के अधीन आता है लेकिन वहां पर शिकायत दर्ज कराने पर लोगों को कोई राहत नहीं मिलती. जीएसटी कम करने के बारे में दिये जा रहे तर्क 'बेतुके और नाकाफी हैं.'
भारत में गैम्बलिंग और जुए वाले सभी तरह के ऑनलाइन गेम गैर-कानूनी हैं.
सिर्फ स्किल वाले गेम को ही कानूनी मंजूरी मिल सकती है इसलिए ऐसे सभी गेमों में एक समान 28 फीसदी जीएसटी की वसूली होनी चाहिए.
किन राज्यों में हैं बने हैं क़ानून
तमिलनाडु प्रोहिबिशन ऑफ़ ऑनलाइन गैंबलिंग एंड रेग्युलेशन ऑफ़ ऑनलाइन गेम्स एक्ट 2022 में तमिलनाडु ऑनलाइन गैंबलिंग आथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है, जिसके प्रमुख सेवानिवृत्त अधिकारी होंगे.
ये क़ानून इस आथॉरिटी को सभी ऑनलाइन खेलों में समय, पैसे और उम्र की सीमा तय करने का अधिकार है.
इसमें ग़ैरक़ानूनी गैंबलिंग सर्विस में शामिल लोगों को तीन साल की सज़ा और 10 लाख रुपये के ज़ुर्माने का प्रावधान है.
आंध्र प्रदेश में यह क़ानून ऑनलाइन गेमिंग और जुए पर प्रतिबंध लगाता है. इसमें सट्टा लगाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है.
सिक्किम, नगालैंड और मेघालय में लाइसेंस के बाद ही इस तरह के गेम खेलने की इजाज़त है.
1996 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ऑनलाइन रमी और पोकर खेलों को दक्षता वाले खेल बताया था, इसलिए इन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने में मुश्किलें हैं.
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