नीजेर में तख़्तापलट: अफ़्रीका के इस इलाके में हालात हुए बद से बदतर

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- Author, युसूफ़ अकिनपेलू
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ लागोस
नीजेर, अफ़्रीका के साहेल क्षेत्र में गिने-चुने लोकतांत्रिक देशों में से एक था. अब अपने पड़ोसी देशों की तरह वहां भी सत्ता पर फौज क़ाबिज़ हो गई है.
पश्चिम में माली से लेकर पूरब में सूडान तक, अफ्रीका के एक बड़े इलाक़े में अब हुकूमत फौजी जनरलों के हाथों में है.
अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में नीजेर उन गिने चुने देशों में से था, जहां लोकतांत्रिक शासन था. लेकिन, अब वहां भी सेना ने सत्ता हथिया ली है. ऐसे में इस इलाक़े के भविष्य को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं.
नीजेर के राष्ट्रपति मुहम्मद बज़ूम, साहेल क्षेत्र में पश्चिमी देशों के प्रमुख सहयोगियों में से एक रहे हैं. बुधवार को कुछ सैनिकों ने उनका तख़्तापलट कर दिया. हालांकि, अभी मुहम्मद बज़ूम ने हार नहीं मानी है.
लेकिन, उनको हिरासत में ले लिया गया है. वहीं, नीजेर के सेनाध्यक्ष ने देश में फौजी हुकूमत का समर्थन किया है. फिर भी, अभी नीजेर की तस्वीर साफ़ नहीं है. ये पता नहीं चल रहा है कि कमान किसके हाथ में है.

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फ्रांस और अमेरिका ने फौजी अड्डे
नीजेर फ्रांस का उपनिवेश रह चुका है. वहां, यूरेनियम के प्रचूर भंडार मौजूद हैं. नीजेर में फ्रांस और अमेरिका ने फौजी अड्डे बनाए हुए हैं.
वहां जैसे ही सैनिकों ने तख़्तापलट का एलान किया, तो फ्रांस और अमेरिका ने इसकी कड़ी आलोचना की.
पश्चिमी देशों को इस बात की फ़िक्र सता रही है कि नई हुकूमत के आने पर नीजेर, कहीं उनसे दूर होकर रूस के पाले में न चला जाए.
अगर नीजेर ऐसा करता है, तो वो भी उसी रास्ते पर चल रहा होगा, जिसे उसके दो पड़ोसी देश बुर्किना फासो और माली ने अपनाया है.
अपने यहां फौजी तख़्तापलट के बाद दोनों ही देशों ने रूस से नज़दीकी बढ़ा ली है.
लेकिन, भले ही नीजेर अपने यहां जिहादी उग्रवाद और ग्रामीण इलाक़ों में डकैती की समस्याओं से जूझ रहा था. फिर भी, पड़ोसी देशों की तुलना में वहां के हालात अब तक बेहतर थे.
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'सुरक्षा के बिगड़ते हालात'
आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन ऐंड इवेंट डेटा (एसीएलईडी) के मुताबिक़, 2021 के बाद से नीजेर में सियासी हिंसा में मारे गए लोगों की आधिकारिक तादाद, अपने पड़ोसियों की तुलना में बेहद कम थी.
नीजेर में तख़्तापलट करने वाले सैनिकों के प्रवक्ता कर्नल मेजर अमांदोऊ अब्द्रामाने ने दावा किया कि, 'देश की सुरक्षा के बिगड़ते हालात' और 'ख़राब सामाजिक आर्थिक स्थिति' की वजह से फौज को सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेनी पड़ी.
मज़े की बात ये है कि उनका बयान नीजेर के पड़ोसी देशों के फ़ौजी शासकों से मिलता जुलता है. जबकि उन देशों और नीजेर के ज़मीनी हालात में काफ़ी फ़र्क़ है.
मगर, उन देशों में तख़्तापलट और माली में रूस के वागनर ग्रुप के क़रीब एक हज़ार हथियारबंद भाड़े के सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद, फ़ौजी तख़्तापलट के बाद इन देशों में जिहादी हमलों से मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.
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भूमध्य सागर के रास्ते
इसके अलावा, इन देशों में मानव अधिकारों के उल्लंघन के दस्तावेज़ी सुबूत भी लगातार सामने आ रहे हैं. इनमें, माली में सुरक्षा बलों और विदेशी लड़ाकों के हाथों सैकड़ों आम नागरिकों की हत्या भी शामिल है.
नीजेर के राष्ट्रपति मुहम्मद बज़ूम की सरकार, भूमध्य सागर के रास्ते यूरोप जाने वालों को रोकने की यूरोपीय देशों की मुहिम का भी हिस्सा रही है.
नीजेर, लीबिया के नज़रबंदी शिविरों में क़ैद सैकड़ों अप्रवासियों को अपने यहां वापस लेने के लिए भी राज़ी हो गया था.
मुहम्मद बज़ूम ने इंसानों की तस्करी करने वालों के ख़िलाफ़ भी सख़्त कार्रवाई की थी.
क्योंकि, नीजेर पश्चिमी अफ्रीका से उत्तरी अफ्रीका की तरफ़ जाने वाले अप्रवासियों की आवाजाही का एक प्रमुख रास्ता बन चुका है.
लेकिन, अब हालात बदल सकते हैं.
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क्रेमलिन का बयान
और, अगर माली और बुर्किना फासो की तरह नीजेर में भी पश्चिमी देशों और संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं को देश छोड़ने को कहा जाता है, तो इससे इस्लामिक उग्रवादियों के ख़िलाफ़ मुहिम को तगड़ा झटका लगेगा. क्योंकि, अब इस्लामिक कट्टरपंथी नीजेर की अस्थिरता का फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे.
रूसी सरकार के समर्थक जानकारों को वहां के सरकारी मीडिया और टेलीग्राम चैनलों पर ये कहते सुना गया है कि नीजेर में तख़्तापलट से वहां रूस के दाख़िल होने का रास्ता खुल गया है.
हालांकि, रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के एक प्रवक्ता ने मुहम्मद बज़ूमी को रिहा करने और इस संकट के शांतिपूर्ण समाधान की अपील की है.
तख़्तापलट के दौरान कुछ समर्थक रूस का झंडा लहराते और पूर्व औपनिवेशिक देश फ्रांस की आलोचना करते दिखाई ज़रूर दिए थे. लेकिन, अब तक इस बात के कोई सुबूत नहीं मिले हैं कि नीजेर में फ़ौज के हुकूमत पर क़ाबिज़ होने में रूस का कोई हाथ रहा है.
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सामरिक झुकाव
तो, अब इस बात का इंतज़ार किया जा रहा है कि तख़्तापलट करने वाले सैनिक, भविष्य में नीजेर के सामरिक झुकाव पर क्या कहते हैं.
क्या वो पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखेंगे? या फिर, वो अपने पड़ोसी देशों की तरह अफ्रीका में रूस के दबदबे वाला इलाक़ा बनना पसंद करेंगे?
नीजेर में इस तख़्तापलट से ये सवाल भी पैदा हुआ है कि क्या पूरे अफ्रीका में धीरे धीरे फैल रहे लोकतंत्र के लिए भी अब ख़तरा पैदा हो गया है.
वैसे तो पश्चिमी अफ्रीका का क्षेत्रीय आर्थिक समूह इकोवास, नीजेर में पैदा हुए सियासी संकट के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिश कर रहा है.
फिर भी, ऐसा लग रहा है कि साहेल इलाक़े की स्थिरता इस वक़्त बेहद नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है.
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