फ्रांस को यहां से वापस क्यों बुलाने पड़े अपने सैनिक? - दुनिया जहान

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों

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इस साल फ़रवरी में ऐसे दो देशों के रिश्तों में दरार की ख़बर हर तरफ छाई हुई थी जिनके बीच ऐतिहासिक घनिष्ठता रही है.

दोनों के बीच बीते कुछ वक़्त से बातें बिगड़ने लगी थीं और तीखी बयानबाज़ी हो रही थी.

इनमें से एक देश है माली और दूसरा है फ्रांस. स्थिति इस क़दर ख़राब हो गई कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने सैनिकों को माली से वापस बुलाने का फ़ैसला कर लिया.

सैनिकों का आखिरी दस्ता अगस्त में लौटा. करीब नौ साल पहले फ्रांस के सैनिक इस्लामी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में माली की मदद के लिए आए थे.

वो कैसी स्थितियां थीं जिनमें फ्रांस ने माली से बाहर निकलने का फ़ैसला किया.

बीबीसी ने इस सवाल का जवाब पाने के लिए चार एक्सपर्ट से बात की.

माली की राजधानी बामाको में रूस का झंडा लहराते प्रदर्शनकारी

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रिश्तों का पुल

सहेल इलाके की राजनीति और सुरक्षा मामलों की एक्सपर्ट ओर्नेला मॉडेरन कहती हैं, "माली में आज़ादी के बाद का इतिहास मुश्किल भरा है."

वो बताती हैं, " माली पश्चिमी अफ़्रीका में है. ये सलेह इलाका कहा जाता है. माली प्राकृतिक संसाधनों के मामले में काफी संपन्न है. खेती और मत्स्य पालन के लिहाज से यहां की स्थितियां माकूल हैं. यहां खनिज भी प्रचुर मात्रा में हैं. इनमें सोना प्रमुख है. 1960 के दशक में मिली आज़ादी के बाद से माली, प्रशासन और भ्रष्टाचार से जुड़ी दिक्कतों से जूझता रहा है."

माली और फ्रांस के रिश्ते आज के नहीं हैं. इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई. ओर्नेला बताती हैं कि औपनिवेशिक इतिहास दोनों देशों को जोड़ता है. फ्रांस में माली मूल के लोग बड़ी संख्या में हैं. माली में भी फ्रांस के प्रवासी हैं.

आज़ाद होने के बाद माली ने तत्कालीन सोवियत संघ के साथ भी संबंध जोड़े. आज़ादी के बाद माली की पहली सरकार ने खुद को सोशलिस्ट घोषित किया.

ओर्नेला बताती हैं कि माली में रूस कोई नया प्लेयर नहीं है. माली के ख़ुफिया विभाग और शासन तंत्र से जुड़े कई लोगों ने 1990 और 2000 के दशक के शुरुआती सालों में वहां ट्रेनिंग ली.

साल 1968 में माली की समाजवादी सरकार का तख्ता पलट दिया गया. इसके बाद 23 साल तक देश में सेना का शासन रहा.

ओर्नेला मॉडेरन कहती हैं, " 1991 में जन आंदोलनों के बाद सैन्य तानाशाही ख़त्म हुई और माली में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत हुई. उस दौरान फ्रांस के साथ रिश्तों में एक नई गर्माहट दिखी. 1990 के दशक और 2000 के बाद के कुछ सालों तक फ्रांस एक बार फिर माली के सबसे करीबी साझेदारों में शुमार हो गया. उस समय राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में फ्रांस का असर था."

माली की मदद के लिए साल 2013 में फ्रांस के सैनिक पहुंचे

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2011 के आखिर और 2012 की शुरुआत में माली के उत्तर में आज़ादी के लिए संघर्ष शुरू हो गया. इसकी अगुवाई सशस्त्र समूह तुआरेग कर रहा था.

ओर्नेला बताती हैं कि तुआरेग नस्लीय समूह है. विद्रोहियों ने ऐसे मौके पर हमला बोला जब माली की सेना तैयार नहीं थी. लीबिया संकट की वजह से ये पूरा इलाका अस्थिर सा था. गद्दाफी शासन के पतन के बाद लीबिया से लड़ाके, हथियार और मिलीशिया आ रहे थे.

ओर्नेला बताती हैं कि अलक़ायदा माली के उत्तरी हिस्से में लंबे समय से मौजूद था. विद्रोहियों के अभियान के चलते अफरातफरी की स्थिति बनी. उन्होंने इसका फायदा उठाया.

इसके बाद माली ने फ्रांस से मदद मांगी.

ओर्नेला मॉडेरन कहती हैं, " ये गुजारिश 10 जनवरी 2013 को भेजे पत्र के जरिए की गई. उस समय माली के अंतरिम राष्ट्रपति डियोंकुंडा ताओहे ने ये पत्र फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद को लिखा. इसका आधार दोनों देशों के बीच के करीबी रिश्ते, दोस्ती और साझा इतिहास था."

संयुक्त राष्ट्र के जरिए ये गुजारिश आगे बढ़ाई गई और कुछ ही दिन में फ्रांस के सैनिक माली पहुंच गए.

फ्रांस के सैनिक

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फ्रांस से बढ़ी दूरी

अफ़्रीकन सिक्योरिटी सेक्टर नेटवर्क की प्रमुख डॉक्टर निगाली बगायोको कहती हैं, " ये याद करना अहम होगा कि 2013 में जब फ्रांस के सैनिक तैनात किए गए तब माली के लोगों ने कितने उत्साह के साथ उनका स्वागत किया. 2013 और 2014 में कई बच्चों का नाम फ्रांस्वा ओलांद रखा गया. ऐसा फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति को शुक्रिया कहने के लिए किया गया. उन्होंने ही माली में फ्रांस के सैनिकों को भेजने का फैसला किया था."

फ्रांस के सैनिकों के बाद इकॉनोमिक कम्युनिटी ऑफ़ वेस्ट अफ़्रीकन स्टेट्स के सैनिक भी वहां पहुंच गए.

अगले कुछ हफ़्तों के दौरान माली के उत्तरी हिस्से में तुआरेग विद्रोहियों और इस्लामी चरमपंथी समूहों के कब्ज़े वाले इलाके हासिल कर लिए गए.

तब सब कुछ योजना के मुताबिक होता लग रहा था लेकिन हकीकत में ऐसा था नहीं.

डॉक्टर निगाली बगायोको कहती हैं, " बहुत शुरूआत में ही पहली घटना हो गई. फ्रांस की सेना ने किदाल शहर को मुक्त कराया. ये तुआरेग विद्रोहियों का केंद्र है. फ्रांस के सैनिक जब शहर में दाखिल हुए तब उन्होंने माली के सैनिकों को अपने साथ आने नहीं दिया."

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फिर फ्रांस ने जिहादी गुटों से संघर्ष के लिए तुआरेग समूह के साथ गठजोड़ किया. माली प्रशासन को ये बात पसंद नहीं आई.

माली की निर्वाचित सरकार के सलाहकारों की राय थी कि जिहादी समूहों के साथ बातचीत शुरू की जाए. दो सक्रिय जिहादी नेताओं को बातचीत शुरु करने से जुड़ी प्रक्रिया के लिए बहुत अहम माना जा रहा था.

शांति समझौते की सूरत तय करने के लिए तुआरेग समूह को शामिल किए जाने का फ्रांस ने समर्थन किया लेकिन बातचीत में जिहादी समूहों को शामिल करने के सुझाव को खारिज किया.

डॉक्टर निगाली कहती हैं कि फ्रांस ने नए सिरे से चुनाव कराने का समर्थन किया. इस जगह वो लोगों का मूड भांपने में नाकाम रहे.

डॉक्टर निगाली बगायोको बताती हैं, " चुनाव को यकीनी तौर पर समाधान के तौर पर नहीं देखा गया. जल्दी ही ये साफ हो गया कि सेना के साथ लोगों का बड़ा समर्थन है."

डॉक्टर निगाली की राय है कि दोनों पक्षों के रिश्ते बुरी तरह खराब हो गए हैं.

सेना ने चुनाव कराने का वादा किया था लेकिन बाद में कहा कि वो पांच और साल सत्ता पर अधिकार चाहती है. इस साल जनवरी में फ्रांस ने ईयू पर दवाब बनाया कि वो माली पर प्रतिबंध लगाए.

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उधर, माली और पश्चिमी अफ़्रीका के कुछ अन्य देशों की राय है कि फ्रांस सैन्य लिहाज से सक्षम नहीं है और मगरूर भी है.

माली में एक साल से कम वक़्त के दौरान दो बार तख्ता पलट हुआ है. पहला तख्ता पलट निर्वाचित सरकार के ख़िलाफ़ महीनों तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद हुआ. दूसरा मई 2021 में हुआ और अंतरिम सरकार को हटा दिया गया.

माली की सत्ता पर काबिज मिलेट्री जुंटा के साथ फ्रांस के रिश्ते खराब होते गए.

फ्रांस के अभियान को शुरुआत में जो कामयाबी मिली थी, उसकी छाप भी धुंधली पड़ चुकी है. चरमपंथी समूहों पर अब तक काबू नहीं हो सका है.

डॉक्टर निगाली बगायोको कहती हैं, " हकीकत ये है कि जिहादी समूह देश के उत्तरी हिस्से से बढ़कर मध्य तक आ चुके हैं. इससे साफ है कि फ्रांस के सैनिक अभियान को कामयाब नहीं कहा जा सकता है."

साल 2013 में फ्रांस के सैनिक माली आए थे. अब हालात उस वक़्त से भी ज़्यादा खराब हैं. असहमति और नाराज़गी बढ़ने लगी तो फ्रांस को महसूस हुआ कि ये फैसला लेने की घड़ी है.

माली में फ्रांस का सैनिक

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घर वापसी

यूनिवर्सिटी ऑफ़ केंट की ब्रसेल्स ब्रांच में इंटरनेशनल कॉनफ्लिक्ट एनालिसिस के सीनियर लेक्चरर डॉक्टर इवान जिशावा बताते हैं, " माली से सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला फ्रांस के कमांडर इन चीफ इमैनुएल मैक्रों ने फरवरी के मध्य में लिया."

डॉक्टर इवान कहते हैं, " दिलचस्प ये है कि माली ने फ्रांस के सैनिकों से कभी नहीं कहा कि वो चले जाएं. लेकिन फ्रांस के सैनिकों की मौजूदगी को लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. उधर, फ्रांस आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई के लिए यूरोप की स्पेशल फोर्स माली लाना चाहता था. लेकिन माली प्रशासन का कहना था कि आपको पहले हमसे सलाह लेनी होगी. उन्होंने डेनमार्क से मिलिट्री डेप्लॉयमेंट पर पाबंदी लगा दी. उन्हें फ्रांस की मदद के लिए आना था. इसके बाद फ्रांस को लगा कि अब माली में सैन्य अभियान चलाना मुमकिन नहीं है."

सेना हटाने के फैसले के एलान के कुछ हफ़्ते पहले माली के सैन्य अधिकारियों ने फ्रांस के राजदूत को आदेश दिया कि वो 72 घंटे में देश छोड़ दें.

ये फ्रांस के विदेश मंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया थी. उन्होंने माली के सैन्य शासन को अवैध और नियंत्रण से बाहर बताया था.

इस साल मई में माली ने फ्रांस के साथ रक्षा समझौते को रद्द कर दिया. माली ने ये भी कहा कि फ्रांस के पास सैनिक अभियान चलाने का कोई वैध आधार नहीं है.

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फुटबॉल खेलता सैनिक

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इस बीच माली की सेना ने एक नया रिश्ता जोड़ लिया.

डॉक्टर इवान जिशावा कहते हैं, "सैन्य सरकार ने रूस के साथ संपर्क साधा. रूस और माली की सेना के बीच कुछ बातचीत भी हुई. वो चाहते थे कि रूस के कुछ लड़ाके तैनात हों. माली के अधिकारी उन्हें भाड़े के लड़ाके नहीं बल्कि रूस के इंस्ट्रक्टर बताते हैं."

भाड़े के सैनिक मुहैया कराने वाली रूस की एक निजी फर्म है. इसका नाम है वागनर ग्रुप. रिपोर्टों के मुताबिक विवादों में रही ये फर्म माली में ऑपरेट कर रही है. डॉक्टर इवान कहते हैं कि अगर आप अफ़्रीकन यूनियन का हिस्सा हैं तो आधिकारिक तौर पर ऐसे लड़ाकों का इस्तेमाल नहीं कर सकते. इसका असर सेना के मनोबल पर भी हो सकता है. उनकी राय है कि रूस के इंस्ट्रक्टर्स की मौजूदगी फ्रांस के फैसले का बड़ा कारण रही होगी.

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फ्रांस के सैनिक जा चुके हैं लेकिन ज़ुबानी जंग जारी है.

माली ने हाल में संयुक्त राष्ट्र से लिखित शिकायत की और आरोप लगाया कि फ्रांस ने इस्लामी चरमपंथियों को हथियार मुहैया कराए हैं. फ्रांस ने इसका ज़ोरदार खंडन किया.

गौरतलब है कि फ्रांस के सैनिक अब भी इस इलाके में तैनात हैं.

डॉक्टर इवान जिशावा की राय है, " आंतकवाद से जंग के लिए उन्हें इस इलाके में रहना होगा. आतंकवाद यूरोपीय यूनियन के लिए खतरा है. उन्होंने माली से सैनिक हटा लिए हैं लेकिन बुरकिना फासो समेत पड़ोस के देशों में उनके सैनिक हैं. फ्रांस का कहना है कि उन्होंने माली से सबक सीखा है. जो देश आतंकवादी हमलों का सामना कर रहे हैं, उनके साथ वो ज़्यादा सहयोगपूर्ण तरीके से काम करना चाहते हैं. जिस देश को भी जरूरत होगी वो उसे मदद देंगे."

सैनिकों की वापसी का फैसला करने वाले फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि वो इस बात को खारिज करते हैं कि माली में फ्रांस का अभियान नाकाम रहा. लेकिन डॉक्टर इवान कहते हैं कि किसी वक्त फ्रांस की कॉलोनी रह चुके देशों के साथ रिश्तों को लेकर उन्हें गंभीरता से गौर करना होगा.

माली से रवाना होते फ्रांस के सैनिक

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आगे का रास्ता

वाशिंगटन स्थित अफ़्रीका सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज में डॉयरेक्टर ऑफ़ रिसर्च जो सीगल कहते हैं, "फ्रांस के सैनिकों के जाने के बाद माली में एक बहुत बड़ी खाली जगह बन गई है."

वो कहते हैं कि फ्रांस के सैनिकों की विदाई के बाद अतिवादी समूहों को बढ़ावा मिलेगा.

जो सीगल कहते हैं, " उनकी रफ़्तार बढ़ सकती है. उन्हें माली के समुदायों के बीच पैर जमाने का मौका मिलेगा. वो सिर्फ अलग थलग पड़े चरमपंथियों का समूह नहीं है. वो स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश में हैं. ये सुरक्षा के लिहाज से एक जटिल समस्या है. इसे सिर्फ सेना के तौर तरीकों से हल नहीं किया जा सकता है."

क्या माली की स्थिति भी वैसी ही हो सकती है, जैसे कि अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में हुई, जो सीगल इस सवाल पर कहते हैं कि ये संभावना दूर की कौड़ी नहीं है.

वो याद दिलाते हैं कि इस साल वहां कई जिहादी हमले हुए हैं. ये हमले राजधानी बामाको के सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर के दायरे में हुए हैं. बीते सालों में ऐसा बहुत कम देखने में आया था.

अगर माली के भविष्य की बात करें तो जो सीगल कहते हैं कि फिलहाल लगता है कि आगे तीन स्थितियां बन सकती हैं.

वो कहते हैं, " पहली संभावना ये है कि अभी की तरह सुरक्षा स्थिति लगातार खराब होती जाए. माली में सरकार कमजोर हो और उसकी पकड़ ढीली पड़ जाए. जिहादी राजधानी बामाको का नियंत्रण अपने हाथ में ले लें. ऐसा अचानक भी हो सकता है."

माली के सैनिक

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दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन हो.

जो सीगल कहते हैं, " सेना में मौजूद दूसरे किरदार जो हालात पर तो नज़र रखे हुए हैं लेकिन उन्होंने तख्तापलट का समर्थन नहीं किया, वो आगे आएं और सेना की सरकार को बाहर कर दें. उसके बाद वो विपक्षी दलों को आगे लाकर बदलाव करें. तीसरी स्थिति ये हो सकती है कि विपक्ष और सिविल सोसाइटी सेना पर और दबाव बनाएं कि वो बदलाव की प्रक्रिया में तेज़ी लाएं जिससे नागरिक सरकार का गठन हो सके. जो माली के लोगों के हितों के लिए काम करे और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर देश में स्थिरता लाने की कोशिश करे."

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लौटते हैं उसी सवाल पर कि फ्रांस ने माली से बाहर निकलने का फ़ैसला क्यों किया?

2021 में सेना ने जो तख्ता पलट किया, वो टर्निंग प्वाइंट बन गया.

फ्रांस और माली के रिश्ते में उसके काफी पहले से ही खटास आ चुकी थी.

फ्रांस के सैनिकों को माली से वापस जाना ही था लेकिन बदले घटनाक्रम ने सैनिकों की जल्दी वापसी करा दी.

दोनों देशों के बीच भरोसे का पुल टूट गया. बातचीत बंद हो गई. नीतियों और नेताओं में टकराव बढ़ गया.

माली की सैन्य सरकार की रूस से बढ़ती नजदीकी भी फ्रांस के फैसले की वजह बनी.

फ्रांस के सैनिक माली के पड़ोस में हैं लेकिन इससे सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं दूर नहीं होंगी.

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