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भारत का 'छुपा ख़जाना' हैं 20 करोड़ बेकार मोबाइल और लैपटॉप लेकिन कैसे?
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या आपके पास एक से अधिक मोबाइल फोन हैं? क्या आपके पास लैपटॉप या कोई दूसरा इलेक्ट्रॉनिक गैजेट भी है?
आप शायद इनमें से एक ही का इस्तेमाल करते हों और बाकी यूं ही पड़े हों.
हो सकता है कि इनमें से कुछ अच्छी हालात में हों और कुछ यूं ही खराब पड़े हों.
इंडियन सेलुलर एंड इलेक्ट्रॉनिक एसोसिएशन (आईसीईए) और आईटी कंपनी एसेंचर की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय घरों में मोबाइल और लैपटॉप मिलाकर ऐसे 20 करोड़ 60 लाख डिवाइस हैं,जो बेकार पड़े हैं.
लेकिन आप इन्हें सिर्फ कबाड़ न समझें. ये देश के लिए 'बड़ा खजाना' साबित हो सकता है.
दरअसल ये ‘ई-कचरा’ सर्कुलर इलेक्ट्रॉनिक्स बिजनेस मॉडल की बुनियाद है, जिसका दायरा 2035 तक बढ़ कर 20 अरब डॉलर का हो सकता है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है, "देश में ’सर्कुलर डिजाइन,रिपेयर और री-सेल समेत कुल छह सर्कुलर बिजनेस मॉडल से 2035 तक सात अरब डॉलर की कमाई हो सकती है. पब्लिक और प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के जरिये ये बाज़ार 20 अरब डॉलर का हो सकता है.’’
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत लैपटॉप,मोबाइल और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामानों के री-यूज,रिपेयर, रिकवरी और री-मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस का बड़ा बाज़ार बन सकता है.
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना-प्रौद्योगिकी टेक्नोलॉजी मंत्रालय के सचिव अखिलेश कुमार शर्मा ने कहा है कि भारत के लिए रिपेयरिंग,री-साइक्लिंग और री-यूज इकोनॉमी के लिए बेहद अहम है क्योंकि भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स की खपत लगातार बढ़ रही है.
50 लाख नौकरियां पैदा करने की क्षमता
आने वाले वर्षों के दौरान भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स रिपेयरिंग सबसे बड़ा और तेज़ी से ग्रोथ करने वाला सेक्टर बन सकता है.
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना-प्रौद्योगिकी टेक्नोलॉजी मंत्रालय के मुताबिक़ ये सेक्टर पचास लाख रोजगार पैदा कर सकता है.
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी इंजीनियरों और तकनीशियनों की कमी नहीं है इसलिए ये दुनिया का ‘इलेक्ट्रॉनिक्स रिपेयरिंग डेस्टिनेशन’ भी बन सकता है.
भारत में विकसित देशों की तुलना में रिपेयरिंग की लागत भी कम है इसलिए ये दुनिया का पसंदीदा इलेक्ट्रॉनिक्स रिपेयरिंग बाज़ार बन सकता है. इस सेक्टर में पचास लाख नौकरियां पैदा करने की क्षमता है.
एचसीएल के संस्थापकों में से एक अजय चौधरी कहते हैं, " ये भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार भी खोल सकता है. पूरी दुनिया के इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट रिपेयरिंग के लिए भारत आ सकते हैं. भारत के पास इस काम की विशेषज्ञता है. ये विदेशी मुद्रा कमाने का काफी अच्छा जरिया बन सकता है."
अर्थव्यवस्था को मिलेगी मजबूती
सत्या गुप्ता ने कुछ अरसा पहले लिंक्डइन पर एक सीमित सर्वे कराया था. उनका कहना है इस सर्वे से पता चला है कि इसमें शामिल लोगों के पास औसतन चार मोबाइल थे, जो काम कर रहे थे लेकिन इस्तेमाल नहीं हो रहे थे.
एपिक फाउंडेशन और वीएलएसआई सोसाइटी ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट सत्या गुप्ता कहते हैं,"अगर हम अपने इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट की रिपेयरिंग करा कर इस्तेमाल करते हैं तो इकोनॉमी में 30 फीसदी वैल्यू जोड़ते हैं. कहने का मतलब अगर तीन साल चल चुके किसी मोबाइल को हम रिपेयरिंग के बाद एक और साल चलाते हैं तो हम लगभग 30 फीसदी विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं. क्योंकि अभी भी हमारे यहां ज्यादातर मोबाइल और उनके पार्ट्स आयातित हैं. इससे 33 फीसदी ई-कचरा भी कम पैदा होगा"
डॉलर की बचत
देश में पेट्रोल और गोल्ड के बाद सबसे ज़्यादा आयात इलेक्ट्रॉनिक्स का होता है. फरवरी 2021 से अप्रैल 2022 के बीच 550 अरब डॉलर के आयात बिल में अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम की हिस्सेदारी 62.7 अरब डॉलर की थी.
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए ये एक बड़ा बोझ है, जो पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस के बढ़ते दाम की वजह से भारी दबाव में है. भारत में मोबाइल, लैपटॉप का रिपेयरिंग बाजार बढ़ता है तो इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों का आयात कम होगा और विदेशी मुद्रा बचेगी.
मोबाइल जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स डिवाइस में 14 मैटल्स होते हैं. इनमें से कई कीमती और रेयर अर्थ मैटल होते हैं. इन 14 में से आठ के लिए भारत को पूरी तरह आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. जाहिर है रिपेयरिंग क्षमता और बाज़ार बढ़ने पर ऐसे मैटल्स पर निर्भरता कम हो जाएगी.
‘यूज एंड थ्रो’ बनाम रिपेयरिंग कल्चर
भारत में पश्चिमी देशों की तरह ‘यूज एंड थ्रो’ कल्चर नहीं है. हम किसी चीज का कई बार कई तरह से इस्तेमाल करते हैं
सत्या गुप्ता कहते हैं, "भारत में टूथ ब्रश भी चार बार इस्तेमाल होता है. पहले दांत साफ करने के लिए, फिर बालों को रंगने के लिए, बाथरूम में सफाई के लिए और यहां तक नाड़ा डालने में भी. हमारी संस्कृति में चीजों के अधिकतम इस्तेमाल करने की परंपरा है. आज बहुत सारे लोगों के घर में चार-पांच लैपटॉप या मोबाइल है. इन्हें रिपेयर कर हम अपने स्टूडेंट्स, कम आय के लोगों को दे सकते हैं. आज जरूरत भारत में रिपेयरिंग कल्चर को बढ़ावा देने की है."
अजय चौधरी भी इसके समर्थक हैं. रिपेयरिंग इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के सवाल पर बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "हमें उपभोग के पश्चिमी ढर्रे से हट कर भारतीय परंपरा के हिसाब से चलना होगा, जिसमें री-यूज और री-साइक्लिंग पर जोर होना चाहिए."
अजय चौधरी कहते हैं, "अभी जो मोबाइल बन रहे हैं उनकी रिपेयरिंग नहीं हो सकती. कई मोबाइल तो ऐसे हैं जिनकी बैटरी भी नहीं बदली जा सकती. कई प्रोडक्ट तो खोले भी नहीं जा सकते. हमें ऐसे प्रोडक्ट डिजाइन करने होंगे जिन्हें रिपेयर और अपग्रेड किया जा सके और जो ज्यादा समय तक काम कर सकें."
भारत क्या कर रहा है?
एपिक फाउंडेशन ने भारत में 'राइट टू रिपेयर' पर एक रिपोर्ट तैयार की है.
अजय चौधरी बताते हैं, "उपभोक्ता मामलों का मंंत्रालय इस पर काम कर रहा है. चूंकि इस सेक्टर में एक्सपोर्ट के काफी मौके हैं इसलिए सरकार हार्डवेयर संगठन एमएआईटी की रिपोर्ट पर काम कर रही है. पिछले तीन महीने से इस पर बेंगलुरू में काम हो रहा है. सरकार का आयात-निर्यात विभाग और सीमा शुल्क विभाग इस पर काम कर रहा है. नए नियम तय किए जा रहे हैं जिससे भारत में गैजेट की मरम्मत कर निर्यात किया जा सके."
वो कहते हैं, "भारत सरकार का मानना है कि यहां काफी इंजीनियर और तकनीशियन हैं जो रिपेयरिंग का काम काफी अच्छा कर सकते हैं. इससे दो फायदे होंगे. नौकरियां पैदा होंगी और भारत के लिए निर्यात का नया बाजार तैयार होगा.ये भारत के लिए फायदे का सौदा है."
संगठित रिपेयरिंग सेक्टर की जरूरत
सत्या गुप्ता कहते हैं, "हमारे यहां मोबाइल और लैपटॉप रिपेयिंग का काम असंगठित सेक्टर क्षेत्र कर रहा है.अगर हम इस इंडस्ट्री को संगठित कर दें तो इसका काफी फायदा होगा."
संगठित रिपेयरिंग सेक्टर में भारत में दो या तीन ही कंपनी हैं. उनमें भी एक या दो ई-कॉमर्स कंपनी हैं, जो वेंडर से ये काम कराती है. लिहाजा यहां संगठित रिपेयरिंग इंडस्ट्री की ग्रोथ की बड़ी संभावना है. भारत में रिपेयरिंग कंपनी खड़ी कर इसकी ब्रांडिंग की जा सकती है स्टार्ट-अप खोले जा सकते हैं.
कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के तहत रिपेयरिंग कंपनी खोली जा सकती है. अगर भारत अपने यहां की असंगठित रिपेयरिंग सेक्टर को संगठित सेक्टर में तब्दील कर सके तो ये रिपेयरिंग और रिफरबिशमेंट का वैश्विक केंद्र बन सकता है.
राइट टू रिपेयर
भारत में उपभोक्ता मामलों के मंंत्रालय ने राइट टू रिपेयर पोर्टल बनाया है. ये पोर्टल वारंटी अवधि में गैजेट और गाड़ियों की रिपेयरिंग की सहूलियत देता है.
पोर्टल काम रहा है और फिलहाल कंज्यूर ड्यूरेबल्स, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, गाड़ियों और कृषि उपकरणों के गारंटी पीरियड में रिपेयरिंग का अधिकार देता है. इस पोर्टल पर प्रोडक्ट की सर्विस, वारंटी, शर्तों और नियमों से जुड़ी जानकारी मौजूद होती है.
फिलहाल 17 ब्रांड राइट टू रिपेयर पोर्टल पर रजिस्टर्ड हैं. इनमें ऑटोमोटिव, स्मार्टफोन और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स उद्योग की कंपनियों से जुड़े ब्रांड शामिल हैं. जो ब्रांड शामिल हैं वो हैं- एप्पल, सैमसंग, रियलमी, ओप्पो, एचपी, बोट, पैनासोनिक, एलजी, केंट, हैवेल्स, माइक्रोटेक, ल्यूमिनस. गाड़ियों के ब्रांड में हीरो मोटोकॉर्प और होंडा मोटरसाइकिल.
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