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पीएम मोदी के ग्रीस दौरे के बाद अदानी के नाम की चर्चा क्यों?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर पीएम मोदी पर अदानी समूह को फ़ायदा पहुँचाने के लिए विदेश यात्रा पर जाने का आरोप लगाया है.
बीजेपी के प्रवक्ता ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है जबकि अदानी समूह ने इसे कयासबाज़ी बताया है.
पीएम मोदी पिछले हफ़्ते ग्रीस दौरे पर गए थे. पिछले 40 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का ये पहला दौरा था.
इससे पहले साल 1983 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ग्रीस पहुंची थीं जो भूमध्य सागर क्षेत्र में भारत के लिए रणनीतिक रूप से काफ़ी अहम है.
पीएम मोदी ने ग्रीस पहुँचकर कहा था, "चालीस सालों बाद भारत के किसी प्रधानमंत्री का ग्रीस आना हुआ है. फिर भी, ना तो हमारे संबंधों की गहराई कम हुई है, ना ही रिश्तों की गर्मजोशी में कोई कमी आई है."
लेकिन इसके बाद भी पीएम मोदी ने ग्रीस में सिर्फ़ कुछ घंटे ही गुज़ारे.
पीएम मोदी दक्षिण अफ़्रीका में आयोजित हुए ब्रिक्स सम्मेलन से लौटते हुए ग्रीस पहुंचे थे. और इसके तुरंत बाद उन्हें बेंगलुरू पहुंचकर इसरो के वैज्ञानिकों से मुलाक़ात करनी थी.
लेकिन इतने संक्षिप्त दौरे और व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद भारत में काम कर रही कई कंपनियों के शीर्ष अधिकारी ग्रीस पहुंचकर पीएम मोदी के साथ उस बिज़नेस लंच में शामिल हुए जिसे ग्रीक पीएम ने आयोजित किया था.
इस मौके पर ग्रीस के व्यापारिक जगत के शीर्ष अधिकारियों ने भारतीय व्यापारिक हस्तियों से मुलाक़ात की.
क्या कह रहा है ग्रीस का मीडिया?
पीएम मोदी के दौरे के बारे में ग्रीक मीडिया में दावा किया गया है कि पीएम मोदी ने ग्रीस के बंदरगाहों के अधिग्रहण को लेकर रुचि ज़ाहिर की है.
ग्रीस के अख़बार ग्रीक सिटी टाइम्स ने लिखा है– ‘पीएम मोदी के इस दौरे पर रणनीतिक निवेश और पर्यटन आदि के साथ-साथ बंदरगाहों के अधिग्रहण के मुद्दे पर भी चर्चा हुई.’
अख़बार ने ये भी लिखा है कि – ‘सूत्रों ने बताया है कि पीएम मोदी ने ग्रीस में बंदरगाहों को अधिग्रहित करने में अपनी रुचि दिखाई है. और इसकी वजह भारतीय अरबपति व्यवसायी गौतम अदानी का अदानी समूह है जिसकी ग्रीस के दो बंदरगाहों कावाला और वोलोस में रुचि है. इसके साथ ही ये समूह अलेक्ज़ेंडरोपोली में भी दिलचस्पी ले रहा है.’
ग्रीस के एक अन्य मीडिया समूह प्रोटो थेमा ने भी इसी मुद्दे पर सूत्रों के हवाले से यही ख़बर प्रकाशित की है.
ग्रीस के बिजनेस डेली ने गौतम अदानी के प्रभाव, उनके व्यवसाय और पीएम मोदी के साथ उनके क़रीबी रिश्तों के बारे में एक ख़बर छापी है.
वहीं, एक मीडिया समूह ने यहाँ तक लिखा है कि भारत से 40 साल बाद पीएम मोदी ग्रीस आए थे लेकिन महफ़िल गौतम अदानी लूट ले गए.
हालांकि, ग्रीस में पीएम मोदी के साथ लंच में शामिल हुए भारतीय व्यवसायियों में गौतम अदानी शामिल नहीं थे.
अब तक अदानी समूह की ओर से ग्रीस के इन तीन बंदरगाहों को लेकर सार्वजनिक रूप से रुचि ज़ाहिर नहीं की गई है.
अदानी ग्रुप के प्रवक्ता ने भी बीबीसी को इमेल भेजकर बताया है कि "हम इस तरह की कयासबाजी का खंडन करते हैं."
लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पीएम मोदी को घेरने की कोशिश की है.
कांग्रेस पार्टी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है – ‘जैसा कि आपको पता है कि पीएम मोदी अभी-अभी ग्रीस की यात्रा से लौटे हैं, वहाँ उन्होंने ग्रीस के पोर्ट्स में दिलचस्पी भी दिखाई थी. अब ख़बर है कि अदानी ग्रुप ग्रीस के पोर्ट्स का अधिग्रहण करने वाला है. इसका मतलब है कि हमेशा की तरह इस बार भी मोदी जी की विदेश यात्रा अपने परम मित्र को डील दिलाने के लिए ही थी. यानी मोदी ही अदानी है, अदानी ही मोदी है.’
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस विवाद पर प्रकाशित ख़बर शेयर करते हुए लिखा है कि शायद इसी वजह से पीएम मोदी पहले बंगलुरु नहीं पहुँच पाए.
बीजेपी प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने बीबीसी से बात करते हुए अपना पक्ष रखा है.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस की ओर से लगाए गए बेबुनियाद आरोपों पर मेरी कोई जानकारी नहीं है. अगर भारत को आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित होना है तो इंटरनेशनल ट्रेड रूट्स पर हमारी मौजूदगी आवश्यक है.
मोदी जी वैश्विक स्तर पर यह सुनिश्चित करने की तरफ़ आगे कदम बढ़ा रहे हैं, और इसमें भारत को सफलता भी मिल रहीं हैं. इन सब प्रयासों के माध्यम से पीएम मोदी जी भारत के हित में लगातार काम कर रहे हैं."
लेकिन पीएम मोदी के ग्रीस पहुँचने से पहले वहाँ के विदेश मंत्री जॉर्ज गेरापेट्राइटिस ने वियोन न्यूज़ को बताया है कि ग्रीस में स्थित यूरोप के सबसे बड़े बंदरगाहों में शामिल परेअस पोर्ट भारत के यूरोप में प्रवेश का ज़रिया बन सकता है.
अदानी की चर्चा क्यों?
अदानी समूह की सहायक कंपनी 'अदानी पोर्ट्स एंड एसईज़ेड' लिमिटेड को दुनिया के सबसे बड़े पोर्ट डेवेलपर और संचालक कंपनी के रूप में देखा जाता है.
ये कंपनी सिर्फ़ भारत में ही 13 टर्मिनलों का संचालन कर रही है. और भारत की मैरिटाइम कमाई पर अदानी समूह की 24 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.
अदानी समूह ने भारत के बाहर इस क्षेत्र में पैर पसारते हुए इज़राइल के दूसरे सबसे बड़े बंदरगाह हाइफ़ा को अधिग्रहित किया है.
अदानी समूह को इस बंदरगाह की लीज़ साल 2054 तक के लिए मिली है. और इस पोर्ट में 70 फीसद हिस्सेदारी अदानी समूह की है.
इसके साथ ही तीस फीसद हिस्सेदारी इसराइली केमिकल और लॉजिस्टिक कंपनी गोडॉट के पास है.
इस डील के फ़ाइनल होने के समय गौतम अदानी ने ट्वीट किया था, "इस डील का कूटनीति और ऐतिहासिक महत्व है. हाइफ़ा में आकर मैं ख़ुश हूँ, जहाँ 1918 में भारतीयों ने सैन्य इतिहास के सबसे महान घुड़सवारों की टुकड़ी का नेतृत्व किया था."
इस डील के बाद से माना जा रहा है कि अदानी की हाइफ़ा पोर्ट पर एंट्री एशिया और यूरोप के बीच मैरिटाइम ट्रैफ़िक में इज़ाफ़ा करेगी और भूमध्यसागर में वह एक बड़ा एशियाई प्लेयर बनकर उभरेगा.
कितने अहम हैं भूमध्यसागर के ये बंदरगाह?
लेकिन सवाल उठता है कि ग्रीस और सुर्खियां बटोर रहे इसके बंदरगाहों की रणनीतिक अहमियत क्या है?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफेसर डॉ राजन कुमार मानते हैं कि पीएम मोदी का ये दौरा दोनों देशों के बीच रिश्तों में गतिशीलता लाएगा.
वे कहते हैं, “द्विपक्षीय रिश्तों को बेहतर बनाने की कोशिश के साथ-साथ ग्रीस में हमारे दूसरे हित भी हैं. पूर्वी भूमध्यसागर में ग्रीस की लोकेशन बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. क्योंकि हम यूरोप के तमाम देशों के साथ व्यापार करते हैं. ऐसे में भारत से निर्यात होने वाला माल मुंबई से निकलता है.
इसके बाद वह स्वेज नहर से होता हुआ भूमध्यसागर में प्रवेश करता है.
इसके बाद स्पेन के नीचे स्थित जिब्राल्टर से होते हुए अटलांटिक महासागर में जाता है, जहाँ से वह अमेरिका और लातिन अमेरिकी देशों में जाता है. इसके साथ ही भूमध्य सागर से निकलने वाला भारतीय माल यूरोपीय देशों की ओर भी बढ़ता है. इस लिहाज़ से ग्रीस की रणनीतिक लोकेशन अहम हो जाती है.”
लेकिन क्या ग्रीस के साथ संबंध बेहतर करते हुए भारत तुर्की को भी स्पष्ट संदेश देने की कोशिश कर रहा है?
तुर्की - चीन के लिए भी संदेश?
डॉ राजन कुमार इसका जवाब देते हुए कहते हैं कि ये तुर्की को स्पष्ट संकेत है कि अगर आप पाकिस्तान के साथ जाएँगे, कश्मीर के मुद्दे पर बात करेंगे तो हम भी आपके प्रतिद्वंद्वियों के साथ संबंध मज़बूत करेंगे.
उन्होंने बताया, "दुनिया जानती है कि तुर्की और ग्रीस के बीच संबंध काफ़ी तीख़े हैं, विशेष रूप से साइप्रस और एजइन सागर के दूसरे द्वीपों की वजह से. ऐसे में भारत वहाँ अपना बेस बनाने की कोशिश कर सकता है. और हमारे नौसेनिक अभ्यास भी हो रहे हैं जिससे प्रतिद्वंद्वी देश को संकेत जाता है. ऐसे में तुर्की को एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश है. और ग्रीस में ये हमारा भू-राजनीतिक हित है."
लेकिन ये दुनिया का वो क्षेत्र है, जहाँ चीन तेज़ी से अपने क़र्ज़ के दम पर पैर पसारता हुआ दिख रहा है.
यूरोप के सबसे बड़े बंदरगाहों में से ग्रीस के परेअस बंदरगाह में चीन की हिस्सेदारी लगभग साठ फ़ीसदी है.
इसके साथ ही चीन ने स्वेज़ नहर के क़रीब स्थित अफ़्रीकी देशों जैसे सोमालिया, इथियोपिया में अच्छा निवेश किया हुआ है.
यूरोप की बात करें तो चीन ने ग्रीस, इटली और स्पेन में भी निवेश किया हुआ है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत इस क्षेत्र में धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाने की दिशा में बढ़ रहा है.
राजन कुमार इसके जवाब में कहते हैं, “ग्रीस को यूरोप में सबसे ख़राब अर्थव्यवस्था वाले देशों में गिना जाता है. लेकिन पिछले साल ग्रीस की अर्थव्यवस्था में तेज़ उछाल देखने को मिला है. और इसमें चीनी निवेश की एक अहम भूमिका रही है. ऐसे में भारत की ओर से शुरू की गई कोशिश को एक शुरुआत भर कहा जा सकता है.”
राजन कुमार इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, “रणनीतिक दृष्टि से हाइफ़ा को इसराइल का दूसरा सबसे अहम बंदरगाह बताया जाता है. इसके बाद अगर हम ग्रीस में जगह बना पाते हैं, ब्रिक्स का सदस्य बनने वाले मिस्र के साथ हमारे संबंध पहले से हैं.
ऐसे में इन तमाम देशों के साथ हमारे संबंध इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव के साथ संतुलन बिठाने की कोशिश भी है.
लेकिन चीन का ग्रीस, इटली और स्पेन में भारी निवेश है. इसके साथ सोमालिया और इथियोपिया में भी उसने अच्छा निवेश किया हुआ है. ऐसे में ये एक शुरुआत भर है. क्योंकि चीन की बराबरी करने के लिए हमें भारी निवेश करने की ज़रूरत होगी जो हमारे लिए मुश्किल होगा. लेकिन हम यूरोपीय संघ के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता करने वाले है. ब्रिटेन के साथ हमारा इस तरह का समझौता होने ही वाला है.
अगर ये समझौते हो जाते हैं तो ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ हमारा व्यापार बढ़ने की काफ़ी अच्छी संभावनाएं हैं. ऐसे में व्यापार का ये मार्ग हमारे लिए काफ़ी अहम हो जाता है. इसी वजह से भारतीय कूटनीति धीरे-धीरे उन छोटे-छोटे देशों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है जिन्हें पहले नज़रअंदाज़ किया जाता था.”
भारत और ग्रीस के बीच मौजूदा व्यापार सिर्फ़ दो अरब डॉलर का है जिसे अगले कुछ सालों में बढ़ाकर चार अरब डॉलर तक करने की प्रतिबद्धता जताई जा रही है.
इसके साथ ही ग्रीस से लगते हुए यूरोपीय देशों के साथ भी भारत का व्यापार बहुत ज़्यादा नहीं है.
ऐसे में ये देखना होगा कि आने वाले समय में भारत सरकार ग्रीस में अपनी जगह तलाशने के साथ ही उसके साथ अपने रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने के लिए किस तरह के कदम उठाती है.
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