यूएई सोमालिया में कैसे फंस गया है, अच्छे रिश्ते क्यों हुए ख़राब

    • Author, बुशरा मोहमद
    • पदनाम, बीबीसी अफ़्रीका

पिछले कई हफ़्तों से सोमालिया अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने के लिए कूटनीतिक कोशिश में लगा है.

इसराइल ने उससे अलग हुए क्षेत्र सोमालीलैंड को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दे दी है.

सोमालीलैंड, सोमालिया से अलग हुआ एक क्षेत्र है, जो 1991 से स्वतंत्र देश के तौर पर काम कर रहा है.

राजनयिक संपर्कों और उच्च स्तर की फोन पर बातचीत के ज़रिये सोमालिया की सरकार ने अफ़्रीका और मध्य-पूर्व के कई देशों का समर्थन हासिल कर लिया है ताकि इस मान्यता का विरोध किया जा सके.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक रिश्ता बुरी तरह बिगड़ गया है और वो है, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ सोमालिया की पुरानी साझेदारी.

तेल से समृद्ध खाड़ी देश यूएई को लंबे समय से सोमालिया की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति में एक अहम भूमिका निभाने वाला देश माना जाता रहा है.

क्यों बिगड़ रहे हैं यूएई और सोमालिया के रिश्ते

सोमालिया की 3,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा है, जो अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से लगती है.

यह इलाक़ा रणनीतिक रूप से अहम है लेकिन यहाँ समुद्री डकैती और हथियारों की तस्करी भी होती रही है, जिसने अफ़्रीका और मध्य-पूर्व दोनों में अस्थिरता बढ़ाई है.

यूएई ने सोमालिया की संघीय सरकार के साथ-साथ उसके अलग-अलग क्षेत्रों के साथ भी कई स्तर पर रिश्ते बनाए थे.

वह पंटलैंड के बोसासो, जुबालैंड के किसमायो और सोमालीलैंड के बेरबेरा बंदरगाह को संचालित करने में भी शामिल रहा है.

लेकिन सोमवार को सोमालिया की संघीय सरकार ने यूएई के साथ सभी बंदरगाह प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग समझौतों को रद्द करने की घोषणा कर दी.

सरकार ने आरोप लगाया कि यूएई सोमालिया की संप्रभुता को कमज़ोर कर रहा है.

राष्ट्रपति हसन शेख़ महमूद ने एक असाधारण कैबिनेट बैठक के बाद टीवी पर दिए अपने संबोधन में कहा, ''यूएई के साथ हमारे अच्छे संबंध थे लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने हमें एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में नहीं देखा. गहन समीक्षा के बाद हमें यह फ़ैसला लेने के लिए मजबूर होना पड़ा."

यूएई ने अब तक इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के सीनियर रिसर्चर उमर महमूद ने बीबीसी से कहा कि इसराइल की ओर से सोमालीलैंड को मान्यता देना इस फैसले की पृष्ठभूमि में है.

महमूद के मुताबिक, "सोमालिया इसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन मानता है और उसका मानना है कि यूएई ने पर्दे के पीछे इस फ़ैसले का समर्थन किया."

दिसंबर 2025 के आख़िर में इसराइल दुनिया का पहला देश बना, जिसने सोमालीलैंड की स्वतंत्रता को मान्यता दी.

इसके बाद सोमालीलैंड की राजधानी हरगेइसा में बड़े पैमाने पर जश्न मनाया गया.

सोमालीलैंड पिछले 30 सालों से अंतरराष्ट्रीय मान्यता की उम्मीद लगाए बैठा था.

उसने सोमालिया से अलग होकर अपनी सरकार बनाई, अपना पासपोर्ट और अपनी मुद्रा अपनाए.

इसके बदले में सोमालीलैंड ने 2020 के अब्राहम समझौतों में शामिल होने की बात कही.

इन समझौतों के तहत अब तक यूएई, बहरीन और मोरक्को ने इसराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं.

इससे इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को उस समय राजनीतिक बढ़त मिली है, जब गज़ा युद्ध को लेकर उनकी सरकार की कड़ी आलोचना हो रही है.

जियो-पॉलिटिकल टकराव का केंद्र और यमन कनेक्शन

उमर महमूद कहते हैं, ''यह इलाक़ा अब अलग-अलग जियो-पॉलिटिकल गुटों में बँटता जा रहा है. एक तरफ़ यूएई और इसराइल हैं जबकि दूसरी तरफ़ सऊदी अरब, तुर्की और कुछ दूसरे देश.''

सोमवार को मध्य-पूर्व से जुड़ी ख़बरों और विश्लेषणों की वेबसाइट मिडिल ईस्ट आई ने लिखा कि कूटनीतिक टकराव के चलते यूएई ने बोसासो स्थित एयर बेस से अपने सुरक्षाकर्मियों और भारी सैन्य उपकरणों को वापस ले लिया है.

विश्लेषक उमर महमूद का कहना है कि सोमालिया और यूएई के रिश्ते 2024 से ही लगातार बिगड़ते जा रहे हैं.

इथियोपिया हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में यूएई का बड़ा सहयोगी है. उसने संकेत दिया था कि वह सोमालीलैंड की स्वतंत्रता को मान्यता देने के लिए तैयार है. इसके बदले उसे अलग हुए इस क्षेत्र के तट पर एक नौसैनिक अड्डा स्थापित करने की अनुमति दी जानी थी.

महमूद के मुताबिक़, "2024 में इथियोपिया और सोमालीलैंड के बीच हुए समझौते के बाद यूएई को लेकर सोमालिया का संदेह बढ़ गया.''

इस समझौते में समुद्र तक पहुंच के बदले मान्यता देने की बात थी और सोमालिया को लगा कि यूएई ऐसे किसी समझौते का समर्थन कर सकता है, जिसका वह कड़ा विरोध करता है.

महमूद कहते हैं, "लेकिन इथियोपिया ने केवल मान्यता देने का वादा किया था. इसराइल ने आगे बढ़कर सच में मान्यता दे दी और इससे मामला और गंभीर हो गया.''

विश्लेषक यह भी बताते हैं कि सोमालिया ने यूएई पर यह आरोप लगाया है कि उसने अपनी ज़मीन का इस्तेमाल यमन के अलगाववादी नेता ऐदारूस अल-ज़ुबैदी को देश से बाहर निकालने में मदद के लिए किया.

माना जा रहा है कि यही घटना दोनों देशों के रिश्तों में अंतिम टूट का कारण बनी.

सोमालिया के विदेश मामलों के राज्य मंत्री अली उमर ने अल जज़ीरा से कहा, "सोमालिया के हवाई क्षेत्र और हवाई अड्डों का इस्तेमाल किसी भगोड़े को चुपचाप बाहर निकालने के लिए किया जाए, यह बात सोमालिया को मंजूर नहीं है."

पिछले हफ़्ते यमन में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने भी ऐसा ही आरोप लगाया था. उसका कहना था कि ऐदारूस अल-ज़ुबैदी, यमन की अलगाववादी सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल का नेतृत्व करते हैं.

उन्हें पहले जहाज़ के जरिए बेरबेरा पहुंचा और फिर मोगादिशु के रास्ते एक कार्गो विमान से अबू धाबी भेजा गया.

आरोप है कि यह सब यूएई के अधिकारियों की निगरानी में हुआ.

हालांकि यूएई यमन में अलगाववादियों का समर्थन करने के आरोप से इनकार करता है.

यह पहली बार नहीं है जब सोमालिया और यूएई के रिश्ते बिगड़े हों.

2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अब्दुल्लाही फरमाजो के नेतृत्व में सोमालिया ने यूएई से संबंध तोड़ दिए थे.

उस समय यूएई पर सोमालिया के आंतरिक मामलों में दख़ल देने का आरोप लगाया गया था.

दिलचस्प बात यह है कि उस समय मौजूदा राष्ट्रपति हसन शेख़ महमूद विपक्ष में थे और उन्होंने सोमालिया में यूएई की भूमिका का ज़ोरदार बचाव किया था.

लेकिन अब उन्होंने बिल्कुल अलग रुख़ अपनाया है और यमन युद्ध को लेकर यूएई और सऊदी अरब के बीच मतभेदों का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं

सोमालिया के इस फ़ैसले का कितना असर?

बालकीस इनसाइट थिंक-टैंक की विश्लेषक समीरा ग़ैद ने बीबीसी से कहा, "सोमालीलैंड को इसराइल की मान्यता और यमन में सऊदी अरब और सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल से जुड़े बदलते हालात ने सरकार पर इतना दबाव बना दिया कि उसे निर्णायक कदम उठाना पड़ा."

हालांकि उमर महमूद का कहना है कि सोमालिया की संघीय सरकार के पास यूएई के साथ बंदरगाह समझौते रद्द करने के अपने फैसले को ज़मीन पर लागू करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है क्योंकि उसका अलग हुए क्षेत्र सोमालीलैंड पर कोई नियंत्रण नहीं है.

इतना ही नहीं, सोमालिया की संघीय सरकार का पंटलैंड और जुबालैंड के बंदरगाहों पर भी बहुत सीमित प्रभाव है.

ये दोनों सोमालिया के भीतर अर्द्ध स्वायत्त क्षेत्र हैं.

महमूद कहते हैं, "इन इलाकों में सोमाली सरकार की ज़मीनी मौजूदगी बेहद कम है और वह सत्ता के बंटवारे को लेकर इन क्षेत्रीय प्रशासन से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझी हुई है."

उम्मीद ना के बराबर

दुबई स्थित लॉजिस्टिक्स कंपनी डीपी वर्ल्ड भी संघीय सरकार की घोषणा से ज़्यादा परेशान नहीं दिखी.

कंपनी ने कहा कि सोमालीलैंड के बेरबेरा बंदरगाह पर उसका संचालन जारी रहेगा.

डीपी वर्ल्ड ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए बयान में कहा, ''डीपी वर्ल्ड बंदरगाह के सुरक्षित और प्रभावी संचालन पर ध्यान केंद्रित रखे हुए है और सोमालीलैंड और पूरे हॉर्न ऑफ अफ़्रीका क्षेत्र को व्यापार और आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है."

कंपनी ने कहा, "राजनीतिक फ़ैसलों में अंतर-सरकारी बातचीत या कूटनीतिक रुख़ से जुड़े सवाल संबंधित अधिकारियों से पूछे जाने चाहिए."

यह बयान हैरान करने वाला नहीं था क्योंकि सोमालीलैंड पहले ही कह चुका है कि यूएई के साथ उसके सभी समझौते ''क़ानूनी और बाध्यकारी'' हैं.

जहां तक जुबालैंड का सवाल है, उसने संघीय सरकार के फैसले को ''अमान्य और निरर्थक" क़रार दिया है, जबकि पंटलैंड ने इसकी निंदा करते हुए कहा कि यह फैसला ''संवैधानिक शासन के सिद्धांतों के मुताबिक़ नहीं है''.

फिर भी महमूद का कहना है कि सोमालिया के पास अब भी यूएई और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने के कुछ साधन मौजूद हैं.

वो कहते हैं, " सोमालिया देश के हवाई क्षेत्र को नियंत्रित करता है और कूटनीतिक दबाव के साथ-साथ इसका इस्तेमाल यूएई और क्षेत्रीय प्रशासन दोनों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है.''

"इसके अलावा, सोमालिया तुर्की और सऊदी अरब जैसे साझेदारों को भी अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश करेगा."

महमूद को निकट भविष्य में सोमालिया और यूएई के रिश्तों में सुधार की उम्मीद नहीं दिखती क्योंकि उनके शब्दों में, ''आपसी भरोसा ख़त्म हो चुका है". वो कहते हैं, "इस भरोसे को बहाल करने के लिए व्यापक कूटनीति और ठोस क़दमों की ज़रूरत होगी.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.