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अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: अदालत और सरकार ने क्या कहा
- Author, सुचित्र मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जम्मू और कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा दिए जाने में लगने वाले समय के बारे में पूरी जानकारी मुहैया कराने का निर्देश दिया है.
संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस आदेश के साथ ही राज्य में लोकतंत्र बहाली की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने साल 2019 में अनुच्छेद 370 ख़त्म करके जम्मू और कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था. इस फ़ैसले से जम्मू और कश्मीर का प्रशासन सीधे केंद्र के हाथों में आ गया था.
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से ये भी बताने के लिए कहा है कि जम्मू और कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म करने का फ़ैसला किस आधार पर लिया गया है.
केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि जम्मू और कश्मीर की 'मौजूदा स्थिति' कोई स्थाई बात नहीं है और इसे कभी भी वापस राज्य बनाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को क्या-कुछ हुआ
अनुच्छेद 370 ख़त्म करने और जम्मू और कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ सुनवाई कर रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वे केंद्र सरकार से इस बारे में पूछें कि क्या जम्मू और कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा दिए जाने का कोई टाइम फ्रेम हो सकता है.
सॉलिसिटर जनरल अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले का बचाव कर रहे थे तभी सुप्रीम कोर्ट ने ये बात कही.
संविधान पीठ ने केंद्र से ये सवाल भी पूछा कि "क्या संसद के पास किसी मौजूदा राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने का अधिकार है?"
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि जम्मू और कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फ़ैसला कोई स्थाई नहीं है.
लोकतंत्र की बहाली
उन्होंने कहा, "जम्मू और कश्मीर को फिर से राज्य बनाया जाएगा जब वहां हालात सामान्य हो जाएंगे."
सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस सिलसिले में की जा रही कोशिशों के बारे में संसद में सरकार ने बयान भी दिया है.
तुषार मेहता ने कहा, "जब कोशिशें रंग लाएंगी और हालात सामान्य होंगे तो हम इस पर विचार करेंगे. हम हमेशा ही राष्ट्रीय एकता के पक्ष में रहे हैं. मैं राजनीति और चुनाव की बात नहीं कर रहा हूं. मैं राष्ट्रीय एकता की बात कर रहा हूं. इस में जनहित का ख़्याल रखा जा रहा है."
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि लोकतंत्र की बहाली भी महत्वपूर्ण है.
बेंच ने कहा, "लोकतंत्र को बहाल किया जाना भी उतना ही अहम है. हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते हैं जहां हालात आपके काबू में न हो."
जम्मू और कश्मीर का स्पेशल स्टेटस
केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए तुषार मेहता ने बताया कि साल 2020 में जम्मू और कश्मीर में दशकों बाद पहली बार स्थानीय निकाय चुनाव कराए गए और कोई हड़ताल नहीं हुई और कोई कर्फ़्यू नहीं लगाया गया.
तुषार मेहता ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि फरवरी, 2019 में पुलवामा में जेहादी चरमपंथी हमला हुआ था जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवानों की जान चली गई.
उन्होंने कहा कि इस घटना की वजह से केंद्र सरकार को जम्मू और कश्मीर के स्पेशल स्टेटस खत्म करने और भारत संघ में उसके पूर्ण विलय पर मजबूर होकर विचार करना पड़ा.
तुषार मेहता ने कहा, "वहां नए होटल बनाए जा रहे हैं. हर किसी को इस फ़ैसले से फ़ायदा हो रहा है. नौजवान जिन्हें पहले आतंकवादी गुट भर्ती कर लिया करते थे और जिनके मन में भारत विरोधी भावनाएं थीं, उन्हें रोज़गार मुहैया कराया जा रहा है."
"केंद्र सरकार की इन नीतियों से पता चलेगा कि जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन सही था या गलत. ये योजना यह सुनिश्चित करती है कि जम्मू और कश्मीर में अब तक जो कुछ भी किया गया है, उससे वहां के हालात सामान्य हों.
सॉलिसिटर जनरल ने ये भी कहा कि जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन में वही तरीका अपनाया गया है जो साल 1966 में पंजाब का बंटवारा करके हरियाणा और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ बनाते वक़्त अपनाया गया था. उस वक़्त पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू था. भविष्य में जम्मू और कश्मीर भी राज्य बन सकता है.
उन्होंने कहा, "ये सभी नीतिगत मुद्दे हैं. जब कभी किसी राज्य का पुनर्गठन होता है, इससे संबंधित योजना में केंद्र यह भी तय करती है कि राज्य के पुनर्गठन के बाद क्या किया जाएगा. किस तरह से राज्य के युवकों को मुख्यधारा में लाया जाएगा, सभी को कैसे रोज़गार मुहैया कराया जाएगा, इन सभी मुद्दों पर विचार किया जाता है."
अगस्त, 2019 के फ़ैसले का बचाव करते हुए तुषार मेहता ने कहा, "रोज़गार भी जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है. लेकिन अनुच्छेद 35ए की वजह से वहां दशकों रहने के बावजदू जम्मू और कश्मीर के बाहर का कोई व्यक्ति संपत्ति नहीं खरीद सकता है. इसका मतलब वहां निवेश नहीं हो पाएगा."
इस पर बेंच ने कहा, "अनुच्छेद 35ए वहां के बाशिंदों को विशेषाधिकार देता है और जहां तक ग़ैरबाशिंदों की बात है, उनसे वो अधिकार ले भी लेता है."
तुषार मेहता का कहना था कि अब पूरा संविधान ही जम्मू और कश्मीर में लागू है और इसके साथ ही राज्य के लोग बाक़ी भारत के अपने बहन-भाइयों की तरह बराबर हैं. इसके साथ ही जितने भी जनकल्याणकारी क़ानून हैं, वो सभी वहां लागू हुए हैं.
मेहता ने कहा कि जिन लोगों पर उन्हें रास्ता दिखलाने की जिम्मेदारी थी, वे लोग अब तक वहां के लोगों को ये समझाते रहे थे कि अनुच्छेद 370 आपकी तरक्की में कोई बाधा नहीं है. ये आपका विशेषाधिकार है. आप लड़ेंगे तो कोई भी अनुच्छेद 370 आपसे छीन नहीं सकता है. ये सबसे दुखद बात है कि अदालत के समक्ष दो प्रमुख राजनीतिक दल अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेध 370 का बचाव कर रहे हैं.
तुषार मेहता ने अदालत का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि अनुच्छेद 370 ख़त्म किए जाने के फ़ैसले के बाद अब तक 16 लाख सैलानी कश्मीर की यात्रा कर चुके हैं. वहां नए होटल बनाए जा रहे हैं जिससे बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार मुहैया कराया जा सके.
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