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कश्मीर: 'सूचनाओं के ब्लैकहोल' में कैसी है ज़िंदगी
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली में रह रही एक महिला ने पिछले महीने भारत प्रशासित कश्मीर में रहने वाले अपने दोस्तों के नाम बेहद ख़ूबसूरत हस्तलेख में एक पत्र लिखा.
वो जुलाई में कश्मीर घूमने गई थीं, जब वहां कुछ लोगों से उनकी दोस्ती हो गई. वो जानना चाहती थीं कि उनके कश्मीरी दोस्तों का क्या हाल है.
''आह! कितना कठोर समय है'', महिला ने काले रंग से ये पंक्तियां लिखी हैं.
उन्होंने लिखा है, "सुबह होने से पहले रात सबसे ज़्यादा स्याह होती है और सुबह का अब भी इंतज़ार है."
उन्होंने अपने पत्र समाप्त करते हुए लिखा, "बुरी तरह टूट चुके दिल के साथ.''
पत्र में जो पीड़ा झलक रही है उसकी एक खास वजह है.
ब्लैक होल
एक अशांत इलाका जहाँ लगभग एक करोड़ लोग रहते हैं, वह बीती पांच अगस्त से पूरी तरह बंद हो चुका है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस इलाके की स्वायत्तता छीन ली है.
इस एकाकीपन को संचार माध्यमों पर लगी पाबंदियों ने और बढ़ा दिया है. फ़ोन, मोबाइल, इंटरनेट सेवाएं बंद हैं. एक स्थानीय संपादक के शब्दों में, "कश्मीर सूचना के ब्लैकहोल में डूब रहा है."
एक महीने से भी ज़्यादा समय गुज़रने के बाद अब जब सरकार 80 प्रतिशत से ज़्यादा लैंडलाइन फ़ोन्स की सेवाएं बहाल कर देने का दावा कर रही है, तब भी सूचनाओं और संचार साधनों पर रोक जस की तस है.
दिल्ली की महिला ने यह चिट्ठी तब लिखी जब उन्होंने कश्मीर से दिल्ली आए एक पत्रकार की फेसबुक पोस्ट देखी.
27 साल के विकार सईद कश्मीर से दिल्ली इंटरनेट इस्तेमाल करने और समाचार संस्थानों को कश्मीर से जुड़े स्टोरी आइडिया देने आए थे.
इस पत्रकार ने सोशल मीडिया पर संदेश डाला कि कश्मीर में जिस ज़िले से वो आते हैं, वहां के दिल्ली में रह रहे लोग अगर अपने परिजनों को कोई संदेश देना चाहते हैं तो वो ये संदेश उनके घरों तक हुंचाने की पूरी कोशिश करेंगे.
दो दिन बाद सईद जब वापस श्रीनगर जाने लगे तो उनके मोबाइल पर देश विदेश से 17 संदेश आए थे. ये संदेश दक्षिण कश्मीर के तीन ज़िलों में रहने वाले लोगों के लिए थे. कश्मीर का यह इलाका सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है.
कई लोगों ने उन्हें डिजिटल संदेश भेजे. कुछ लोगों ने हाथ से चिट्ठियां लिखी और उनकी तस्वीरें फ़ेसबुक मैसेंजर के ज़रिए सईद को भेजी.
दिल्ली की यह महिला भी उन लोगों में से एक थी. वो कश्मीरी नहीं है. उनकी चिट्ठी में संचार सेवाओं के ठप होने से उपजी बेचैनी साफ़ ज़ाहिर हो रही थी.
उन्होंने लिखा कि कैसे कश्मीर के नंबर मिलाते मिलाते उनकी उंगलियां दुखने लगी और कैसे वो रातों को जाग-जाग कर अपना मोबाइल देखा करती कि कहीं किसी का संदेश तो नहीं आया.
अपनी चिट्ठी में वो बताती हैं कि कैसे वो कश्मीर में बिताई छुट्टियों की तस्वीरें बार-बार देखती रहती हैं.
चिट्ठियों की तरफ लौटे लोग
कश्मीर लौटकर सईद संदेश भेजने वाले दूत बन गए. वो श्रीनगर से उन घरों में संदेश पहुंचाने गए जिनके संदेश उनके पास थे, ये घर कई दिनों से बंद पड़े थे.
सईद बताते हैं, ''मैंने उन घरों को तलाशा, उनके दरवाज़ों पर दस्तक दी और उन्हें अपने मोबाइल पर आए संदेश दिखाए. इनमें से अधिकतर संदेश अच्छी ख़बरों वाले थे.''
''वे बहुत ही भावुक पल थे. मैं एक घर में पहुंचा जिनका बेटा चंडीगढ़ के कॉलेज में पढ़ाई करता है, उसने संदेश भेजा था कि वह अपनी परीक्षा में सेकेंड आया है, यह संदेश पाकर उनकी मां मेरे गले लगकर खुशी से रोने लगीं.''
कश्मीर में संचार माध्यमों के 'ब्लैकआउट' के बाद लोग उन आदतों की तरफ लौटने लगे जिन्हें हमने बरसों पहले भुला दिया है. जैसे कि चिट्ठियां लिखना.
26 साल के इरफ़ान अहमद श्रीनगर के दूसरे छोर पर रहने वाली यूनिवर्सिटी की एक छात्रा से प्यार करते हैं. वो दोनों एक दूसरे को कागज़ पर चिट्ठियां लिखकर भेजते हैं.
इरफ़ान एक दफ़्तर में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी करते हैं, वो बताते हैं, ''इंटरनेट और मोबाइल बंद होने के बाद हम फोन पर बातचीत नहीं कर पाते. तो हमने चिट्ठियां लिखनी शुरू कीं.''
''हम एक दूसरे को अपना हाल चाल बताते हैं, एक दूसरे को कितना याद करते हैं, यह बताते हैं. जब सब कुछ बंद हो गया तो हमने तय किया कि चिट्ठियां लिखेंगे. मैं चिट्ठी लिखकर कागज़ को मोड़ देता हूं और उसे उनके बेडरूम में फेंकने की कोशिश करता हूं.''
लैंडलाइन कनेक्शन
भारत में 100 करोड़ से अधिक मोबाइल फोन सब्सक्राइबर हैं जबकि 56 करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर हैं. जबकि इसकी तुलना में भारत में सिर्फ 2.3 करोड़ लैंडलाइन फोन हैं.
भारत डिजिटल मार्केट में तेज़ी से उभर रहा है, लेकिन कश्मीर में लोग लैंडलाइन कनेक्शन के लिए आवेदन कर रहे हैं या फिर पुराने लैंडलाइन को दोबारा चालू कर रहे हैं.
हालांकि फिर भी लोगों की शिकायत है कि उनके लैंडलाइन फोन भी काम नहीं कर रहे.
सड़कों पर सुरक्षाबलों ने कुछ मोबाइल फोन बूथ बनाए हैं, जहां एक प्लास्टिक की टेबल, कुछ कुर्सियां और एक चाइनीज़ फोन रखा होता है. इसके अलावा कुछ पुलिस स्टेशनों में भी फ्री कॉलिंग करने की सुविधा दी जा रही है.
ऐसे ही एक बूथ पर, मंज़ूर अहमद यह बताने में संकोच महसूस कर रहे थे कि किस तरह तमाम पाबंदियों में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
55 साल के शॉल विक्रेता मंज़ूर अपने एक ग्राहक को फोन करने की कोशिश कर रहे थे जो कश्मीर से बाहर है उनके कुछ पैसे ले गया है.
मंज़ूर बताते हैं, ''उन्होंने मुझे चेक भेजा. मैं उसे लेकर बैंक गया, लेकिन उन्होंने कहा कि वहां इंटरनेट नहीं है इसलिए वो इस चेक़ को कैश नहीं कर सकते. अब मैं उस ग्राहक को फोन कर यह बोलना चाहता हूं कि वो मेरे खाते में पैसे ट्रांसफर कर दे.''
यास्मीन मसरत श्रीनगर में एक कमरे में ट्रेवल एजेंसी चलाती हैं. उनका लैंडलाइन फोन अगस्त महीने के बीच में काम करने लगा. उन्होंने लोगों को वहां से मुफ्त कॉल करने की सुविधा दी है.
जगह-जगह इस तरह के नोटिस चस्पा हैं कि 'छोटी और ज़रूरत के मुताबिक ही कॉल करें'. यास्मीन के ऑफिस से मुफ़्त कॉल की सुविधा की जानकारी मिलते ही 500 से ज़्यादा लोग वहां पहुंच गए और करीब 1000 मुफ़्त कॉल लग चुकी हैं.
कॉल करने वालों में कैंसर के मरीज़ और दवाओं के लिए डॉक्टरों और दुकानों से संपर्क करने वाले लोग भी शामिल थे.
यास्मीन बताती हैं, ''एक दिन एक आठ साल की बच्ची अपनी दादी के साथ आई. उसे अपनी मां से बात करनी थी जो मुंबई के अस्पताल में कैंसर का इलाज करवा रही थीं. पिछले 20 दिन से उस बच्ची ने अपनी मां से बात नहीं की थी. वो बस यही दोहरा रही थी, तुम जल्दी ठीक होकर लौट आओ.''
''इसी तरह एक दिन एक आदमी ने फोन पर अपने बेटे को बताया कि कुछ दिन पहले उसकी दादी का निधन हो गया है. मेरे आस-पास सभी लोग रो रहे थे.''
लोकल न्यूज़ नेटवर्क की मदद
जहां लैंडलाइन भी काम नहीं कर रहे, वहां भारत के दूसरे हिस्सों या विदेश में रहने वाले कश्मीरी लोग अपने परिजनों तक संदेश भेजने के लिए लोकल न्यूज़ नेटवर्क का सहारा भी ले रहे हैं.
ये लोग अपने परिवारों के लिए संदेश भेज रहे हैं जिन्हें स्थानीय चैनल दिखाते हैं.
गुलिस्तां न्यूज़, दिल्ली में स्थित एक सैटेलाइल केबल न्यूज नेटवर्क है. इस चैनल को कई संदेश और वीडियो मिले हैं. यह चैनल समाचार बुलेटिन के बीच में इन संदेशों को प्रसारित करता है.
इस नेटवर्क का कहना है कि उन्होंने सैकड़ों संदेश चलाए हैं जिसमें शादी रद्द होने की ख़बर थी. कश्मीर में यह मौसम शादियों का होता है.
पिछले हफ़्ते 26 साल के शोएब मीर श्रीनगर स्थित नेटवर्क के दफ़्तर पहुंचे और उन्होंने कहा कि क्या वो लोग उनके लापता पिता को खोजने में मदद कर सकते हैं?
शोएब के 75 वर्षीय पिता बेमीना एक दिन सुबह सैर पर निकले तो लौटकर नहीं आए. शोएब बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता को हर जगह तलाशा, पुलिस में भी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई लेकिन अब तक कुछ पता नहीं चला.
वो कहते हैं, ''सड़क पर सन्नाटा पसरा पड़ा है, एक भी शख्स दिखाई नहीं देता. पुलिसवाले भी हमेशा व्यस्त रहते हैं, शायद इस वीडियो संदेश के बाद मेरे पिता का पता लग सके.''
इस शटडाउन ने स्थानीय मीडिया को भी बहुत ज़्यादा प्रभावित किया है. चैनलों में ख़बरें तलाशनी मुश्किल हो गई है. रोज़ एक कुरियर के ज़रिए 16 जीबी की पेनड्राइव दिल्ली भेजी जाती और उसके ज़रिए कश्मीर की ख़बरें प्रसारित होती.
स्थानीय समाचार पत्र 16 से 20 पन्नों से घटकर छह से आठ पन्नों पर सिकुड़ गए. कई हफ़्तों तक करीब 200 पत्रकार महज़ 10 कंप्यूटरों पर ही काम करते रहे. ये कंप्यूटर सरकार की तरफ से श्रीनगर में मुहैया करवाए गए थे.
सूचनाएं रोकने से हिंसा पर असर?
कश्मीर के लिए इंटरनेट शटडाउन कोई नई चीज़ नहीं है. ट्रैकर इंटरनेटशटडाउन.इन के मुताबिक इस साल 51वीं बार इलाके में इंटरनेट बंद हुआ है.
साल 2011 से 170 से ज़्यादा बार इंटरनेट शटडाउन हो चुका है. इसमें साल 2016 में छह महीने तक हुआ शटडाउन भी शामिल है.
कश्मीर टाइम्स की एग्जिक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन ने इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की. उन्होंने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया.
उन्होंने कहा कि इस शटडाउन के चलते लोगों को सूचनाएं नहीं मिल रही हैं, पत्रकार रिपोर्टों को आगे नहीं भेज पा रहे.
वहीं सरकार का तर्क है कि इंटरनेट शटडाउन के ज़रिए हिंसा को नियंत्रित किया जा रहा है. भारत ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि वह भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथियों को भेज रहा है.
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है, ''ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं आतंकवादियों और उनके आकाओं का संपर्क काट दूं लेकिन उसी समय वहां रहने वाले दूसरे लोगों का इंटरनेट जारी रहे? किसी के पास इसका जवाब है तो मुझे भी बताए.''
हालांकि पुरानी रिसर्च बताती हैं कि इस तरह के शटडाउन के बाद घाटी में और अधिक हिंसा भड़की है.
स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के जैन रिडज़ैक ने नेटवर्क शटडाउन पर पढ़ाई की है. वो इस संबंध में बताते हैं, ''सूचनाओं के रोकने से और लोगों को सही जानकारी के अभाव के चलते हिंसक घटनाएं और ज़्यादा होती हैं.''
कश्मीर का भविष्य अस्थिर बना हुआ है, अभी किसी को नहीं पता कि वहां सूचनाओं पर लगी रोक कब हटेगी.
लेकिन फिर भी कुछ-कुछ उम्मीदों की किरण बाकी है.
पिछले हफ़्ते एक सुबह श्रीनगर में एक न्यूज़ नेटवर्क की लाइन अचानक ही काम करने लगी. वहां मौजूद पत्रकार इस पर खुशी जताने लगे.
वहां की चीफ़ रिपोर्टर कहती हैं, ''शायद चीजें बेहतर होंगी, हम इसी उम्मीद में जी रहे हैं.''
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