You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
चीन से ताइवान को बचाने वाली 'सिलिकॉन शील्ड' कैसे काम करती है
- Author, क्रिस्टीना जे ओर्गाज़
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़
विश्व की एक महाशक्ति के सामने एक छोटा-सा द्वीप है जो क्यूबा जितना बड़ा भी नहीं है.
ताइवान, पीपुल्ज़ रिपब्लिक ऑफ़ चाइना से महज़ 180 किलोमीटर दूर है. ताइवान की भाषा और पूर्वज चीनी ही हैं लेकिन वहां अलग राजनीतिक व्यवस्था है और यही चीन और ताइवान के बीच दुश्मनी की वजह भी है.
ताइवान की खाड़ी के एक तरफ़ 130 करोड़ की आबादी वाला चीन है जहां एकदलीय राजव्यवस्था है जबकि दूसरी तरफ ताइवान है, जहां दो करोड़ 30 लाख लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं.
चीन और ताइवान के बीच 1949 से विवाद चला आ रहा है जिसकी वजह से ताइवान की पहुंच अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक नहीं है और उसे सीमित अंतरराष्ट्रीय मान्यता ही मिली हुई है. दुनिया के सिर्फ 15 देश ही ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र मानते हैं.
वहीं, चीन इसे अपने से अलग हुआ हिस्सा और एक विद्रोही प्रांत मानता है. साल 2005 में चीन ने अलगाववादी विरोधी क़ानून पारित किया था जो चीन को ताइवान को बलपूर्वक मिलाने का अधिकार देता है.
उसके बाद से यदि ताइवान अपने आप को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करता है तो चीन की सेना उस पर हमला कर सकती है. लेकिन कई साल के तनाव और धमकियों के बाद ताइवान ने एक रणनीति खोज ली है जिससे वो चीन के हमले से बचता रहा है.
'सिलिकॉन शील्ड' आख़िर है क्या?
ताइवान की ये रणनीति 'सिलिकॉन शील्ड' की तरह काम करती है. ताइवान के लिए ये एक तरह का ऐसा 'हथियार' है जिसे कोई और देश निकट भविष्य में आसानी से नहीं बना सकता है.
ये ताइवान का एक अहम उद्योग है जिसपर लड़ाकू विमानों से लेकर सोलर पैनल तक और वीडियो गेम्स से लेकर मेडिकल उपकरण उद्योग तक निर्भर हैं. पत्रकार क्रेग एडिशन ने अपनी किताब 'सिलिकॉन शील्ड- प्रोटेक्टिंग ताइवान अगेंस्ट अटैक फ्रॉम चाइना' के शीर्षक में ये शब्द गढ़ा है.
क्रेग एटिशन कहते हैं, "इसका मतलब ये है कि ताइवान दुनिया भर में एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स का अग्रणी उत्पादक है और इसी वजह से चीन की सेना उसके ख़िलाफ़ हमला नहीं कर पाती है."
क्रेग के मुताबिक़ दुनिया के इस सेक्टर में युद्ध का असर इतना व्यापक होगा कि चीन को भी इसकी भारी आर्थिक क़ीमत चुकानी पड़ेगी. ये युद्ध चीन को इतना महंगा पड़ सकता है कि चीन हमला करने से पीछे हटेगा.
दुनिया के बाकी देशों की तरह चीन भी ताइवान में बनने वाली एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स पर निर्भर है. ये ऐसे ख़ास चिप होते हैं जिनपर सेमीकंडक्टर सर्किट बनाए जाते हैं. ये चिप सिलिकॉन से बने होते हैं. दुनिया के लगभग सभी तकनीकी उत्पादों की जान इन्हीं चिप्स में बसती है.
ये ताइवान की सुरक्षा कैसे कर सकती हैं?
इसे शीत युद्ध के दौरान के 'मैड सिद्धांत' (एमएडी यानी म्युचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन जिसका मतलब हुआ कि दोनों का बर्बाद होना सुनिश्चित है) से समझा जा सकता है.
ताइवान की खाड़ी में सैन्य कार्रवाई का असर इतना व्यापक हो सकता है कि चीन या अमेरिका भी उससे बचे नहीं रह सकेंगे.
ऐसे में ये 'सिलिकॉन शील्ड' असरदार तरीके से ताइवान को चीन की सेना के हमले से सुरक्षित रखती है. क्रेग कहते हैं कि ताइवान पर हमले की क़ीमत इतनी भारी होगी कि चीन की सरकार को हमला करने से पहले बार-बार सोचना पड़ेगा.
क्या हालिया इतिहास में इस तरह की सुरक्षा के उदाहरण हैं?
चीन की सरकार बार-बार कहती रही है कि वह ताइवान को ताक़त के दम पर चीन में मिला लेगी लेकिन इन धमकियों के बावजूद चीन आज तक ताइवान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई नहीं कर पाया है. इससे स्पष्ट है कि ताइवान की 'सिलिकॉन शील्ड' प्रभावी है.
यदि ताइवान दुनिया के तकनीकी उपकरणों में जान फूंकने का काम करने में इतना अहम नहीं होता तो संभव है कि चीन ने अब तक ताइवान पर कब्ज़ा कर लिया होता.
साल 1996 में जब ताइवान की खाड़ी में तनाव पैदा हुआ था तब अमेरिका ने लड़ाकू विमानों के दो समूह ताइवान की मदद के लिए भेजे थे ताकि ताइवान को निशाना बनाकर किए जा रहे चीन के युद्धाभ्यास को रोका जा सका. इस अभ्यास में मिसाइलें दागना भी शामिल था.
अमेरिका किस तरफ है?
अधिकतर सैन्य विश्लेषक ये मानते हैं कि चीन की सेना के पास ताइवान पर हमला करने की क्षमता नहीं है.
जून में अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष दिए अपने बयान में ज्वॉइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के चेयरमैन जनरल मार्क माइले ने कहा था कि ताइवान पर हमला करना बेहद जटिल होगा और चीन को बहुत महंगा पड़ेगा.
चीन को ताइवान के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान शुरू करने से पहले इस सवाल का सामना करना भी होगा कि क्या अमेरिका ताइवान की रक्षा के लिए आगे आएगा. ये मानना मुश्किल है कि यदि चीन ताइवान पर कब्ज़ा करने की कोशिश करेगा तो अमेरिका बैठा देखता रहेगा.
अमेरिका को मदद क्यों करनी पड़ेगी?
यदि चीन ताइवान पर कब्ज़ा कर लेता है तो उसके हाथ में दुनिया की सबसे उन्नत चिप फैक्ट्रियां आ जाएंगी. इसका सीधा असर अमेरिका पर भी होगा.
बीते कई दशकों में अमेरिका ने ताइवान को भारी हथियार भी बेचे हैं, चीन के हाथों में ये हथियार भी आ जाएंगे.
ये सोचना बेमानी है कि अमेरिका हाथ पर हाथ धरे ये सब होता देखता रहेगा.
क्या सभी राष्ट्रपतियों के दौर में ताइवान को लेकर अमेरिकी नीति एक जैसी रही है?
जब राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने साल 1979 में एकतरफ़ा तरीके से चीन के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए और ताइवान के साथ आधिकारिक संबंध ख़त्म कर लिए थे तो अमेरिकी कांग्रेस ने ताइवान रिलेशंस ऐक्ट पारित किया था.
ये क़ानून इस बात की इजाज़त देता था कि अमेरिका ताइवान को रक्षात्मक हथियारों की बिक्री कर सकता था. ताइवान को लेकर अमेरिकी की नीति में एक तरह की 'रणनीतिक अस्पष्टता' दिखाई देती रही है.
इसका मतलब ये हुआ कि अमेरिका सार्वजनिक रूप से इस पर कुछ नहीं कहता कि ताइवान पर हमला होने की सूरत में वो इसका बचाव करेगा या नहीं. इससे चीन की मुश्किल बढ़ जाती है कि वो ताइवान को लेकर क्या सैन्य रणनीति अपनाए.
साल 2001 में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने कहा था कि चीन के हमले से ताइवान को बचाने के लिए जो भी ज़रूरी होगा, अमेरिका करेगा. हालांकि ज़्यादातर अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने ताइवान के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा.
हालांकि ताइवान को लेकर उन्होंने जो कदम उठाए, वे शब्दों से ज़्यादा स्पष्ट थे. साल 1996 में जब ताइवान की खाड़ी में मिसाइल संकट गहराया तो तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने चीन की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए दो युद्धक विमान तैनात करने का हुक्म दिया था.
चीन के लिए ये अमेरिका की तरफ़ से एक शक्तिशाली संदेश था. राष्ट्रपति ट्रंप के दौर में ताइवान के साथ अमेरिका ने करीबी सैनिक संबंध स्थापित किए. ट्रंप प्रशासन ने ताइवान को अत्याधुनिक हथियार भी बेचे थे.
राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल में भी निकटता की ये रणनीति बरकरार रही है.
इस साल जून महीने की शुरुआत में अमेरिकी सीनेटरों का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति बाइडन के कोविड वैक्सीन डोनेशन प्रोग्राम के तहत बोइंग सी-17 विमान से कोरोना के टीके की खेप लेकर ताइवान पहुंचा.
ताइवान के हवाई अड्डे पर अमेरिकी सेना के विशालकाय जहाज की मौजूदगी चीन के लिए एक और संदेश था.
सेमीकंडक्टर माइक्रोचिप्स की किल्लत का ताइवान कनेक्शन क्या है?
ऑटोमोटिव सेक्टर में सेमीकंडक्टर की किल्लत इसलिए महसूस हुई क्योंकि कंपनियां इस बात का हिसाब-किताब ठीक से नहीं बिठा पाईं कि कोरोना महामारी के बाद मांग के पटरी पर आने में कितना समय लगेगा.
पहले तो कंपनियों ने चिप के ऑर्डर कैंसल कर दिए लेकिन फिर उन्हें एहसास हुआ कि जब वे नए ऑर्डर देंगे तो उन्हें कतार में सबसे आख़िर में खड़ा होना होगा. बाद में ये किल्लत अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के मामले में भी महसूस होने लगी.
इसमें लैपटॉप और गेमिंग मशीनें शामिल थीं. दुनिया भर में लॉकडाउन के कारण इनकी मांग तेज़ी से बढ़ी थी. ताइवान इन उत्पादों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है. इसी वजह से जल्द ही ग्लोबल सप्लाई चेन पर नकारात्मक असर पड़ा.
ताइवानी कंपनी की भूमिका
इस किल्लत को देखते हुए दुनिया भर में सेमीकंडक्टर चिप्स की मांग के एक चौथाई हिस्से की आपूर्ति करने वाली 'ताइवान सेमीकंडक्टर मैनुफैक्चरिंग कंपनी' (टीएसएमसी) एक नए उत्पादन प्लांट में निवेश कर रही है.
लेकिन ये उसकी दीर्घकालीन नीति है. तात्कालिक रूप से टीएसएमसी ने उन खरीदारों को प्राथमिकता देने का फ़ैसला किया है जिन्हें इसकी जल्द ज़रूरत है. वैसे खरीदार जो ज़्यादा मात्रा में खरीदारी करके किल्लत का फायदा उठाना चाहते हैं, उन्हें इंतज़ार करने को कहा जा रहा है.
टीएसएमसी की कोशिश चिप इंडस्ट्री का स्विट्ज़रलैंड बनने की रही है. इसका मतलब ये हुआ वो तटस्थ बने रहना चाहता है. लेकिन अब ये रणनीति अपने आख़िरी मुकाम पर पहुंच गई है.
चीन के साथ ट्रेड वार में जब चीनी कंपनी ख़्वावे पर अमेरिका ने पाबंदियां लगाईं तो टीएसएमसी को वाशिंगटन का साथ चुनना पड़ा था. सच तो ये भी था कि टीएसएमसी के पास ऐसा करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था.
उसके ज़्यादातर खरीदार उत्तरी अमेरिका के देशों से हैं. साल 2020 के आंकड़ों के मुताबिक़ टीएसएमसी को तकरीबन 62 फीसदी ऑर्डर नॉर्थ अमेरिका से मिले थे.
एप्पल, एनवीडिया, क्वालकॉम जैसी कंपनियों से टीएसएमसी को कमाई होती है और साल 2020 में उसकी कुल बिक्री का केवल 17 फीसदी हिस्सा ही चीन से मिला था जिसमें ख़्वावे का ऑर्डर भी शामिल है.
दूसरी तरफ़ टीएसएमसी की निर्भरता कुछ अमेरिकी कंपनियों पर भी है. ये अमेरिकी कंपनियां वो मशीनें बनाती है जो माइक्रोचिप बनाने के काम आती हैं. इस वजह के कारण भी टीएसएमसी अमेरिका की मर्जी के ख़िलाफ़ जाने की स्थिति में नहीं है.
अगर वो ऐसा करता तो वो भी पाबंदियों के दायरे में आ जाता और अमेरिकी टेक्नॉलॉजी उसे नहीं मिल पाती.
कहा जाता है कि टीएसएमसी वो ताइवानी कंपनी है जिसकी आत्मा अमेरिकी है क्योंकि इसके संस्थापक मॉरिस चांग और ज़्यादातर सीईओ और अन्य शीर्ष अधिकारियों ने अपने कॉलेज की पढ़ाई अमेरिका में की है और उन्होंने अमेरिकी कंपनियों में लंबे समय तक काम किया है. इनमें से कई तो अब अमेरिकी नागरिक हैं.
क्या कोई देश तकनीकी रूप से पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो सकता है?
तकनीक के क्षेत्र में कोई भी देश पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो सकता है और सेमीकंडक्टर्स के मामले तो बिलकुल ही नहीं. बीते दशकों में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में एक तरह का बिखराव देखा गया है.
उसे बनाने के काम में आने वाली चीज़ों का उत्पादन दुनिया भर के अलग-अलग ठिकानों पर अलग-अलग कंपनियां करती हैं. चिप की डिज़ाइन मुख्य रूप से अमेरिका में तैयार की जाती है. मोटे तौर पर उसका उत्पादन ताइवान में होता है तो उसकी असेम्बलिंग और टेस्टिंग या तो चीन में होती है या फिर दक्षिण पूर्वी एशिया में.
टीएसएमसी ने हाल ही में अमेरिका के एरिज़ोना में एक नई फैक्ट्री शुरू की है जहां ख़ास तौर पर अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन किया जाएगा. अमेरिकी सरकार ने इसके लिए टीएसएमसी पर दबाव डाला था.
अमेरिकी सेना ये चाहती थी कि उसके लिए सेमीकंडक्टर चिप्स की आपूर्ति उसकी अपनी ज़मीन पर से ही हो. अमेरिका रक्षा विभाग की भरोसेमंद मानी जाने वाली कंपनी ग्लोबल फाउंडरीज़ टेक्नॉलॉजी के रेस में टीएसएमसी से पिछड़ गई थी.
इसके बाद टीएसएमसी को एरिज़ोना में प्लांट खोलने के लिए कहा गया. हालांकि अब ये माना जा रहा है कि टीएसएमसी के अमेरिका आने से एप्पल, क्वालकॉम और एनवीडिया जैसी अमेरिकी कंपनियों को भी इसका बड़ा फायदा होगा.
अब वे इस बात के लिए थोड़ा आश्वस्त महसूस कर सकते हैं कि उनके काम आने वाला एक महत्वपूर्ण पुर्जा अमेरिका में ही तैयार होता है और इसके लिए वे पूरी तरह से ताइवान पर निर्भर नहीं हैं.
चीन की योजना, ताइवान पर निर्भरता कम कैसे हो?
चीन भी सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री का प्रमुख केंद्र बनने के लिए एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है. लेकिन सवाल उठता है कि ताइवान पर उसकी निर्भरता ख़त्म होने में कितना वक़्त लगेगा?
और ऐसा भी नहीं है कि ये तमन्ना केवल चीन की है. अमेरिका, यूरोप और जापान भी यही चाहते हैं. लेकिन व्यवहारिक तौर पर ये किसी भी देश के लिए नामुमकिन जैसा कि वो सेमीकंडक्टर बनाने का पूरा काम अपने ही देश में कर ले. तकनीकी रूप से ये मुमकिन भी हो जाएगा तो इसमें आना वाला खर्च इतना बड़ा होगा कि वो हज़ार बार सोचेगा.
ये बात न केवल चीन पर लागू होती है बल्कि अमेरिका पर भी उतनी ही लागू होती है. अगर चीन बाहर से खरीदे गए सेमीकंडक्टर चिप्स पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है तो इसका मतलब ये हुआ कि उसे इसका निर्माण अपने घर में ही करना होगा.
लेकिन इसके बावजूद उसे विदेशी टेक्नॉलॉजी की मदद लेनी होगी और ये हालात आने वाले दशकों तक नहीं बदलने वाले हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)