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ताइवान की राष्ट्रपति की चीन को दो टूक- एक देश दो सिस्टम नहीं चलेगा
"लोकतांत्रिक ताइवान चीन के नियम-क़ायदे कभी कबूल नहीं करेगा और चीन को इस हक़ीक़त के साथ शांति से जीने का तरीक़ा खोजना होगा."
ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के मौक़े पर बुधवार को ये बात कही.
वैसे ये मौक़ा कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जारी लड़ाई में ताइवान की जीत के जश्न का भी था.
जनवरी में हुए चुनाव में राष्ट्रपति साई इंग-वेन को ताइवान के मतदाताओं ने दूसरा मौक़ा दिया था.
ताइवान को अलग-थलग करने की चीन की मुहिम की राष्ट्रपति साई इंग-वेन कट्टर आलोचक रही हैं.
साई इंग-वेन से चीन की नाराज़गी
साई इंग-वेन ताइवान को एक संप्रभु देश के तौर पर देखती हैं और उनका मानना है कि ताइवान 'वन चाइना' का हिस्सा नहीं है. चीन उनके इस रवैये को लेकर नाराज़ रहता है.
साल 2016 में वो जब से सत्ता में आई हैं, चीन ताइवान से बातचीत करने से इनकार करता रहा है.
इतना ही नहीं चीन ने इस द्वीप पर आर्थिक, सैनिक और कूटनीतिक दबाव भी बढ़ा दिया है.
चीन का मानना है कि ताइवान उसका क्षेत्र है. चीन का कहना है कि ज़रूरत पड़ने पर ताक़त के ज़ोर उस पर कब्ज़ा किया जा सकता है.
'एक देश, दो व्यवस्था'
हॉन्ग कॉन्ग की तर्ज पर ताइवान में 'एक देश, दो व्यवस्थाओं' वाले मॉडल को लागू करने की बात की जाती रही है जिसमें चीन का अधिपत्य स्वीकार करने पर ताइवान को कुछ मुद्दों पर आज़ादी रखने का हक़ होगा.
लेकिन साई इंग-वेन ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के मौके पर ही साफ़ कर दिया कि इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है.
उन्होंने कहा, "हम 'एक देश, दो व्यवस्था' वाली दलील के नाम पर चीन का अधिपत्य नहीं स्वीकार करेंगे जिसमें ताइवान का दर्जा कम कर दिया जाएगा और चीन-ताइवान संबंधों की मौजूदा स्थिति बदल जाएगी."
साई इंग-वेन ने एक बार फिर चीन से बातचीत की पेशकश की है और उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अपील की वे तनाव कम करने के लिए उनके साथ मिलकर काम करें.
"दोनों पक्षों की ये जिम्मेदारी है कि वे सहअस्तित्व का रास्ता खोजें और मतभेद और मनमुटाव ख़त्म करने के लिए काम करें."
WHO को लेकर ताज़ा विवाद
राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने बुधवार को ये भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भागीदारी के लिए ताइवान अपना संघर्ष जारी रखेगा और अमरीका, जापान, यूरोप और दूसरे समान विचार वाले देशों के साथ संबंध मज़बूत बनाए जाएंगे.
ताइवान ने चीन पर ये आरोप लगाया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन से उसे बाहर रखने के लिए दबाव बनाया है. हालांकि चीन का कहना है कि ताइवान उसका एक प्रांत है और उसके साथ एक देश जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता है.
हालांकि अमरीका केवल चीन को मान्यता देता है पर ट्रंप प्रशासन ने ताइवान को पूरा समर्थन दिया है. हाल ही में अमरीका ने ये सवाल उठाया था कि ताइवान ने कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर जब डब्ल्यूएचओ को जानकारी दी तो उस पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
इस हफ़्ते की शुरुआत में हुई विश्व स्वास्थ्य संगठन की हेल्थ एसेंबली की बैठक में जब ताइवान कोरोना महामारी से निपटने के अनुभव दुनिया से शेयर करना चाहता था तो उसे ये मौका नहीं मिला.
अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने पिछले दिनों कहा था, "ताइवान को ऑब्जर्वर स्टेटस देने से भी इनकार करने वाले डब्ल्यूएचओ ने जन स्वास्थ्य के मुक़ाबले फिर से राजनीति को चुना है. डब्ल्यूएचओ के इस काम से वक़्त और ज़िंदगियां दोनों बर्बाद हुई हैं."
चीन-ताइवान के बीच क्यों है विवाद
चीन ने ताइवान को हमेशा से ऐसे प्रांत के रूप में देखा है जो उससे अलग हो गया है. चीन मानता रहा है कि भविष्य में ताइवान चीन का हिस्सा बन जाएगा. जबकि ताइवान की एक बड़ी आबादी अपने आपको एक अलग देश के रूप में देखना चाहती है. और यही वजह रही है दोनों के बीच तनाव की.
वर्ष 1642 से 1661 तक ताइवान नीदरलैंड्स की कॉलोनी था. उसके बाद चीन का चिंग राजवंश वर्ष 1683 से 1895 तक ताइवान पर शासन करता रहा. लेकिन साल 1895 में जापान के हाथों चीन की हार के बाद ताइवान, जापान के हिस्से में आ गया.
दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद अमरीका और ब्रिटेन ने तय किया कि ताइवान को उसके सहयोगी और चीन के बड़े राजनेता और मिलिट्री कमांडर चैंग काई शेक को सौंप देना चाहिए.
चैंग की पार्टी का उस वक़्त चीन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण था. लेकिन कुछ सालों बाद चैंग काई शेक की सेनाओं को कम्युनिस्ट सेना से हार का सामना करना पड़ा. तब चैंग और उनके सहयोगी चीन से भागकर ताइवान चले आए और कई वर्षों तक 15 लाख की आबादी वाले ताइवान पर उनका प्रभुत्व रहा.
कई साल तक चीन और ताइवान के बीच बेहद कड़वे संबंध होने के बाद साल 1980 के दशक में दोनों के रिश्ते बेहतर होने शुरू हुए. तब चीन ने 'वन कंट्री टू सिस्टम' के तहत ताइवान के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वो अपने आपको चीन का हिस्सा मान लेता है तो उसे स्वायत्ता प्रदान कर दी जाएगी.
ताइवान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
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