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कोरोना: चीन के कारण ताइवान को अपनी बात रखने का मौक़ा नहीं मिल रहा?
- Author, सायरा अशेर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कोरोना वायरस फैलने के बाद स्वास्थ्य अधिकारी पहली बार अगले हफ़्ते होने वाली वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में भाग लेंगे. इंटरनेट के माध्यम से होने वाली इस बैठक में ये तय किया जाएगा कि दुनिया को इस संकट से कैसे निपटना चाहिए.
लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन की निर्णायक समिति इस बैठक में उसको बुलावा नहीं भेजेगी जो कि अपने लोगों को कोरोना वायरस से बचाने में सफल मुल्कों में से एक है.
दुनिया भर में ताइवान की तारीफ़ कोरोना वायरस के प्रसार को तेज़ी से रोकने के लिए हो रही है. ताइवान का कहना है कि उसे दुनिया के साथ अपना अनुभव साझा करने के लिए मंच मिलना चाहिए.
लेकिन ताइवान को अपना क्षेत्र बताने वाले चीन ने साल 2016 के बाद से ताइवान की उपस्थिति पर रोक लगा दी है.
पिछले कुछ हफ़्तों में अमरीका, यूरोपीय संघ, जापान और कई अन्य देशों ने 18 मई को होने वाली इस बैठक में ताइवान के एक दर्शक के रूप में शामिल होने की माँग का समर्थन किया है.
चीन इस समय कोरोना वायरस के स्रोत और शुरुआती स्तर पर ग़लत क़दम उठाने की वजह से आलोचनाओं का सामना कर रहा है. लेकिन इसके बावजूद चीन ने पुरज़ोर तरीक़े से इसका विरोध किया है.
ताइवान को लेकर जारी विवाद काफ़ी पुराना है. लेकिन डेविडसन कॉलेज में प्रोफ़ेसर और ताइवान पर शोध करने वालीं शेली रिगर्स कहती हैं कि इस मौक़े पर संभवत: कुछ मुल्कों का "धैर्य कम" होता दिख रहा है क्योंकि चीन की ओर से लगाई गई आपत्ति "वैश्विक आपदा के समय काफ़ी काल्पनिक और वैचारिक लगती है.
ताइवान की उपस्थिति विवाद का विषय क्यों?
ताइवान साल 1949 से स्वाधीन है. जब साल 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी ने चीनी सरकार का तख़्तापलट कर दिया था तब तत्कालीन सरकार ने द्वीप में जाकर अपनी सरकार बनाई थी.
चीनी सरकार अपनी वन चाइना पॉलिसी के तहत ये ज़ोर डालती है कि ताइवान वैधानिक ढंग से उसके अधिकार क्षेत्र में आता है और एक दिन उसे चीनी सरकार के बैनर तले लाया जाएगा. अगर इसके लिए बल प्रयोग की ज़रूरत पड़ी तो उसका भी इस्तेमाल किया जाएगा.
ताइवान में वर्तमान सरकार स्वाधीनता की पक्षधर है. और जब से साइ इंग-वेन की डेमोक्रोटिक प्रोग्रेसिव पार्टी ने सत्ता संभाली है तब से चीन के साथ उनके रिश्ते ख़राब हो गए हैं.
ताइवान के पास अपनी स्वयं की सेना है और कुछ देश इसे एक राज्य की तरह देखते हैं.
अमरीकी रक्षा मंत्रालय में चीन, ताइवान और मंगोलिया क्षेत्र को संभालने वाले एक पूर्व अधिकारी ड्रिव थॉम्पसन बताते हैं, "चीन इस मसले को लेकर स्पष्ट है. इसका सार्वजनिक स्वास्थ्य के विषय से कोई लेना देना नहीं है. इसका सीधा संबंध ताइपेई और राष्ट्रपति साइ-इंग-वेन के चीन से रिश्तों से है जो कि ताइवान पर चीन की संप्रभुता मानने से इनकार करती हैं."
ताइवान के साथ चीनी संबंध
चीन के दबाव में 15 देशों ने ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध ख़त्म कर दिए हैं. लेकिन ताइवान ने अथक प्रयास करके अंतरराष्ट्रीय पटल पर वैधता हासिल करने के लिए बहु-पक्षीय संस्थाओं जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य देशों की ओर से पहचान हासिल कर ली है.
लेकिन ऐसा नहीं है कि ताइवान हमेशा से बाहर ही रहा है. पिछली सरकार जो कि चीन से बेहतर संबंध रखना चाहती है, उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन में `चाईनीज़ ताइपेई' के नाम से ऑब्ज़र्वर का दर्जा हासिल था. लेकिन 2017 के बाद से जब साइ-इंग-वेन सत्ता में आई हैं तब से इसे वापस नहीं बुलाया गया है.
इसके बाद से हर साल ताइवान ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के देशों से बात करके बैठक में शामिल होने के लिए कोशिशें की हैं. लेकिन इस साल ताइवान के समर्थन में उठने वाली आवाज़ें स्पष्ट और तेज़ हैं.
विशेषज्ञ कहते हैं कि पहले अन्य देश ये सोचते थे कि ताइवान के लिए चीन को नाराज़ नहीं किया जा सकता है, वह गणित कोविड-19 के बाद बदल गया है.
प्रोफ़ेसर शेली रिगर्स कहती हैं, "अब ये सिर्फ़ ताइवान के लोगों के स्वास्थ्य के बारे में नहीं है. ये हमारे देशों में हमारे लोगों की सेहत का मामला है. तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि इसे ऐसे जाने दें.."
कोविड ने कैसे बदले हैं समीकरण?
ताइवान को कोरोना वायरस से निपटने में प्रशंसनीय सफलता मिली है. ताइवान में 2.3 करोड़ लोगों की आबादी में सिर्फ़ 440 मामले हैं और सात लोगों की मौत हुई है. इसके लिए सीमाओं पर नियंत्रण, विदेशी नागरिकों के आने पर प्रतिबंध और ताइवान लौट रहे लोगों के लिए अनिवार्य क्वारंटीन जैसे क़दमों को श्रेय दिया जा रहा है.
इस सफलता ने ताइवान को दुनिया के स्वास्थ्य पर फ़ैसला करने वाले देशों में शामिल होने के लिए एक नया मौक़ा और वजह दी है.
बीती 8 मई को अमरीकी कॉन्ग्रेशनल फ़ॉरेन अफ़ेयर्स कमेटी ने लगभग 60 देशों को एक पत्र लिखकर कहा है कि ये "सुनिश्चित करना कि सभी देश वैश्विक स्वास्थ्य और सुरक्षा को राजनीति से ऊपर रखें कभी भी इतना अहम नहीं रहा है."
ये पत्र कहता है कि चीन की धमकाने वाली रणनीतियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोरोना वायरस रोकने के लिए किए जा रहे प्रयत्नों में ताइवन के योगदान करने की क्षमताओं को कम किया है.
इस तरह सभी को एक बड़े जोखिम में डाला है. ऐसे में ताइवान को वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की मीटिंग में शामिल होने का मौक़ा दिया जाना चाहिए.
इस पर कई बड़ी शक्तियों ने प्रतिक्रिया की है. इनमें यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल हैं. हालांकि, किसी ने भी वन चाइना पॉलिसी को छोड़ने की बात नहीं की है जिसने ताइवान को ऐसी स्थिति में रखा है.
अमरीका करता रहा है समर्थन
ताइवान ने कोरोना वायरस के मामलों को दुनिया के साथ पारदर्शिता के साथ साझा किया है. इसके साथ ही मास्क आदि देकर दूसरे देशों की मदद की है. यहां तक कि उन देशों की जो कि ताइवान को एक राष्ट्र के रूप में स्वीकार भी नहीं करते हैं. ताइवान ने अपने इन क़दमों की वजह से तारीफ़ हासिल की है.
अमरीका एक लंबे समय से ताइवान का समर्थन करता आया है.
ऐसे में ताइवान को विश्व स्वास्थ्य संगठन में शामिल करने के लिए कोरोना वायरस एक नया बहाना हो सकता है.
चीन-ताइवान रक्षा और विदेश नीति विषय पर विशेषज्ञ और राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर अलेक्जेंडर हुआंग कहते हैं कि वो देश जो कि चीन और ताइवान के बीच विवाद को लेकर स्पष्ट नहीं थे, वहां अब चर्चाएं शुरू हो गई हैं.
वो कहते हैं कि इन देशों ने बीते हफ़्तों में अमरीकी-चीनी रिश्ते ख़राब होते हुए देखे हैं. लेकिन वे इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि वैश्विक महामारी के बाद क्या होगा और चीन के ऊपर पूरी जानकारी नहीं देने को लेकर पैदा हो रहे शक को लेकर भी चिंतित हैं,
सिंगापुर की ली कुआं ये स्कूल ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर ड्रिव थॉम्प्सन कहते हैं, "दुनिया भर में चीन के प्रति नज़रिया नकारात्मक हो गया है. और ये चीन का अपनी नीतियों को लेकर दबाव बनाने का परिणाम है."
क्या है चीनी प्रतिक्रिया
चीन हमेशा इस तरह की गतिविधियों को अपने आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप बताता आया है. लेकिन इस बार चीन ने अपनी आक्रामकता और धमकियों के स्तर को बढ़ा दिया है और ताइवान के विश्व स्वास्थ्य संगठन में उपस्थिति को उसकी स्वाधीनता से जोड़कर देख रहा है.
स्टेट मीडिया शिन्हुआ ने एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें विशेषत: अमरीका की निंदा की गई है.
इस आर्टिकल में लिखा है, "दुनिया में सिर्फ़ एक चीन है. पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार पूरे चीन का प्रतिनिधित्व करती है और ताइवान चीन का अलग न किया जा सकने वाला हिस्सा है."
इस लेख में अमरीका से कोरोना वायरस के मुद्दे का राजनीतिकरण करने से बाज़ आने को भी कहा गया है.
राष्ट्रवादी अख़बार के रूप में माने जाने वाले ग्लोबल टाइम्स ने एक एडिटोरियल प्रकाशित किया है जिसमें कहा गया है कि ये स्थिति चीन को बल प्रयोग करने पर मजबूर कर सकती है जो कि एक अक्सर दी जाने वाली धमकी है.
एडिटोरियल कहता है, "इसका सिर्फ़ एक परिणाम निकल सकता है जिसके तहत चीनी सरकार ग़ैर-शांतिपूर्ण ढंग से ताइवान के मसले को हमेशा के लिए सुलझा कर इस फ़ालतू के खेल को ख़त्म करने पर विचार कर सकती है."
चीन की धमकियां
इस महामारी से पहले भी दक्षिण चीन सागर और दोनों देशों को अलग करने वाली 180 किलोमीटर चौड़ी ताइवान जलसंधि में सैन्य मौजूदगी में बढ़त आई थी. लेकिन शक्ति प्रदर्शन चेतावनियों में बदल गई.
हुआंग के मुताबिक़, "पिछले तीन महीनों में चीन ने बमवर्षक विमानों, टोही विमानों और लड़ाकू विमानों, और उनकी नौसेना ने जितना अभ्यास किया है जितना उन्होंने इससे पहले के तीन महीनों में नहीं किया था."
जब दूसरे देशों की बात आती है तब चीन ने आर्थिक धमकियां दी हैं.
लेकिन जब न्यूज़ीलैंड ने वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में ताइवान के शामिल होने का समर्थन किया तो चीन ने ग़ुस्से में कहा कि इससे द्विपक्षीय रिश्ते ख़राब हो सकते हैं.
लेकिन विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने एक प्रेस वार्ता में कहा, "हमें अपने लिए खड़ा होना पड़ेगा. और एक सच्ची दोस्ती बराबरी पर टिकी होती है. इस दोस्ती में असहमत होने की क्षमता होनी चाहिए."
प्रोफ़ेसर हुआंग कहते हैं कि बीते कुछ सालों में चीन के विदेशी संबंधों में ज़्यादा राष्ट्रवाद, अपनी छवि की सुरक्षा और किसी तरह की आलोचना के लिए बिलकुल भी सहिष्णुता नहीं दिखाई दी है.
वो कहते हैं, "इस महामारी की वजह से चीन बाहरी दुनिया से आ रही आलोचना के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो गया है. और ये भी है कि चीन अपनी ताक़त और शक्ति के प्रदर्शन को लेकर अच्छी स्थिति में हैं."
क्या विश्व स्वास्थ्य संगठन ताइवान को बुला सकता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता आया है कि ताइवान की सदस्यता पूरी तरह सदस्य देशों पर निर्भर करता है. इसके साथ ही ये भी कहा गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ताइवान के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारियों से बात की है और जानकारी का आदान-प्रदान जारी है.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने कहा है कि हाल ही में डायरेक्टर जनरल ने ताइवान को न्यौता दिया था लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रिंसिपल लीगल ऑफ़िस से स्टीवन सोलोमन ने कहा कि महानिदेशक बस तब किसी को न्यौता दे सकते हैं जब ये स्पष्ट हो कि सदस्य देश इसका समर्थन करते हैं जो कि अभी स्पष्ट नहीं है.
लेकिन रिगर्स कहती हैं ताइवान पहले इस बैठक में शामिल हो सकता था और दूसरे इलाक़े जैसे फ़लस्तीन क्षेत्र और वेटिकन को ऑब्ज़र्वर का दर्जा हासिल था.
वो कहती हैं, "हम एक देश के बारे में बात कर रहे हैं जो कि सिर्फ़ एक कारण की वजह से बाहर है."
इस दो दिवसीय बैठक से ऊपर उठकर देखें तो इस महामारी ने विश्व पटल पर ताइवान की सहभागिता के सवाल को नया महत्व दिया है.
जब तक ताइवान का दर्जा स्पष्ट नहीं होता है, ये संभव है कि संप्रभुता का मुद्दा चीन के साथ जारी विवादों में एक परोक्ष युद्धभूमि की भूमिका निभाता रहेगा. और ये वायरस के ख़त्म होने के बाद भी जारी रहेगा.
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