कोरोना संकट: गूगल, फ़ेसबुक, ऐपल और एमेज़ॉन का धंधा कैसे चमका

    • Author, रोरी कैटलिन जोंस
    • पदनाम, टेक्नॉलॉजी रिपोर्टर

दुनिया का बड़ा हिस्सा लॉकडाउन से जूझ रहा है. उपभोक्ता खर्च नहीं कर रहे हैं और कई उद्योग तो दिवालियेपन की कगार पर पहुंच गए हैं.

लेकिन टेक्नॉलॉजी सेक्टर की कुछ बड़ी कंपनियों पर तो लगता है कि इस वैश्विक महामारी का मामूली असर ही पड़ा है.

और अब तो ये माना जा रहा है कि इस संकट के उबरने के बाद ये टेक फर्म्स पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत बनकर उभरेंगी.

पिछले कुछ दिनों में 'गूगल' पर स्वामित्व रखने वाली कंपनी 'अल्फाबेट', 'ऐपल', 'फ़ेसबुक' और 'एमेज़ॉन' के नतीजे आए हैं.

जानकार कहते हैं कि GAFA (गूगल, ऐपल, फ़ेसबुक और एमेज़ॉन) ग्रुप के नाम से कुख्यात ये कंपनियां ख़तरनाक़ रूप से ताक़तवर हो गई हैं और इनके पर कतरे जाने की ज़रूरत है.

गूगल और फ़ेसबुक

गूगल और फ़ेसबुक दोनों ही पूरी तरह से विज्ञापनों से होने वाली कमाई पर निर्भर करती हैं.

एक तरफ़ जब विज्ञापन देने वाली कंपनियां अपने मार्केटिंग बजट में कटौती कर रही हैं तो आप सोच रहे होंगे कि गूगल और फ़ेसबुक जैसी कंपनियों के लिए ये मुश्किल भरा दौर होगा.

मार्च में 'अल्फाबेट' के सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) सुंदर पिचाई ने विज्ञापनों से होने वाली कमाई में अचानक बड़ी गिरावट आई है.

लेकिन कंपनी की शेयर कीमतों में जिस तरह से उछाल देखा गया है, उससे तो यही लगता है कि कंपनी का बैलेंस शीट में सुधार शुरू हो गया है.

फ़ेसबुक ने भी यही बात कही थी कि कोरोना वायरस का उनके विज्ञापन कारोबार पर कुछ असर पड़ा है. लेकिन ये ट्रेंड तो पूरी तिमाही में देखा गया कि कमाई पहले की तरह नहीं बढ़ रही थी.

दूसरी तरफ़ अख़बार और टेलीविज़न चैनलों के लिए कारोबारी सूखा डरावने हद तक पहुंच गया है.

ऐपल और एमेज़ॉन

इस बीच ऐपल के हार्डवेयर बिज़नेस यानी उसके फोन की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है लेकिन कंपनी की सर्विस से होने वाली कमाई उछाल आया है.

ऑनलाइन रीटेल बिज़नेस की बड़ी खिलाड़ी एमेज़ॉन का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है. उसका क्लाउड कम्प्यूटिंग का बिज़नेस बढ़िया चल रहा है.

हालांकि कोरोना वायरस से निपटने में कंपनी के खर्चे ज़रूर बढ़े हैं.

इसकी वजह से जेफ़ बेज़ोस ने निवेशकों को चुप रहने की चेतावनी देनी पड़ी. ये इस बात का संकेत था कि उनके लिए मुनाफ़ा ही सबकुछ नहीं है.

फिर भी तरक्की करने के लिए खर्च करो, खर्च करो और करते रहो की नीति ने उन्हें दुनिया का सबसे अमीर आदमी बना दिया है.

और इस बात के पूरे संकेत हैं कि जेफ़ बेज़ोस और उनकी कंपनी कोरोना संकट के बाद पहले से ज़्यादा ताक़तवर बनकर सामने आएगी.

कड़े नियम कायदे लागू करने की मांग

एक और बड़ी टेक फर्म माइक्रोसॉफ़्ट के सत्या नडेला ने इस हफ़्ते कहा कि उनकी कंपनी ने दो साल के बराबर का कायापलट महज दो महीनों कर दिखाया है.

जाहिर है कि कंपनी के नतीजे अच्छे रहे हैं. नडेला का कहना है कि क्रांतिकारी विकास की इस प्रक्रिया को अगर तेज़ी लाई जाए तो इससे कंपनी और प्रभावशाली हो जाएगी.

लेकिन जिस रफ़्तार से ये कंपनियां तरक्की कर रही हैं, उसने इन्हें पहले ही बहुत शक्तिशाली बना दिया है.

राष्ट्रपति ओबामा के आर्थिक सलाहकार रहे जैसन फरमैन उन लोगों में से हैं जो इन कंपनियों पर कड़े नियम कायदे लागू करने की मांग का ज़ोरदार समर्थन करते हैं.

जैसन फरमैन की आशंका है कि कोरोना संकट के कारण इन कंपनियों पर दबाव कम हो जाएगा.

अमरीकी शेयर बाज़ार

जैसन फरमैन कहते हैं, "अगर हालात ऐसे ही रहे तो ये कंपनियां अपनी मजबूत स्थिति को और मजबूत बनाने की दिशा में लग जाएंगी. या कोरोना संकट के कारण उन पर लागू नियम कायदों के दबाव में जरा सी भी ढील दी गई तो ये किसी न किसी मोड़ पर हमारे लिए आर्थिक परेशानी पैदा कर देंगी."

इस हफ़्ते अमरीका और यूरोप में ऐसे ही कुछ डरावने आर्थिक आंकड़े जारी किए गए हैं. अमरीकी शेयर बाज़ारों में सुधार देखा गया है. बीता महीना पिछले तीस सालों में सबसे बेहतर रहा है.

और ये सबकुछ टेक्नॉलॉजी बिज़नेस से जुड़ी इन कंपनियों के कारण हुआ है. एमेज़ॉन और नेटफ़्लिक्स के शेयरों में 15 मार्च के बाद से 40 फ़ीसदी का उछाल दर्ज किया गया है.

राष्ट्रपति ट्रंप के एजेंडे में डाउ जोंस इंडेक्स पर काफी ध्यान दिया गया था लेकिन इन टेक फर्म्स की तरक्की का ये मतलब होगा कि ट्रंप प्रशासन इनपर किसी तरह की कार्रवाई में अपनी दिलचस्पी खो देगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)