मूडीज की रिपोर्ट में मणिपुर का ज़िक्र, क्या इकोनॉमी के लिए रेड अलर्ट है?

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की सोवरेन रेटिंग 'बीएए3' को बरकरार रखा है और उम्मीद जताई है कि अगले दो साल के दौरान इसकी आर्थिक विकास दर सभी जी-20 देशों की तुलना में ज्यादा रहेगी.

लेकिन मूडीज ने देश में हाल में हुई हिंसा को लेकर राजनीतिक जोखिम का सवाल भी प्रमुखता से उठाया है.

मूडीज इनवेस्टर सर्विसेज के ताजा आकलन में मणिपुर की घटना की भी जिक्र है.

इसमें राजनीतिक असहमतियों पर नियंत्रण की सरकार की कथित कोशिश के साथ सिविल सोसाइटी के अधिकारों में कटौती और बढ़ते सांप्रदायिक तनाव की बात की गई है.

इसमें कहा गया है, ''हालांकि बढ़े हुए राजनीतिक ध्रुवीकरण के बावजूद सरकार में अस्थिरता की संभावना नहीं है लेकिन घरेलू राजनीतिक तनाव की वजह से मौजूदा लोकप्रिय नीतियां जोख़िम में पड़ सकती हैं. क्षेत्रीय और स्थानीय सरकारों को लेकर भी ये दिक्कत आ सकती है. ऐसी स्थिति में गरीबी और असमानता का जोखिम भी बढ़ सकता है. इससे सभी को शिक्षा और बेसिक सर्विसेज देने में अड़चन आ सकती है.’’

अमूमन रेटिंग एजेंसियां राजनीतिक जोखिम के बजाय आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती हैं.

अर्थव्यवस्था के जोखिम का आकलन करते हुए वो राजनीतिक जोखिम का जिक्र करती हैं लेकिन इस पर इनका ज्यादा जोर नहीं होता है.

हालांकि इस बार मूडीज ने इसे काफी प्रमुखता से रेखांकित किया है. यही वजह है कि उसके इस रुख की खासी चर्चा है.

आख़िर इसकी क्या वजह है? मूडीज ने मोदी सरकार आर्थिक विकास दर के सामने राजनीतिक जोखिमों पर ज्यादा जोर क्यों दिया है? बीबीसी हिंदी ने इसे समझने के लिए देश के दो जाने-माने अर्थशास्त्रियों से बात की.

रिपोर्ट में राजनीतिक असर का जिक्र क्यों?

मशहूर अर्थशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे अरुण कुमार से जब हमने मूडीज की रिपोर्ट में राजनीतिक जोखिम को कुछ ज्यादा तवज्जो देने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ''मूडीज जैसी रेटिंग एजेंसियों के आकलन में राजनीतिक जोखिम का जिक्र तो होता ही है. हालांकि इसे बहुत ज्यादा प्रमुखता नहीं दी जाती है.आकलन को आर्थिक विकास दर या दूसरे आर्थिक आकलनों तक ही सीमित रखा जाता है. लेकिन इस बार मणिपुर हिंसा और हरियाणा में हुए सांप्रदायिक तनावों को देखते हुए मूडीज ने राजनीतिक जोखिम के सवाल पर ज्यादा जोर दिया है.''

उन्होंने कहा,''निवेश भविष्य के लिए होता है. इसलिए आने वाले दिनों में राजनीतिक और आर्थिक माहौल कैसा रहेगा, इस बारे में आकलन जरूरी होता है. फिलहाल मूडीज ने जो आकलन पेश किया है, उसमें भारत की रेटिंग पॉजीटिव रखी गई है लेकिन आने वाले ख़तरों की बात की गई है. बेहतर ग्रोथ रेट के आकलन के साथ बढ़ते राजनीतिक जोखिम का जिक्र कर रिपोर्ट में संतुलन बनाने की कोशिश की गई है.’’

हालांकि बीआर अंबेडकर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक यूनिवर्सिटी बेंगलुरू के वाइस चासंलर और एनआईपीएफपी में प्रोफेसर एन आर भानुमूर्ति की राय थोड़ी अलग है.

वो कहते हैं, ''मणिपुर और हरियाणा में जो हुआ वो चिंता की बात है लेकिन भारत काफी बड़ा देश है और अक्सर किसी न किसी हिस्से में ऐसे मामले सामने आते रहते हैं. लेकिन इसका ग्रोथ पर स्थायी प्रभाव नहीं पड़ने वाला. दरअसल रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग लंबी अवधि के दौरान निवेशकों के लिए होती है. ऐसी घटनाओं का लंबी अवधि में ग्रोथ पर असर नहीं होता है. इसलिए निवेशकों का निवेश घट जाएगा, ऐसी बात नहीं है.''

ग्रोथ बनाम आंकड़ा

मूडीज भारत आर्थिक विकास दर को लेकर बुलिश (सकारात्मक) है. इसने कहा है कि भारत की विकास दर जी-20 देशों में सबसे ज्यादा रहेगी.लेकिन प्रोफेसर अरुण कुमार मूडीज के आकलन पर सवाल खड़े करते हैं.

उनका कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रोथ सिर्फ संगठित क्षेत्र के प्रदर्शन पर आंकी जा रही है.

उनका कहना है, ''मूडीज हो चाहे आईएमएफ या फिर एडीबी या यूएन की कोई एजेंसी, सभी सरकार के आंकड़ों के आधार पर आकलन पेश करते हैं, जबकि हमारी सरकार के आंकड़े ठीक नहीं है. क्योंकि इसमें हमारे असंगठित क्षेत्र का प्रदर्शन दिखता ही नहीं है.’’

प्रोफेसर अरुण कुमार नोटबंदी का हवाला देते हैं. वो कहते हैं,'' 2016 में लाई गई नोटबंदी कै दौरान इंडस्ट्रीज बंद हो गईं. बाजार बंद हो गए. थोक बाजारों में काम बंद हो गया. फिर भी उस साल आठ फीसदी से अधिक की ग्रोथ रेट दर्ज की गई. इसे दशक का सबसे ज्यादा ग्रोथ रेट कहा गया. तो ये आंकड़ा संगठित क्षेत्र का था. असंगठित क्षेत्र तो पूरा बंद हो गया था.’’

प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं,''दरअसल हमारा आंकड़ा संगठित क्षेत्र से आता है. इसलिए इस आधार पर दिखाया जानी वाली ग्रोथ रेट पर भरोसा नहीं किया जा सकता. ये सही ग्रोथ रेट नहीं है. हम छह-सात फीसदी ग्रोथ की बात करते हैं लेकिन असली ग्रोथ एक-दो फीसदी से ज्यादा नहीं है. दरअसल हमारी अर्थव्यवस्था पांचवीं नहीं आठवीं या नौवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है.''

संगठित बनाम असंगठित क्षेत्र

प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि हमारे यहां ग्रोथ के आकलन का तरीका ही गलत है. उनका कहना है कि अगर हम ये मानते हैं कि जिस रफ़्तार से संगठित क्षेत्र बढ़ रहा है उसी तरह असंगठित क्षेत्र भी बढ़ रहा है तो ये गलत आकलन है.

उनका कहना है, ''नोटबंदी, कोरोना महामारी, एनबीएफसी संकट और जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया. पिछले सात साल में अर्थव्यवस्था को चार बार बड़े झटके लगे. फिर संगठित क्षेत्र असंगठित क्षेत्र के बराबर ही तरक्की कैसे कर सकता है. मैं 2016 से बार-बार लिख रहा हूं कि हमें आंकड़े इकट्ठा करने का तरीका बदलना चाहिए. लेकिन सरकार ऐसा नहीं कर रही है. तो हम सभी गलत आंकड़ों पर विश्लेषण कर रहे हैं.’’

अरुण कुमार कहते हैं, ''मुझे हॉकर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि नोटबंदी के बाद 40 फीसदी हॉकरों के धंधे बंद हो गए हैं. लेकिन ये ग्रोथ के आंकड़ों में दिखता नहीं है. हम कहते रहते हैं कि आठ फीसदी ग्रोथ हो रही है.''

अरुण कुमार कहते हैं, ''अगर हम आधिकारिक तौर पर भी देखें तो 2017-18 की चौथी तिमाही में आठ फीसदी की ग्रोथ दिखाई गई थी. कोरोना महामारी से पहले 2019-20 की चौथी तिमाही में 3.2 फीसदी की ग्रोथ दिखाई गई थी. यानी सरकारी आंकड़ों में भी ग्रोथ रेट गिर रहा था. क्योंकि अर्थव्यवस्था में मांग नहीं थी. मांग तो आम उपभोक्ता पैदा करता है. ज्यादातर मांग कामगार पैदा करते हैं जो असंगठित क्षेत्र में 94 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं. उनका रोजगार खत्म हो गया. आमदनी गिर गई फिर मांग कहां से पैदा होती.''

असंगठित क्षेत्र की मांग पर संगठित क्षेत्र का कब्जा

उन्होंने कहा, ''कोरोना महामारी से पहले से ही हमारे यहां मंदी चल रही थी. 3.2 फीसदी की जो ग्रोथ थी वो संगठित क्षेत्र की थी. असंगठित क्षेत्र को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो ये नकारात्मक हो जाती. सरकार कह रही है इकोनॉमी में रिकवरी हो गई. लेकिन ये संगठित क्षेत्र की रिकवरी है. ''

वो कहते हैं, ''ई-कॉमर्स का उदाहरण लीजिये. कोरोना और इसके बाद इसमें 20 से 40 फीसदी तक ग्रोथ देखी गई. लेकिन जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार रुकी हुई है तो ये ग्रोथ कहां से आ रही है. जाहिर है ये असंगठित क्षेत्र की मांग का हिस्सा खा रही है. लेदर गुड्स सेक्टर के क्षेत्र के निर्माता का कहना है कि उनके यहां मांग बढ़ रही है. क्योंकि लेदर गुड्स सेक्टर में असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी 80 फीसदी है. उनके यहां मांग में आई कमी इधर शिफ्ट हो रही है. लगेज इंडस्ट्री, प्रेशर कुकर इंडस्ट्री, बिस्कुट इंडस्ट्री में भी ऐसा ही हो रहा है. असंगठित क्षेत्र की मांग संगठित क्षेत्र की ओर शिफ्ट हो रही है.''

भारत की जीडीपी में असंगठित क्षेत्र का योगदान लगभग 50 फीसदी है. देश के श्रमबल का 90 फीसदी असंगठित क्षेत्र में काम करता है.

तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और प्रति व्यक्ति जीडीपी का सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों कहा था कि बीजेपी के तीसरे कार्यकाल में भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा.

लेकिन प्रोफेसर भानुमूर्ति कहते हैं ये अच्छी बात है कि भारत पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था से तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बात कर रहा है. लेकिन ये भी ध्यान रहे कि भारत की आबादी बहुत बड़ी है और इस लिहाज से यहां प्रति व्यक्ति जीडीपी बहुत कम है. इसलिए भारत को प्रति व्यक्ति जीडीपी बढ़ाने पर जोर देना चाहिए.

उन्होंने कहा,’’ तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ख्वाहिश या लक्ष्य रखना अच्छी बात है लेकिन हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि देश के नागरिकों का जीवनस्तर अच्छा हो. लोगों के बीच प्रति व्यक्ति जीडीपी का गैप ज्यादा न बढ़े. यानी आय की असमानता कम हो.’’

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