रमेश बिधूड़ी प्रकरण: संसद की गरिमा और मर्यादा क्या केवल कहने की बातें हैं? - नज़रिया

रमेश बिधूड़ी

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    • Author, अनिल जैन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

"देश की सड़कें जब गूंगी या सूनी हो जाती हैं तो उस देश की संसद आवारा और बदचलन हो जाती है,"

डॉ. राममनोहर लोहिया ने सड़क और संसद के परस्पर रिश्तों पर यह बात उस दौर में कही थी जब देश की सड़कों पर सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों के झंडों तले होने वाले कांग्रेस विरोधी जन आंदोलनों की चहल-पहल बनी रहती थी और देश की संसद में भी जन आकांक्षाएं गूंजती थीं.

क़रीब छह दशक पहले दी गई लोहिया की यह चेतावनी पिछले कुछ वर्षों से लगातार साकार होती दिख रही है. संसदीय लोकतंत्र के 'अमृतकाल' में 21 सितंबर को संसद के विशेष सत्र के दौरान तो यह बात नए भयावह रूप में प्रकट हुई.

संसद का विशेष सत्र शुरू होने से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इस सत्र की अवधि छोटी ज़रूर है लेकिन इसमें कुछ बड़े और ऐतिहासिक महत्व के काम होने वाले हैं.

करोड़ों रुपए के खर्च से चार दिन तक चले विशेष सत्र में और जो कुछ हुआ उसे ऐतिहासिक महत्व का कहे जाने पर दो राय हो सकती है लेकिन आख़िरी दिन जो हुआ उसे 'अभूतपूर्व' और 'ऐतिहासिक’ मानने से शायद ही कोई इनकार करेगा.

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संसदीय कार्यवाही के दौरान सदस्यों के बीच तल्ख़ लहजे में आरोप-प्रत्यारोप होना आम बात है और कभी-कभी अभद्र भाषा का इस्तेमाल भी एक-दूसरे के ख़िलाफ़ होता है, जिस पर स्पीकर ऐसा करने वाले सदस्यों को चेतावनी देते हैं, उनके आपत्तिजनक शब्दों को सदन की कार्यवाही से निकाल देते हैं तो कभी पूरा सदन समवेत स्वर में संबंधित सदस्यों के ऐसे व्यवहार की निंदा करता है और उसे खेद व्यक्त करने के लिए बाध्य करता है.

कुछ एक मामलों में स्पीकर ने ऐसे सदस्यों को कुछ दिनों के लिए या पूरे सत्र से निलंबित करने की कार्रवाई भी की है, लेकिन 21 सितंबर को लोकसभा में जो कुछ हुआ वह भारतीय संसद ने और देश ने पहली बार देखा.

चंद्रयान-3 की कामयाबी पर चर्चा के दौरान दक्षिण दिल्ली से निर्वाचित भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने अमरोहा से निर्वाचित बहुजन समाज पार्टी के सांसद कुंवर दानिश अली के लिए जैसे अभद्र और देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति सांप्रदायिक नफ़रत से भरे शब्दों को इस्तेमाल किया और उन्हें सदन से बाहर निकलने पर देख लेने की धमकी भी दी.

डॉ. हर्षवर्धन और रविशंकर की आलोचना

इस दौरान सदन की कार्यवाही का संचालन कर रहे पीठासीन अध्यक्ष कोडिकुन्नील सुरेश ने बिधूड़ी को रोकने की कोशिश भी की लेकिन बिधूड़ी अपने आपत्तिजनक शब्दों को दोहराते रहे.

हैरानी की बात यह भी रही कि जिस समय बिधूड़ी ऐसा कर रहे थे उस समय उनके ठीक पास बैठे पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और उनके पीछे बैठे पूर्व क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद सब कुछ सुनकर हँस रहे थे.

यही नहीं, सत्तापक्ष के कुछ सांसद मेजें थपथपा कर बिधूड़ी की हौसलाअफ़ज़ाई भी कर रहे थे, सदन में मौजूद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी और अन्य मंत्रियों में से भी किसी ने बिधूड़ी को रोकने-टोकने की कोशिश नहीं की.

विडंबना यह भी है कि यह सब संसद की उस नई इमारत में हुआ जिसका निर्माण प्रधानमंत्री मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में कोरोना महामारी के दौरान अरबों रुपए के खर्च से कराया गया और चार महीने पहले जिसके उद्घाटन के मौक़े पर प्रधानमंत्री ने भव्य समारोह में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सेंगोल (राजदंड) स्थापित किया था.

संसद के लिए असंसदीय शब्द

दिलचस्प बात है कि पिछले साल जुलाई में असंसदीय शब्दों की लंबी चौड़ी फ़ेहरिस्त जारी की गई जिनका प्रयोग संसद में वर्जित होगा.

आप उस सूची को देखिए और सोचिए जो कुछ बीजेपी सांसद ने कहा है वो उन शब्दों की तुलना में कितनी अभद्र हैं.

इस नई इमारत में इस पहले सत्र की शुरुआत के मौके़ पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यह भवन सांसदों को नई प्रेरणा और ऊर्जा देगा, जो हमारे लोकतंत्र को और ज्यादा मज़बूत बनाएगी.

बहरहाल, बिधूड़ी के इस व्यवहार का जब समूचे विपक्ष ने विरोध किया और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अनमना खेद व्यक्त किया.

बिधूड़ी के मुंह से निकले जो अपशब्द पूरे देश ने सुने और अब उसका वीडियो पूरी दुनिया में वायरल हो रहा है.

उसके बारे में राजनाथ सिंह ने कहा, ''बिधूड़ी जी ने क्या कहा, मैं ठीक से सुन नहीं पाया, फिर भी अगर विपक्ष उनकी बातों से अपने को आहत महसूस करता है तो मैं खेद व्यक्त करता हूँ."

मोदी के साथ रमेश बिधुड़ी

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प्रधानमंत्री ने नहीं दी कोई प्रतिक्रिया

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एक सहज सवाल मन में यह भी उठता है कि अगर ऐसे बयान देने वाले व्यक्ति का नाम रमेश की जगह दानिश होता तो क्या कुछ हुआ होता?

देश में और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'सबका साथ-सबका विश्वास, सबका विकास' तथा 'वसुधैव कुटुंबकम्' का उद्घोष करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

दरअसल, बिधूड़ी भाजपा के सामान्य सांसद नहीं हैं, वे दिल्ली के सबसे समृद्ध और संभ्रांत माने जाने वाले दक्षिण दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से लगातार दो बार चुने गए हैं, वे तीन बार दिल्ली विधानसभा के सदस्य भी रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी जब विदेशी दौरे से लौटते हैं तो दिल्ली हवाईअड्डे पर उनके स्वागत के लिए वे मौजूद रहते हैं. इसके अलावा दिल्ली में मोदी की कोई रैली और रोड शो के लिए भीड़ के प्रबंधन का ज़िम्मा बिधूड़ी ही उठाते हैं. इस नाते वे प्रधानमंत्री के चहेते सांसदों में से एक हैं.

बिधूड़ी अपनी किशोरावस्था से जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं, उसके मुखिया मोहन भागवत अक्सर कहते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों का एक ही डीएनए है और सब भारतमाता की संतानें हैं.

लेकिन इस मामले में अपने स्वयंसेवक बिधूड़ी के आचरण पर संघ की भी कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है.

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी

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किसी का निलंबन, तो किसी को सिर्फ चेतावनी

लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने बिधूड़ी के आपत्तिजनक शब्दों को सदन की कार्यवाही से हटाने का निर्देश दिया है हालांकि संसद की कार्यवाही के लाइव प्रसारण के दौर में ऐसी कार्रवाई का अब कोई मतलब नहीं रह गया है.

बिधूड़ी ने दानिश अली के ख़िलाफ़ जिन आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है वे पूरे देश की स्मृति में दर्ज होकर संसदीय इतिहास का हिस्सा हो गए हैं और वीडियो क्लिप के ज़रिए पूरी दुनिया में फैल चुके हैं.

छोटी-छोटी बातों पर विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर देने वाले स्पीकर ने इस मामले में बिधूड़ी को सिर्फ चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने सदन में ऐसा व्यवहार दोबारा किया तो उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी.

गौरतलब है कि संसद के मानसून सत्र में लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी और राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह जब मणिपुर के मामले में प्रधानमंत्री से बयान देने की मांग करते हुए अपनी सीट से उठकर स्पीकर के सामने वेल में पहुंच गए थे तो दोनों सदस्यों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया था.

विपक्षी सांसदों के निलंबन के ऐसे कई मामले राज्यसभा और इस 17वीं लोकसभा में देखे गए हैं जबकि बिधूड़ी का मामला उन सब मामलों के तुलना में बेहद गंभीर है.

यह सही है कि संविधान के अनुच्छेद 105 (2) के मुताबिक़ संसद में कही गई बात या किसी व्यवहार के लिए कोई भी सांसद किसी भी अदालत के प्रति उत्तरदायी नहीं होता, उसके ख़िलाफ़ कोई पुलिस कार्रवाई भी नहीं हो सकती है. ऐसे मामलों में लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों के तहत स्पीकर को ही कार्रवाई करने का अधिकार है.

ऐसे में सवाल है कि क्या कोई सांसद अपने इस विशेषाधिकार के तहत किसी अन्य सांसद के ख़िलाफ़ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल या गाली-गलौच भी कर सकता है?

इस बारे में भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा स्पीकर की प्रतिक्रिया भी कम हैरान करने वाली नहीं है जब उनसे इस बारे में पूछा गया कि इस मामले में स्पीकर को क्या करना चाहिए या अगर उनके समय में यह मामला हुआ होता वे क्या करतीं, तो उन्होंने अव्वल तो इस पूरे मामले से ही अनभिज्ञता जाहिर की.

यही नहीं, उन्होंने रमेश बिधूड़ी और दानिश अली के बारे में भी पूछा कि ये कौन हैं, जबकि बिधूड़ी तो उनके स्पीकर रहते भी पांच साल तक लोकसभा के सदस्य रहे हैं.

खैर, जब उन्हें पूरा वाकया विस्तार से बताया गया तो उनका कहना था, "अब मैं तो स्पीकर हूं नहीं, इसलिए मैं इस बारे में क्या कह सकती हूं, बेहतर होगा कि आप इस बारे में स्पीकर से ही पूछें."

अमित शाह के साथ बिधूड़ी

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पहले भी नेता देते रहे हैं आपत्तिजनक बयान

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी ने बिधूड़ी को कारण बताओ नोटिस देकर उनसे 15 दिनों में जवाब देने को कहा है.

लेकिन सब जानते हैं, जिन्होंने नोटिस दिया है वे भी और जिसे नोटिस दिया गया वह भी कि ऐसे नोटिस का कोई मतलब नहीं है. बिधूड़ी नोटिस के जवाब में खेद व्यक्त कर लेंगे और मामला रफा-दफा हो जाएगा.

दरअसल, बिधूड़ी भाजपा के पहले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्होंने मुस्लिम समुदाय को निशाना बना कर ऐसे आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है.

संसद में इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करने वाले वे पहले नेता जरूर हैं लेकिन संसद या विधानसभा के बाहर तो योगी आदित्यनाथ, अनुराग ठाकुर, प्रज्ञा सिंह ठाकुर, गिरिराज सिंह, हिमंत बिस्वा सरमा, साध्वी निरंजन ज्योति आदि की एक लंबी फेहरिस्त है, जो ऐसे बयान देने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन आज तक किसी का कुछ नहीं बिगड़ा, उलटे उन्हें पदोन्नत ही किया गया है.

प्रज्ञा सिंह ठाकुर

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अनुराग ठाकुर ने 2020 में नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ दिल्ली के शाहीन बाग में लंबे समय तक चले आंदोलन को निशाना बनाते हुए एक रैली में केंद्रीय राज्यमंत्री की हैसियत से अपने समर्थकों से गद्दारों को गोली मारने वाला नारा लगवाया था.

उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर तक दर्ज नहीं हो सकी और मामला अभी तक अदालत में विचाराधीन है लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें कैबिनेट मंत्री बना कर दो-दो महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंप दिए गए.

बिहार के भाजपा नेता गिरिराज सिंह की तो पहचान ही ऐसे बयान देने वाले नेता की है, वे महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त भी बता चुके हैं.

उन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में राज्यमंत्री बनाया था और दूसरे कार्यकाल में उन्हें पदोन्नति देकर कैबिनेट मंत्री बना दिया.

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भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर तो 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में मुख्य अभियुक्त हैं और उन पर आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए बने क़ानून यूएपीए के तहत अभी मुकदमा चल रहा है.

इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में भोपाल से अपना उम्मीदवार बनाया.

चुनाव प्रचार के दौरान ही उन्होंने नाथूराम गोडसे को देशभक्त और महापुरुष बताने वाला बयान दिया.

उनके इस बयान पर प्रधानमंत्री मोदी ने नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा कि वे प्रज्ञा ठाकुर को इस बयान के लिए 'कभी दिल से माफ़ नहीं कर पाएंगे' लेकिन पार्टी ने उनकी उम्मीदवारी ख़त्म नहीं की. वे अभी सांसद हैं और आए दिन उसी तरह के बयान देती रहती हैं.

लोगों को शायद ही याद हो कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर मामले पर बीजेपी ने एक अनुशासन समिति गठित की थी जिसकी कोई बैठक कभी हुई ही नहीं.

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पाँच साल पहले कांग्रेस से भाजपा में गए हिमंत बिस्वा सरमा भी मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ नफरत फैलाने वाले बयान देते रहते हैं, पार्टी ने उन्हें असम का मुख्यमंत्री बना रखा है.

केंद्रीय राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने तो जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 'रामजादे और हरामजादे' वाला भाषण दिया था तो खुद प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में उनका बचाव करते हुए कहा था कि वे पिछड़ी जाति और ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली नेता हैं, इसलिए उनकी बातों को तूल नहीं दिया जाना चाहिए.

इन सारे उदाहरणों को रमेश बिधूड़ी को सोशल मीडिया में भाजपा समर्थकों की ओर से मिल रहे समर्थन को देखते हुए लगता नहीं कि पार्टी उनके ख़िलाफ़ किसी तरह की कोई कार्रवाई करेगी.

लेकिन कई जानकार सवाल पूछ रहे हैं कि जब चुनाव करीब है तो क्या सत्तारूढ़ दल के नेताओं, सांसदों और मंत्रियों की ओर से इस तरह के बयानों का सिलसिला रुकेगा और क्या पार्टी नेतृत्व उनके ख़िलाफ़ कोई ऐसा सख़्त कदम उठा पाएगा जिससे 'लाइन क्रॉस' करने वाले दूसरे नेताओं को सबक मिले.

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