मोहम्मद शमी: अमरोहा के शर्मीले लड़के 'सिम्मी' ने क्रिकेट की दुनिया में कैसे मचाई सनसनी - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली से क़रीब 150 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे 9 से निकली एक पतली सड़क लहराते हुए आगे बढ़ती है.
दोनों तरफ़ गन्नों के खेत हैं. हाईवे से क़रीब एक किलोमीटर दूर सफेद ऊंची दीवारों से घिरा एक फॉर्महाउस है.
ये भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी का घर है, जो उन्हें मिली शोहरत और कामयाबी की कहानी बयान करता है.
अमरोहा के शांत गांव सहसपुर अलीनगर में पैदा हुए और उबड़-खाबड़ मैदानों में टेनिस बॉल से क्रिकेट खेलते हुए बड़े हुए मोहम्मद शमी ने आईसीसी वर्ल्ड कप 2023 में तहलका मचा दिया है.
उन्होंने 6 मैचों में 5, 4, 5, 2, 0 और 7 यानी कुल 23 विकेट ले लिए हैं. सेमीफ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड के सात विकेट लेकर मोहम्मद शमी ने एक नया कीर्तिमान रच दिया है.

ये किसी भी गेंदबाज़ के लिए ड्रीम प्रदर्शन है. वो वर्ल्ड कप में सर्वाधिक 27 विकेट लेने के मिशेल स्टार्क के 27 विकेट के रिकॉर्ड से बस चार क़दम दूर हैं.
सहसपुर अलीनगर गांव में अब पत्रकारों की भीड़ है. गांव वालों के पास सुनाने के लिए मोहम्मद शमी से जुड़े क़िस्से हैं.
मोहम्मद शमी को गांव के लोग ‘सिम्मी भाई’ कहकर पुकारते हैं. सिम्मी जब छोटे थे तब उनके पिता तौसीफ़ अली गांव में क्रिकेट खेलते थे.
सहसपुर के रहने वाले मोहम्मद जुम्मा बताते हैं, "इस गांव में क्रिकेट तौसीफ़ ही लाए थे. उस दौर में हम रेडियो पर कमेंट्री सुना करते थे, वहीं से क्रिकेट का शौक पैदा हुआ. तौसीफ़ क्रिकेट की किट ले आए और गांव में पिच बना ली गई."

जुम्मा याद करते हैं, "सिम्मी बहुत छोटा था, तब से उसे एक्स्ट्रा फील्डर के रूप में खिलाते थे, वो बहुत तेज़ दौड़ता था. फिर उसने गेंदबाज़ी शुरू की, अगर कोई साथ खेलने के लिए नहीं होता था, तो वो अकेले ही गेंदबाज़ी किया करता था."
सहसपुर अलीनगर गांव में मोहम्मद शमी के घर के ठीक बगल में एक पुराना क़ब्रिस्तान हैं. अब यहां ऊंची झाड़ियां हैं, लेकिन जिस दौर में शमी क्रिकेट खेलना सीख रहे थे, यहां पिच हुआ करती थी.
इस उबड़-खाबड़ ज़मीन पर बनीं तिरछी (नीचे से ऊपर की तरफ जाने वाली पिच) पर शमी की गेंदें क़हर बरपाती थी.
जुम्मा बताते हैं, "गांव की अपनी क्रिकेट की टीम थी. शमी के बड़े भाई हसीब भी ऑलराउंडर थे. उस दौर के बच्चों में पुलिस और सेना में जाने का शौक था, फिटनेस के लिए क्रिकेट अच्छा था, ऐसे में गांव में एक मज़बूत टीम बन गई."
मोहम्मद शमी अपनी रफ़्तार से पहचान बना चुके थे. इलाक़े में होने वाले क्रिकेट टूर्नामेंटों में उनका खेल देखने के लिए भीड़ जुटती थी.
जुम्मा बताते हैं, "गांव के मैदान इन खिलाड़ियों के लिए छोटे पड़ रहे थे. शहर की टीमों से मैच खेले जाने लगे. वहां मुरादाबाद के सोनकपुर स्टेडियम में खेलते हुए कोच बदरुद्दीन की नज़र शमी पर पड़ी और उन्होंने शमी को स्टेडियम में प्रैक्टिस करने के लिए बुला लिया."

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यही मोहम्मद शमी के करियर का टर्निंग प्वॉइंट था. अब उनके पास मैदान था, कोच था और आगे बढ़ने के सपने थे.
कोच बदरुद्दीन भी शमी की रफ़्तार के कायल थे. उन्होंने ही आगे ट्रेनिंग के लिए शमी को कोलकाता जाने के लिए प्रेरित किया.
बदरुद्दीन भी अब शमी के प्रदर्शन पर हैरान हैं. बीबीसी से बात करते हुए बदरुद्दीन कहते हैं, "हमें ये तो मालूम था कि शमी आगे जाएगा, लेकिन किसी ने नहीं सोचा होगा कि वो ऐसा कमाल का प्रदर्शन करेगा. आज शमी वर्ल्ड का बेस्ट बॉलर है."
शमी की कामयाबी की वजह बताते हुए बदरुद्दीन कहते हैं, "अपनी लाइन पर सीम के साथ बॉल फेंक रहा है. उसका सीम इस समय दुनिया में सबसे बेहतर है."
"उसका तरीक़ा सिंपल है, जो उसकी सबसे बड़ी स्ट्रेंथ है, वो उसी पर फोकस कर रहा है. वो एक ही जगह बॉल डालता है और वहीं से अंदर स्विंग मिलता है. उसकी गेंद सीम और स्विंग दोनों हो रही हैं. इसलिए ही दुनिया के बेस्ट बल्लेबाज़ भी उसके सामने चकरा रहे हैं."

शमी के ऐतिहासिक प्रदर्शन का श्रेय बदरुद्दीन शमी की मेहनत को देते हैं. वो कहते हैं, "उसने कभी प्रैक्टिस नहीं छोड़ी. हमेशा मेहनत करता रहा. वर्ल्ड कप में जो दिख रहा है वो कई सालों से की जा रही मेहनत का नतीजा है."
सहसपुर अलीनगर गांव के बाहर बन रहे एक पॉलीटेक्निक कॉलेज का ग्राउंड, गांव के बच्चों के लिए खेल का मैदान भी है. हरी घास और सपाट पिच के इस मैदान में गांव के कई लड़के दोपहर के वक़्त क्रिकेट खेल रहे हैं.
मोहम्मद शमी ने युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया है और इसमें उनके गांव के लड़के भी हैं.
मुनीर भी एक तेज़ गेंदबाज़ हैं. मुनीर कहते हैं, "सिम्मी भाई को देखकर हम भी खेल रहे हैं. हमें लगता है कि अगर वो कमाल कर सकते हैं तो एक ना एक दिन हम भी जगह बना सकते हैं."
ये गांव का एकमात्र मैदान है, लेकिन इसमें भी अब नई इमारत बनाने के लिए गड्ढे खोदे जाने लगे हैं.

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यहां अभी तक खेल की कोई सुविधा नहीं है. मुनीर कहते हैं, "सुविधा हो या ना हो, हम खेलेंगे और अगर हम सिम्मी भाई की तरह गेंदबाज़ी करेंगे तो हमें भी कहीं ना कहीं जगह मिल ही जाएगी."
वर्ल्ड कप में मोहम्मद शमी के शानदार प्रदर्शन के बाद अब अमरोहा ज़िला प्रशासन यहां एक मिनी स्टेडियम बनाने जा रहा है.
अमरोहा के ज़िलाधिकारी राजेश कुमार त्यागी कहते हैं, "मोहम्मद शमी के गांव में एक मिनी स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव हमने शासन के पास भेजा है और मंज़ूरी मिलते ही इसके लिए काम शुरू हो जाएगा, हमने ज़मीन की पहचान कर ली है और ज़िले के अधिकारियों ने गांव का दौरा भी किया है."
मुनीर जैसे खिलाड़ी ख़ुश हैं कि मोहम्मद शमी की वजह से गांव में स्टेडियम बनेगा और अन्य सुविधाएं मिलने लगेंगी.
वहीं राजनीतिक दल भी अब इस गांव में खेल सुविधाओं का विकास करने के लिए घोषणाएं कर रहे हैं. राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी ने कहा है कि वो मोहम्मद शमी के गांव में अपने संसदीय फंड से खेल सुविधाओं का विकास करना चाहता हैं.

उधर, मोहम्मद शमी के घर माहौल ख़ुशनुमा है. दिल्ली से दर्जनों पत्रकार यहां पहुंचे हैं और बारी-बारी से शमी के परिजनों का इंटरव्यू कर रहे हैं.
बीबीसी से बात करते हुए शमी के बड़े भाई हसीब कहते हैं, "जब शमी ने पांच विकेट लिए तो मैं दिल-दिल में सोचता था कि काश किसी दिन छह या सात विकेट ले ले. अब शमी ने ये कारनामा कर दिया है. इस उपलब्धि से पूरा इलाक़ा खु़श है."
हसीब ख़ुद क्रिकेट खेलते थे. वो कहते हैं, "हमारे पापा क्रिकेट खेलते थे, उन्हें देखकर हम दोनों भाइयों को शौक हो गया. शमी के पास रफ़्तार थी. परिवार ने उनकी ट्रेनिंग पर फोकस किया, दोनों भाइयों में से सिर्फ़ एक को ही भेजा जा सकता था, शमी गए और आज नतीजा दुनिया के सामने हैं."
हसीब वानखेड़े स्टेडियम में मैच देखने नहीं जा पाए थे क्योंकि उन्होंने फ़ाइनल देखने की योजना बनाई थी.
हसीब कहते हैं, हम आश्वस्त थे कि भारत मैच जीतेगा, इसलिए हम अहमदाबाद जाना चाहते थे, लेकिन अब वानखेड़े में सेमीफ़ाइनल ना देखने का अफ़सोस है. इस ऐतिहासिक प्रदर्शन को हम मैदान में नहीं देख पाये.

हसीब अब परिवार के साथ मैच देखने अहमदाबाद चले गए हैं. वो कहते हैं, "हर भारतीय को आज शमी पर जितना गर्व है, इतना ही गर्व हमें हैं."
मोहम्मद शमी ने निजी ज़िंदगी में उतार-चढ़ावों के बीच अपना ध्यान खेल पर बनाये रखा और किसी भी हालात में अपनी प्रेक्टिस नहीं छोड़ी.
हसीब कहते हैं, "वो रोज़ाना दो बजे से रात दस बजे के बीच प्रैक्टिस करता है, इस दौरान किसी से बात नहीं करता. चाहे जो भी हो, वो अपनी प्रेक्टिस कभी नहीं छोड़ता, ये लगातार, बिना रुके की गई मेहनत ही उसकी कामयाबी की असली वजह है."
मोहम्मद शमी का व्यक्तित्व बहुत शर्मीला है, वो लोगों से बहुत कम बात करते हैं. हसीब कहते हैं, "वो बोलता नहीं है, बस मुस्कुरा देता है. जब यहां आता है तब भी बहुत कम ही बाहर निकलता है."
शमी की मां अंजुम आरा क्रिकेट की क्रिकेट में कोई दिलचस्पी नहीं है. वो बेटे की कामयाबी से ख़ुश हैं और फ़ाइनल मैच से पहले दुआएं कर रही हैं.
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