कोलकाता रेप केस: पॉलीग्राफ टेस्ट कैसे करते हैं और ये कितना सही होता है?

पॉलीग्राफी टेस्ट

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कोलकाता में डॉक्टर के रेप और मर्डर मामले में 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई की.

कोर्ट ने देरी से एफ़आईआर दर्ज करने को लेकर ममता बनर्जी सरकार पर सवाल उठाए.

इस मामले में अब अभियुक्त के पॉलीग्राफ टेस्ट करने की बात सामने आ रही है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, स्थानीय अदालत ने 19 अगस्त को अभियुक्त का पॉलीग्राफ टेस्ट करने की अनुमति सीबीआई को दे दी है.

हालांकि अभी तक ये पता नहीं चल पाया है कि सीबीआई ये पॉलीग्राफ टेस्ट कब करेगी.

14 अगस्त को कोलकाता हाईकोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी थी. अब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है.

ऐसे में सवाल ये है कि पॉलीग्राफी टेस्ट क्या होता है और ये कैसे होता है? ये नार्को टेस्ट से कैसे अलग है और क्या इस टेस्ट को अदालत में माना जाता है?

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पॉलीग्राफ टेस्ट क्या है?

पुलिस के पास एक अपराध, एक अपराधी और कुछ सबूतों के बारे में जानकारी है.

लेकिन जब इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि सबूत अदालत में टिके रहेंगे, तो पुलिस एक मजबूत मामला बनाने के लिए और लापता कड़ियों को जोड़ने के लिए इन परीक्षणों को करती है.

पूछताछ के दौरान जब अभियुक्त झूठ बोलता है तो शरीर में कुछ परिवर्तन नज़र आते हैं.

हृदय गति बढ़ जाती है, सांस लेने का तरीका बदल जाता है, रक्तचाप बढ़ जाता है, पैरों में पसीना आने जैसे लक्षण दिखने लगते हैं.

इन मानकों के आधार पर, विशेषज्ञों ने एक ऐसी प्रणाली बनाई है जो सामान्य प्रश्नों के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया और चुनौतीपूर्ण प्रश्नों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के बीच के अंतर को माप सकती है.

यानी शरीर में होने वाले बदलाव बताते हैं कि कोई व्यक्ति सच बोल रहा है या सवाल करने वाले को धोखा दे रहा है.

पॉलीग्राफ टेस्ट कैसे किया जाता है?

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अदालत की ओर से पॉलीग्राफ टेस्ट की अनुमति देने के बाद और अभियुक्त की सहमति से पहले एक सामान्य शारीरिक टेस्ट किया जाता है.

यह सुनिश्चित करने के बाद कि अभियुक्त को कोई बीमारी नहीं है, कोई शारीरिक समस्या नहीं है, उसके शरीर से कुछ सेंसर जोड़े जाते हैं.

रक्तचाप को मापने के लिए उसकी छाती पर एक बेल्ट, पेट-छाती के दबाव सेंसर के साथ एक बेल्ट और रक्त को मापने के लिए उसकी उंगली पर एक सेंसर प्रवाह, आदि.

इन सभी सेंसर्स के सिग्नल एक डिजिटल मॉनिटर पर रिकॉर्ड किए जाते हैं.

पहले कुछ सरल प्रश्न पूछे जाते हैं, जैसे - आपका नाम क्या है, आपकी आयु क्या है, आप कहाँ पैदा हुए हैं, आपकी शिक्षा क्या है, आपके माता-पिता के बारे में जानकारी...

इसका मतलब है कि ऐसे सवाल जिन्हें नकारने या झूठ बोलने की ज़रूरत नहीं है. इससे अभियुक्त को आराम मिलता है और उसके शरीर की सामान्य प्रतिक्रिया दर्ज की जाती है.

साथ ही यह सवाल-जवाब की दिशा तय करती है, ताकि वह जांच के बिंदु पर आगे जवाब दे.

फिर सवालों का अगला सेट शुरू होता है जिसके उत्तर हां या नहीं या विस्तृत हो सकते हैं. इन जवाबों की शारीरिक प्रतिक्रिया से अंदाजा लगाया जाता है कि वह व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ.

नार्को टेस्ट क्या है?

पॉलीग्राफी टेस्ट, नार्को टेस्ट

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कई बड़े और अहम मामलों में पुलिस अभियुक्तों के नार्को टेस्ट की मांग करती है और अपनी जांच में उस पर भरोसा भी करती है.

अगर किसी अभियुक्त के दिए बयान और पुलिस की देखी गई वास्तविक स्थिति और साक्ष्य के बीच तालमेल की कमी लगती है तो अभियुक्त से वास्तविक जानकारी हासिल करने के लिए नार्को टेस्ट किया जाता है.

इस टेस्ट को 'ट्रूथ सीरम' भी कहा जाता है. इस जांच के दौरान अभियुक्त को सोडियम पेंटाथोल जैसी दवा दी जाती है.

साल 2022 के श्रद्धा वालकर मर्डर केस के सिलसिले में बीबीसी मराठी ने पूर्व सहायक पुलिस आयुक्त श्रीकांत महाजन से ट्रूथ सीरम के बारे में बात की थी.

उन्होंने कहा था, "इस दवा को देने के बाद अभियुक्त न तो पूरी तरह से बेहोश होता है और न ही उसे होश आता है. इस स्थिति को ट्रान्स कंडीशन कहा जाता है. इसके बाद एक व्यक्ति से पूछकर जानकारी प्राप्त की जाती है."

"नार्को टेस्ट में मनोचिकित्सक या इस टेस्ट के विशेषज्ञ की देख रेख में किया जाता है. सरकारी अस्पताल में व्यवस्था नहीं होने पर मेडिकल कॉलेज में निजी डॉक्टर को बुलाकर नार्को टेस्ट कराया जाता है. परीक्षण के दौरान मौजूद डॉक्टर को नार्को परीक्षण की प्रक्रिया के बारे में पूरी जानकारी होने की उम्मीद की जाती है."

श्रीकांत महाजन ने कहा था, "डॉक्टर की काफी अहमियत होती है क्योंकि कोर्ट अभियुक्त या पुलिस से ज्यादा इस बात पर ध्यान देता है कि डॉक्टर क्या कहते हैं."

पॉलीग्राफ और नार्को टेस्ट कितना सही है?

नार्को टेस्ट

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इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

ये दोनों ही वैज्ञानिक रूप से 100 प्रतिशत सटीक टेस्ट नहीं हैं.

कुछ जानकारों के मुताबिक अभियुक्त काफी अभ्यास के बाद टेस्ट में बिना पकड़ में आए अपने झूठ के सहारे पास भी हो सकता है.

साल 2018 में ब्रिटेन में पॉलीग्राफ टेस्ट लेने वालों को ट्रेनिंग देने वाले प्रोफ़ेसर डॉन ग्रुबिन ने बीबीसी न्यूज़ को बताया था, "अगर आप एक परीक्षण से पहले अपने जूते में एक कंकर डालते हैं, तो यह आपको अधिक पसीना देता है और आपकी शारीरिक प्रतिक्रिया को बदल देता है, इसलिए जब आप झूठ बोल रहे होते हैं तो शरीर में बदलाव नहीं होता है."

अगर आपने अभिनेत्री तापसी पन्नू की फिल्म 'हसीन दिलरुबा' नेटफ्लिक्स पर देखी है तो आप उसमें इस तरह की लड़ाई देख सकते हैं. लेकिन हकीकत में चीजें बहुत अलग होती हैं.

हालांकि विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि बहुत से लोग इस टेस्ट को लेने से पहले तनाव में रहते हैं, भले ही वे सच बोल रहे हों और निर्दोष हों, उन्हें इस टेस्ट में फँसने का डर सता रहा होता है.

पॉलीग्राफ या नार्को टेस्ट का नतीजा कितना स्वीकार्य है?

क्राइम, कोलकाता रेप मर्डर केस

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दरअसल, नार्को टेस्ट की तरह पॉलीग्राफ टेस्ट के नतीजे को सबूत के तौर पर अदालत में पेश नहीं किया जा सकता.

लेकिन अगर परीक्षण से नए सुराग मिलते हैं- जैसे हत्या का हथियार या हत्या का मकसद- तो पुलिस इसे अदालत में सबूत के तौर पर पेश कर सकती है.

वकील असीम सरोदे ने बीबीसी से कहा था कि इस तरह के टेस्ट का इस्तेमाल जांच एजेंसियों की जांच को दिशा देने या जांच में कुछ सूत्र पाने के लिए किया जाता है और कई मामलों में इसे फायदेमंद भी देखा गया है.

जांच एजेंसियों का तर्क है कि जब अभियुक्त का रवैया मदद करने वाला ना हो तो उस पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करने के बजाय, इस तरह से जानकारी निकालना हमेशा बेहतर होता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा था कि एक गलत रास्ते के विकल्प के तौर पर दूसरा गलत रास्ता अपनाना सही नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट

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22 मई 2010 को एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि नार्को टेस्टिंग सिर्फ अभियुक्त या संबंधित व्यक्ति की सहमति से ही की जा सकती है.

अगर अभियुक्त की सहमति के बिना नार्को परीक्षण किया जाता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है.

साथ ही संबंधित जांच एजेंसियों को यह परीक्षण कराते समय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए.

इससे पहले 2002 के गुजरात दंगों, तेलगी स्टांप पेपर घोटाले, 2007 के निठारी हत्याकांड और 26/11 हमले के मामले में चरमपंथी अजमल कसाब का भी पुलिस ने नार्को टेस्ट किया था.

फरवरी 2022 में श्रद्धा वालकर मर्डर केस में भी पॉलीग्राफी टेस्ट की मांग की गई थी.

नोएडा के बहुचर्चित आरुषि तलवार हत्याकांड के अभियुक्तों में से एक का नार्को टेस्ट कराया गया, जिसका वीडियो भी बाद में लीक हुआ था.

एडवोकेट असीम सरोदे ने बीबीसी से कहा था, "संविधान के अनुच्छेद 20(3) के मुताबिक किसी को भी अपने ख़िलाफ़ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. इसे हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार माना जाता है. नार्को टेस्ट इसके ख़िलाफ़ जाता है. साथ ही अनुच्छेद 20 में गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया गया है. इसलिए क्रूर व्यवहार की अनुमति भी नहीं दी जा सकती है."

सरोदे बोले थे, "राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2000 में दिशानिर्देश जारी किए. यह स्पष्ट है कि नार्को-परीक्षण बिना अनुमति के नहीं किया जा सकता है. वरना यह मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा."

नोट- ये रिपोर्ट दिसंबर 2022 को पहली बार प्रकाशित हुई थी. इस रिपोर्ट को अपडेट के साथ दोबारा प्रकाशित किया जा रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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