कोलकाता डॉक्टर रेप-मर्डर केस: मां बोली टॉप करना चाहती थी बेटी, पिता बोले - उसने अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
''62 साल की उम्र में मेरे सारे सपने टूट गए हैं. हम दोषी के लिए सख़्त से सख़्त सज़ा चाहते हैं.''
31 साल की डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या ने भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर फिर से बहस शुरू कर दी है. कोलकाता की इस डॉक्टर के पिता ने अपने घर में बीबीसी से बात की.
बेटी की ख़ौफ़नाक हत्या के बाद से साधारण सा दिखने वाला उनका घर मीडिया कैमरों के केंद्र में बना हुआ है.
इस रिपोर्ट से पीड़िता के परिवार के सदस्यों के नाम हटा दिए गए हैं. भारतीय क़ानून के मुताबिक़, रेप पीड़िता या उसके परिवार की पहचान को सार्वजनिक करने की मनाही होती है.
पीड़िता के पिता कहते हैं, ''हमारा राज्य, हमारा देश और यहां तक कि पूरी दुनिया इंसाफ़ मांग रही है.''
पीड़िता की मां अपने पति के ठीक पीछे ख़ामोशी से बैठी हुई थीं.

बेटी हमेशा रखती थी ध्यान
नौ अगस्त की रात को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी. रेप और मर्डर अस्पताल के अंदर ही सेमिनार हॉल में किया गया था.
पीड़िता ने घटना से कुछ देर पहले ही रात 11 बजे के क़रीब अपनी मां से फ़ोन पर बात की थी.
मां अपनी बेटी के आख़िरी शब्दों को याद करती हैं- ''प्लीज़ ध्यान रखना कि पापा दवा वक़्त से लें. मेरी चिंता मत करना.''
मां बताती हैं- ''ये आख़िरी बार था, जब हमने बात की. अगले दिन उसके फ़ोन की घंटी बजती रही.''
पीड़िता के पिता को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है और वक़्त पर दवाएं लेना ज़रूरी होता है.
अपने घर में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में पीड़िता के पिता कहते हैं, ''वो हमेशा इस बात का ध्यान रखती थी कि मैं कोई ख़ुराक लेना ना भूल जाऊं.''
उन्होंने कहा, ''एक बार दवाएं ख़त्म हो गई थीं. मैंने सोचा था कि अगले दिन ख़रीद लूंगा. लेकिन बेटी को पता चला गया. रात के 10 या 11 बज रहे थे. उसने कहा कि जब तक दवाएं नहीं आ जातीं तब तक कोई खाना नहीं खाएगा. ऐसी तो मेरी बेटी थी. मुझे कभी किसी चीज़ की फ़िक्र नहीं करने दी.''
कोलकाता के इस रेप से 2012 के दिल्ली गैंग रेप की यादें ताज़ा हो गई हैं, जब चलती बस में 22 साल की लड़की के साथ गैंग रेप हुआ था. इस दौरान पीड़िता के शरीर पर चोटें इतनी गहरी थीं कि वो बच नहीं सकी.


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सख़्त हुए थे क़ानून
दिल्ली में हुए इस गैंगरेप के बाद यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ क़ानून को सख़्त किया गया था.
लेकिन महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के दर्ज मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली और भारतीय महिलाओं के लिए इंसाफ़ पाना अब भी चुनौती बना हुआ है.
कोलकाता रेप, मर्डर मामले के बाद स्वास्थ्यकर्मियों को जिन चुनौतों का सामना करना पड़ता है, उस तरफ़ एक बार फिर ध्यान गया है.
स्वास्थ्यकर्मियों की मांग है कि निष्पक्ष जांच हो और कार्यस्थल पर ख़ासकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर क़ानून बनाया जाए.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने डॉक्टरों को आश्वासन दिया है कि काम करने की जगह पर बेहतर सुरक्षा संबंधी माहौल तैयार करने के लिए सख़्त क़दम उठाए जाएंगे.
नेशनल मेडिकल कमिशन ने काम करने की जगहों को सुरक्षित बनाने से संबंधित एडवाइजरी सभी मेडिकल कॉलेज और संस्थानों के लिए जारी की है.
इस रेप के मामले को लेकर न सिर्फ़ कोलकाता बल्कि भारत के दूसरे शहरों में भी विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं.

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पुलिस की सुरक्षा और पीड़िता का परिवार
हमने पीड़िता के परिवार से उनके घर जाकर मुलाक़ात की.
घर के रास्ते में एक तरफ़ पुलिस बैरिकेड, दर्जनों कैमरे और कई न्यूज़ चैनल के संवाददाता हर पल को दर्ज कर रहे थे.
दूसरी तरफ़ 10 से 15 पुलिस अधिकारी अपनी सफ़ेद वर्दी में तैनात दिखे.
इन पुलिसवालों का सिर्फ़ एक मक़सद है कि कैमरे बैरिकेड से पीछे की तस्वीर ना ले पाएं. इसी बैरिकेड के पीछे पीड़िता का घर है.
नौ अगस्त की रात जूनियर डॉक्टर अपनी 36 घंटे की नाइट शिफ्ट ख़त्म करने के बाद सेमिनार हॉल में आराम करने गई थी.
अगली सुबह डॉक्टर का शव मिला.
अपराध की इस घटना के बाद कोलकाता समेत कई दूसरे शहरों में इंसाफ़ की मांग करते हुए प्रदर्शन हुए.
'रिक्लेम द नाइट' मार्च कोलकाता में आयोजित किया गया और देश भर की करोड़ों महिलाओं के लिए सुरक्षा की मांग की गई.


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पिता के सवाल
पीड़िता के पिता कहते हैं- अस्पताल ही वो जगह है, जहां ड्यूटी पर बेटी के साथ इतनी क्रूर हरकत की गई.
बेटी को खोने के बाद ये परिवार सदमे में है.
अपनी बेटी के बारे में पिता कहते हैं, ''उसकी शादी लगभग तय हो गई थी लेकिन वो कहती थी कि पापा आप पैसे कहां से लाएंगे? आप फ़िक़्र मत करिए, मैं संभाल लूंगी.''
जब वो ये बात कह रहे थे तो पीछे से उनकी पत्नी के सुबकने की आवाज़ लगातार आ रही थी.
इस घर के लिविंग रूम के बगल की सीढ़ियों से ऊपर जाएं तो वहां पीड़िता का कमरा है.
इस कमरे का दरवाज़ा बीते 11 दिनों से नहीं खुला है. 10 अगस्त के बाद से ये मां-बाप अपनी बेटी के कमरे में नहीं घुसे हैं.
पिता कहते हैं, ''जब वो छोटी थी तब हमें आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था. वो तब पांच साल की रही होगी. उसे फल बहुत पसंद थे, ख़ासकर अनार. एक बार जब हम लोग बाहर गए थे तो उसने कहा था- पापा आप पूजा के लिए अनार नहीं लोगे? वो कभी ख़ुद के लिए कोई चीज़ नहीं मांगती...''
अपनी बात पूरी करने से पहले ही उनकी आंखों से आंसू छलक गए.
वहीं मौजूद एक रिश्तेदार ने ढांढस बंधाते हुए कहा- ख़ुद को संभालो.

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मज़बूत रहने का बोझ
पिता के कंधों पर मज़बूत रहने का भार है.
पीड़िता उनकी इकलौती बेटी थी, जिसको बचपन से ही पढ़ने का शौक़ था. स्कूल में टीचर्स हमेशा तारीफ़ करतीं.
पिता कहते हैं, ''जब वो छोटी थी तो उसके टीचर्स उसे गोद उठा लेते. हम निम्न मध्यम वर्ग परिवार से हैं और सब कुछ अपने आप बनाया है.''
उन्होंने कहा, ''लोग कहते थे कि आप अपनी बेटी को डॉक्टर नहीं बना सकते. लेकिन मेरी बेटी ने सबको ग़लत साबित किया और सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाख़िला लिया.''
इस बातचीत के दौरान पीड़िता की मां ख़ामोशी से सब सुनती रहीं.
वो अपने हाथ की चूड़ियों को छूती रहीं. ये चूड़ियां वो अपनी डॉक्टर बेटी के साथ ख़रीदकर लाई थीं.
वो याद करती हैं कि कैसे उनकी बेटी हर रात सोने से पहले डायरी लिखा करती थी.
पीड़िता की मां कहती हैं- ''बेटी ने लिखा था कि वो मेडिकल डिग्री में गोल्ड मेडल जीतना चाहती थी. वो अच्छी ज़िंदगी जीना और हम लोगों का ख़्याल रखना चाहती थी.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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