कोलकाता की सड़कों पर आधी रात को उतरीं महिलाएं, मां-बाप भी साथ आए: आँखों देखी

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
तारीख़ 14 अगस्त. रात के 10 बज रहे हैं. ये जगह कोलकाता का एकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स है.
सड़क के किनारे बने एक अस्थायी मंच के सामने लगी कुर्सियां भर चुकी हैं.
यहां कार्यक्रम का समय है रात 11.30 बजे. लेकिन नौ बजे से ही महिलाएं और युवतियां पहुंचने लगी हैं.
ज्यादातर के हाथों में पोस्टर और बैनर हैं. कार्यक्रम स्थल पर भी बैनर और फ्लेक्स लगाए गए हैं.
तय समय से पहले ही महिलाओं की भीड़ जुटने के कारण भाषण भी शुरू हो गया है.
इस कार्यक्रम की ख़ास बात यह है कि ज़्यादातर वक्ता महिलाएं ही हैं.

'रिक्लेम द नाइट'
रात 11 बजे, स्थान—जादवपुर विश्वविद्यालय के सामने 8 बी बस स्टैंड.
सड़क के एक किनारे पर कुछ जगह घेर कर एक शामियाना लगा है, जहां कुछ युवतियां और महिलाएं बैठी हैं. चारों तरफ पोस्टर और बैनर लगे हैं.
मौक़े पर लगातार नारे लग रहे हैं. सड़क पर काफ़ी भीड़ है. इस कारण इस जगह से तीन-चार किलोमीटर दूर तक सड़कों पर वाहनों का जाम लगा है.
पैदल चलने तक की जगह नहीं है तो गाड़ी को रास्ता कहां मिलेगा. यहां भी वही कार्यक्रम होना है. फ़र्क़ यह है कि यहां भीड़ हज़ारों में है.
यह कार्यक्रम है 'रिक्लेम द नाइट' यानी रात पर कब्जा करो.
कोलकाता के सरकारी आरजी कर अस्पताल में बीते शुक्रवार को एक ट्रेनी डॉक्टर की रेप के बाद हत्या कर दी गई. इसके विरोध में आयोजित इस अभियान के तहत बुधवार की आधी रात को महिलाओं ने हकीकत में महानगर की सड़कों पर कब्जा सा कर लिया था.
कोलकाता में पहले जगदलपुर में ही इस कार्यक्रम के आयोजन की योजना थी.
उसके बाद इसे बढ़ा कर तीन जगह करने का फैसला किया गया.
बाद में सोशल मीडिया के जरिए यह कार्यक्रम राज्य के 300 से ज्यादा जगहों पर आयोजित किया गया. आधी रात को ही महिलाओं ने कहीं मोमबत्ती जुलूस निकाला तो कहीं धरना दिया और नारेबाजी की.

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लंबा जाम
इस अभियान को ध्यान में रखते हुए कोलकाता पुलिस ने सुरक्षा का पुख़्ता इंतजाम किया है.
एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि यह इंतजाम अभियान में बाधा पहुंचाने नहीं बल्कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए किया गया है.
महानगर की सड़कों पर पूरी रात विशेष गश्त जारी रहेगी ताकि दूरदराज से आने वाली महिलाओं को आने-जाने में कोई दिक़्क़त नहीं हो.
जादवपुर में आयोजित कार्यक्रम में इतनी भीड़ है कि कई किलोमीटर दूर से लोग पैदल ही मौके पर पहुंच रहे हैं.
रात बढ़ने के साथ ही भीड़ भी बढ़ रही है. दूरदराज से लोग अपने बच्चों के साथ इस अभियान में हिस्सा लेने पहुंच रहे हैं.
इस बात की फ़िक्र किए बगैर कि देर रात घर कैसे लौटेंगे.
कोलकाता के इस नज़ारे को देखकर लग रहा था कि महानगर की तमाम सड़कें और उस पर उमड़ी भीड़ 8 बी बस स्टैंड की ओर ही जा रही हैं.

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उत्साह नहीं दिखा कम
बीच रात करीब 12 बजे आई बारिश भी महिलाओं और दूसरे लोगों का उत्साह कम नहीं कर सका. लोग भीगते हुए नारे लगा रहे हैं.
इस अभियान के प्रति समर्पण का आलम यह है कि सैकड़ों लोग सपिरवार यहां पहुंचे हैं.
कइयों की गोद में तो छोटे बच्चे भी हैं. इससे आरजी कर की घटना के प्रति लोगों के मन में जमी नाराज़गी का पता चलता है.
हाल के बरसों में कोलकाता ने आधी रात के समय सड़कों पर ख़ासकर महिलाओं की ऐसी भीड़ नहीं देखी होगी.
इस अभियान की मुख्य संयोजक और प्रेसीडेंसी कॉलेज की पूर्व छात्रा रिमझिम सिन्हा बताती हैं कि इस अभियान की अपील करते समय उन्होंने इतने बड़े पैमाने पर लोगों के पहुंचने की उम्मीद नहीं की थी.
उनकी एक फेसबुक पोस्ट के कारण ही कोलकाता समेत पूरे बंगाल में इस अभियान को इतने बड़े पैमाने पर आम लोगों का समर्थन मिला है.
यहां जो पोस्टर और बैनर लगे हैं, उन सबको आयोजकों ने नहीं बनाया है.
कोलकाता के विभिन्न हिस्सों से ख़ासकर युवतियां खुद अपने हाथों से यह पोस्टर बनाकर यहां ले आई हैं.
जितने पोस्टर उतनी तरह के नारे. किसी पर आरजी कर के अभियुक्त को सख़्त सज़ा देने की बात कही गई है तो किसी में महिलाओं को बेहतर सुरक्षा मुहैया कराने की.

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भीड़ टस से मस नहीं हुई
रात के सवा बारह बज चुके हैं. लेकिन भीड़ टस से मस होने का नाम नहीं ले रही है.
इसी बीच धरना मंच से नारा लगता है- हमें चाहिए आजादी....पूरी भीड़ एक साथ इसे दोहराने लगती है.
आयोजकों की ओर से लोगों को रैली की शक्ल में आगे बढ़ने को कहा जाता है. लेकिन लोगों के चेहरों पर जोश जस का तस है. लोग पूरे दम-खम के साथ एक ही जगह खड़े रह कर नारे लगाने में जुटे रहते हैं."
अपने हाथों में पोस्टर लेकर यहां पहुंचीं कॉलेज छात्रा सुप्रिया घोष बताती हैं, "मैं दक्षिण कोलकाता के गड़िया इलाके से यहां आई हूं. सड़क पर भीड़ के कारण अपनी स्कूटी दो-तीन किलोमीटर पहले ही एक परिचित के घर छोड़नी पड़ी. वहां से पैदल आ रही हूं. उसकी चार सहेलियां भी साथ हैं.''
क्या आपके माता-पिता ने आपको आधी रात को इतनी दूर आने की अनुमति दे दी?
जवाब मिला- आरजी कर की घटना से हर मां-बाप अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर चिंतित है. इसलिए मेरी मां भी साथ आई है.
जादवपुर विश्वविद्यालय की एमए की छात्रा प्रीति गांगुली भी अपनी सहेलियों के साथ 'रिक्लेम द नाइट' का हिस्सा बनने पहुंची हैं. उनके हॉस्टल की तमाम छात्राएं यहां पहुंची हैं.
प्रीति कहती हैं, "आरजी कर जैसी घटना तो कभी भी कहीं भी हो सकती है. लेकिन जिस तरह पहले इसे आत्महत्या बताकर प्रशासन ने मामले की लीपापोती कर असली अभियुक्तों को बचाने का प्रयास किया, वह अक्षम्य है. हमारी लड़ाई उस मानसिकता से है जिसने रेप पीड़िता को ही उसके कपड़े और रात में बाहर निकलने की वजह से दोषी ठहराते हुए कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. हमारा विरोध इसी मानसिकता से है. जब तक इसमें बदलाव नहीं आएगा, तस्वीर नहीं बदलेगी."

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चेहरे पर नाराज़गी
विरोध प्रदर्शन में शामिल भीड़ के चेहरों पर नाराज़गी साफ झलक रही है.
उनमें जोश की भी कमी नहीं नज़र आती.
पहले उमस वाली गर्मी, बीच में बारिश और फिर गर्मी. इसके बावजूद ज्यादातर लोग अपने स्थान से हिल तक नहीं रहे हैं. कुछ तो भीड़ की वजह से और कुछ इस अभियान को ठोस समर्थन देने के इरादे से.
कोलकाता की सड़कों पर देर रात इतनी भीड़ उत्सव के दिनों में ही नज़र आती है. आज कोई उत्सव नहीं है. लेकिन विरोध प्रदर्शन के लिए जुटी यह भीड़ उत्सव का ही आभास दे रही है.
महिलाओं ने सचमुच रात और सड़क पर कब्जा सा कर लिया है. भीड़ से नारे भी लग रहे है कि रात हमारी है और सड़कें भी हमारी हैं.
आख़िर 12.40 बजे यहां से भीड़ धीरे धीरे जादवपुर थाने की ओर बढ़ती है.
आयोजकों की ओर से बार-बार लाउडस्पीकर पर एलान किया जा रहा है कि यह जुलूस थाने तक ही जाएगा.
लेकिन यहां से थाने तक की दो किमी की दूरी करने में करीब घंटा भर लग जाता है.
इस पूरे रास्ते तमाम नारे गूंजते रहते हैं. थाने के पास पहुंच कर अभियान खत्म करने का एलान किया जाता है. उसके बाद लोग धीरे-धीरे अपने घर की राह पकड़ते हैं.
लौटने वालों की जुबान पर भी इस अभियान की ही चर्चा है.

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क्या है रिक्लेम द नाइट
सुसान अलेक्जेंडर स्पीथ नामक एक युवा महिला माइक्रोबायोलॉजिस्ट की रात को घर लौटते समय चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई थी.
इसके विरोध में टेक बैक द नाइट शीर्ष रैली आयजित की गई थी.
दो साल बाद महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के विरोध में जर्मनी में भी ऐसी रैलियां आयोजित की गई थीं.
12 नवंबर, 1977 को इंग्लैंड के लीड्स में रिक्लेम द नाइट अभियान के तहत करीब डेढ़ सौ महिलाएं आधी रात को सड़कों पर कब्जा जमाने उतरी थीं.
उसके अगले साल ऑस्ट्रेलिया के सिडनी और पर्थ में महिलाओं ने रात को जुलूस निकाले थे.
अमेरिका और जर्मनी समेत कई देशों में समय-समय पर इस अभियान की अपील की जाती रही.
निर्भया गैंगरेप के विरोध में कोलकाता में भी इसका आयोजन किया गया था. लेकिन बुधवार की भीड़ ने पहले के ऐसे तमाम अभियानों को बहुत पीछे छोड़ दिया है.
इस प्रदर्शन से कुछ देर पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित एक कार्यक्रम में आरोप लगाया कि बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार की तर्ज पर कुछ लोग यहां उनकी सरकार गिराना चाहते हैं.
ममता का कहना था- आंदोलन करने वालो में सभी छात्र नहीं हैं. सीपीएम और बीजेपी इस मुद्दे पर राजनीति कर रही हैं.
सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में भी इस मुद्दे पर दो गुट बन गए थे. कुछ लोग अभियान में मिल हुए तो कुछ ने इसे बेमतलब करार दिया.
एक तरफ ये प्रदर्शन था. दूसरी तरफ कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर की रेप के बाद हत्या के मामले में डॉक्टरों के विरोध प्रदर्शन के दौरान 14-15 अगस्त की दरम्यिानी रात भीड़ ने हिंसा की है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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