इस विषय के अंतर्गत रखें अगस्त 2011

प्रधानमंत्री की छवि पर मंडराता साया

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 29 अगस्त 2011, 14:41

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कवि विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है कि 'सत्ता का रास्ता जनता को हटाकर बनता है.' लेकिन पिछले पंद्रह दिनों में जनता ने सत्ता को थोड़ा सा हटाकर अपना रास्ता बनाया है.

सत्ता ताक़तवर होती है. उसे अपने होने का बहुत ग़ुरूर होता है. इसलिए शायद वह स्वीकार न करे कि ऐसा हुआ है.

ये बहसें होती रहेंगी कि अन्ना हज़ारे का आंदोलन सही था या ग़लत. इससे जीत मिली या नहीं. अगर जीत मिली तो आधी थी या इसे जीत का एक पड़ाव मानना चाहिए. लेकिन इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकती कि इसने एक ऐसे शख़्स की धज बिगाड़ दी, जो विवादों से और शंकाओं से परे था.

और वो शख़्स प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा कौन हो सकता है.

एक बरस पहले तक वे इस सरकार के माथे के मुकुट थे. सरकार के धुर विरोधी भी इस ऐहतियात के साथ आरोप लगाते थे कि वे प्रधानमंत्री पर आरोप नहीं लगा रहे हैं और वे एक निहायत ही सीधे-सादे और ईमानदार व्यक्ति हैं.

लेकिन पिछले एक बरस ने इस छवि को निर्ममता के साथ बदल दिया है. ऐसा नहीं है कि उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन लोग महसूस कर रहे हैं कि वे बेईमानी को रोक नहीं पाए.

टेलीक़ॉम घोटाले से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले तक जो बयान प्रधानमंत्री ने दिए वे एक-एक करके ग़लत साबित हुए हैं. उन्होंने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम में कोई घोटाला नहीं हुआ लेकिन उन्ही के मातहत काम करने वाली सीबीआई ने उनके एक मंत्री और उनके सहयोगी दल की एक सांसद को जेल में डाल रखा है और उनकी ज़मानत तक नहीं होने दे रही है.

राष्ट्रमंडल खेलों में धांधली पर भी उनकी अपनी पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य अपने कई सहयोगियों के साथ तिहाड़ की रोटियाँ खा रहे हैं.

अगर निकली हुई बात सचमुच दूर तक गई तो नोट के बदले वोट वाले मामले में भी उनकी किरकिरी हो सकती है. भले ही अभी आरोप पत्र अमर सिंह और भाजपा के सांसदों के ख़िलाफ़ हो लेकिन जो कुछ हुआ वह उनकी सरकार को बचाने के लिए ही तो था.

अन्ना हज़ारे के जनलोकपाल के मामले में उनकी सरकार ने एक के बाद एक जिस तरह से फ़ैसले लिए, उसने एकबारगी उनकी राजनीतिक समझ पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.

एक आंदोलन जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ था, उसे मनमोहन सिंह की सरकार ने अपनी नासमझी से अपनी सरकार के ख़िलाफ़ बना लिया. अपने शुरुआती भाषणों में ही अन्ना हज़ारे ने कहा था कि वे किसी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं करते क्योंकि उनका अनुभव है कि अगर ये सरकार भ्रष्टाचार में ग्रैजुएट है तो अगली सरकार डॉक्टरेट होगी. चोर की दाढ़ी में तिनका मुहावरा शायद ऐसे ही मौक़ों के लिए बना होगा.

वर्ष 2009 के चुनाव के बाद विश्लेषकों ने कहा था कि मनमोहन सिंह ही यूपीए के तारणहार साबित हुए हैं. उन्होंने ये भी कहा कि अगर लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें 'निकम्मा प्रधानमंत्री' न कहा होता तो एनडीए को इतना नुक़सान नहीं होता.

अब लालकृष्ण आडवाणी या किसी और नेता में वही पुराना आरोप दुहराने की हिम्मत नहीं है लेकिन अब अगर कोई ऐसा ही आरोप लगाएगा तो शायद जनता बुरा नहीं मानेगी.

वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर ने ठीक ही लिखा है कि मनमोहन सिंह वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसा कि अमरीकी राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में करते हैं. उन्हें पार्टी की तो चिंता होती है लेकिन वे अपनी छवि की बहुत चिंता नहीं करते क्योंकि उन्हें अगला चुनाव नहीं लड़ना होता.

जिस तरह से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की चर्चा गाहे-बगाहे गांधी परिवार के वफ़ादार करते रहते हैं, उससे मनमोहन सिंह को ये समझने में दिक्क़त नहीं है कि ये उनकी आख़िरी पारी है.

मनमोहन सिंह एक सफल नौकरशाह रहे हैं और प्रधानमंत्री की भूमिका भी वे उसी तरह निभाना चाहते हैं. एक राजनीतिक आंदोलन पर लोकसभा में उनका बयान एक राजनीतिक की तरह नहीं आता, किसी नौकरशाह की तरह ही आता है.

उनके फ़ैसले लेने का ढंग ऐसा है कि नारायणमूर्ति तक को ये कहना पड़ा कि इस सरकार में दो शक्तिकेंद्र हैं इसलिए ये ठीक से चल नहीं पा रही है.

अगर उन्होंने शनिवार को हुई बहस ठीक से सुनी हो तो उन्हें थोड़ा समझ में तो आया ही होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आदर के साथ क्यों लिया जाता है.

लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के पद पर लोग एक राजनेता को देखना चाहते हैं. अनिर्णय में फंसे किसी ऐसे नौकरशाह को नहीं तो अपने लिए किसी आदेश की प्रतीक्षा कर रहा हो.

अभी इस सरकार के इतना समय है कि वह अपनी डगमगाती नैया को भँवर से निकाल ले और इतना ही समय प्रधानमंत्री के पास है कि वे अनिर्णय से निकलकर कुछ ठोस राजनीतिक क़दम उठाएँ.

देश का प्रधानमंत्री मज़रूह सुल्तानपुरी का ये शेर नहीं गुनगुनाता रह सकता....

तुझे न माने कोई तुझको इससे क्या निस्बत
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ताचीनों को

क्योंकि इतिहास बहुत निष्ठुर होता है और वह किसी को माफ़ नहीं करता और जनता सबक सिखाने पर उतर आए तो किसी से सहानुभूति नहीं रखती.

जनसंगठन का कफ़न-दफ़न

राजेश जोशीराजेश जोशी|गुरुवार, 25 अगस्त 2011, 18:58

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पिता के कंधों पर बैठा वो बच्चा अपने हाथों में छोटा सा तिरंगा उठाए था. उसके दोनों गालों पर कूची से तीन रंगों के निशान बनाए गए थे.

ये बच्चा अन्ना हज़ारे के आंदोलन में शरीक था.

लेकिन 'न्यू इंडिया' में इस बच्चे को आप कहीं भी देख सकते हैं: बंबई के वानखेड़े स्टेडियम में आइपीएल मैच की चकाचौंध देखने आई भीड़ में. विश्वकप क्रिकेट का सिरमौर बने इंडिया की जीत का जश्न मनाने सड़कों पर उतरे किसी क्रिकेट प्रेमी पिता के कंधों पर. मदर्स डे या फ़ादर्स डे या फिर जन्माष्टमी के जुलूस में.

अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने कुछ और बदलाव किया हो या नहीं, उत्सव और आंदोलन के बीच के अंतर को मिटा दिया है. उनके अभियान में शरीक लोगों के हाथ में तिरंगा, होठों पर वंदेमातरम् और विचारों में राजनीति के प्रति एक अगंभीर क़िस्म की वितृष्णा महसूस की जा सकती है.

सभी नहीं तो इनमें से बहुत सारे वो लोग भी हैं जो आम तौर पर राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों पर नाक भौं सिकोड़ते हैं और कहते हैं कि हड़तालों और प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए क्योंकि इससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.

इस आंदोलन के समर्थकों में कॉरपोरेट कंपनियों में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं जो सामाजिक मुद्दों पर सड़कों पर उतरना आम तौर पर अपनी तौहीन मानते हैं.

एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी के एक एक्ज़ीक्यूटिव ने मुझे बहुत उत्साहित होकर बताया कि बंगलौर के उनके दफ़्तर में काम करने वाले सभी लोग रोज़ाना शाम को अपने दफ़्तर के बाहर मोमबत्ती जलाकर विरोध प्रदर्शन करते हैं.

मेट्रो ट्रेन में मेरे साथ सफ़र कर रहे एक नौजवान का कहना था कि उसके पिताजी प्रॉपर्टी का धंधा करते हैं और कल ही उन्होंने गैस के दस सिलेंडर रामलीला मैदान पहुँचवाए ताकि 'अन्ना की रसोई' में खाना पकता रहे. यानी प्रॉपर्टी डीलर से लेकर कॉरपोरेट तक सभी अन्नामय हैं.

अन्ना का आंदोलन भारतीय समाज में पिछले बीस वर्षों में आए बदलावों को प्रतिबिंबित करता है. अब जनांदोलनों को जन संगठन नहीं चलाते, 'सिविल सोसाइटी' चलाती है. अब आंदोलन के लिए कंधे पर थैला टाँगे, चना-लाही खाकर दिन-रात लोगों को गोलबंद करने वाले कार्यकर्ता की शायद ज़रूरत नहीं रहेगी. ये काम इंटरनेट, ट्विटर और फ़ेसबुक की मदद से एनजीओ कर रहे हैं. पर्यावरण से लेकर समलैंगिकों के अधिकारों तक और दलित जागरण से लेकर कलाओं के संरक्षण तक - हर सामाजिक गोलबंदी के पीछे एनजीओ होते हैं.

न्यू इंडिया में जनसंगठन या तो ग़ायब हो गए हैं या फिर उनमें से बहुतों ने अपना चेहरा मोहरा और यहाँ तक कि नाम बदल कर एनजीओ का आसान रास्ता अपना लिया है. अब ये संगठन संघर्ष नहीं बल्कि सहकार की वकालत करते नज़र आते हैं. यहाँ तक कि कई संगठनों ने अपने नाम से संघर्ष शब्द ही हटा दिया है. उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी उत्तराखंड लोक वाहिनी बन गई और दिल्ली का झुग्गी झोपड़ी संघर्ष मोर्चा झुग्गी झोपड़ी विकास मोर्चा !

'सिविल सोसाइटी' और जनसंगठन के द्वंद्व में फ़िलहाल जनसंगठन लहूलुहान चित्त पड़ा हुआ है और रामलीला मैदान में उसको गहरा दफ़्न किए जाने का जश्न मनाया जा रहा है.

जनसंगठन का कफ़न-दफ़न

राजेश जोशीराजेश जोशी|गुरुवार, 25 अगस्त 2011, 18:58

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पिता के कंधों पर बैठा वो बच्चा अपने हाथों में छोटा सा तिरंगा उठाए था. उसके दोनों गालों पर कूची से तीन रंगों के निशान बनाए गए थे.

ये बच्चा अन्ना हज़ारे के आंदोलन में शरीक था.

लेकिन 'न्यू इंडिया' में इस बच्चे को आप कहीं भी देख सकते हैं: बंबई के वानखेड़े स्टेडियम में आइपीएल मैच की चकाचौंध देखने आई भीड़ में. विश्वकप क्रिकेट का सिरमौर बने इंडिया की जीत का जश्न मनाने सड़कों पर उतरे किसी क्रिकेट प्रेमी पिता के कंधों पर. मदर्स डे या फ़ादर्स डे या फिर जन्माष्टमी के जुलूस में.

अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने कुछ और बदलाव किया हो या नहीं, उत्सव और आंदोलन के बीच के अंतर को मिटा दिया है. उनके अभियान में शरीक लोगों के हाथ में तिरंगा, होठों पर वंदेमातरम् और विचारों में राजनीति के प्रति एक अगंभीर क़िस्म की वितृष्णा महसूस की जा सकती है.

सभी नहीं तो इनमें से बहुत सारे वो लोग भी हैं जो आम तौर पर राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों पर नाक भौं सिकोड़ते हैं और कहते हैं कि हड़तालों और प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए क्योंकि इससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.

इस आंदोलन के समर्थकों में कॉरपोरेट कंपनियों में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं जो सामाजिक मुद्दों पर सड़कों पर उतरना आम तौर पर अपनी तौहीन मानते हैं.

एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी के एक एक्ज़ीक्यूटिव ने मुझे बहुत उत्साहित होकर बताया कि बंगलौर के उनके दफ़्तर में काम करने वाले सभी लोग रोज़ाना शाम को अपने दफ़्तर के बाहर मोमबत्ती जलाकर विरोध प्रदर्शन करते हैं.

मेट्रो ट्रेन में मेरे साथ सफ़र कर रहे एक नौजवान का कहना था कि उसके पिताजी प्रॉपर्टी का धंधा करते हैं और कल ही उन्होंने गैस के दस सिलेंडर रामलीला मैदान पहुँचवाए ताकि 'अन्ना की रसोई' में खाना पकता रहे. यानी प्रॉपर्टी डीलर से लेकर कॉरपोरेट तक सभी अन्नामय हैं.

अन्ना का आंदोलन भारतीय समाज में पिछले बीस वर्षों में आए बदलावों को प्रतिबिंबित करता है. अब जनांदोलनों को जन संगठन नहीं चलाते, 'सिविल सोसाइटी' चलाती है. अब आंदोलन के लिए कंधे पर थैला टाँगे, चना-लाही खाकर दिन-रात लोगों को गोलबंद करने वाले कार्यकर्ता की शायद ज़रूरत नहीं रहेगी. ये काम इंटरनेट, ट्विटर और फ़ेसबुक की मदद से एनजीओ कर रहे हैं. पर्यावरण से लेकर समलैंगिकों के अधिकारों तक और दलित जागरण से लेकर कलाओं के संरक्षण तक - हर सामाजिक गोलबंदी के पीछे एनजीओ होते हैं.

न्यू इंडिया में जनसंगठन या तो ग़ायब हो गए हैं या फिर उनमें से बहुतों ने अपना चेहरा मोहरा और यहाँ तक कि नाम बदल कर एनजीओ का आसान रास्ता अपना लिया है. अब ये संगठन संघर्ष नहीं बल्कि सहकार की वकालत करते नज़र आते हैं. यहाँ तक कि कई संगठनों ने अपने नाम से संघर्ष शब्द ही हटा दिया है. उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी उत्तराखंड लोक वाहिनी बन गई और दिल्ली का झुग्गी झोपड़ी संघर्ष मोर्चा झुग्गी झोपड़ी विकास मोर्चा !

'सिविल सोसाइटी' और जनसंगठन के द्वंद्व में फ़िलहाल जनसंगठन लहूलुहान चित्त पड़ा हुआ है और रामलीला मैदान में उसको गहरा दफ़्न किए जाने का जश्न मनाया जा रहा है.

जनसंगठन का कफ़न-दफ़न

राजेश जोशीराजेश जोशी|गुरुवार, 25 अगस्त 2011, 18:46

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पिता के कंधों पर बैठा वो बच्चा अपने हाथों में छोटा सा तिरंगा उठाए था. उसके दोनों गालों पर कूची और रंगों से छोटे छोटे तिरंगे बनाए गए थे.

ये बच्चा अन्ना हज़ारे के आंदोलन में शरीक था.

लेकिन 'न्यू इंडिया' में इस बच्चे को आप कहीं भी देख सकते हैं: बंबई के वानखेड़े स्टेडियम में आइपीएल मैच की चकाचौंध देखने आई भीड़ में. विश्वकप क्रिकेट का सिरमौर बने इंडिया की जीत का जश्न मनाने सड़कों पर उतरे किसी क्रिकेट प्रेमी पिता के कंधों पर. मदर्स डे या फ़ादर्स डे या फिर जन्माष्टमी के जुलूस में.

अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने कुछ और बदलाव किया हो या नहीं, उत्सव और आंदोलन के बीच के अंतर को मिटा दिया है. उनके अभियान में शरीक लोगों के हाथ में तिरंगा, होठों पर वंदेमातरम् और विचारों में राजनीति के प्रति एक अगंभीर क़िस्म की वितृष्णा महसूस की जा सकती है.

सभी नहीं तो इनमें से बहुत सारे वो लोग भी हैं जो आम तौर पर राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों पर नाक भौं सिकोड़ते हैं और कहते हैं कि हड़तालों और प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए क्योंकि इससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.

इस आंदोलन के समर्थकों में कॉरपोरेट कंपनियों में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं जो सामाजिक मुद्दों पर सड़कों पर उतरना आम तौर पर अपनी तौहीन मानते हैं.

एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी के एक एक्ज़ीक्यूटिव ने मुझे बहुत उत्साहित होकर बताया कि बंगलौर के उनके दफ़्तर में काम करने वाले सभी लोग रोज़ाना शाम को अपने दफ़्तर के बाहर मोमबत्ती जलाकर विरोध प्रदर्शन करते हैं.

मेट्रो ट्रेन में मेरे साथ सफ़र कर रहे एक नौजवान का कहना था कि उसके पिताजी प्रॉपर्टी का धंधा करते हैं और कल ही उन्होंने गैस के दस सिलेंडर रामलीला मैदान पहुँचवाए ताकि 'अन्ना की रसोई' में खाना पकता रहे. यानी प्रॉपर्टी डीलर से लेकर कॉरपोरेट तक सभी अन्नामय हैं.

अन्ना का आंदोलन भारतीय समाज में पिछले बीस वर्षों में आए बदलावों को प्रतिबिंबित करता है. अब जनांदोलनों को जन संगठन नहीं चलाते, 'सिविल सोसाइटी' चलाती है. अब आंदोलन के लिए कंधे पर थैला टाँगे, चना-लाही खाकर दिन-रात लोगों को गोलबंद करने वाले कार्यकर्ता की शायद ज़रूरत नहीं रहेगी. ये काम इंटरनेट, ट्विटर और फ़ेसबुक की मदद से एनजीओ कर रहे हैं. पर्यावरण से लेकर समलैंगिकों के अधिकारों तक और दलित जागरण से लेकर कलाओं के संरक्षण तक - हर सामाजिक गोलबंदी के पीछे एनजीओ होते हैं.

न्यू इंडिया में जनसंगठन या तो ग़ायब हो गए हैं या फिर उनमें से बहुतों ने अपना चेहरा मोहरा और यहाँ तक कि नाम बदल कर एनजीओ का आसान रास्ता अपना लिया है. अब ये संगठन संघर्ष नहीं बल्कि सहकार की वकालत करते नज़र आते हैं. यहाँ तक कि कई संगठनों ने अपने नाम से संघर्ष शब्द ही हटा दिया है. उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी उत्तराखंड लोक वाहिनी बन गई और दिल्ली का झुग्गी झोपड़ी संघर्ष मोर्चा झुग्गी झोपड़ी विकास मोर्चा !

'सिविल सोसाइटी' और जनसंगठन के द्वंद्व में फ़िलहाल जनसंगठन लहूलुहान चित्त पड़ा हुआ है और रामलीला मैदान में उसको गहरा दफ़्न किए जाने का जश्न मनाया जा रहा है.

दिग्भ्रमित मध्यम वर्ग?

भारत का मध्यम वर्ग उस मछली की तरह है जो पानी के गंदा होने की शिकायत करते-करते उसके बिना रहने की बात करने लगा है. भारत में भ्रष्टाचार रहित शहरी जीवन की कल्पना करने पर लगता है कि मानो व्यवस्था ही ख़त्म हो जाएगी.

भ्रष्टाचार के बिना जीवन बहुत कठिन होता है. अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है, पूरे टैक्स भरने पड़ते हैं, बिना पढ़े-लिखे पीएचडी नहीं मिलती, सिफ़ारिश नहीं चलती, सबसे तकलीफ़देह बात ये कि जेब में पैसे होने के बावजूद हर चीज़ नहीं ख़रीदी जा सकती...

भ्रष्टाचार करोड़ों लोगों की रगों में बह रहा है, भारत में सबसे ज़्यादा लोगों को रोज़गार देने वाला उद्यम भारतीय रेल या कोल इंडिया नहीं है बल्कि ईश्वर की तरह सर्वव्यापी भ्रष्टाचार है.

अन्ना सही हैं या ग़लत इस बहस को एक तरफ़ रखकर सोचना चाहिए कि अगर अन्ना का आंदोलन सफल हो गया तो उन्हें ही सबसे बड़ा झटका लगेगा जो लोग सबसे बुलंद आवाज़ में नारे लगा रहे हैं और ट्विट कर रहे हैं.

इस आंदोलन के समर्थन में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो राजनीतिक भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं और उन्हें लगता है कि जन-लोकपाल बिल से सिर्फ़ नेताओं की कमाई बंद होगी, उनका जीवन यूँ ही चलता रहेगा.

जैसे मिलावट करने वाले दान भी करते हैं, पाप करने वाले गंगा नहाते हैं, उसी तरह बहुत से लोग भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मोमबत्तियाँ जला रहे हैं, इससे मन को शांति मिलती है, ग्लानि मोम की तरह पिघलकर बह जाती है.

अन्ना हज़ारे को इस बात श्रेय ज़रूर मिलना चाहिए कि उन्होंने भ्रष्टाचार को बहस का इतना बड़ा मुद्दा बना दिया है, हो सकता है कि यह एक बड़े आंदोलन की शुरूआत हो लेकिन अभी तो भावुक नारेबाज़ी, गज़ब की मासूमियत और हास्यास्पद ढोंग ही दिखाई दे रहा है.

नेताओं का भ्रष्टाचार ग्लोबल वर्ल्ड में शर्मिंदगी का कारण बनता है, बिना लाइसेंस के कार चलाने पर पुलिसवाला पाँच सौ रुपए ऐंठ लेता है, ये दोनों बुरी बातें हैं, ये बंद होना चाहिए, क्या मध्यम वर्ग में सिर्फ़ मोमबत्ती जलाने वाले सज्जन लोग हैं जो दोनों तरफ़ से पिस रहे हैं?

भ्रष्ट तरीक़े अपनाकर पैसा या रसूख हासिल करने वाले लोगों के प्रति सम्मान का भाव जब तक ख़त्म नहीं होगा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ असली लड़ाई शुरू नहीं होगी.

भ्रष्टाचार और ईमानदारी

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 18 अगस्त 2011, 00:18

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हाथ में तिरंगा झंडा लेकर सड़कों पर भारत माता की जय करने में मज़ा बहुत आता है. उस पर भी जब ट्रैफिक वाला न टोके और पुलिस वाला रास्ता दे दे तो क्या ही कहने..

सच में लगता है किला फतह हो गया. रात के साढ़े नौ बजे ऑफिस आते समय ऐसे ही नज़ारे देखता हुआ आया हूं. बाइकों पर बिना हेलमेट नौजवान. उन्हें पता है हाथ में आज तिरंगा है या अन्ना की तस्वीर है तो कोई ट्रैफिक वाला रोकने की हिम्मत नहीं करेगा.

मुझे भी भ्रष्टाचार से बहुत समस्या है. मैं भी इसका विरोध करता हूं लेकिन इंडिया गेट पर अन्ना के समर्थन में नहीं जाऊंगा मैं क्योंकि मुझे पता है कि ज़रुरत पड़ी तो मैं फिर से अपना काम घूस देकर करवाऊंगा.

चाहे बच्चे का एडमिशन हो या गैस का कनेक्शन. स्कूल के टीचर और कनेक्शन देने वाला भले ही इंडिया गेट पर हो लेकिन एडमिशन या कनेक्शन देते समय वो बिना जेब गर्म किए काम नहीं करेगा.

मैं चाहता हूं कि मैं ईमानदार हो जाऊं अपने प्रति...अन्ना के प्रति नहीं. ऐसा नहीं है कि भारत में सारे लोग ही भ्रष्ट हो गए हैं और ऐसा भी नहीं है कि जनलोकपाल से सारा भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा. बात ईमानदारी बरतने की है. अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब में कितने लोग ईमानदारी से कह सकते हैं कि वो अपना कोई भी काम बिना घूस दिए या लिए नहीं करेंगे.

हाथ में तिरंगा ले लेने से और भारत माता के जयकारे लगाने से कोई ईमानदार नहीं हो जाता. ईमानदारी जीवन में रचने-बसने की चीज़ होती है और ईमानदार का जीवन कठिन होता है.

हमारे एक परिचित सरकारी अधिकारी हैं. बिचारे ईमानदार हैं. उनके ख़िलाफ़ उच्च स्तर पर शिकायत की गई है और ट्रांसफर किए जाने का ख़तरा मंडराता रहता है उनके सर पर. लेकिन वो फिर भी ईमानदार हैं. भारत ऐसे ही लोगों से चल रहा है.

तिरंगा लहराने वालों से नहीं.

इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना को विरोध करने का हक है और उनसे साथ सरकार का बर्ताव अत्यंत ख़राब ही कहा जा सकता है. दो बार सरकार बनाने वाली कांग्रेस के मंत्रियों का अहंकार किसी से छुपा नहीं है.

भ्रष्टाचार को लेकर आम लोगों की नाराज़गी भी किसी से छुपी नहीं है लेकिन एक ऐसा माहौल बन रहा है जिसमें कोई अपनी आलोचना बर्दाश्त करने को तैयार नहीं. न सरकार न अन्ना और न ही तिरंगा उठा कर टीवी कैमरों को देख कर उन्माद में आने वाला मध्य वर्ग.

रही बात जनलोकपाल बिल की या किसी भी और बिल की तो बिल से समस्याएं जड़ से नहीं ख़त्म हो जातीं. दहेज़ प्रथा, जाति प्रथा और न जाने कितनी बुराइयों के ख़िलाफ़ कड़े क़ानून बने है लेकिन क्या ये ख़त्म हो गए.

अगर ये खत्म हो जाते तो देश के जाने माने अख़बारों में अपनी जाति की लड़की-लड़का खोजे जाने के बड़े बड़े विज्ञापन नहीं आते और आज भी लाखों रुपए दहेज़ नहीं दिया जाता.

लोकतंत्र की रक्षा किसका काम है?

विनोद वर्माविनोद वर्मा|रविवार, 14 अगस्त 2011, 13:17

टिप्पणियाँ (40)

लोकतंत्र की रक्षा किस विभाग का काम है?

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अन्ना हज़ारे से कहा है कि वे अपनी शिकायत उचित दफ़्तर के समक्ष रखें.

आपको पता ही होगा अन्ना अनशन की जगह देने के लिए दिल्ली पुलिस की शर्तों से नाराज़ थे और उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर शिकायत की थी.

उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा था कि सरकार लोकतंत्र की हत्या कर रही है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है. उन्होंने प्रधानमंत्री को हिम्मत दिखाने की चुनौती दी थी और पूछा था कि वे क्या मुंह लेकर लालक़िले में झंडा फहराएँगे.

प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के मातहत आने वाली दिल्ली पुलिस के बारे में कहा है कि ये उनके कार्यालय के दायरे में नहीं आता. याद नहीं आता कि इतनी साफ़गोई से बात करने वाला कोई प्रधानमंत्री इससे पहले हमें मिला था.

टेलीकॉम के घोटाले के समय भी उन्होंने कहा था कि ये मेरे मंत्रालय का मामला नहीं. वो वित्त मंत्रालय और संचार मंत्रालय के बीच का मामला है. राष्ट्रमंडल खेल भी उनके विभाग का मामला नहीं था. वो खेल मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और दिल्ली की कांग्रेस सरकार का मामला था.

अब अन्ना हज़ारे के सामने अनशन की जगह से भी बड़ा संकट ये है कि वे देश की राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र की हत्या की शिकायत करना चाहते हैं तो कौन से विभाग के समक्ष जाया जाए.

अगर उन्हें ये शिकायत करनी हो कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है तो किससे जाकर कहें?

इसके बाद जनता को भी सोचना होगा कि बात-बेबात प्रधानमंत्री को परेशान किया जाए या नहीं. अगर महंगाई से मर रहे हैं तो वित्तमंत्री से कहिए, प्रधानमंत्री कार्यालय का इससे क्या लेना देना? अगर जनता ग़रीबी और भूख से त्रस्त है तो उसे कृषि मंत्रालय या योजना आयोग आदि के पास जाना चाहिए.

अब देखना होगा कि नक्सली समस्या को देश की सबसे बड़ी समस्या बताकर प्रधानमंत्री ने किसी और के विभाग में दखलंदाज़ी तो नहीं की थी.

ध्यान में ये भी रखना होगा कि जब वे लालक़िले से भाषण देंगे तो सोचकर बोलें कि वे किसके विभाग की बात कर रहे हैं और क्यो कर रहे हैं.

रहा सवाल कि वे किस मुंह से झंडा फ़हराएँगे तो इसका जवाब कांग्रेस से मांगना होगा क्योंकि वे तो कांग्रेस का चेहरा हैं. सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद न लेने का जो महान त्याग दिखाया था उसके बाद सरकार के लिए उन्होंने ही ये चेहरा तलाश किया था. तो एक तरह से ही वो सोनिया गांधी का ही चेहरा लेकर झंडा फहराएँगे. तो अगर सोचना है तो सोनिया गांधी और उनकी कांग्रेस सोचे.

अन्ना हज़ारे जो चाहते हैं वह देश का हर नागरिक चाहता है. भ्रष्टाचार ख़त्म हो और जवाबदेही आए इससे अच्छा भला और क्या हो सकता है?

समस्या सिर्फ़ ये है कि ये उस तरह से नहीं हो सकता जिस तरह से अन्ना हज़ारे चाहते हैं.

मैं मानता हूँ कि चाहे जैसे भी लोग हमारे संसद में हों, चाहे राजनीतिक पार्टियाँ जैसी भी हों, चाहे बहुत से राजनेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हों, लेकिन हमें कोई ऐसा रास्ता अख़्तियार नहीं करना चाहिए जिससे कि हमारा लोकतंत्र कमज़ोर पड़ता दिखता हो.

चाहे सरकार अन्ना हज़ारे और उनके सहयोगियों से सहमत हो या न हो, उनके शांतिपूर्ण अनशन के लोकतांत्रिक अधिकारों को नहीं छीना जाना चाहिए. अन्ना को अनशन की जगह देने में सरकार जो आनाकानी कर रही है वह भी लोकतंत्र को कमज़ोर करने की साज़िश की तरह दिखती है.

लोकतंत्र की रक्षा हमारा पहला और अंतिम दायित्व होना चाहिए क्योंकि वह हमारा अपना तंत्र है, जनता का तंत्र है. ये बात प्रधानमंत्री को भी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि वे प्रधानमंत्री इसी जनता के हैं और लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व उनका भी है और हम सबसे अधिक है.

प्रधानमंत्री ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि लोकतंत्रित मूल्यों की रक्षा के लिए उचित विभाग में गुहार लगाइए.

लंदन से एक पाती

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|शनिवार, 06 अगस्त 2011, 20:30

टिप्पणियाँ (15)

दिल्ली में रहनेवाले मेरे प्यारे दोस्त,

लंदन के ट्रैफ़ेलगर स्क्वायर का नाम सुना है ना, देखा भी होगा, हिंदी फ़िल्मों में अक्सर दिखता है, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे के शुरू में ही अमरीश पुरी वहाँ कबूतरों को चुग्गा डालते दिखाई देते हैं.

उसी ट्रैफ़ेलगर स्क्वायर पर इन दिनों एक घड़ी लगी है, उसमें उल्टी गिनती चल रही है, अगले साल होनेवाले ओलंपिक खेलों की, बीते सप्ताह, बुधवार की शाम वहाँ दिन घटकर रह गए - 365 - यानी ठीक एक साल बाद लंदन में ओलंपिक खेल होंगे.

अब जबकि एक साल रह गए हैं, चर्चा ये नहीं हो रही कि स्टेडियम समय पर बनेंगे कि नहीं, जो बनने हैं उनमें से अधिकतर बन चुके हैं, कई खेल तो पुरानी जगहों पर होंगे, जैसे लॉर्ड्स में, जहाँ बैट और बॉल की जंग होती है, वहाँ तीर-धनुष से निशाना लगेगा, फिर टेनिस के लिए विंबलडन तो है ही...

चिंता स्टेडियमों के ख़ाली रहने की भी नहीं है, टिकट जमकर बिके हैं, चिंता तो उल्टी है, कि लोगों को टिकट नहीं मिल रहे.

मगर असल चिंता दूसरी बातों पर है - कि कहीं एथेंस, अटलांटा और बीजिंग की तरह सफेद हाथी को बुला लेने और फिर तमाशा ख़त्म होने के बाद सिर धुनने की नौबत तो नहीं आएगी - बजट पहले ही जितना अनुमान था उससे तिगुना हो चुका है.

सवाल ये भी उठ रहे हैं कि ये जो दो हफ़्ते की बारात सजेगी उसका आम लोगों को क्या फ़ायदा होगा - क्या नई पीढ़ी में खेल को लेकर नई ऊर्जा जगेगी? क्या पूर्वी लंदन के जिस उपेक्षित इलाक़े में निवेश हो रहा है, उससे वहाँ की तस्वीर बेशक बदल जाए, लोगों की ज़िंदगियों में स्थायी बदलाव आएगा? खेलगाँव में एथलीटों-अधिकारियों के ठहरने के लिए जो फ़्लैट बन रहे हैं, जिनको खेल के बाद बेचा जाएगा, उसमें कितने साधारण लंदनवासी रहेंगे?

तो यही सब चर्चा हो रही है - अब तुम बताओ?

दिल्ली में तो पिछले साल बड़ा ग़ज़ब का खेल हुआ, खेल के कुछ दिन पहले पुल ज़रूर टूट गया, लेकिन अंत होते-होते जलवा दिखा ही दिया दिल्ली ने.

पर अब कैसा है सब? घोटाला-डोपिंग ये सब तो ख़बरों में आता रहता है, मगर दूसरी बातों का क्या हाल है? नई पीढ़ी बैट-बॉल छोड़ कुछ और खेलती नज़र आती है? खेलगाँव के फ़्लैट, साधारण लोगों को भी मिले? बताना.

लंदन से तुम्हारा दोस्त

तथ्य सुधारः मूल ब्लॉग में दूसरी पंक्ति में फ़िल्म का नाम 'कुछ-कुछ होता है' लिखा गया था, जिसे सुधार कर 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' किया गया

उम्मीद का दूसरा नाम

विनोद वर्माविनोद वर्मा|गुरुवार, 04 अगस्त 2011, 12:36

टिप्पणियाँ (18)

'उम्मीद का दूसरा नाम' दरअसल अशोक वाजपेयी के कविता संग्रह का नाम है.

प्रगतिशील कहलाने वाले बहुत से लोग कहते हैं कि अशोक वाजपेयी के लिए उम्मीद का दूसरा, तीसरा और चौथा नाम भी अगर कुछ है तो वह कलावादी ही है.

बहुत से कलावादी कहलाने वाले जनवादियों का यह कहकर मज़ाक उड़ाते हैं कि उनके लिए उम्मीद का दूसरा नाम क्रांति ही है जो कभी संभव नहीं.

चाहे जो हो, इससे ये तो उम्मीद बंधती ही है कि हर व्यक्ति के लिए उम्मीद का एक दूसरा नाम होता होगा.

पति के लिए उम्मीद का दूसरा नाम प्रेमिका हो सकती है लेकिन पत्नी के लिए उम्मीद का दूसरा नाम मौजूदा पति का सुधर जाना या बेहतर हो जाना होगा.

मध्यमवर्गीय लोगों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम महंगाई का कम हो जाना, बेहतर तनख़्वाह वाली नौकरी और बच्चों का पढ़ लिखकर अपने बाप से बेहतर हो जाना है. उसकी उम्मीद के नामों में किसी दिन भ्रष्टाचार का कम हो जाना और साफ़ सुथरी छवि वाले नेताओं का विधानसभाओं और संसद में बैठा होना भी होगा शायद.

अमीरों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम और अमीर हो जाने के अलावा क्या हो सकता है भला?

मीडिया, ख़ासकर भारतीय टेलीविज़न के लिए उम्मीद का दूसरा नाम निरंतर चलने वाला ऐसा तमाशा है जिसके सामने कैमरा लगा दो और बाक़ी सब तमाशबीन ख़ुद कर ले. जैसे कि अन्ना का अनशन, रामदेव की रामलीला, प्रिंस का गड्ढे में गिर जाना और मटुकनाथ की प्रेमिका का उनकी बीवी के हाथों पिटना आदि कुछ भी.

लेकिन उम्मीद के सबसे दिलचस्प दूसरे नाम उनके पास हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान के क़रीब हैं.

विधायकों और सांसदों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम पहले अपनी पार्टी की सरकार है फिर ख़ुद का मंत्री बनना है.

जो मंत्री बन गए हैं उनके लिए उम्मीद का दूसरा नाम बेल्लारी, 2जी स्पैक्ट्रम, कॉमनवेल्थ जैसा कोई आयोजन आदि हो सकता है.

लेकिन उम्मीदों के सबसे अधिक नाम शायद ग़रीबों के पास होंगे क्योंकि उसमें कभी दो जून की रोटी है, कभी तन ढंकने को कपड़ा है, कभी सर छिपाने की जगह है, कभी बीमार के लिए दवा है तो कभी जीने का अधिकार भर है.

बाक़ी सारी उम्मीदें फिर भी अपने दूसरे नाम का अर्थ पा लेंगीं सिर्फ़ ग़रीबों के लिए ही कोई उम्मीद नहीं दिखती.

खान और खदान

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 01 अगस्त 2011, 14:11

टिप्पणियाँ (12)

खान हूं खदान हूं
येदियुरप्पा की आन हूं
कोड़ा की शान हूं
रेड्डी बंधुओं की जान हूं

मैं खान हूं खदान हूं. मेरे नाम के आगे कुछ भी लगा दीजिए कोयला, लोहा, अभ्रक, यूरेनियम काम मेरा वही रहता है. ज़मीन के नीचे ऊपर जहां कहीं लोगों को ज़रुरत होती है वो मुझे खोज लेते हैं फिर खोद डालते हैं. जब मेरी जान निकल जाती है तो मुझे छोड़ जाते हैं.

मुझे इस बात का दुःख नहीं होता था क्योंकि मैं देश के काम आ रही थी. प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री मेरी देख रेख करते थे. अब कहीं कहीं सरकारी हूं और कई जगहों पर निजी कंपनियों के कब्ज़े में हूं. मेरी गोद में कई मज़दूर पले बढ़े और चिरनिद्रा में सोए भी. ये वही मज़दूर हैं जो हमेशा से मजबूर हैं...जंगलों के बीच पड़े. सभ्यता से दूर हैं.

लेकिन अब मैं दुःखी हूं क्योंकि अब मेरा इस्तेमाल देश के लिए नहीं बल्कि कुछ नेताओं के लिए होने लगा है. मुझे भ्रष्टाचार का एक बड़ा ज़रिया बना दिया गया है.चाहे झारखंड हो या कर्नाटक खान और खदान बदनाम हो रहे हैं.

झारखंड में तो मैं बिल्कुल फैली हुई है. ज़मीन के हर टुकड़े में हूं मैं लेकिन राज्य के काम नहीं आती. जिसे जब मन होता है एक पट्टा दे देता है खोद लो और अपना काम निकाल लो.

मैं भ्रष्ट नहीं हूं लेकिन मेरे कारण लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो रहे हैं. पिछले हफ्ते कर्नाटक के लोकायुक्त ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि अवैध खनन हो रहा है और करोड़ों का नुकसान हुआ है.

मुझे इसका दुःख होता है क्योंकि मैं तो देश की संपत्ति हूं किसी की निजी संपत्ति नहीं. मेरा दुःख मीडिया के पल्ले भी नहीं पड़ता. खैर मीडिया के बारे में क्या कहूं. मीडिया के एक बड़े हिस्से को न तो किसान दिखते हैं न गरीब दिखते है तो फिर खान और ख़ान मज़दूर कैसे दिखेंगे.

हां लेकिन मुझे इस देश के लोगों से उम्मीद है कि वो खानों को, किसानों को और जवानों को नहीं भूलेंगे क्योंकि इन तीनों ने देश के लिए बड़ी कुर्बानियां दी हैं.

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