प्रधानमंत्री की छवि पर मंडराता साया
कवि विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है कि 'सत्ता का रास्ता जनता को हटाकर बनता है.' लेकिन पिछले पंद्रह दिनों में जनता ने सत्ता को थोड़ा सा हटाकर अपना रास्ता बनाया है.
सत्ता ताक़तवर होती है. उसे अपने होने का बहुत ग़ुरूर होता है. इसलिए शायद वह स्वीकार न करे कि ऐसा हुआ है.
ये बहसें होती रहेंगी कि अन्ना हज़ारे का आंदोलन सही था या ग़लत. इससे जीत मिली या नहीं. अगर जीत मिली तो आधी थी या इसे जीत का एक पड़ाव मानना चाहिए. लेकिन इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकती कि इसने एक ऐसे शख़्स की धज बिगाड़ दी, जो विवादों से और शंकाओं से परे था.
और वो शख़्स प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा कौन हो सकता है.
एक बरस पहले तक वे इस सरकार के माथे के मुकुट थे. सरकार के धुर विरोधी भी इस ऐहतियात के साथ आरोप लगाते थे कि वे प्रधानमंत्री पर आरोप नहीं लगा रहे हैं और वे एक निहायत ही सीधे-सादे और ईमानदार व्यक्ति हैं.
लेकिन पिछले एक बरस ने इस छवि को निर्ममता के साथ बदल दिया है. ऐसा नहीं है कि उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन लोग महसूस कर रहे हैं कि वे बेईमानी को रोक नहीं पाए.
टेलीक़ॉम घोटाले से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले तक जो बयान प्रधानमंत्री ने दिए वे एक-एक करके ग़लत साबित हुए हैं. उन्होंने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम में कोई घोटाला नहीं हुआ लेकिन उन्ही के मातहत काम करने वाली सीबीआई ने उनके एक मंत्री और उनके सहयोगी दल की एक सांसद को जेल में डाल रखा है और उनकी ज़मानत तक नहीं होने दे रही है.
राष्ट्रमंडल खेलों में धांधली पर भी उनकी अपनी पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य अपने कई सहयोगियों के साथ तिहाड़ की रोटियाँ खा रहे हैं.
अगर निकली हुई बात सचमुच दूर तक गई तो नोट के बदले वोट वाले मामले में भी उनकी किरकिरी हो सकती है. भले ही अभी आरोप पत्र अमर सिंह और भाजपा के सांसदों के ख़िलाफ़ हो लेकिन जो कुछ हुआ वह उनकी सरकार को बचाने के लिए ही तो था.
अन्ना हज़ारे के जनलोकपाल के मामले में उनकी सरकार ने एक के बाद एक जिस तरह से फ़ैसले लिए, उसने एकबारगी उनकी राजनीतिक समझ पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.
एक आंदोलन जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ था, उसे मनमोहन सिंह की सरकार ने अपनी नासमझी से अपनी सरकार के ख़िलाफ़ बना लिया. अपने शुरुआती भाषणों में ही अन्ना हज़ारे ने कहा था कि वे किसी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं करते क्योंकि उनका अनुभव है कि अगर ये सरकार भ्रष्टाचार में ग्रैजुएट है तो अगली सरकार डॉक्टरेट होगी. चोर की दाढ़ी में तिनका मुहावरा शायद ऐसे ही मौक़ों के लिए बना होगा.
वर्ष 2009 के चुनाव के बाद विश्लेषकों ने कहा था कि मनमोहन सिंह ही यूपीए के तारणहार साबित हुए हैं. उन्होंने ये भी कहा कि अगर लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें 'निकम्मा प्रधानमंत्री' न कहा होता तो एनडीए को इतना नुक़सान नहीं होता.
अब लालकृष्ण आडवाणी या किसी और नेता में वही पुराना आरोप दुहराने की हिम्मत नहीं है लेकिन अब अगर कोई ऐसा ही आरोप लगाएगा तो शायद जनता बुरा नहीं मानेगी.
वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर ने ठीक ही लिखा है कि मनमोहन सिंह वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसा कि अमरीकी राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में करते हैं. उन्हें पार्टी की तो चिंता होती है लेकिन वे अपनी छवि की बहुत चिंता नहीं करते क्योंकि उन्हें अगला चुनाव नहीं लड़ना होता.
जिस तरह से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की चर्चा गाहे-बगाहे गांधी परिवार के वफ़ादार करते रहते हैं, उससे मनमोहन सिंह को ये समझने में दिक्क़त नहीं है कि ये उनकी आख़िरी पारी है.
मनमोहन सिंह एक सफल नौकरशाह रहे हैं और प्रधानमंत्री की भूमिका भी वे उसी तरह निभाना चाहते हैं. एक राजनीतिक आंदोलन पर लोकसभा में उनका बयान एक राजनीतिक की तरह नहीं आता, किसी नौकरशाह की तरह ही आता है.
उनके फ़ैसले लेने का ढंग ऐसा है कि नारायणमूर्ति तक को ये कहना पड़ा कि इस सरकार में दो शक्तिकेंद्र हैं इसलिए ये ठीक से चल नहीं पा रही है.
अगर उन्होंने शनिवार को हुई बहस ठीक से सुनी हो तो उन्हें थोड़ा समझ में तो आया ही होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आदर के साथ क्यों लिया जाता है.
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के पद पर लोग एक राजनेता को देखना चाहते हैं. अनिर्णय में फंसे किसी ऐसे नौकरशाह को नहीं तो अपने लिए किसी आदेश की प्रतीक्षा कर रहा हो.
अभी इस सरकार के इतना समय है कि वह अपनी डगमगाती नैया को भँवर से निकाल ले और इतना ही समय प्रधानमंत्री के पास है कि वे अनिर्णय से निकलकर कुछ ठोस राजनीतिक क़दम उठाएँ.
देश का प्रधानमंत्री मज़रूह सुल्तानपुरी का ये शेर नहीं गुनगुनाता रह सकता....
तुझे न माने कोई तुझको इससे क्या निस्बत
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ताचीनों को
क्योंकि इतिहास बहुत निष्ठुर होता है और वह किसी को माफ़ नहीं करता और जनता सबक सिखाने पर उतर आए तो किसी से सहानुभूति नहीं रखती.




