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उम्मीद का दूसरा नाम

विनोद वर्माविनोद वर्मा|गुरुवार, 04 अगस्त 2011, 12:36 IST

'उम्मीद का दूसरा नाम' दरअसल अशोक वाजपेयी के कविता संग्रह का नाम है.

प्रगतिशील कहलाने वाले बहुत से लोग कहते हैं कि अशोक वाजपेयी के लिए उम्मीद का दूसरा, तीसरा और चौथा नाम भी अगर कुछ है तो वह कलावादी ही है.

बहुत से कलावादी कहलाने वाले जनवादियों का यह कहकर मज़ाक उड़ाते हैं कि उनके लिए उम्मीद का दूसरा नाम क्रांति ही है जो कभी संभव नहीं.

चाहे जो हो, इससे ये तो उम्मीद बंधती ही है कि हर व्यक्ति के लिए उम्मीद का एक दूसरा नाम होता होगा.

पति के लिए उम्मीद का दूसरा नाम प्रेमिका हो सकती है लेकिन पत्नी के लिए उम्मीद का दूसरा नाम मौजूदा पति का सुधर जाना या बेहतर हो जाना होगा.

मध्यमवर्गीय लोगों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम महंगाई का कम हो जाना, बेहतर तनख़्वाह वाली नौकरी और बच्चों का पढ़ लिखकर अपने बाप से बेहतर हो जाना है. उसकी उम्मीद के नामों में किसी दिन भ्रष्टाचार का कम हो जाना और साफ़ सुथरी छवि वाले नेताओं का विधानसभाओं और संसद में बैठा होना भी होगा शायद.

अमीरों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम और अमीर हो जाने के अलावा क्या हो सकता है भला?

मीडिया, ख़ासकर भारतीय टेलीविज़न के लिए उम्मीद का दूसरा नाम निरंतर चलने वाला ऐसा तमाशा है जिसके सामने कैमरा लगा दो और बाक़ी सब तमाशबीन ख़ुद कर ले. जैसे कि अन्ना का अनशन, रामदेव की रामलीला, प्रिंस का गड्ढे में गिर जाना और मटुकनाथ की प्रेमिका का उनकी बीवी के हाथों पिटना आदि कुछ भी.

लेकिन उम्मीद के सबसे दिलचस्प दूसरे नाम उनके पास हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान के क़रीब हैं.

विधायकों और सांसदों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम पहले अपनी पार्टी की सरकार है फिर ख़ुद का मंत्री बनना है.

जो मंत्री बन गए हैं उनके लिए उम्मीद का दूसरा नाम बेल्लारी, 2जी स्पैक्ट्रम, कॉमनवेल्थ जैसा कोई आयोजन आदि हो सकता है.

लेकिन उम्मीदों के सबसे अधिक नाम शायद ग़रीबों के पास होंगे क्योंकि उसमें कभी दो जून की रोटी है, कभी तन ढंकने को कपड़ा है, कभी सर छिपाने की जगह है, कभी बीमार के लिए दवा है तो कभी जीने का अधिकार भर है.

बाक़ी सारी उम्मीदें फिर भी अपने दूसरे नाम का अर्थ पा लेंगीं सिर्फ़ ग़रीबों के लिए ही कोई उम्मीद नहीं दिखती.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:50 IST, 04 अगस्त 2011 vivek kumar pandey:

    ग़रीबों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम अन्ना हज़ारे है. नेताओं के लिए मुसीबत का दूसरा नाम अन्ना हज़ारे है. अन्ना हज़ारे का समर्थन किया जाना चाहिए. रचनात्मक ब्लॉग लिखने के लिए शुक्रिया.

  • 2. 14:40 IST, 04 अगस्त 2011 BHEEMAL Dildar nagar:

    मान्यवर वर्मा जी, काफ़ी सुथरा, सुधरा-सा ब्लॉग लिखा. धन्यवाद
    जनता को तो सिर्फ़ मरना-पिसना ही है. मान्यवर नेता-अभिनेता-मीडिया-बाबा-अन्ना सिर्फ़ सपने दिखा कर मौज करते हैं.

  • 3. 17:36 IST, 04 अगस्त 2011 yaswant kothari:

    उम्मीद पर दुनिया क़ायम है. आशा है कि आपकी उम्मीद पर पाठक खरे उतरेंगे और पाठकों की आशाओं पर आप खरे उतरते रहेंगे.

  • 4. 17:56 IST, 04 अगस्त 2011 Rajesh Tiwari Pathalkhan, Bhagalpur:

    क्या सारी उम्मीदें अवसरवादी हो गई हैं? मानसून के काले बादलों की उम्मीद करते ही रह गए बस कुछ फ़ुहारों से मिटी उम्मीद. विशेष राज्य के दर्जे के लिए नीतीश कुमार से बिहारियों की उम्मीदें. भ्रष्टाचार के भंवर से देश को निकालने की बाबा रामदेव की उम्मीद. 16 अगस्त को सरकार से जंतर मंतर पर रामलीला मैदान को दोहराने की उम्मीद. लाखों करोड़ों देशवासियों की अन्ना हज़ारे से उम्मीद. लालू, मुलायम और माया तो सोनिया से सीबीआई से बचाने की उम्मीद. पूरे भारत की मास्टर ब्लास्टर सचिन से सौवें शतक की उम्मीद.

  • 5. 17:59 IST, 04 अगस्त 2011 anjani kumar:

    पाठकों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम है विनोद वर्मा का ब्लॉग. बहुत ख़ूब.

  • 6. 18:45 IST, 04 अगस्त 2011 मुकुल सरल:

    बहुत ख़ूब.

  • 7. 00:28 IST, 05 अगस्त 2011 sunil kumar mitharwal:

    भारतीयों के लिए आजकल उम्मीद का दूसरा नाम सशक्त लोकपाल बिन का बन जाना है. हक़ीकत के क़रीब ब्लॉग लिखने के लिए शुक्रिया.

  • 8. 07:19 IST, 05 अगस्त 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    बीबीसी के हिंदी ब्लागरों ने जिस कौशल से समय कि नब्ज़ पर अपने विचार परोस रहे हैं उसमें विनोद वर्मा लगातार उन मुद्दों को छू रहे हैं जिनमे आम आदमी की छटपटाहट दिखाई देती है यथा 'उम्मीद का दूसरा नाम' ब्लॉग में भी वही चिंता दिखाई देती है. जो भी हो पर 'अशोक वाजपेयी के कविता संग्रह का नाम भले ही 'उम्मीद का दूसरा नाम' होगा, पर इसका खुलासा जिस तरह विनोद जी ने किया है हो सकता है उनमें वाजपेयीजी जैसी साहित्यिकता भले ही न हो पर उसमें सामाजिकता कूट कूट कर भरी है. इसीलिए यह ब्लॉग समकालीन समाज की मूलभूत समस्याओं की नब्ज़ टटोलता नज़र आता है.

  • 9. 08:52 IST, 05 अगस्त 2011 Aseem:

    दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ "ना हो कमीज़ तो पाँव से पेट ढँक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए" याद आ गईं. हालात बदलेंगे भाई, अन्ना और सत्ता के बीच भी एक राह निकलती है...उम्मीद अपने वजूद की एक ख़ास शर्त है. अच्छा लिखा आपने, हमेशा की तरह.

  • 10. 11:14 IST, 05 अगस्त 2011 Kuldeep Bishnoi, IARI, New Delhi:

    विनोद जी, आपने एक कविता संग्रह के माध्यम से सारी बात बहुत ही सटीक ढंग से कहकर गागर में सागर भर दिया.

  • 11. 11:37 IST, 05 अगस्त 2011 manoj parihar:

    बहुत ख़ूब.

  • 12. 12:19 IST, 05 अगस्त 2011 BINDESHWAR PANDEY BHU:

    विनोद जी, आप निराश न हों उम्मीद पर दुनिया टिकी है .उम्मीद है की एक दिन सब ठीक हो जायेगा .उम्मीद का दामन थामे हम आपके एक और ऐसे ही शशक्त व धारदार ब्लॉग का इंतजार करेंगे .शुक्रिया बहुत -बहुत ..

  • 13. 23:06 IST, 05 अगस्त 2011 saroj:

    मेरे विचार से उम्मीद का दूसरा नाम आशा है. जो इस देश को दुबारा सोने की चिड़िया बनाने के लिए ज़रूरी है.

  • 14. 08:30 IST, 06 अगस्त 2011 Ramesh Sharma:

    बहुत बढ़िया ब्लॉग था विनोद जी.

  • 15. 16:09 IST, 06 अगस्त 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    सबसे बुरा है उम्मीदों का मर जाना इसीलिए उम्मीद को ताउम्र बनाए रखना है.

  • 16. 17:52 IST, 06 अगस्त 2011 Sandeep:

    उम्मीद ही है जो संसार को गतियमान रखती है. अगर इंसान उम्मीद करना छोड़ दे तो शायद संसार का अस्तित्व ही समाप्त हो जाये. लेकिन हमें अपनी उम्मीदों की लक्ष्मण रेखा नहीं पर करनी चाहिए नहीं तो एक समय के बाद हमारी उम्मीदें हमें कंट्रोल कर लेंगी. हर किसी की अपनी उम्मीदें होती हैं, इच्छाएं होती है महत्वकांछाएं होती हैं. लेकिन क्या हम दूसरों के लिए भी उम्मीद कर सकते हैं, क्या हम अपने देश के लिए भी कुछ सपने देख सकते हैं? आज अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोग जब देश के अछे भविष्य के लिए उम्मीद कर रहे हैं तो हमारा भी कर्तव्य है की हम आज जब अपनी उम्मीदों को पूरा करने मैं दिन रात जुटे हैं क्या हम अपने देश के भविष्य के लिए बस थोड़ी सी उम्मीद करें. इससे हम सबकी वो उम्मीद पूरी हो जाएगी जो हम अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए देख रहे हैं. विनोद जी आपका ब्लॉग बहुत ही अच्छा है, आपने लगभग सभी के मन को झांककर देख लिया लगता है.

  • 17. 19:05 IST, 18 अगस्त 2011 sanjay:

    भगवान हमारे प्रधानमंत्री को थोड़ी अकल दे .ताकि कांग्रेस की चाल में वो बलि का बकरा न बन जाये . कांग्रेसी राहुल की वाह वही कर के उसे गद्दी पर बैठने का प्रयास कर रहे है . ताकि जनता भावुक हो कर कांग्रेस का वोट बैंक बढ़ जाये और अगले चुनाव मै राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट कर जनता को फिर पाच साल के लिए जनता को बेवकूफ बनायेगे. मनमोहनजी गेट वेल सून.

  • 18. 22:16 IST, 02 सितम्बर 2011 nitesh katare:

    अन्ना हज़ारे जी महान आदमी हैं इसलिए मैं उनका समर्थन करता हूँ.

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