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लंदन से एक पाती

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|शनिवार, 06 अगस्त 2011, 20:30 IST

दिल्ली में रहनेवाले मेरे प्यारे दोस्त,

लंदन के ट्रैफ़ेलगर स्क्वायर का नाम सुना है ना, देखा भी होगा, हिंदी फ़िल्मों में अक्सर दिखता है, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे के शुरू में ही अमरीश पुरी वहाँ कबूतरों को चुग्गा डालते दिखाई देते हैं.

उसी ट्रैफ़ेलगर स्क्वायर पर इन दिनों एक घड़ी लगी है, उसमें उल्टी गिनती चल रही है, अगले साल होनेवाले ओलंपिक खेलों की, बीते सप्ताह, बुधवार की शाम वहाँ दिन घटकर रह गए - 365 - यानी ठीक एक साल बाद लंदन में ओलंपिक खेल होंगे.

अब जबकि एक साल रह गए हैं, चर्चा ये नहीं हो रही कि स्टेडियम समय पर बनेंगे कि नहीं, जो बनने हैं उनमें से अधिकतर बन चुके हैं, कई खेल तो पुरानी जगहों पर होंगे, जैसे लॉर्ड्स में, जहाँ बैट और बॉल की जंग होती है, वहाँ तीर-धनुष से निशाना लगेगा, फिर टेनिस के लिए विंबलडन तो है ही...

चिंता स्टेडियमों के ख़ाली रहने की भी नहीं है, टिकट जमकर बिके हैं, चिंता तो उल्टी है, कि लोगों को टिकट नहीं मिल रहे.

मगर असल चिंता दूसरी बातों पर है - कि कहीं एथेंस, अटलांटा और बीजिंग की तरह सफेद हाथी को बुला लेने और फिर तमाशा ख़त्म होने के बाद सिर धुनने की नौबत तो नहीं आएगी - बजट पहले ही जितना अनुमान था उससे तिगुना हो चुका है.

सवाल ये भी उठ रहे हैं कि ये जो दो हफ़्ते की बारात सजेगी उसका आम लोगों को क्या फ़ायदा होगा - क्या नई पीढ़ी में खेल को लेकर नई ऊर्जा जगेगी? क्या पूर्वी लंदन के जिस उपेक्षित इलाक़े में निवेश हो रहा है, उससे वहाँ की तस्वीर बेशक बदल जाए, लोगों की ज़िंदगियों में स्थायी बदलाव आएगा? खेलगाँव में एथलीटों-अधिकारियों के ठहरने के लिए जो फ़्लैट बन रहे हैं, जिनको खेल के बाद बेचा जाएगा, उसमें कितने साधारण लंदनवासी रहेंगे?

तो यही सब चर्चा हो रही है - अब तुम बताओ?

दिल्ली में तो पिछले साल बड़ा ग़ज़ब का खेल हुआ, खेल के कुछ दिन पहले पुल ज़रूर टूट गया, लेकिन अंत होते-होते जलवा दिखा ही दिया दिल्ली ने.

पर अब कैसा है सब? घोटाला-डोपिंग ये सब तो ख़बरों में आता रहता है, मगर दूसरी बातों का क्या हाल है? नई पीढ़ी बैट-बॉल छोड़ कुछ और खेलती नज़र आती है? खेलगाँव के फ़्लैट, साधारण लोगों को भी मिले? बताना.

लंदन से तुम्हारा दोस्त

तथ्य सुधारः मूल ब्लॉग में दूसरी पंक्ति में फ़िल्म का नाम 'कुछ-कुछ होता है' लिखा गया था, जिसे सुधार कर 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' किया गया

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 03:47 IST, 07 अगस्त 2011 P.N.Sharma:

    दिल्ली आम लोगों के लिए है क्या.आप लंदन में रह कर सब भूल गए क्या?

  • 2. 07:20 IST, 07 अगस्त 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    अपूर्व कृष्ण जी आपकी चिट्ठी पढ़ी और आपने लंदन में बैठकर हिंदुस्तान के किस खेल समारोह से लंदन के खेलों के बारे में जानना चाहते हैं, सारे जबाब आपकी पाती में हैं, लन्दन में बैठकर हिन्दुस्तानी नंगे भूखे और भ्रष्ट तो नज़र आते ही हैं और खेल के खेल में फंस भी जाते हैं. यहाँ बैठे हमें लगता है की हमारे देश के पिछले खेल के आयोजक धीरे धीरे पकड़ में आ रहे हैं. मुझे लगता है लंदन में इस तरह के ओलंपिक तो नहीं होगा की खेल की ख़बर के बाद भी खेल के खेलों की ख़बर चलती रहे. पर आप को क्या लगता है की अब वहां भी कुछ बदला हुआ है क्या.

  • 3. 10:34 IST, 07 अगस्त 2011 rahis:

    कुछ कुछ होता है मैं अमरीश पुरी कहाँ से आया ... उत्तम ब्लॉग भाई.

  • 4. 10:56 IST, 07 अगस्त 2011 saraswati ranchi(Jharkhand):

    वाकई खेलों के आयोजन में काफी अनियमितता बरती जाती है, उसमे मनमानी ख़र्च किए जाते हैं.चाहें वह देश भारत हो या कोई और देश हो. और रही बात आम लोगों की फ़ायदे की तो इससे आम लोगों को कोई फायदा नहीं होता है, क्योंकि उनके पास इतनी बड़ी रकम नहीं होती है,कि वे टिकट खरीद सके और स्टेडियम में बैंठ कर खेलों का आनंद ले सके.

  • 5. 13:27 IST, 07 अगस्त 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    मित्र,सबसे पहले तो मैं आपको यह बता दूं कि कुछ कुछ होता फिल्म में नहीं बल्कि दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे में अमरीशपुरी ट्रैफ़ेलगर स्क्वायर पर कबूतरों को दाना देते दिखाए गए हैं.मित्र,अभी तक तो राष्ट्रमंडल घोटाले की जाँच ही चल रही है और आगे भी चलती रहेगी.फ़्लैट कब बंटेगा पता नहीं लेकिन जब भी बंटेगा गरीबों को तो नहीं मिलेगा इसकी गारंटी है.फिर से एक घोटाला होगा-फ्लैट घोटाला और फिर वही जाँच और वही लीपापोती.

  • 6. 14:02 IST, 07 अगस्त 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    अपूर्व जी आपका ब्लॉग बार-बार पढ़ने के बाद भी ये नहीं पता चल पाया है आप बीबीसी श्रोताओं को क्या पैगाम देना चाहते हैं.भारत की बात छोड़े यह एक महान देश है और बेइमान नेताओं का खुला राज़ है इसलिए इतना होने के बाद भी बदकिस्मती है कि कुर्सी पर विराजमान होकर हुकूमत कर रहे हैं.कृपया किसी सार्खथक मुद्दे पर लेख लिखे तो बेहतर होगा.

  • 7. 19:41 IST, 07 अगस्त 2011 मोहम्मद सलीम:

    आप कहना क्या चाहते हैं समझ के बाहर है, आप लंदन और दिल्ली की तुलना कर रहे हैं या फिर ये बताना चाहते हैं कि लंदन ओलंपिक से दूसरे खेलों को कितना फ़ायदा होगा. लंदन में एक साल पहले तैयारी ख़त्म हो चुकी है जबकि हमारे देश में खेलों से एक साल पहले तैयारी शुरू भी नहीं हो पाई थी. दोनों देशों के सिस्टम और ज़िम्मेदारों की नीयत में कितना फ़र्क़ है ये भी सब को पता है. हमारे देश की बदकिस्मती ये है कि यहाँ पर हज़ारों कलमाडी हैं जबकि लंदन में कलमाडी जैसों को आस-पास भी नहीं भटकने दिया जाएगा. इस पर काफ़ी लिखा जा सकता है पर आपसे अनुरोध है कि बीबीसी में लिखते वक़्त एक ही विषय पर लिखें तो बेहतर होगा.

  • 8. 21:04 IST, 07 अगस्त 2011 नवल जोशी:

    अपूर्व जी आपने लंदन ओलम्पिक के बहाने बहुत खूबसूरत सवाल उठाया. मेरी समझ से अगली ही पंक्ति में आपने जो बात कही उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता है. जब आपने सवाल उठाया कि क्या नई पीढी में खेल को लेकर नई उर्जा जगेगी?तो लगा कि एक बेहतरीन बहस की शुरूआत होगी, खेल आयोजनों का मकसद ही यही है. मनुष्य द्वारा कला, संगीत साहित्य, नृत्य धर्म चर्चा जैसे आयोजनों के बावजूद बहुत कुछ ऐसा भी होता है जो अभिव्यक्त नहीं हो पाता है, खेल आयोजनों से इंसान का एक नया ही पहलू सामने आता है. इसमें किसी को पराजित करने की नहीं, श्रेष्ठता को उपलब्ध होने की इंसान की बेचैनी ओर प्रयास देखने को मिलते हैं. लगता ही नहीं कि कोई इंसान मैदान में है एक दैवीय आभा अपने चारों ओर लिए जब कोई प्रदर्शन करता है तो अनुभव होता है कि वह व्यक्ति इंसान होने की सीमा से थोड़ा ऊपर हो चुका है. लेकिन आपकी दूसरी बात जमीन में पटक देती है फिर वही निवेश ,खर्चा और इसकी वसूली! कहना न होगा कि हर खूबसूरत चीज़ को जैसे कि पूँजीपतियों की नज़र लग गई है. खेल में लागत और वसूली का गणित न ही होता तो खेलों का मक़सद ही पूरा हो गया होता और दुनिया को खूबसूरत बनाने में खेलों की बहुत ही बडी भूमिका होती. लेकिन खेल भी अब धंधा बना दिए गए हैं लागत और मुनाफ़े की बात खुलेआम होने लगी है. इसे कोई बुरा भी नहीं मानता है. अब हमारे देश में क्रिकेट को ही लें, यह खेल तक तो अच्छा है लेकिन जब से यह घंघा बना तो खिलाडी इन्वर्टर,टायर,कोल्ड ड्रिक,बिस्कुट,टायर,कार मोटर साईकिल जैसी वस्तुएं खरीदने के लिए लोगों को बरगला रहे हैं. यह समझ से बाहर है कि किसी की योग्यता खेल में है ,इस कारण लोग उसे प्यार भी करते हैं तो इसका मतलब यह कैसे हो सकता है कि वह कम्पनियों का सेल्समैन बन कर लोगों को ऐसी चीजें खरीदनें के लिए अपनी छवि का इस्तेमाल करे, जिन वस्तुओं में शायद उनका भी भरोसा नहीं होता है. हास्यास्पद स्थिति तब हो जाती है जबकि कम्पनियां अपने इन सैल्समैन खिलाडियों कर गिरती साख को बचाने के लिए उन्हें भगवान के रूप तक में रूथापित करने की कोशिश करती है.क्या इन्हें भगवान के दर्शन हो चुके हैं जो ये लोग इंसानों से उनकी तुलना करने लगे है. कृपया खेल को खेल ही रहने दें और इसे धंधेबाजों से भी बचायें. खेल के बहाने कम्पनियां जो खेल हमसे खेलती हैं उसकी बहुत दर्दनाक कहानी है. पुनश्च अपूर्व जी का धन्यवाद कि आपने एक अच्छा विषय उठाया.

  • 9. 03:25 IST, 08 अगस्त 2011 सुदीप:

    अभी कुछ ही दिन हुए - लंदन आए कुछ पारिवारिक मेहमानों के साथ लंदन के ओलंपिक स्टेडियम देखने के लिए जाना हुआ, एक साल पहले ही लगभग सारी तैयारी पूरी हो चुकी है. बहुत अच्छा लगा. 2-3 दिन ही हुए ये सुन कर, कि जो कंपनी भोपाल गैस काण्ड के लिए जिम्मेदार है, ( जो भारत में घूसखोरी और नेतागिरी की की सहूलियत होने की वजह से आज तक सुरक्षित और तरक्की पर अग्रसर है) वह कंपनी लंदन के नए नवेले स्टेडियम को और इस ओलम्पिक को प्रायोजित कर रही है .. दिल में टीस लग गयी. एक रात में, हज़ारों भारतीयों की हत्या के ज़िम्मेदार, आज तक आराम से घूम रहे है और अब लंदन ओलंपिक में जा के उन लोगो के बैनर्स, पोस्टर्स और शायद मेहमान-नवाज़ी भी देखना पड़ेगी .. शर्मनाक है .. पर क्या कर सकते है.

  • 10. 15:58 IST, 08 अगस्त 2011 बिंदेश्वर पांडे, बीएचयू:

    बारात में असल फ़ायदा तो दूल्हा-दुल्हन को ही होता है, बाराती तो केवल शोभा बढ़ाने जाते हैं सोचिए यदि बारातियों को भी वही लाभ मिलने लगे तो शादी का आयोजन भला कोई क्यों करे?
    और हाँ यदि टिकट सबको नहीं मिल रहा है तो अपूर्व जी आपसे विनम्र निवेदन है कि आप ब्रितानी प्रधानमंत्री को तिहाड़ भेज कर कलमाडी जी से मंत्रणा करने को कहें क्योंकि उन्हें इसका नवीनतम आइडिया है. हमारे यहाँ तो खेल अब राजनीति की बिसात पर खेला जाता है. जिसकी पहुँच है उन्हें अर्जुन, द्रोणाचार्य सब मिल जाता है तथा जिनकी पहुँच नहीं होती वे मैदान में जिंदगी भर खाक ही छानते रह जाते हैं. लंदन हो या दिल्ली, ग़रीबों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है.यदि कोई उनकी ख़बर लेता भी है तो आपना फ़ायदा उसमें ज़रुर देखता है. अंत में, यदि खेलों के आयोजन से दूसरे खेलों का भला नहीं हो रहा है तो उन्हें भी आरक्षण के जरिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए .

  • 11. 13:16 IST, 09 अगस्त 2011 BHEEMAL Dildar Nagar:

    अपूर्व कृष्ण जी, रेडियो में आपका नाम बहुत सुना था, आज दर्शन भी हो गए.

  • 12. 19:40 IST, 09 अगस्त 2011 संजीव:

    ये साफ नहीं है श्रीमान् कि आप क्या कहना चाह रहे हैं.

  • 13. 15:13 IST, 10 अगस्त 2011 रज़ा हुसैन:

    पहले तो मैं एक बात साफ़ कर दूँ कि भारत और इंग्लैंड के खेल को मिलाना ग़लता है, इंग्लैंड विश्व कप फ़ुटबॉल, क्रिकेट, हॉकी, ना जाने कितने खेलों का आयोजन कर चुका है और सब खेलों का आयोजन बेहतर होता है और हर खेल के आयोजन के बाद इंग्लैंड की साख बढ़ी है. घबराएँ नहीं, लंदन में ओलंपिक का आयोजन यादगार और बेहतर होगा क्योंकि वहाँ के लोग देश की साख को बट्टा नहीं लगाते. ये सिर्फ़ भारत में ही होता है. याद करें कि चीन में ओलंपिक का आयोजन कैसे किया था. पूरी दुनिया जानती है. और कैसे यहाँ के भ्रष्ट लोगों ने दुनिया में भारत की जग हँसाई करवाई. लंदन में जितना पैसा ओलंपिक में लगेगा उतना ही लगेगा क्योंकि वहाँ के लोग भ्रष्ट नहीं हैं. देश के गौरव को बढ़ाना जानते हैं. कॉमनवेल्थ गेम्स ख़त्म हो गए पर अभी जाँच चल रही है. दुनिया को मालूम हो गया है भारत खेल के मामले में कितना भ्रष्ट है. मेरा यकीन मानिए लंदन में ओलंपिक का आयोजन शानदार होगा और उनके देश की साख और बढ़ेगी.

  • 14. 04:34 IST, 11 अगस्त 2011 सी मज़ुमदार, अमरीका:

    अपूर्व जी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि आपके ब्लॉग लिखने का आख़िर मक़सद क्या है. आप क्या संदेश देना चाहते हैं. अगर आप ये कहना चाहतें हैं कि आप फ़िलहाल लंदन में हैं और आपको ओलंपिक स्टेडियम देखने का मौक़ा मिला है तब तो आपने बात रख दी. उसके अलावा मुझे आपके
    ब्लॉग का कोई सिर पैर समझ में नहीं आया.

  • 15. 16:13 IST, 12 अगस्त 2011 हर्ष देव जोशी:

    आपने बहुत अच्छा लिखा है. धन्यवाद.

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