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लोकतंत्र की रक्षा किसका काम है?

विनोद वर्माविनोद वर्मा|रविवार, 14 अगस्त 2011, 13:17 IST

लोकतंत्र की रक्षा किस विभाग का काम है?

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अन्ना हज़ारे से कहा है कि वे अपनी शिकायत उचित दफ़्तर के समक्ष रखें.

आपको पता ही होगा अन्ना अनशन की जगह देने के लिए दिल्ली पुलिस की शर्तों से नाराज़ थे और उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर शिकायत की थी.

उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा था कि सरकार लोकतंत्र की हत्या कर रही है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है. उन्होंने प्रधानमंत्री को हिम्मत दिखाने की चुनौती दी थी और पूछा था कि वे क्या मुंह लेकर लालक़िले में झंडा फहराएँगे.

प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के मातहत आने वाली दिल्ली पुलिस के बारे में कहा है कि ये उनके कार्यालय के दायरे में नहीं आता. याद नहीं आता कि इतनी साफ़गोई से बात करने वाला कोई प्रधानमंत्री इससे पहले हमें मिला था.

टेलीकॉम के घोटाले के समय भी उन्होंने कहा था कि ये मेरे मंत्रालय का मामला नहीं. वो वित्त मंत्रालय और संचार मंत्रालय के बीच का मामला है. राष्ट्रमंडल खेल भी उनके विभाग का मामला नहीं था. वो खेल मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और दिल्ली की कांग्रेस सरकार का मामला था.

अब अन्ना हज़ारे के सामने अनशन की जगह से भी बड़ा संकट ये है कि वे देश की राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र की हत्या की शिकायत करना चाहते हैं तो कौन से विभाग के समक्ष जाया जाए.

अगर उन्हें ये शिकायत करनी हो कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है तो किससे जाकर कहें?

इसके बाद जनता को भी सोचना होगा कि बात-बेबात प्रधानमंत्री को परेशान किया जाए या नहीं. अगर महंगाई से मर रहे हैं तो वित्तमंत्री से कहिए, प्रधानमंत्री कार्यालय का इससे क्या लेना देना? अगर जनता ग़रीबी और भूख से त्रस्त है तो उसे कृषि मंत्रालय या योजना आयोग आदि के पास जाना चाहिए.

अब देखना होगा कि नक्सली समस्या को देश की सबसे बड़ी समस्या बताकर प्रधानमंत्री ने किसी और के विभाग में दखलंदाज़ी तो नहीं की थी.

ध्यान में ये भी रखना होगा कि जब वे लालक़िले से भाषण देंगे तो सोचकर बोलें कि वे किसके विभाग की बात कर रहे हैं और क्यो कर रहे हैं.

रहा सवाल कि वे किस मुंह से झंडा फ़हराएँगे तो इसका जवाब कांग्रेस से मांगना होगा क्योंकि वे तो कांग्रेस का चेहरा हैं. सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद न लेने का जो महान त्याग दिखाया था उसके बाद सरकार के लिए उन्होंने ही ये चेहरा तलाश किया था. तो एक तरह से ही वो सोनिया गांधी का ही चेहरा लेकर झंडा फहराएँगे. तो अगर सोचना है तो सोनिया गांधी और उनकी कांग्रेस सोचे.

अन्ना हज़ारे जो चाहते हैं वह देश का हर नागरिक चाहता है. भ्रष्टाचार ख़त्म हो और जवाबदेही आए इससे अच्छा भला और क्या हो सकता है?

समस्या सिर्फ़ ये है कि ये उस तरह से नहीं हो सकता जिस तरह से अन्ना हज़ारे चाहते हैं.

मैं मानता हूँ कि चाहे जैसे भी लोग हमारे संसद में हों, चाहे राजनीतिक पार्टियाँ जैसी भी हों, चाहे बहुत से राजनेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हों, लेकिन हमें कोई ऐसा रास्ता अख़्तियार नहीं करना चाहिए जिससे कि हमारा लोकतंत्र कमज़ोर पड़ता दिखता हो.

चाहे सरकार अन्ना हज़ारे और उनके सहयोगियों से सहमत हो या न हो, उनके शांतिपूर्ण अनशन के लोकतांत्रिक अधिकारों को नहीं छीना जाना चाहिए. अन्ना को अनशन की जगह देने में सरकार जो आनाकानी कर रही है वह भी लोकतंत्र को कमज़ोर करने की साज़िश की तरह दिखती है.

लोकतंत्र की रक्षा हमारा पहला और अंतिम दायित्व होना चाहिए क्योंकि वह हमारा अपना तंत्र है, जनता का तंत्र है. ये बात प्रधानमंत्री को भी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि वे प्रधानमंत्री इसी जनता के हैं और लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व उनका भी है और हम सबसे अधिक है.

प्रधानमंत्री ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि लोकतंत्रित मूल्यों की रक्षा के लिए उचित विभाग में गुहार लगाइए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:15 IST, 14 अगस्त 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी आप के लेख मै कहीं न कहीं अपरोक्ष रूप में मनमोहन सिंह और साथ मै कांग्रेस पार्टी का छुपा पक्ष नज़र आता है. रहा सवाल किसी भी मामले कि गुहार लगाने कि मेरे ख्याल से महान बेईमान भारत में लगाना ही बेकर है कितनी बदकिस्मती है देश का कमज़ोर प्रधानमंत्री यह कहता है कि शिकायत सम्बंधित विभाग को करनी चाहिए. कुल मिलाकर आप का बीबीसी के पाठकों को समझाने का अच्छा प्रयास है.

  • 2. 14:24 IST, 14 अगस्त 2011 pramod kumar:

    अन्ना ने जो चिठ्ठी लिखी है उसे माननीय प्रधानमंत्री को खुद उचित जगह कार्रवाई के लिए भेज देना चाहिए था. इस प्रक्रिया को सारा देश जानता है. आम अवाम को यह मालूम है की जब उसकी कोई नहीं सुनता तो वह महामहीम राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री को ही सीधे पत्र लिखता है .इनके प्रति आम आदमी की गहरी आस्था है. जब इन पत्रों को कार्रवाई के लिए उचित जगह भेजा जाता है. तो अफसरान फाइल लेकर दौड़ लगाने लगते हैं. इसलिए अन्ना के पत्र को प्रधानमंत्री दिल्ली पुलिस के पास कार्रवाई के लिये भेज देते बात बन जाती

  • 3. 14:52 IST, 14 अगस्त 2011 कैलाश चंदर:

    हमारे प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते हैं. यार मनमोहन कम से कम आप तो ऐसी बातें मत करो. आप 79 साल के हो, कल पता नहीं भगवन आपको बुला ले, जाते जाते अच्छा काम कर दो यार. यह देश चीख चीख कर कह रहा है मनमोहन मेरे ऊपर से गंदगी साफ़ कर दे यार.

  • 4. 15:22 IST, 14 अगस्त 2011 naval joshi:

    पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के लिए अन्ना को इस आफिस और कभी उस ऑफिस में अनुमति के लिए भटकना पड रहा है. सरकार की ओर से सुझाव है कि इस सम्बन्ध में उपयुक्त कार्यालय से संपर्क करें. उनकी समस्या आसानी से हल हो जाऐगी. इसी उपयुक्त कार्यालय की तलाश में आम आदमी पिछले चौंसठ वर्षों से भटक रहा है. लेकिन वह ऑफिस अब तक किसी को नहीं मिल पाया है जहॉ से समस्या का समाधान हो जाता है, फिर अन्ना को यह कैसे मिल जाऐगा जबकि वे आम आदमियों जैसी ही बात कर रहे हैं.


    समाज के एक वरिष्ठ नागरिक कुछ कह रहे हैं उस पर ध्यान देने की बजाए इस तरह जलील करना किसी की भी समझ में नहीं आ सकता है। आप अन्ना से सहमत हों या नहीं भी हो सकते है लेकिन यह साफ है कि अन्ना का सरोकार इस देश में किसी से भी कम नहीं है।

  • 5. 15:31 IST, 14 अगस्त 2011 Sandeep:

    मनमोहन सिंह जी ने अब ये बात कह कर यह सिद्ध कर दिया है की सचमुच में वह एक खिलौना मात्र हैं. देश का इससे ज्यादा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है जब देश का प्रधानमंत्री जी ये कहें की देश में क्या कुछ हो रहा है उन्हें कुछ मालूम नहीं और वे किसी के जिम्मेदार नहीं हैं. ऐसा लगता है वे भी भ्रष्टाचार के बराबर के भागिदार हैं जो अब अपने झूठे चेहरे के पीछे भ्रस्ताचारियों के साथ साथ अपने को बचाना चाहते हैं. हालाँकि प्रधानमंत्री जी जवाब से मुझे बहुत ज्यादा हैरानी नहीं हुई. ये सरकार बार बार नागरिक अधिकारों का हननं कर रही है कभी सोते हुए लोगों पर लाठीचार्ज कराके, कभी प्रदर्शनकारीयों पर गोलियां बरसा के पता नहीं अब ये कौन सा कदम उठाने वाले हैं अन्ना जी के अनशन पर. इस ब्लॉग के आपको बहुत बहुत धन्यवाद विनोद जी, बहुत अच्छा अवलोकन है.

  • 6. 15:45 IST, 14 अगस्त 2011 sunil taneja:

    तीर निशाने पर है. विनोद जी

  • 7. 16:39 IST, 14 अगस्त 2011 ZIA JAFRI:

    मनमोहन सिंह एक नौकरशाह थे और आज भी उस मानसिकता से उबर नहीं पाए हैं जहां लोग काम करने की बजाए काम से बचना जानते हैं. वो भूल रहे हैं कि इन लोगों की नासमझी से उठाए क़दम इनको कितने महंगे पड़ने वाले हैं. अगर ये लोग आज देश की धड़कन को नहीं समझेंगे तो कल देश की गर्जन के लिए तैयार रहें. मध्य पूर्व की घटनाएं अभी पुरानी नहीं हुई हैं.

  • 8. 16:57 IST, 14 अगस्त 2011 धर्मेश पटेल:

    "द बक स्टॉप्स हियर" - ये उक्ति अमरीकी राष्ट्रपति ट्रुमन ने हस्ताक्षर करके अपने डेस्क पर रखी और अमरीकी नागरिकों को ये संदेश दिया कि उनके तंत्र में जो कुछ भी हो रहा है उसकी अंतिम जवाबदेही वो ख़ुद स्वीकार करते हैं. उनसे 180 डिग्री उल्टा केस अपने मनमोहनजी का है. ''द बक पासेस टू देल्ही पुलिस,'' ''द बक पासेस टू होम मिनिस्ट्री,'' ''द बक पासेस टू एग्रीकल्चर मिनिस्ट्री,'' ''द बक पासेस टू स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री.''

  • 9. 17:24 IST, 14 अगस्त 2011 vidya bhushan:

    आज से पहले मैंने सिर्फ़ घूसखोर अफ़सर और नेताओं को ही ऐसा करते देखा है जो जानबूझ कर आम जनता को एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर का चक्कर लगाने को मजबूर करते हैं. अब प्रधानमंत्री भी उसी श्रेणी में आ गए हैं तो क्या आज से हम यह मान लें कि जिस देश में हम रहते हैं उस भारत देश का प्रधानमंत्री भी निरंकुश और भ्रष्ट्राचारी है. उसके पास अपनी मजबूरी ले कर जानेवाली आम जनता को ये जवाब दिया जा रहा है कि आप संबंधित विभाग के पास जाइए. क्या देश के प्रधानमंत्री के अधिकार इस हद तक सीमित हो गए हैं. अपने देश के प्रधानमंत्री कोई कॉल सेंटर में काम करने वाले अधिकारी तो नहीं हैं, जिसके पास सिर्फ़ सूचना देने के अलावा कोई अधिकार नहीं होता.

  • 10. 17:44 IST, 14 अगस्त 2011 raza husain:

    अन्ना ने ग़लत समय पर मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी क्योंकि मैडम सोनिया तो विदेश में हैं. मैडम से पूछे बिना मनमोहन कोई काम नहीं करते. एक बात और अगर देश की जनता सोचती है कि मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हैं तो ग़लत सोचती है. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं बल्कि कांग्रेस के प्रधानमंत्री का मुखौटा भर हैं. असली प्रधानमंत्री तो मैडम सोनिया हैं. अगर वो विदेश यात्रा पर जाते हैं तो सोनिया उनको सिखा-पढ़ाकर भेजती हैं कि कहीं कुछ गड़बड़ न कर बैठें. मनमोहन सिंह सीधे बनके देश की जनता को बेवकूफ़ बना रहे हैं.

  • 11. 17:52 IST, 14 अगस्त 2011 MANOJ:

    लोकतंत्र की रक्षा का काम तो हमारे संविधान निर्माता करके स्वर्ग सिधार गए हैं. एक संविधान बन गया है. अब लोकतंत्र की रक्षा का काम उसी का है जो संविधान की गहरी समझ रखता हो, जिसे धाराएं मुंहज़बानी याद हों और जिसके पास कोर्ट में मुक़दमा लड़ने के लिए पर्याप्त धनराशि हो. भूखे-नंगों को लोकतंत्र की रक्षा के बारे में नहीं सोचना चाहिए.

  • 12. 17:53 IST, 14 अगस्त 2011 m:

    सोनिया गांधी के बनाए प्रधानमंत्री दीवाने हो गये हैं. तभी तो ऐसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं. खैर अब उनकी उम्र भी हो गई है. कब तक इस कुर्सी का बोझ उठा पाएंगे. कहीं कोई उम्मीद की किरण भी तो नज़र नहीं आती. अन्ना का आंदोलन जन-जन को प्रेरित करे, लोग सोचने लगें और नया नेतृत्व राष्ट्र को मिले. यही कामना है.

  • 13. 18:51 IST, 14 अगस्त 2011 ALTAF HUSAIN:

    मुझे लगता है मेरे देश की मीडिया अपना काम बख़ूबी कर रही है. आज हमें अन्ना हज़ारे जैसे लोगों का साथ देने की बहुत ज़रूरत है नहीं तो भारत कभी भी सफ़ेदपोश लुटेरों से आज़ाद नहीं हो पाएगा.

  • 14. 19:28 IST, 14 अगस्त 2011 Chandan mishra:

    इस बयान से ये सिद्ध होता है कि मनमोहन सिंह एक मुखौटा प्रधानमंत्री हैं और उनको किसी और जगह से रिमोट कंट्रोल द्वारा चलाया जा रहा है.

  • 15. 21:31 IST, 14 अगस्त 2011 AMIT KRISHNA:

    इस सरकार की बेशर्मी तो देखिए कि अब कांग्रेस के प्रवक्ता "अन्ना" को ही भ्रष्टाचार में लिप्त बता रहे हैं. बस अब और नहीं. इस सरकार को करारा जबाब देने का समय आ गया है. कांग्रेस के पाप का घड़ा भर चुका है.

  • 16. 22:49 IST, 14 अगस्त 2011 nepathya nishant:

    बचपन से आज तक मैंने बहुत सारे बंद देखे, आन्दोलन देखे , धरना एवं प्रदर्शन देखे, मुझे याद नहीं आता कहीं अधिकतम ५००० आदमियों की शर्त लगाईं गयी थी. जनाब हमारे यहाँ के स्थानीय विधायक के बेटे या पोते की शादी में १०० से ज्यादा गाडियाँ होती है. लेकिन सरकार की शर्त देखिये, केवल ५० गाड़ी २ पहिये एवं ५० चार पहिये गाड़ी ले जाने की धरना स्थल पर अनुमति है और यदि कोई इसकी शिकायत प्रधान मंत्री से करे तो प्रधानमंत्री वही मौनी बाबा का रूप धार लेते हैं. आखिर यह कैसा लोकतंत्र है. अब अन्ना हजारे के ऊपर सरकार ने व्यक्तिगत हमले शरू कर दिए है. माफ़ी चाहता हूँ, थोडा कड़े शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ लेकिन मजबूर हूँ . सरकार का यह रुख बहुत कुछ ऐसा ही है, जैसे बलात्कारी न्यायालय में पीडिता के चरित्र पर सवाल उठा कर बचना चाहता है. ताकि इससे अपराध की जघन्यता कम हो जाये, या फिर पीड़ित खुद ही और परेशानी की भय से किनारे कट ले. लेकिन सरकार भूल रही है , की यहाँ पीडित पूरी भारतीय जनता है. अन्ना सिर्फ उनकी आवाज़ है.

  • 17. 05:53 IST, 15 अगस्त 2011 braj kishore singh,hajipur,vaishali:

    विनोद जी आपने एक समीचीन मुद्दे को सटीक तरीक़े से उठाया है. निश्चित रूप से लोकतंत्र की रक्षा का भार सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री पर होता है लेकिन मनमोहन सिंह तो बिल्कुल ही अपवाद हैं. इनके बारे में जो कुछ भी कहा जाएगा कम होगा.

  • 18. 06:55 IST, 15 अगस्त 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    क्या गांधीजी ने अंग्रेज़ों से पूछा था कि अब हम भारत छोड़ो अभियान शुरू करें? और क्या भ्रष्टाचार करने वाला किसी से पूछता है कि अब भ्रष्टाचार करें. यदि नहीं तो भ्रष्टाचार रोकने के लिए अनुमति लेने की क्या ज़रूरत है और वो भी उस प्रधानमंत्री और उनकी पूरी जमात से जो 'भ्रष्टाचार' में आकंठ डूबी है. अन्ना कहीं न कहीं डर गए हैं कि कहीं इनकी हालत 'बाबा रामदेव' जैसी न कर दे सरकार. सरकारी बहाने और सरकारी 'भ्रष्टाचार' के कितने और नमूने चाहिए.

  • 19. 10:48 IST, 15 अगस्त 2011 Sandeep:

    मनमोहन जी ने बिल्कुल वही रवैया अपनाया है जैसाकि सरकारी दफ़्तरों में होता है. सरकारी दफ़्तरों में काम के सिलसिले में जानेवालों को एक जगह से दूसरी जगह का चक्कर लगवाया जाता है. लगता है मनमोहन जी भी बिना घूस के काम नहीं करेंगे. क्या करें बेचारे वो भी तो सिस्टम का ही हिस्सा हैं.

  • 20. 17:16 IST, 15 अगस्त 2011 himmat singh bhati:

    संता और बंता का शासन होता तो ऐसी भूलें और बहकी-बहकी बातें तो वे भी नहीं करते. वह भूलने की आदत से ये तो नहीं भूल बैठे कि वह कहाँ के रहने वाले हैं और कहाँ के प्रधानमंत्री हैं.

  • 21. 18:48 IST, 15 अगस्त 2011 vikas kushwahasujgawan, pukhrayan, kanpur.:

    ये वही कांग्रेस है जिसने देश के बँटवारे को क़बूल किया, आपातकाल लगाया. मुझे इन लोगों से कोई उम्मीद नहीं है.

  • 22. 19:30 IST, 15 अगस्त 2011 Arghya Pal:

    आख़िरकार यूपीए सरकार को डर पैदा हो ही गया. अगर अन्ना जी अनशन पर बैठ जाते हैं और सरकार दबाव में आती है तो इससे कांग्रेस का मुखौटा खुल जाएगा. काले धन के मामले पर, भ्रष्टाचार के मामले पर, हमारे महान और बेईमान राजनेताओं को हमारे देश की जनता कच्चा चबा जाएगी. इसलिए हमारे प्रधानमंत्री जी और कांग्रेस के राजनेता जी ऐसे बयानबाज़ी करते हैं. उन्हें क्या फ़र्क पड़ता है, लोकतंत्र का गला घोटे या न घोटे.

  • 23. 20:29 IST, 15 अगस्त 2011 man mohan:

    इससे यही साबित होता है कि मनमोहन सिंह अब भी सरकारी बाबू की मानसिकता से नहीं उबरे हैं. ग़लती उनकी नहीं है क्योंकि आख़िर उन्हें भी तो सोनिया गाँधी की नौकरी करनी है.

  • 24. 01:02 IST, 16 अगस्त 2011 altaf husain, sikanderpur, ambedlar nagar, up:

    बात सिर्फ़ कांग्रेस की नहीं है यहाँ तो जितने राजनेता हैं सभी एक जैसे हैं, बाहर से कुछ और अंदर से कुछ हैं. सभी भ्रष्टाचार को मिटाना नहीं चाहते हैं क्योंकि अगर भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया तो इनकी आमदनी का रास्ता ख़त्म हो जाएगा ये लोग मौज कैसे करेंगे.

  • 25. 04:04 IST, 16 अगस्त 2011 Anup Kumar:

    आँखों से अंधे और सत्ता के मोह में कानों से बहरे हो चुके धृतराष्ट्र की सभा थी. सभा में द्रोणाचार्य भी थे, कृपाचार्य भी थे और हस्तिनापुर के सिंहासन से बंधे रहने का अभिमान रखने वाले पितामह भीष्म भी थे. द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था, किन्तु सभी स्वनामधन्य लोग मौन थे और द्रौपदी बिलख-बिलख कर हर एक से पूछ रही थी की इस अपराध का दोषी कौन है ? किन्तु किसी का मौन नहीं टूटा बल्कि सभी के सर झुके हुए थे.
    उसी वक़्त महात्मा विदुर ने कहा था की एक तिहाई दोष अपराधी का , एक तिहाई उसके सहयोगियों का और एक तिहाई उसका जो इस जघन्य अपराध के घटित होने पर मौन है.
    कुछ ऐसी ही स्थिति आज अपने महान देश की भी है. प्रधानमंत्री मौन है, राष्ट्रपति मौन है और उपराष्ट्रपति चुप है और आज़ादी के दस वर्षों में से अधिकांश समय तक देश पर राज करने का दंभ भरने वाले नेहरु वंशावली के युवराज और राजमाता भी मौन है.
    आज देश भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबा है. नित नए घोटाले उजागर हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट तक परेशान है मगर हमारे देश के कर्णधार अपनी ही रौ में मस्त है. हमारी सरकार धृतराष्ट्र बनी हुई है.
    बकौल एक कवि :
    किले पर लाल कोई गिद्ध जब सपने सजाता है
    किसी अशफाक का छलनी कलेजा याद आता है
    निगाहों में कोई बिश्मिल सा बरबस झूल जाता है
    कोई कमबख्त जब ईमान को फाँसी लगाता है.

    गूंगों की बस्ती ने किसी बहरे को नेता माना
    अंधे हैं अनशन पर उनको है नुमाइश जाना.
    स्वतंत्रता दिवस की बधाई, मेरा भारत महान.

  • 26. 10:49 IST, 16 अगस्त 2011 Anand Gyan Choudhery:

    प्रधानमंत्री और उनके कर्तव्य पर काफ़ी अच्छा लिखा है, मैं आपको और बीबीसी को इसके लिए धन्यवाद देना चाहूँगा.

  • 27. 11:21 IST, 16 अगस्त 2011 N K MAURYA:

    सारे सरकारी विभाग प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत हैं मगर मनमोहन सिंह जी भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ भी करना नहीं चाहते. मैं उनसे अनुरोध करना चाहूँगा कि देश के लोग उन्हें उनके काम से और अच्छे फ़ैसलों से याद रखेंगे इसलिए कुछ ऐसा करें.

  • 28. 14:36 IST, 16 अगस्त 2011 vivek kumar pandey:

    भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस संघर्ष ने हम सबको एकजुट कर दिया है और स्वतंत्रता के बाद से ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. लोग जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग भेद से ऊपर उठकर अन्ना हज़ारे का समर्थन कर रहे हैं. भ्रष्टाचार के विरुद्ध ये एक ऐतिहासिक आंदोलन का रूप ले लेगा. विनोद जी ने लोगों की नब्ज़ पकड़कर लिखा है.

  • 29. 18:38 IST, 16 अगस्त 2011 VARSHA PRAKASH:

    भारत महाविनाश की ओर बढ़ रहा है और इसके लिए ज़िम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ मनमोहन सिंह हैं.वो एक ऐसी सरकार के सारथी बने हुए हैं जिसके घोड़ो पर उनका नियंत्रण नहीं रह गया है. ये सरकार निरंकुश की सारी हदे पार कर चुकी है.अगर आज गांधी जिंदा होते तो वो शर्म से डुबकर आत्महत्या कर लेते.इस सरकार ने देश की भोली जनता के विश्वास को धोखा दिया है.जब देश में एक आम आदमी अपनी बात नहीं रख सकता तो ये कैसा लोकतंत्र है.

  • 30. 20:14 IST, 16 अगस्त 2011 arvind:

    सरकार ये भूल चुकी है कि हम आज़ाद है.क्या कांग्रेस की रैलियों में दिल्ली पुलिस कोई शर्ते लागू करती है.देश की जनता को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की जा रही है.

  • 31. 20:22 IST, 16 अगस्त 2011 pramod kaunswal:

    विनोद भाई, आपने कई किंतु परंतु किए हैं, मुझे राजेंद्र माथुर के लिखे संपादकियों की याद दिलाते हैं जो अपने शिल्प में काफी जलेबीदार होते थे- यानी जैसे बहुत सी बुराइयां करने के बाद भी- वह कांग्रेस में ही कांग्रेस का विकल्प तलाशते थे...आपकी बात का साफ़ सुथरा निचोड़ यही लाइनें हैं, और उनसे तमाम देशवासी सहमत होंगे-..... मैं मानता हूँ कि चाहे जैसे भी लोग हमारे संसद में हों, चाहे राजनीतिक पार्टियाँ जैसी भी हों, चाहे बहुत से राजनेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हों, लेकिन हमें कोई ऐसा रास्ता अख़्तियार नहीं करना चाहिए जिससे कि हमारा लोकतंत्र कमज़ोर पड़ता दिखता हो.

  • 32. 23:12 IST, 16 अगस्त 2011 Brajesh kumar:

    भ्रष्ट प्रधानमंत्री की सफ़ेदपोशी पर एकदम शत प्रतिशत सही ब्लॉग आपने लिखा है और खुशी इस बात कि है कि जनता भी समझदार हो गई है तभी तो सभी टिपण्णी सटीक हैं.

  • 33. 06:56 IST, 17 अगस्त 2011 ravindra:

    अन्ना आज आंदोलन का प्रतीक बन गए हैं.इस देश का युवा वर्ग ईमानदार और मेहनती है और इसलिए वहां बेईमान नेताओं से कुपित है.अन्ना कहा-कहा लड़ेगे.

  • 34. 10:45 IST, 17 अगस्त 2011 Ram Krishna Verma:

    हमारे नेताओं ने पूरी मानव जाती और इंसानियत को शर्मसार किया है. इनको ईश्वर किसी भी क़ीमत पर माफ़ नहीं कर सकता. इसका परिणाम इतना भयंकर होना है कि ये कल्पना भी नहीं कर सकते कि क्या होने वाला है. मेरे पूज्य गुरुदेव महात्मा श्री रामचन्द्र जी (बाबूजी महाराज , शाहजहांपुर) ने कहा था कि नेचर बहुत गुस्से में है और रामायण और महाभारत काल से ज्यादा भयंकर विनाश होने वाला है और इसके लिए प्रकृति उचित समय का इंतज़ार कर रही है.

  • 35. 13:39 IST, 17 अगस्त 2011 BINDESHWAR PANDEY BHU:

    देश के सर्वेसर्वा प्रधानमंत्री को माना जाता है और वे अपनी जवाबदेही से पीछा छुड़ाना चाहते हैं यही तो देश का दुर्भाग्य है.कमज़ोर लोकतंत्र की शुरुआत तो उसी समय हो गई थी जब देश में कठपुतली नेता का चुनाव हुआ .मजबूत लोकतंत्र के लिए एक सशक्त प्रधानमंत्री का होना पहली शर्त होती है .प्रधानमंत्री जब वास्तव में शक्तिशाली होगा तभी वह समस्त मंत्रालयों में समन्वय स्थापित कर सकेगा.

  • 36. 05:26 IST, 18 अगस्त 2011 शोभित:

    इस विषय पर कई बिन्दुओं पर ध्यान आकर्षण करने कि ज़रूरत है. पहला, अगर हम सही मायनों में समझदार हैं तो ये समझाना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री जी देश के नेता के नहीं, एक राजनितिक नेता की भूमिका निभा रहे हैं. जो कि हम कई सालों से देखते आ रहे हैं. इसलिए इसके लिए खुद अर्थात देश की जनता को दोषी ठहराना गलत नहीं होगा. क्योंकि हम ही बार-बार (50 सालों से) गलती दोहरा रहे हैं. दूसरा, जब विपक्षी दल के नेता हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी को "कमजोर प्रधानमंत्री" कि संज्ञा देते हैं तो हम उनका भी प्रत्यक्ष समर्थन नहीं करना चाहते . शायद हम चाहते ही नहीं कि राजनितिक नेता देश की सरकार का भी प्रतिनिधित्व करें और शायद उच्च न्यायालय के हाथ में ही देश को सोंप देना चाहिए. तीसरा और अंतिम बिंदु, जहाँ तक दूरसंचार विभाग के घोटाले का सवाल है, सबको परेशानी यही है कि कद्दू कटा लेकिन सबमें क्यों नहीं बटा और "सबमें" आम जनता भी शामिल है . हम चाहते हैं कि घोटाले में छोटे स्तर से लेकर मंत्रियों तक सभी शामिल हों, जैसे घोटाले ऐसी योजनाओं में हों जिसमें पैसा ग्राम पंचायत तक तक को मिले, जैसे नरेगा योजना . शायद इसलिए ही पंचायती राज को पूरे देश में समर्थन भी मिला. कुछ प्रतिशत तक वास्तविक रूप में इन योजनाओं का फायदा भी हुआ है लेकिन 60 से 70 प्रतिशत तक ज़मीनी स्तर पर कुछ खास असर देखने को नहीं मिला. जनता खुश बस और क्या चाहिए. वापस अपने मुख्य बिंदु की ओर, लोकतंत्र का दूसरा नाम अगर आन्दोलन ही है तो हम इसी आन्दोलन के भंवर में फंसे रहेंगे, अगर हम अपने विकल्पों का सही अध्यन नहीं करेंगे और उसमें से सही विकल्प नहीं चुनेंगे, क्योंकि बस वही हमारे हाथ में है. मुझे एक मंत्री का कथन याद आ गया लोकपाल के बारे में जो काफी हद तक सही भी है, "अगर सभी बेईमान हैं तो क्या लोकपाल स्वर्ग से टपकेगा"

  • 37. 11:17 IST, 18 अगस्त 2011 देश के सर्वेसर्वा प्रधानमंत्री को मा�:

    देश के सर्वेसर्वा प्रधानमंत्री को माना जाता है और वे अपनी जवाबदेही से पीछा छुड़ाना चाहते हैं यही तो देश का दुर्भाग्य है. प्रधानमंत्री जब वास्तव में शक्तिशाली होगा तभी वह समस्त मंत्रालयों में समन्वय स्थापित कर सकेगा

  • 38. 11:23 IST, 22 अगस्त 2011 Aryan Siddharth Singh Guatam:

    मैंने कई लोगों से पूछा कि वो क्यों अन्ना हज़ारे का समर्थन कर रहे हैं. मैंने उनसे कहा कि मैं भी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हूं लेकिन क्या आप मुझे बता सकते हैं कि भ्रष्टाचार की मूल वजह क्या है और इसका समाधान क्या है तो इसका कोई सज्जन जवाब नहीं दे सके.
    कृपया किसी को दोषी ठहराने से पहले कोई तो मेरे इस सवाल का जवाब दे.

  • 39. 18:23 IST, 31 अगस्त 2011 baijnath:

    जो बात संसद के अंदर और बहार राजनैतिक तरीके से लड़ी जा सकती थी उसको संसद की मर्यादा के साथ जोड़कर आखिरकार क्यों लड़ा गया? क्या सरकार यह बताना चाहती है कि संसद सिर्फ़ चुने हुए चंद सांसदों की ही धरोहर है? या सिर्फ़ राजनेताओं की जमींदारी है संसद? कि वे जैसा चाहे वहाँ बैठकर करते रहे जनता कुछ भी आवाज़ उठाएगी तो संसद की मर्यादा समाप्त हो जाएगी तो फिर यह कैसा लोकतंत्र है?

  • 40. 00:24 IST, 25 अक्तूबर 2012 Hemlata:

    क्या आपको लगता है कि मनमोहन सिंह को कोई दूसरा काम नहीं है? अन्ना हज़ारे को भ्रष्टाचार के मामलों को जुड़े विभागों के सामने रखना चाहिए.

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