भ्रष्टाचार और ईमानदारी
हाथ में तिरंगा झंडा लेकर सड़कों पर भारत माता की जय करने में मज़ा बहुत आता है. उस पर भी जब ट्रैफिक वाला न टोके और पुलिस वाला रास्ता दे दे तो क्या ही कहने..
सच में लगता है किला फतह हो गया. रात के साढ़े नौ बजे ऑफिस आते समय ऐसे ही नज़ारे देखता हुआ आया हूं. बाइकों पर बिना हेलमेट नौजवान. उन्हें पता है हाथ में आज तिरंगा है या अन्ना की तस्वीर है तो कोई ट्रैफिक वाला रोकने की हिम्मत नहीं करेगा.
मुझे भी भ्रष्टाचार से बहुत समस्या है. मैं भी इसका विरोध करता हूं लेकिन इंडिया गेट पर अन्ना के समर्थन में नहीं जाऊंगा मैं क्योंकि मुझे पता है कि ज़रुरत पड़ी तो मैं फिर से अपना काम घूस देकर करवाऊंगा.
चाहे बच्चे का एडमिशन हो या गैस का कनेक्शन. स्कूल के टीचर और कनेक्शन देने वाला भले ही इंडिया गेट पर हो लेकिन एडमिशन या कनेक्शन देते समय वो बिना जेब गर्म किए काम नहीं करेगा.
मैं चाहता हूं कि मैं ईमानदार हो जाऊं अपने प्रति...अन्ना के प्रति नहीं. ऐसा नहीं है कि भारत में सारे लोग ही भ्रष्ट हो गए हैं और ऐसा भी नहीं है कि जनलोकपाल से सारा भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा. बात ईमानदारी बरतने की है. अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब में कितने लोग ईमानदारी से कह सकते हैं कि वो अपना कोई भी काम बिना घूस दिए या लिए नहीं करेंगे.
हाथ में तिरंगा ले लेने से और भारत माता के जयकारे लगाने से कोई ईमानदार नहीं हो जाता. ईमानदारी जीवन में रचने-बसने की चीज़ होती है और ईमानदार का जीवन कठिन होता है.
हमारे एक परिचित सरकारी अधिकारी हैं. बिचारे ईमानदार हैं. उनके ख़िलाफ़ उच्च स्तर पर शिकायत की गई है और ट्रांसफर किए जाने का ख़तरा मंडराता रहता है उनके सर पर. लेकिन वो फिर भी ईमानदार हैं. भारत ऐसे ही लोगों से चल रहा है.
तिरंगा लहराने वालों से नहीं.
इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना को विरोध करने का हक है और उनसे साथ सरकार का बर्ताव अत्यंत ख़राब ही कहा जा सकता है. दो बार सरकार बनाने वाली कांग्रेस के मंत्रियों का अहंकार किसी से छुपा नहीं है.
भ्रष्टाचार को लेकर आम लोगों की नाराज़गी भी किसी से छुपी नहीं है लेकिन एक ऐसा माहौल बन रहा है जिसमें कोई अपनी आलोचना बर्दाश्त करने को तैयार नहीं. न सरकार न अन्ना और न ही तिरंगा उठा कर टीवी कैमरों को देख कर उन्माद में आने वाला मध्य वर्ग.
रही बात जनलोकपाल बिल की या किसी भी और बिल की तो बिल से समस्याएं जड़ से नहीं ख़त्म हो जातीं. दहेज़ प्रथा, जाति प्रथा और न जाने कितनी बुराइयों के ख़िलाफ़ कड़े क़ानून बने है लेकिन क्या ये ख़त्म हो गए.
अगर ये खत्म हो जाते तो देश के जाने माने अख़बारों में अपनी जाति की लड़की-लड़का खोजे जाने के बड़े बड़े विज्ञापन नहीं आते और आज भी लाखों रुपए दहेज़ नहीं दिया जाता.

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सुशील जी,
आपने भी क्या बेतुका लेख लिखा है. समझ में नहीं आया की क्या कहने की कोशिश थी आपकी. आम आदमी हर कदम पैर भ्रष्टाचार से लड़ता है. लेकिन आज के सिस्टम में उसकी सुनने वाला कोई नहीं है. जन लोकपाल से एक आशा-विश्वास जागा है लोगो में. ये उन्माद उसी की अभिव्यक्ति है. ये देश ऐसे ही किसी उन्माद से जागेगा और ये सिस्टम में सुधार होगा. जन लोकपाल कितना प्रभावी होगा पता नहीं, लेकिन आज के आम आदमी को इसने उठ खड़े होने की हिम्मत दी है और ये सराहनीय है.
संजय.
जहाँ पूरा देश अन्ना के इस क़दम को सही कह रहा है वहीँ आप को ये ठीक नहीं लग रहा है मुझे नहीं पता ऐसा क्यों ? लेकिन इतना तो आपको भी मान ही लेना होगा कि देश की जनता पागल नहीं है जो अन्ना के लोकपाल का समर्थन कर रही है .
इस लेख को व्यावहरिक रूप से सही मनाता हुँ. हर एक आदमी हर पल , हर जगह जागरूक रहे तो किसी की ज़रुरत नहीं. लेकिन हमारे जैसे देश में मुझे लगता है कुछ ऐसा ही करना पड़ता है कि कि लात के भूत बातों से नही मानते है . दहेज़ और जाति प्रथा संबंधी कानून की तरह इसकी भी वही हालत हो सकती है , लेकिन बीच बीच में अन्ना पैदा होते रहें तो लोकपाल कुछ करेगा और ऐसा होना भी चाहिए
सुशील जी मैं आपसे सहमत हूँ.
आप जो बात कर रहे है अगर वैसा हो जाये तो फिर किसी क़ानून की ज़रुरत ही नहीं और न पुलिस की. सब अपने आप ही ईमानदार हो जायेंगे तो सब कुछ ठीक हो जायेगा ऐसा सोचना ,मुझे बेवकूफी भरा विचार समझ में आता है .
अन्ना राम लीला मैदान में आनेवाले लोगों से घूस न लेने और और न देने की कसम खिलवाकर ही अनशन को जारी रखे.परिवार के लोग संकल्प ले.कि घूस की रकम से चूल्हा नहीं जलेगा,घूस देने वाले का बहिष्कार घर के अन्दर और बाहर जारी रहेगा.गुटका खाते हुए अन्ना जिंदाबाद का नारा न लगाये.
सही कहते हो आप, मेरा भी यही सोचना है..इतने सारे बिल बने और क़ानून बने हुए है क्या समस्या जड़ से ख़तम हुई, मैं अपने कई दोस्तों से मिला जो लोकपाल बिल का समर्थन करते हैं,लकिन जब उनसे पूछो इस बिल मैं है क्या तो उन्हें कुछ नहीं पता...बस सप्पोर्ट कर रहे है...भ्रस्ताचार तो हम खुद भी ख़तम कर सकते है अगर सुच मैं ठान ले तो...लेकिन नहीं हमें पीछे चलने के आदत है...जब तक कोई आगे बड़ कर हमें लीड न करे हमें समझ नहीं आता...पता नहीं हम कब जागेंगे...अगर कल को अन्ना घर चले जायेंगे तो क्या होगा?
सुशील जी मैं आपके विचारों से सहमत हूँ. लोगों को आपके विचारों को ठीक से समझना चाहिए.
आम आदमी भ्रष्टाचार से लड़ता नही भ्रष्टाचार से समझौता करके निकल जाता है संजय भाई
अगर आम आदमी भ्रष्टाचार से लड़ता तो भ्रष्टाचार कब का समाप्त होगया होता और यही सुशील जी कहना चाहते है अपने आप से ईमानदारी बरतते हुये भ्रष्टाचार से लड़ने की ज़रूरत है.भ्रष्टाचार से लड़ने का दिखावा करने का नहीं अगर हम ऐसा करते है तो हमें किसी अन्ना की ज़रूरत नहीं.
इस देश में कानूनों की कोई कमी नहीं . जिस विषय पर चाहो - क़ानून बन सकते हैं. जन लोकपाल बिल लोकपाल बिल की तुलना में थोड़ा विवादग्रस्त हो गया है पर क़ानून बना देने से अन्ना भी सिर्फ 60% भ्रष्टाचार पर लगाम लगने की बात कहते हैं. उन्हें मालूम है क़ि इस देश में कानून का पालन कराना इतना आसान नहीं. शायद शुरुआत में उसके लिए भी घूस देनी पड़े और भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़े. पर भविष्य में इसको लेकर जो परिणाम आयेंगे उनसे शायद नए भविष्य का सृजन हो. आप आज क्या हो रहा है इसकी बात न करें तो शायद आपके आशावादी रुख़ का ही पता चले.
सुशील जी, अन्ना के साथ जो हुआ हैं वो गलत हैं ,और सारी राजनैतिक पार्टिया भी गलतिया कर चुकीं हैं. मैं अन्ना के इस आन्दोलन से पूरी तरह इत्तेफाक नहीं रखता, पर हाँ कुछ बातें हैं जिनसे मैं सहमत हूँ. आज भीड़ के हर शख्स के लिए भ्रष्टाचार के मायने अलग अलग हैं अपने साथ हो तो भ्रष्टाचार, दुसरे के साथ होता हैं तो आँख मूंद लेता हैं ये आम आदमी और जो आम आदमी हैं, वो जब किसी आम आदमी के साथ गलत होता हैं तब उसकी कोई मदद नहीं करता , जब तक खुद पे नहीं बीतती यही आम आदमी आम आदमी का दर्द नहीं समझता और देखता. लेकिन फिर भी जो अन्ना ने इस आम आदमी को एक आवाज दी हैं ,हम सबको एक उम्मीद की किरण दी हैं वो क्या कम हैं , आम आदमी में चेतना दी हैं क्या इसकी महत्ता को कम किया जा सकता हैं क्या ? किसी भी आन्दोलन का असर तत्काल नहीं होता आने वाली नस्ले जरुर इसका फायदा पायेगी,
या तो आप कांग्रेस के अंध समर्थक है , या भारत विरोधी है , या फिर मूर्ख है . आप मुझे ये बताइए कि क्या पुलिस की स्थापना से अपराध ख़त्म हो जाता है . नहीं न तो फिर आप के अनुसार पुलिस को भी ख़त्म कर देना चाहिए .
प्रिय सुशील जी,आप विभिन्न संवाददाताओं द्वारा भेजी गयी खबरों को बहुत ही स्पष्ट और सुन्दर तरीके से पढकर सुनाते हैं. मेरा अपना विचार है कि आपके लिए यह कार्य ब्लॉग लिखने से बेहतर है. आपके ब्लॉग में वैचारिक गहराई की जगह सच्चे-झूठे परिचितों और आपबीतियों का जिक्र अधिक होता है जो मुझ जैसे पाठक पर अनुकूल प्रभाव नहीं डाल पाती. धृष्टता के लिए क्षमा चाहूँगा.
ज़िन्दगी की तल्ख़ हैं सच्चाइयाँ,
कम हैं इन्सान ज़्यादा हैं परछाँइयाँ.
सब हुए शामिल फ़तह के जश्न में,
किसने देखीं ज़ख्मों की गहराइयाँ.
सुशील जी , कहीं से तो शुरुआत होनी है . वो जो रिश्वत दे कर अपना काम निकलवाता है , क्या चाहता है कि उसको ऐसा करना पड़े ? नहीं , तो फिर उसकी मजबूरी का फायदा उठाने वाले के ख़िलाफ़ आवाज़ कभी तो उठेगी ही . आप को यह बात समझ आये तो आप भी उठायें
एक जेठमलानी है , जो कि तस्करों और देशद्रोही लोगों की पैरवी में सर्वप्रथम आगे आते है . हाँ जी अगर मुझे फ़ासी हो तो कोई आगे नहीं आएगा पैरवी करने .ब्लॉग पढ़ कर लगता हैं कि सरकारी परोकर ने लिखा होगा,क्या आप धृतराष्ट्र -गंधारी -दुर्योधन -दुशाशन -शकुनी के हितैषी हैं ?खूब लिखा है जलेबी जैसी छद्मवेशी पत्रकारिता .
लेख बेतुका और बकवास है,पढ़ने के बाद लगा ही नहीं कि जिसे पढ़ा जा रहा है वो बीबीसी का पत्रकार है .
सुशील जी मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ.
भारत देश में विभिन्न संस्कृतियों का समागम एकत्र है इन्ही संस्कृतियों के सहारे भ्रष्टाचार भी आया जिसमें पूर्व से लेकर पश्चिम तक में फेले भ्रष्टाचार को समेट लिया. आज हर आवश्यकता काले धन से ही देश में पूरी होती है. हर धनाढय अपने पीछे का काले साये को लेकर चलता है जिसका साथ राजनीतिज्ञों द्वारा सदैव दिया गया क्योंकि उन्हें तो हरदम सत्ता का सुख चाहिये .इस सुख के लिए चंद टुकडे फेंको और हथियालो सब कुछ इसमें अन्ना को दोष क्यो दिया जाये.यदि अन्य इतने बुरे हैं तो इस देश में से कुछ टुकडे काटकर अन्ना देश ही बना दे सरकारजी
ये बिलकुल सतही स्तर पर लिखा गया लेख है जिसमें कोई हल तो है नहीं बल्कि उलटे रोज -मर्रा की समस्याएं ही बताई गयी हैं . कृपया थोडा ऊपर उठ कर सोचे और ऐसे सतही लेख लिखने से बचें . और जिस चीज की आपप बात कर रहे हैं वो कुछ हद तक स्कूली पाठयक्रम में नैतिक शिक्षा लागू करके हल की जा सकती है . पर यहाँ पर बात सुधारों की है जो कि कही बड़े हैं .
सुशील जी, आपकी बात अक्षरशः सत्य है.भ्रष्टाचार ऊपर की समस्या कम नीचे की ज्यादा है. सच्चाई यह है कि 100 में से 90 बेईमान फिर भी मेरा भारत महान.
सुशील जी अपने बड़ी ईमानदारी से अपनी बात कही है .लकिन अभी अन्ना के आन्दोलन को दूसरी बातों से कमज़ोर न करें .अन्ना का समर्थन सब ईमानदार कर रहे हैं ये ज़रूरी नहीं .हाँ अन्ना के बातों में दम हैं और सरकार इसमें न क्यों कर रही है ?आप कहतें हैं कानून बनाने से समस्या समाप्त नहीं हो जाती लेकिन कम ज़रूर हो जाती है .
सुशील भाई यह मानता हूँ कि आप अच्छा लिख लेतें हैं, पर पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगता है कभी कभी आप कांग्रेस पार्टी की तरह व्यवहार करने लगते हैं. आप या तो मुद्दे से भटक जातें है या भटकाने की कोशिश करते हैं, बीबीसी की तो बात अलग है पर मुझे कभी कभी मीडिया की नियत पर संदेह होने लगता है, खासकर ख़बरिया चनेलों पर, जहाँ वे सत्ताधारी पार्टी से काफी पैसा खातें हैं वहीं एक सही आदमी को बदनाम भी करते हैं. उदहारण के लिए भाषा में काफी परिवर्तन कर देतें है जैसे रामदेव के लिए " रामदेव ने दागा तोप" की अमुक राजनेता के विदेश में पैसे हैं . क्या वे यह नहीं कह सकते थे की रामदेव ने "आरोप लगया" के अमुक राजनेता के विदेश में पैसे हैं. अब आप इस लेख से क्या कहना चाहते हैं, हमारा व्यवहार निश्चय ही आत्ममंथन का विषय है पर ऐसे समय पर नहीं जब समर्थन करना हो तो आत्ममंथन करने लग जाओ जब आत्ममंथन करना हो तो कोई और काम करो. अभी तो फ़िलहाल अन्ना को समर्थन करें नहीं तो ज़िंदगी भर भ्रम रहेंगे..बिलकुल अपने लेख की तरह.जब बिल पास हो जाये तो इस लेख का स्वागत और अच्छे से होगा .
काफी कड़वा और सच्चा ब्लॉग है और मैं पूरी तरह सहमत हूँ. आज हिन्दुस्तानी समाज , संस्कृति और लोगों में भ्रष्टाचार अंदर तक समा गया है . पहले लोगो को अपने अंदर रिश्वत लेने और देने की प्रथा ख़तम करनी होगी . आज जो लोग सड़को पर मोमबत्ती , धरना कर रहे है यह वही लोग है जो रोज़ रिश्वत लेते और देते है . बिना रिश्वत लिए कोई काम नहीं करते है . गाँधी के देश मे लोग नीचे से लेकर ऊपर तक भ्रष्ट है . आज रिश्वत का बोलबाला है . बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता और ऐसे लोग सड़को पर है. हंसी आती है इससे अच्छा घर पर रहते . अगर देश की इतने ही चिंता है तो आज से ही रिश्वत लेना और देना बंद कर दें, भ्रष्टाचार अपने -आप ख़तम हो जाएगा . यह सड़कों पर नौटंकी करने से कोई फ़ायदा नहीं है . जब गाँधी जी ने आन्दोलन किया थे तो उनके साथ ईमानदार लोग थे . अन्ना के आन्दोलन मे जो देश के लोग खड़े है वो सब के सब रिश्वतखोर है .
सुशील जी ने वैसे ठीक ही लिखा है.क्यूँकि ईमानदारी का गुण किसी मैं भी दवाव से नही डाला जा सकता है .
उस आसमां को बदलो जो बिजली गिराता है,
उस नाखुदा को बदलो जो कश्ती डुबाता है
अन्ना से नहीं नफरत, मनमोहन से नहीं शिकवा
उस रहनुमा को बदलो जो दीवार उठाता है.
सुशील जी आपने यथार्थ लिखा है, सचमुच ईमानदार निजी स्तर पर होना पडेगा तभी भ्रष्टाचार खत्म होगा. मैं समझ सकता हूं कि आपका विरोध अन्ना से नहीं है, उनकी भावना से भी नहीं है... हां उनके पीछे खडे उन लोगों से है जो अन्ना को आगे कर लोगों की भावनाओं से खेल रहे हैं, मुझे याद आता है जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बनने से पहले हर मंच से बोफोर्स तोप दलालों के नाम की पर्ची अपनी जेब में लेकर चलने की घोषणा करते थे. कहीं-कहीं वह जेब से कागज़ का एक पुर्जा निकाल कर लोगों को दिखाते हुए कहते थे कि दलालों के नाम उसमें लिखे हुए हैं. प्रधानमंत्री बन गए, हट भी गए और फिर पंचतत्व में विलीन में हो गए लेकिन दलालों का नाम नहीं बताए.तोप दलाली के सवाल पर यहां की जनता ने सरकार बदल दी थी लेकिन उसके बाद उससे बडे घोटाले हुए. लेकिन तोप दलाली के नाम पर एक बार ठगे गए लोग दुबारा कभी घपले, घोटालों के नाम पर विरोध में नहीं खडे नहीं हुए। कहीं ऐसा न हो भ्रष्टाचार के मुद़दे पर भी लोगों की भावनाएं बाद में भोथरी न हो जाएं और भ्रष्टाचारी मजे करते रहें जैसे अब घोटाले बाज़ कर रहे हैं
जो लोग इस ब्लॉग का समर्थन कर रहे हैं उनसे ये कहना चाहूंगा कि वो चतुर हैं..अपने को सुधारने का ये मतलब नहीं है कि हम अन्ना का समर्थन न करें.ये उस मानसिकता का परिचायक है जिसके कारण हम 100 वर्षों तक अंग्रेज़ों के गुलाम रहे.
आप इस ब्लॉग के माध्यम से क्या कहना चाह रहे है ,समझ नहीं आया .बीबीसी में वैसे तो कई अच्छे पत्रकार है इसलिए आपसे निवेदन है कि ऐसे ज्वलंत मुद्दे पर न लिखा करे .
जिस तरह कुछ लेखक, पत्रकार और चैनल के संवाददाता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आंदोलन को हड़पने की साज़िश रचने का आरोप लगा रहे हैं, उससे स्पष्ट है, कि या तो वह पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, या कांग्रेस के धुर समर्थक हैं और उन्हें कांग्रेस की सड़कों पर होने वाली यह छिछालेदर फूटी आंख नहीं सुहा रही है. खैर कारण जो भी हो, इस जनआंदोलन को संसदीय राजनीति के लिए चुनौती और लोकतंत्र के लिए खतरा बताकर आंदोलन का विरोध और कांग्रेस का पक्ष रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार बन्धु और चैनल के बुद्धिजीवी यह तो स्वीकार कभी नहीं करेंगे कि वे जिस संसदीय राजनीति की चुनौती का पक्ष रख रहे हैं, उसके लिए चुनौती अभी-नहीं बल्कि तब खड़ी हुई थी, जब सैकड़ों घोटाले एक-के-बाद एक कर देश की संवैधानिक और चुनी हुई सरकार के मंत्रियों पर जनता का पैसा हड़प करने के आरोप लगे, और उनमें से कुछ मंत्री अब जेल की हवा खा रहे हैं. संसदीय राजनीति की गरिमा तब तार-तार हो गई जब कलमाड़ी, ए.राजा जैसे लोगों को आरोप लगने और सिद्ध होने के बाद भी पद पर निर्लज्जता से बनाए रखा गया, लोकतंत्र के लिए ख़तरा वास्तव में तब उत्पन्न हुआ जब देशहित के मुद्दों को अहिंसक तरीके से उठाने पर रामलीला मैदान में इसी सरकार के प्रतिनिधियों ने आधी रात को अपनी ही जनता के बाल-वृद्ध-महिलाओं पर बर्बर तरीके से लाठियां भांजी थी. "लोकतंत्र को खतरा" और "संसदीय राजनीति" के पैरवीकार क्या संसदीय राजनीति की आड़ में किए जा रहे दमन को न्यायोचित ठहराना चाहते हैं? देश में लोकतंत्र यदि है, तो वह इस देश की स्वाभिमानी और न्यायप्रिय जनता में जीवित है, जो वह अपने अधिकार के लिए अपनी नौकरी, व्यवसाय और रोजमर्रा के कामकाज छोड़कर भ्रष्ट व्यवस्था के विरोध में सड़क पर आ गई है, कम-से-कम उस भ्रष्ट तंत्र में तो कुछ लाज-शर्म बाकी नहीं जो अब भी चरित्रहरण, दमन, और बयानबाजी पर विश्वास करता है. आज जनआंदोलन को जो व्यापक जन-समर्थन मिल रहा है, वह इस बात की प्रतिक्रिया है, कि 5 वर्षों के लिए चुनी गई सरकार का अर्थ 5 वर्ष तक दमन, भ्रष्टाचार, अटकलबाजी और अकर्मण्यता का लाइसेंस नहीं है. जनतंत्र का अर्थ जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा उसके चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन है, इसका अर्थ सरकार की लालफीताशाही तो बिल्कुल नहीं है.सरकार का अर्थ 'माई-बाप' नहीं है, बल्कि सरकार का अर्थ है- जनसेवक, जनप्रतिनिधि.लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति पूरी तरह बिना शर्त और बिना किसी धौंस के जवाबदेह/उत्तरदायी है.
संसद में बैठने वाले नेताओ को आम जनता ऐ.सी. में ऐशोआराम से बैठने के लिए, बल्कि आमजन के हित के लिए, देश के विकास के लिए नीति-निर्धारण करने, योजना बनाने और उसे जमीनी स्तर पर कार्यान्वित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से चुन कर भेजती है.आमजन में प्रतिक्रिया इस बार सभी ओर है, और खुशी की बात है, कि यह प्रतिक्रिया एक योग्य, राष्ट्रभक्त और निष्ठापूर्ण व्यक्ति के निर्देशन में न केवल पूर्णतः अहिंसक है, बल्कि स्वस्फूर्त और देशभक्ति के ज्वार के रूप में परिवर्तन की पावन अभिव्यक्ति भी है. यह देश के प्रति नागरिकों के लगाव और स्नेह का प्रत्यक्ष साक्षात्कार है. देशप्रेम की इस आंधी में यदि किसी को चिंता है तो वह केवल इस भ्रष्ट व्यवस्था के जनक, पालक, पोषक और संरक्षकों को ही है, लेखक, पत्रकार और चैनल के संवाददाता स्वयं विचार करें कि वह किस पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे है. रही बात "संसदीय राजनीति" और "लोकतंत्र को खतरा" जैसे जुमलों की, तो बुद्धिजीवी विचार करें, कि भ्रष्ट व्यवस्थाओं को केवल परंपरा के नाम पर उचित ठहराना कहां तक न्यायसंगत है? आखिर जनतंत्र की अवधारणा भी तो मनुष्य की बेहतरी और हितसाधन का ही माध्यम है, और संप्रति सड़कों पर उतरा अनुशासित लेकिन असंतुष्ट और आक्रोशित जनमानस केवल जनतंत्र पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए सड़कों पर नहीं उतरा, बल्कि जनतंत्र और लोकतंत्र के मुखौटे की आड़ में की जा रही स्वार्थसिद्धि, भ्रष्टाचार और छलावे के विरोध में उतरा है. अच्छा हो कि संपूर्ण घटनाक्रम का ठीकरा आर. एस. एस. के सिर पर फोड़ने के बजाय लेखक, पत्रकार और चैनल के संवाददाता कोई तर्कसंगत समाधान प्रस्तुत करें और सत्तासीन सफेदपोशों के स्वार्थी और धूर्त चेहरे से नकाब खींच कर सच्चाई के पक्ष में समाचार प्रसारित करें.
ये ड्रामा हो रहा है, जो लोग लोकपाल के दायरे में हैं वही सुधर जाएँ तो बड़ी बात है. कोई भी क़ानून बनाकर भारत से भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकता, क्योंकि उसे लागू तो वही लोग करेंगे. भ्रष्टाचारी मंगल ग्रह से नहीं आए हैं वो हमारे परिवार और समाज का ही हिस्सा हैं. क्या कोई अपने परिवार के भ्रष्टाचारी से नफ़रत करता है? नहीं बल्कि उनके कमाई पर ऐश करते हैं. अन्ना हजारे का अनशन और आंदोलन चार दिन के लिए है इससे कुछ नहीं होने वाला. क्या अन्ना ये ज़मानत दे सकते हैं कि लोकपाल के बाद भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा
सरकार अपना काम कर रही है. अन्ना हज़ारे को सरकार को मजबूर नहीं करना चाहिए. उनके अनशन से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा. भ्रष्टाचार के लिए जनता भी दोषी है.अन्ना हजारे जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं. क़ानून बनाना संसद का काम है, अन्ना हज़ारे का नहीं. जब जनता सही लोगों को संसद में भेजेगी तभी सही क़ानून बनेगा. इस समय कोई भी सरकार होती तो वो यही करती. विपक्ष को पहले भाजपा शासित राज्यों से भ्रष्टाचार खत्म करना चाहिए और फिर केन्द्र को दोष देना चाहिए. श्री अन्ना को प्रदर्शन के अधिकार का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए
लाचारी एक आम आदमी की, रोजमर्रा की चीजों के लिए ...
मेरा ऐसा मानना है, यधपि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं है, कि हमारे समाज में 10% लोग शायद विशुद्ध रूप से ईमानदार हैं . 80% लोग कभी लालच में पड़ जाते है, तो कभी मज़बूरी से समझौता कर लेते हैं. यदि व्यवस्था सही हो तो इस वर्ग के लोग ज्यादातर समय सही से काम करना पसंद करेंगे. शायद 10 % लोग ऐसे हों, जो पूरी तरह से भ्रष्ट समाज में जीना पसंद करेंगे. फिर भी, यदि सही कानून के साथ प्रोधौगिकी का प्रयोग (जैसे रेलवे में स्वेपिंग मशीन से टिकटों की चेकिंग ) हो तो काफी हद तक समाज और देश बदला जा सकता है. रही बात जन लोकपाल की, तो मान ले, हमारे जीवन में 5000 समस्यायें है , तो हम समस्याओं को वर्गीकृत कर सुलझाने की कोशिश करेंगे, या रोते रहेंगे. हो सकता है जीवन भर में कुल 50 ही समस्या सुलझा पांए, लेकिन जीवन कुछ तो बेहतर होगा. वही बात देश एवं जन लोकपाल पर भी लागू होता है. जहाँ तक लोगों के प्रदर्शन को दोहरे मानकों की बात कहीं है, हो सकता है, बात थोड़ी सही भी हो, लेकिन फिर भी एक संकल्प या आशा तो दिखती ही है.
तरस आता है उन लोगों पर जो अन्ना और उनके समर्थकों के विरोध प्रदर्शन से उठे सैलाब को महज़ दो टके की भीड़ का नाम देते हैं.
लगता है जन आन्दोलन करना और सामाजिक सुधार के विषयों से सम्बंधित बहस में शामिल होने का ठेका सिर्फ दिल्ली में बैठे कुछ खास वर्ग और उनके चमचों को ही है. जब इन लोगों की यह ठेकेदारी उनके हाथ से खिसकती आम जनता के हाथ में दिखाई देती है तो उन जैसे ख़ास लोगों को बड़ी तकलीफ होती है.
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाजुओं को देख, पतवारे न देख.
सुशील साहब क्या आप दोनों पक्षों को संतुलित करने का प्रयास कर रहे हैं? उन्हें वाणी देने का प्रयास कर रहे हैं ? आप सही अर्थो में व्यावसायिक पत्रकार हैं !
सुशील जी आपका ब्लॉग पढने के बाद मुझे लगता है की आपने बेतुका लेख लिखा है क्योकि
1- ऑफिस जाते समय नज़ारे देख रहे है और आप खुद ही महसूस कर रहे है की ज़रुरत पड़ी तो मैं फिर से अपना काम घूस देकर करवाऊंगा. मतलब आप खुद भ्रष्टाचार के अनुयायी है.
2- जन लोकपाल को कानून बनाने से 100% भ्रष्टाचार तो नहीं मिटेगा, क्योकि दुनिया में कोई चीज आदर्श नहीं है, लेकिन बहुत हद तक रुकेगा. हमारे देश में बहुत कानून है और ज्यादातर कानून प्रभावशाली नहीं है. इस देश में लोकतंत्र है न की तानाशाही. जो कुछ लोग इस देश के लिए कानून बना रहे है , वो इस जनता के सेवक है , और एक सेवक के अपने मालिक से एक बार मशविरा करने में क्या दिक्कत है ?
पत्रकार महोदय पानी सिर से ऊपर जा चुका है.अब तो मीडिया को उत्तर ख़ोजना है कि भारत का होस्नी मुबारक कौन हैं?.
सुशील जी यह बात तो खुद अन्ना भी स्वीकार कर रहे हैं कि जनलोकपाल के आने के बाद भी भ्रष्टाचार पूरी तरह से समाप्त नहीं होने वाला है फिर भी कुछ तो फर्क पड़ेगा ही चाहे वह एक प्रतिशत ही क्यों न हो.
एकदम सही बात लिखी है.
बिल्कुल सही लिखा है सुशील जी..मैं सहमत हूं आपसे.
सुशील जी, आपकी बात अक्षरशः सत्य हैं.भ्रष्टाचार ऊपर की समस्या कम नीचे की ज़्यादा है. सच्चाई यह है कि 100 में से 90 बेईमान फिर भी मेरा भारत महान.
आज जो लोग सड़को पर मोमबत्ती , धरना कर रहे हैं ,यह वही लोग है जो रोज़ रिश्वत लेते और देते है . बिना रिश्वत लिए कोई काम नहीं करते है..... गाँधी के देश में लोग नीचे से लेकर ऊपर तक भ्रष्ट है . आज रिश्वत का बोलबाला है . बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता और ऐसे लोग सड़को पर है. हंसी आती है इससे अच्छा घर पर रहते . अगर देश की इतनी ही चिंता है तो आज से ही रिश्वत लेना और देना बंद कर दें. भ्रष्टाचार अपने -आप ख़त्म हो जाएगा . यह सड़कों पर नौटंकी करने से कोई फ़ायदा नहीं है . जब गाँधी जी ने आन्दोलन किया था तो उनके साथ ईमानदार लोग थे . अन्ना के आन्दोलन मे जो देश के लोग खड़े है वो सब के सब रिश्वतखोर है .
अन्ना राम लीला मैदान में आनेवाले लोगों से घूस न लेने और और न देने की कसम खिलवाकर ही अनशन को जारी रखे.परिवार के लोग संकल्प ले.कि घूस की रकम से चूल्हा नहीं जलेगा,घूस देने वाले का बहिष्कार घर के अन्दर और बाहर जारी रहेगा.गुटका खाते हुए अन्ना जिंदाबाद का नारा न लगाए.
ये क्या विधवा विलाप लगा रखा है.शायद आप दुखी तो हैं लेकिन आपको न अपने पर विश्वास है ना जो जनशक्ति है उस पर.पहले नियम बनाने दो फिर नीयत भी बदलेगी.
कुछ लोगों की आदत होती है सही को ग़लत साबित करने की. मुझे ये नहीं समझ आ रहा है कि कह तो बहुत से लोग रहे है कि जब हम सुधरेंगे तो समाज में भी सुधार आएगा लेकिन सुधरना कोई नहीं चाह रहा है बस ये बातें कह रहे हैं.ये लोग बस ये बातें कह कर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं.
भीड़ पर ये सवाल करना कि इसमें शामिल कितने लोग व्यक्तिगत रूप से नैतिक और ईमानदार हैं इसे जायज़ नहीं कहा जा सकता. इसी भ्रष्ट तंत्र ने हमको-आपको विवश किया है कि रोज़मर्रा के कामों में कुछ ले दे कर निपटाया जाए, अन्यथा आपकी आत्मा भी फाईलों में ही भटकती रहेगी. ....................
इस भीड़ में गाँव,मज़दूर दलित और आदिवासी नहीं है.ये विद्वान कह रहे हैं की वो टीवी नहीं देखते और फेसबुक,ट्विटर के अंतरजाल तक उनकी पहुँच नहीं है इसलिए उदासीन हैं.
तरस उनकी सोच पर, इस उभार ने आम आदमी के अन्दर के आक्रोश को अभिव्यक्ति दी है. .अन्ना और टीम (कभी टीम जेपी या टीम गाँधी नहीं सुना था) के बहाने सडकों पर निकले लोग ये बता रहे हैं की जैसा संविधान कहता है की "हम भारत के लोग " यानी केवल चुनाव जीतने हारने वाले ही नहीं,नीति निर्धारण में भागीदारी चाहते हैं.यह भीड़ रामलीला के ख़त्म होने के बाद घर में फिर लौटेगी तो सही पर जो लोग जल , जंगल, ज़मीन और आदमजात को बचाने के लिए काम कर रहें हैं उनके लिए शुभ संकेत भी है की निराश होने की ज़रूरत नहीं है इस आंदोलन से सरकार बहादुर के सामने भी ये सवाल उठा है कि आखिर जनता को कब तक नकारते रहा जाए.
लोकतंत्र में कुछ पत्रकार लोग भी होते है जो कि आम परिवार से आते हैं, माल मिलते ही अभिजात्य वर्ग बन जाते हैं.लोकतंत्र में राजा-रानी,पुलिस और मीडिया मिलजुल कर शोषण करते हैं और ये पैसा बाहर के बैंक में जाकर जमा हो जाता है.
अपने निजी स्वार्थ के लिए पूरे देश की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती है.अन्नाजी जो कुछ कर सकते थे कर रहे हैं.वे बिल्कुल सही कर रहे है.अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं.
बहुत अच्छा विचार है आपका.
सुशील जी, बेशक ईमानदारी ज़रुरी है लेकिन क्या आपको लगता है कि अपने आप से जूझते लोग जो आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक हर क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं वो बेईमान होते हैं? बेशक हाथ में तिरंगा और भारत माता की जय कहने से कोई देशभक्त और देशहित के लिए काम करने वाला नहीं बन जाता. ये भी मानता हूं कि जनलोकपाल भ्रष्टाचार के लिए रामबाण साबित नहीं होगा, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ये शक्तिबाण साबित होगा. एक नागरिक के तौर पर अपने विचार रखने के लिए आप स्वतंत्र हैं लेकिन एक पत्रकार के तौर पर आपकी ये बात जंची नहीं. मैं कहूंगा बिल्कुल बकवास तर्क दिया है आपने. अन्ना के समर्थन में अंधभक्ति नहीं करनी चाहिए लेकिन थोड़ा व्यावहारिक तो होना पड़ेगा. हम भावुक होकर किसी आंदोलन का समर्थन करते हैं बात ऐसी नहीं है और न ही तिरंगा लिए सारे लोग बेईमान ही हैं, अपवाद हर जगह होते हैं और फिर इस लड़ाई को सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार खत्म नहीं होने वाला और आंदोलन में शामिल लोग भी भ्रष्ट हैं. ये लड़ाई उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ भी है जो लोगों को घूस देने और लेने के लिए मजबूर करता है. हर आदमी ईमानदार होता है भाई, कोई बेईमानी करना नही चाहता लेकिन उसे मज़बूरी में ऐसा करना पड़ता है. अस्पतालों में उसे ज़्यादा पैसे देने पड़ते हैं नहीं तो उनके अपने सदा के लिए इस दुनिया से चले जाएंगे. सीट नहीं मिलेगी. किसी भी प्रकार का प्रमाण पत्र बनाने के लिए पैसे देने पड़ते हैं नहीं तो पेट के लिए मिल रही एक नौकरी भी हाथ से चली जाएगी क्योंकि अधिकारी समय पर काम नहीं करते. उसे ऐसा करना पड़ता है क्योंकि वह मजबूर है. वो आम आदमी है उसके पास न तो पैसा है, न पावर है, न वो नेता है और न ही दबंग. इस समाज के तथाकथित सामाजिक नियमों में बंधा हुआ वो एक आम आदमी है जिसकी जिंदगी का ज़्यादातर वक़्त अपने और परिवार के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ करने में बीतता है. दिन भर पसीना बहाकर काम करना पड़ता है तब शाम में उसके घर का चूल्हा जलता है उसपर मंहगाई का ये आलम है. इसके लिए जिम्मेदार कौन है? ये लड़ाई इसलिए भी है, लेकिन पता नहीं आप जैसे शिक्षित, जागरूक और सम्मानीय लोगों को ये बात समझ में क्यों नहीं आती. माफ़ करेंगे जब कोई बेतुके तर्कों के साथ सही चीज़ों को काटने की कोशिश करता है तो मेरे शब्द कड़े हो जाते हैं. आप कह रहे हैं घर लौटकर सभी घूस देकर काम करवाएंगे. क्या आप ये समझते हैं कि इस लड़ाई की उपलब्धि तभी होगी जब सारे ईमानदार लोग शामिल होंगे और घूस देना और लेना बंद हो जाए? क़तई नहीं. हजारों भ्रष्टों में अगर एक भी इस लड़ाई के बाद ईमानदार हो गया तो ये इस लड़ाई की उपलब्धि होगी. 74 साल के उस बूढ़े के संघर्ष की ये सकारात्मक परिणति होगी. क़ानून तो बाद में बनेगा. आपका ये आलेख मुझे एक कहावत याद दिला रहा है कि जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था. पूरा देश आंदोलित है और आप ईमानदारी की दुहाई देकर लड़ाई पर ही प्रश्नचिंह लगा रहे हैं?
आपने बिल्कुल सच बयान किया है और यही हक़ीकत है पर मैं उम्मीद करता हूँ की काश ऐसा न होता. मैं आज अन्नाजी की रैली में गया ये जानते हुए भी की अगर वक़्त आया तो मैं भी ट्रैफ़िक पुलिस वाले को पचास रूपये देकर निकल जाऊंगा. पर हमलोग रिश्वत स्वेच्छा से नहीं देते हम मजबूर हैं इस सिस्टम से. लेकिन अब पानी सर से ऊपर जा चुका है. ये भी सच है की सिर्फ़ लोकपाल के आने से सबकुछ ठीक हो जाएगा शायद ऐसा भी नहीं है. जैसा की प्रधानमंत्री जी ने भी कहा की भ्रष्टाचार कोई जादू की छड़ी से ठीक नहीं हो सकती. इसके लिए एक बदलाव की आवश्यकता है. लेकिन मुझे डर है, क्योंकि हमारी याददाश्त काफी कमज़ोर होती है वह एक रबर की तरह होती है जिसे खींच कर छोड़ दो तो फिर से पुराने स्वरुप में आ जाती है. परन्तु फिर भी मुझे उम्मीद है क्योंकि रबर भी एक बिंदु से आगे खींचने पर वापस पुराने स्वरुप में नहीं आती.
अन्ना हज़ारे के आंदोलन से मदद तो ज़रुर मिलेगी लेकिन जब तक हर व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेगा तब तक कुछ नहीं हो सकता.
बिल्कुल सही लिखा है सुशील जी..मैं सहमत हूं आपसे.
आप की पहली पंक्ति से लगता है कि आप बहुत सचेत हैं और दूसरा कालम यह प्रश्न पैदा करता है कि आखिर लोगों कि ऐसी सोच बन क्यों गई है? कभी किसी पुलिस वाले को हेल्मट पहने देखा है ? और अगर देखा है तो बेचारे की क्या मजबूरी होगी, राम जाने. डर दिखाकर ज्यादा दिन राज नहीं किया जा सकता. तीसरे कालम में आप बहुत सच्चे पर तोते कि तरह बोल रहे हैं. आप ईमानदार होना चाहते हैं, मतलब अभी आप ईमानदार नहीं हैं. कोई भी नहीं कह सकता कि वह अपना काम ईमानदारी से कराएगा. कोई करने भी देगा?रिश्वत बिना कोई काम करता नहीं. मेरा काम रुकने से उसको कोई फ़र्क पड़ता नहीं. सुनने वाला मेरी कोई है नहीं. अन्ना के साथ अपना दुखड़ा ही तो सुनाने की कोशिश कर रहे हैं. और अगर कभी लोग थोड़ी सी खुली हवा में साँस ले लें तो कोई घोटाला नहीं कर रहे हैं. जनता तो तिरंगा आज लहरा रही है, जिनको 65 साल हो गए लहराते हुए वो कितने ईमानदार हैं? और अगर वो ईमानदारी से काम करते तो जनता यूँ झंडे लहराती ? जनता ने दो दिन झंडा क्या लहरा दिया, आप से भी ये भी हजम नहीं होता. हद है.
लगता है आपको कमी निकालने की आदत हो गई है.जहां आपको समर्थन करना चाहिए वहां पर आप ग़लत बता रहे हैं.आपको से ये उम्मीद नहीं थी.
एक राखी सावंत का नाम सुना था जो कि कुछ भी अनाप-शनाप बोल के सुर्खियां बटोर लेती हैं और एक आप हैं जो उसी नक़्शेक़दम पर चल रहे हैं. इसी बीबीसी की एक महिला पत्रकार ने एक अमरीकी व्यक्ति से मुलाक़ात का विवरण दिया था जो उन्हें इंडिया गेट पर मिलता है और हमारे शांतिपूर्ण प्रदर्शन की बेहद प्रशंसा करता है. वो ये भी बताता है कि ये पश्चिमी दुनिया के लिए मिसाल होगा. अपने आपको कार्ल मार्क्स समझने वाले सुशील झा महोदय! कृपया अपने कुछ उत्तरदायित्वों को समझें और सही चीज़ बयां करें. अपने आपको भीड़ से अलग हटकर सोचनेवाला होने का दिखावा न करें.
सुशील जी, आपने अभी पढ़ा होगा कि हमारे तथाकथित प्रधानमंत्री ने कहा है कि लोकपाल बिल लाने के लिए प्रक्रियाएं होती हैं. लेकिन उन्हें ये तो याद होगा कि शाहबानो के बिल के लिए इस प्रक्रिया का पालन किस तरह किया गया था. वही प्रक्रिया लोकपाल बिल के लिए भी इस्तेमाल करने की ज़रूरत है. आपका क्या ख़्याल है.
मुझे लगता है ये आपकी निजी राय है और लोग आपकी राय से सहमत नहीं होंगे. हर व्यक्ति भ्रष्टाचार से पग-पग पर नहीं लड़ सकता. ट्रैफ़िक पुलिस, पासपोर्ट इन्क्वायरी, दाख़िला जैसे तमाम काम हैं जिन्हें करवाने के लिए आम आदमी को रिश्वत देनी पड़ती है. आमलोगों के रोज़मर्रा के जीवन की इन्हीं कठिनाइयों को दूर करना चाहते हैं अन्ना हज़ारे और उनकी टीम के सदस्य.
मैं आपका समर्थन करता हूं. अगर मैं ईमानदार बनूंगा तो अन्ना की क्रांति की वजह से नहीं बल्कि अपने ज़मीर के लिए बनूंगा. मैं ये कहना चाहता हूं कि अपने घर को स्वच्छ बनाओ, देश ख़ुद ब ख़ुद स्वच्छ हो जायेगा. मैं अन्ना का विरोधी नहीं हूं. पर मैं भी उन लोगों का विरोध करता हूं जो ये समझते हैं कि बीयर पीकर 15 अगस्त को रात में तिरंगा ले कर ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाना देशभक्ति है. ये वही लोग हैं जो अपने बच्चों को कहते हैं कि कोई भी आए तो कह देना मैं घर पर नहीं हूं. बोर्ड परीक्षा में अपने बच्चो के लिए पेपर लीक करते हैं.
सुशील जी, इतना अच्छा लेख लिखने के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद. आपने समाज को आईना दिखा दिया. सच में अगर जनलोकपाल विधेयक से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे तो मैं भी अन्ना जी का समर्थन करने के लिए तैयार हूं लेकिन क्या अन्ना जी का अनशन ही एकमात्र विकल्प है. मुझे तो ये विपक्षी पार्टियों की साज़िश लग रही है जो अन्ना जी को मोहरा बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. इन्हें देश के नागरिकों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है.
आपमें पत्रकारिता नहीं है. लगता है कि किसी की सिफ़ारिश से पत्रकार बन गए हैं आप.
सुशील जी, आपने बिल्कुल सही लिखा क्योंकि हाथ में झंडा लेकर रामलीला मैदान जाने से या किसी बिल से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा. इसके लिए हर आदमी को सुधरना पड़ेगा.
क्या बेतुकी बात करते हैं अगर आपको लगता है भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाने से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा तो फिर हत्या लूट डकेती इन सब के लिए कानून बनाने की क्या ज़रुरत है. ये अपराध तो आज भी हो रहे हैं. ये धाराएँ ख़त्म कर देनी चाहिए. हर आदमी को खुद सुधारना चाहिए.
भ्रष्टाचार पर लिखा आपका लेख बहुत अच्छा लगा, अच्छा है कि आप लोगों को उनकी ड्यूटी याद दिला रहे हैं, मैं आपको दस में से दस अंक दूँगा.
हमें भारतीय नागरिकों को जगाना चाहिए,
नेताओं का एक ही नारा है,
क्या हिंदू क्या मुसलमान,
क्या सिख इसाई
कुर्सी अपनी क़ौम पराई.
मैं आपसे सहमत हूँ.
मैं भ्रष्ट नहीं हूँ, नहीं हूँ, नहीं हूँ. मैं जनरल क्लास का टिकट लेकर स्लीपर क्लास में सफ़र नहीं करता. मैं गैस ब्लैक में नहीं लेता न ही अपने बिजली के मीटर में गड़बड़ी करता हूँ. मैं सेल्स टैक्स या इनकम टैक्स की चोरी नहीं करता.... मैं हर प्रकार से नियमों का पालन करता हूँ. क्या मैं जैसा हूँ वैसा बना रहूँ या कोशिश करूँ कि दूसरा व्यक्ति भी बदल जाए?
जब ये क़ानून आया कि पब्लिक प्लेस पर धूम्रपान करना अप्राध है तो इसमें कमी आई है पर ये बंद नहीं हुआ. शायद ये क़ानून और मज़बूत कर दिया जाए तो इसमे 60-70 प्रतिशत की कमी आ जाएगी.
मैं आप से असहमत हूँ. हम जानते हैं कि हम भ्रष्टाचार के साथ लगे हुए हैं. लेकिन यह केवल एक छोटा सा कदम कलमाडी, राजा आदि जैसों की विकास दर को कम करने के लिए लिया है. प्रत्येक भारतीय का मन बदलने के लिए लंबा समय लगेगा. मुझे आशा है कि आपने अन्ना आंदोलन से पहले किसी भी भारत की सभा में ऐसा माहौल नहीं देखा होगा. रामलीला मैदान में लोग पानी के पैकेट, खाद्य, रोटी आदि अन्ना समर्थक को दे रहे हैं. यह क्या है ? यह भारत की आत्मा है!
कुछ अन्ना मुझे भी मिले :
1. कैंप में तीन मोटरसाइकिलों पर सवार दस लोग बिना हैलमेट पहने, हाथ में तिरंगा उठाए, रिक्शेवाले को धौल जमाते और गाली देते देखे. मैं कुछ नहीं कहा क्योंकि वो सब अन्ना थे.
2. दिल्ली गेट चौराहे पर मुझे कुछ और अन्ना नज़र आए जो स्कूल से भागे हुए थे. वो सब अपने माँ-बाप को बेवक़ूफ़ बना रहे थे. मैं कुछ नहीं कह पाया क्योंकि वो सब अन्ना थे.
3. मैट्रो, बस और सड़कों पर भी कुछ अन्ना दिखते हैं जो समाज की हर चीज़ पर सवाल उठआ रहे हैं.
4. एक अन्ना संत नगर बुराड़ी में बैठा है जिस पर छह क़त्ल के इल्ज़ाम हैं, जो दूसरों की जायदाद हड़पता है. लेकिन वो अन्ना भी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ है.
5. रामलीला मैदान में एक जेबतराश पिट गया. उसकी टी-शर्ट पर भी लिखा था, "मैं अन्ना हूँ".
यह सच है की मध्यम वर्ग ही भ्रष्टाचार का जनक है, लेने में भी और देने में भी, मगर उसे भ्रष्टाचार तब खलता है जब देना होता है. इस हद तक कि वह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अन्ना के साथ हो लेता है. उसे रिश्वत न देनी पड़े, चाहे उसे रिश्वत भले ही न मिले !! मध्य वर्ग के मन में इर्ष्या की भी भावना चरम पर होती है. बाबू महीने में दस की पगार पाकर ४० हजार रिश्वत से कमाता है लेकिन उसे आइएएस का महीन में लाख रुपए कमाना खलता है. आइएएस को सांसद की करोड़ की आमदनी खलती है और बेचारा सांसद सोचता है की जितना रुपया वह साल भर में बना पता है, उससे ज्यादा डालर तो कोई और हर महीन स्विस बैंकों में लुढ़का देता होगा !!
लेकिन ये भी सही है कि कहीं की भी जनता दूध की धुली नहीं है और अगर कहीं सार्वजानिक जीवन में शुचिता है तो दंड के भय से ही है. देश के सबसे भ्रष्ट १००० अधिकारियों की सारी संपत्ति ज़ब्त करके उन्हें सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ दो और फिर भी मध्य वर्ग न सुधरे तो हम मान लेंगे की भारत से भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता.
सहमति आपके विचारों से सुशील जी.
आप सही हैं. ये भारत की नैतिक समस्या है.
सत्य यही है कि हर आदमी को इमानदार होने की ज़रूरत है, अपने प्रति, अपने काम के प्रति और अपने देश के प्रति. क़ानून और नैतिकता को अपने जीवन में अपनाने की ज़रूरत है.
सुशील जी मैं आपसे सहमत हूँ.
सुशील जी आपका लेख आज के परिप्रेक्ष्य में एकदम सटीक है.