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दिग्भ्रमित मध्यम वर्ग?

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|सोमवार, 22 अगस्त 2011, 22:43 IST

भारत का मध्यम वर्ग उस मछली की तरह है जो पानी के गंदा होने की शिकायत करते-करते उसके बिना रहने की बात करने लगा है. भारत में भ्रष्टाचार रहित शहरी जीवन की कल्पना करने पर लगता है कि मानो व्यवस्था ही ख़त्म हो जाएगी.

भ्रष्टाचार के बिना जीवन बहुत कठिन होता है. अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है, पूरे टैक्स भरने पड़ते हैं, बिना पढ़े-लिखे पीएचडी नहीं मिलती, सिफ़ारिश नहीं चलती, सबसे तकलीफ़देह बात ये कि जेब में पैसे होने के बावजूद हर चीज़ नहीं ख़रीदी जा सकती...

भ्रष्टाचार करोड़ों लोगों की रगों में बह रहा है, भारत में सबसे ज़्यादा लोगों को रोज़गार देने वाला उद्यम भारतीय रेल या कोल इंडिया नहीं है बल्कि ईश्वर की तरह सर्वव्यापी भ्रष्टाचार है.

अन्ना सही हैं या ग़लत इस बहस को एक तरफ़ रखकर सोचना चाहिए कि अगर अन्ना का आंदोलन सफल हो गया तो उन्हें ही सबसे बड़ा झटका लगेगा जो लोग सबसे बुलंद आवाज़ में नारे लगा रहे हैं और ट्विट कर रहे हैं.

इस आंदोलन के समर्थन में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो राजनीतिक भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं और उन्हें लगता है कि जन-लोकपाल बिल से सिर्फ़ नेताओं की कमाई बंद होगी, उनका जीवन यूँ ही चलता रहेगा.

जैसे मिलावट करने वाले दान भी करते हैं, पाप करने वाले गंगा नहाते हैं, उसी तरह बहुत से लोग भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मोमबत्तियाँ जला रहे हैं, इससे मन को शांति मिलती है, ग्लानि मोम की तरह पिघलकर बह जाती है.

अन्ना हज़ारे को इस बात श्रेय ज़रूर मिलना चाहिए कि उन्होंने भ्रष्टाचार को बहस का इतना बड़ा मुद्दा बना दिया है, हो सकता है कि यह एक बड़े आंदोलन की शुरूआत हो लेकिन अभी तो भावुक नारेबाज़ी, गज़ब की मासूमियत और हास्यास्पद ढोंग ही दिखाई दे रहा है.

नेताओं का भ्रष्टाचार ग्लोबल वर्ल्ड में शर्मिंदगी का कारण बनता है, बिना लाइसेंस के कार चलाने पर पुलिसवाला पाँच सौ रुपए ऐंठ लेता है, ये दोनों बुरी बातें हैं, ये बंद होना चाहिए, क्या मध्यम वर्ग में सिर्फ़ मोमबत्ती जलाने वाले सज्जन लोग हैं जो दोनों तरफ़ से पिस रहे हैं?

भ्रष्ट तरीक़े अपनाकर पैसा या रसूख हासिल करने वाले लोगों के प्रति सम्मान का भाव जब तक ख़त्म नहीं होगा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ असली लड़ाई शुरू नहीं होगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 00:03 IST, 23 अगस्त 2011 anuj:

    शतप्रतिशत सत्य, इसमें कोई दो राय नहीं है कि भ्रष्टाचार का पालन पोषण मध्यम वर्ग के ही बीच हुआ है क्योंकि इनकी आकांक्षाएं बहुत हैं. रही बात पीड़ित होने की तो सबसे ज़्यादा पीड़ित भी यही वर्ग है. लेकिन ये भी सच है कि हर आदमी ऐसा नहीं है लेकिन भुगतना उसको भी पड़ता है. तर्क चाहे जो हों लेकिन अन्ना के अनशन ने सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है.

  • 2. 00:11 IST, 23 अगस्त 2011 Nsy:

    सच कहा आपने.

  • 3. 00:21 IST, 23 अगस्त 2011 Altaf Husain, Sikanderpur, Ambedkar Nagar, UP:

    आपके कहने का मतलब कहीं ये तो नहीं कि भ्रष्टाचार चलते रहना चाहिए और जो लोग आज रामलीला मैदान में जमा हैं वो बस दिखावा ह और असली भ्रष्ट वही लोग हैं.

  • 4. 00:21 IST, 23 अगस्त 2011 Saptarshi:

    आपने ग़लत जगह ये ब्लॉग पोस्ट कर दिया...आप शायद टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए लिख रहे थे.

  • 5. 01:17 IST, 23 अगस्त 2011 विष्‍णु बैरागी:

    श्री विजय वाते का ये शेर इस दौर पर सौ टका फ़िट बैठता है -

    चाहते हैं सब कि बदले ये अंधेरों का निज़ाम।
    पर हमारे घर किसी बाग़ी की पैदाइश न हो।।

  • 6. 01:24 IST, 23 अगस्त 2011 nepathya nishant:

    बहुत नकारात्मक टिप्पणी है. संभव है लोकपाल के बजाय जोकपाल ही बने. फिर भी एक आवाज़ तो उठी. ये धारणा तो खंडित हुई की देश के युवा वर्ग अपने करियर के इतर भी किसी मुद्दे पर कोई सारोकार रखता है. पता तो चला कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक अच्छे आन्दोलन को खड़ा करने के लिए किया जा सकता है. आज़ादी के पहले भी शायद एक दो लोग बौद्धिक जुगाली करते हुए राय देते होंगे, "आजादी के आन्दोलन से क्या हासिल होगा. ये अंग्रेज़ तो पूरी दुनिया पर राज करते हैं. हिंदुस्तानियों में स्वतंत्र समाज बनने की कहां क्षमता है'' वगैरह-वगैरह. राजेश जी, कोई भी व्यवस्था अंतिम नहीं होती, कोई आन्दोलन भी अंतिम नहीं होता.....ना ही कोई समाज अंतिम प्रेरणादायक आदर्श होता है, हर पीढ़ी इसमें कुछ जोड़ती है. क्या परिवर्तन की कुछ किरणें ही निराशावाद के ब्लैक होल से अच्छी नहीं हैं?

  • 7. 06:18 IST, 23 अगस्त 2011 डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी , क्लीवलैंड:

    बिना लाइसेंस कार चलने वाले मियां छब्बू जैसे ही पुलिस को पांच सौ रूपए पकड़ाकर आगे बढ़े, मैंने उन्हें रोक लिया. बोले - मियां, मैं परिवहन कार्यालय से ही आ रहा हूं. वहां सब कागज़ात सही होने पर भी अफसर ड्राइविंग लाइसेंस बनाने का पांच हज़ार मांग रहा था.
    अगर जन लोकपाल विधेयक पारित हो गया तो वो अधिकारी सलाखों के पीछे होगा और मियां छब्बू केवल लाइसेंस बनवाने की फ़ीस देकर तन के गाड़ी चला रहे होंगे.

  • 8. 08:13 IST, 23 अगस्त 2011 arvind:

    हमें ऐसे सभी भ्रष्ट लोगों को अब तक के भ्रष्ट आचरण के लिए आम माफ़ी देने पर भी विचार करना चाहिए जो भ्रष्टाचार के ज़रिए जमा किए धन को लौटाने को तैयार हों.

  • 9. 09:42 IST, 23 अगस्त 2011 धनंजय शर्मा :

    जिस प्रकार हर समाज में अच्छे और बुरे लोग होते हैं, उसी प्रकार मध्यम वर्ग में भी अच्छे और बुरे लोग हैं. ये एक आम मनोवृत्ति है कि हम कुछ अच्छा देखने कि बजाय बुराइयां ढूंढना शुरू कर देते हैं. अन्ना हज़ारे के अनशन को ‘हास्यास्पद ढोंग’ क़रार देने से पहले आपको ये समझना चाहिए कि इस आंदोलन को जो वैश्विक समर्थन मिल रहा है वो कोई ढोंग नहीं है. ये स्वतःस्फूर्त आंदोलन है जो आम जन मानस के ह्रदय में कई बरसों से सुलग रहा था. मध्यम वर्ग में सिर्फ़ सज्जन लोग ही कैसे हो सकते हैं? क्या उच्च वर्ग के सभी लोग सज्जन हैं? क्या सभी पत्रकार सज्जन हैं?

  • 10. 09:46 IST, 23 अगस्त 2011 Sandeep Mahato:

    राजेश जी आपने एक बहुत अच्छी बात कही कि हमें सिर्फ़ पैसे वाले लोगों की इज्ज़त नहीं करनी चाहिए वरन ये भी देखना चाहिए कि उसने पैसे किस तरीक़े से कमाए. आज जो भी भ्रष्ट है उसके पास काफ़ी पैसा है और उसी की इज्ज़त भी होती है. ये हमारा दुर्भाग्य है. लेकिन एक बात तो माननी पड़ेगी राजेश जी कि घूस देने पर काम बहुत आसानी से हो जाता है. लेकिन हम इसके दूरगामी परिणाम को नज़रअन्दाज़ कर जाते हैं. इसी भारत के बारे में लॉर्ड मैकाले ने कहा था भारत को जीतना नामुमकिन है क्योंकि यहां के लोग भ्रष्ट नहीं हैं. यहां की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ें बहुत मज़बूत हैं. आशा करता हूं हम अपने पुराने भारत को फिर से देख सकेंगे.

  • 11. 09:48 IST, 23 अगस्त 2011 Sandeep Mahato:

    इसे दिग्भ्रमित न कहें बहुत दिनों बाद मध्यम वर्ग को थोड़ी जरुरत पड़ी देश के बारे में सोचने की. यही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी इस आन्दोलन की. आपने कहा आन्दोलन सफल हो गया तो बहुत बड़ा झटका लगेगा. अब आप ही बताइए अगर ये आन्दोलन न हुआ तो क्या होता, वही सरकारी लोकपाल बिल पास हो जाता और सरकार के मनोबल को और बढ़ावा मिल जाता कि लोग कुछ भी कहें वो वही करेंगे जो उनके मन को भायेगा. और हम अपने आपको इस सिस्टम के साथ एडजस्ट करना शुरू कर देते. आपने कहा कि भ्रष्टाचार हमारी रगों में बह रहा है उसके लिए मन का शुद्धिकरण करना होगा परन्तु ये होगा कैसे? हमारे पास कोई मोहिनी अस्त्र तो है नहीं की उसे चला दिया और सबकी सोच बदल गई. इसके लिए एक बदलाव की आवश्यकता है और मुझे लगता है उसकी शुरुआत हो चुकी है.

  • 12. 10:04 IST, 23 अगस्त 2011 Ram Krishna Verma:

    आप सौ प्रतिशत सही कह रहे हैं. सिस्टम को सही करना किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं है. क्योंकि इस भ्रष्टाचार में कहीं न कहीं हम खुद शामिल हैं. दिन प्रतिदिन हम खुद इसको बढ़ावा देते हैं. बस अंतर सिर्फ इतना है कि हम छोटे स्तर पर करते हैं और नेता लोग बड़े स्तर पर. अब जो जिस जगह पर है उसी स्तर का करेगा. लेकिन इसको ख़त्म होना ही है. नेचर इसके लिए कार्यरत है. रामायण और महाभारत काल से बड़ा विनाश होना है, और ये अन्ना या किसी सामान्य व्यक्ति के बस का नहीं. शायद भगवन कृष्ण से ज्यादा बड़ी ईश्वरीय ताकत इसको करने के लिए चाहिए. और प्रकृति का ये काम शुरू हो चुका है.

  • 13. 11:19 IST, 23 अगस्त 2011 Ram Maurya:

    राजेश जी, आप क्या कहना चाहते हैं कि जैसे चलता है, वैसे चलने दो, अगर कुछ पाना है तो खोना पड़ेगा, जनता अगर जाग रही है तो उसे सुलाने का काम मत करिए, कुछ अच्छा लिखिए.

  • 14. 11:24 IST, 23 अगस्त 2011 Ajeet S Sachan:

    ये सब बातें कहने सुनने में अच्छी लगती हैं लेकिन जब आप व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं तो आपके साथ कोई नहीं होता है. अगर आपको असलियत नहीं दिखाई देती है तो अपनी आँखों का इलाज करिए न कि उल्टा सीधा लिखिए. आपसे पहले एक सज्जन जीवन में ईमानदारी की बात लिखी थी, आप दोनों की सोच एक जैसी है जो किसी अच्छे काम में योगदान नहीं कर सकते लेकिन उसे बिगाड़ने की कोशिश ज़रूर कर सकते हैं.

  • 15. 11:27 IST, 23 अगस्त 2011 शशि सिंह:

    भ्रष्ट तरीक़े अपनाकर पैसा या रसूख हासिल करने वाले लोगों के प्रति सम्मान का भाव जब तक ख़त्म नहीं होगा, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ असली लड़ाई शुरू नहीं होगी. राजेश जी, सम्मान का भाव ख़त्म होने की तो बात छोड़ दीजिए, देश के हर गांव-खेड़े में ऐसे ही लोग तो मोटिवेशनल फ़ेक्टर हैं. ऐसे में मोमबत्तियां हमारे दोहरे चरित्र को ही दर्शाती है.

  • 16. 11:31 IST, 23 अगस्त 2011 anand:

    ये क्या लिख दिया आपने. लाखों लोग टूट पड़ेंगे आप पर भ्रष्ट होने का इल्ज़ाम लगाने के लिए. ईमानदार होने की निशानी सिर्फ़ अन्ना के समर्थन में नारे लगाना भर नहीं है, समझे. अगर आपने भूल से भी सवाल खड़े किए तो आपकी खैर नहीं. सिर्फ़ मनमोहन सिंह को गाली दो, टैक्स चोरी करो, बेईमानी से पैसे कमाओ - यही है भारत के पढ़ने-लिखने वालों की फ़ितरत.

  • 17. 11:38 IST, 23 अगस्त 2011 Ranjan Srivastva:

    राजेश जी, मुझे आपकी सोच जानकर गहरी निराशा हुई है. हम सभी जन्म से ही भ्रष्टाचार के शिकार रहे हैं लेकिन इसे मानने को तैयार नहीं. हालांकि आप जैसे कुछ लोग भी हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार के बीच जीवन जीने का रास्ता तलाश लिया है. कृपया सकारात्मक सोच रखें.

  • 18. 12:15 IST, 23 अगस्त 2011 raza husain:

    बहुत सच्चा ब्लॉग लिखा है. मेरा मानना है कि जो लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं और मोमबत्ती जला रहे हैं. दरअसल ये वो लोग हैं जो रोज़ रिश्वत लेते और देते हैं. रिश्वत लेना अपना अधिकार मानते हैं. हमें कोई ऐसा विभाग नहीं मिला जहां कि लोग रिश्वत नहीं लेते. चपरासी से लेकर अफ़सर तक सब के सब इस बहती गंगा में डुबकी लगाते हैं और बात भ्रष्टाचार की करते हैं. सिर्फ़ नेताओं को गाली देने से कोई फ़ायदा नहीं. अगर भ्रष्टाचार को इतना ही बुरा मानते हो तो आज से ही रिश्वत लेना और देना बंद कर दो. इस तरह सड़कों पर नौटंकी करने से कोई फ़ायदा नहीं.

  • 19. 12:35 IST, 23 अगस्त 2011 sandeep sisodiya:

    राजेशजी, आपका ब्लॉग फ़ेसबुक पर शेयर किया है, देखें सुधीजनों और प्रबुद्ध वर्ग की क्या प्रतिक्रिया आती है. वैसे आपकी बात में दम तो है.

  • 20. 13:24 IST, 23 अगस्त 2011 MOHAMMAD KHURSHID ALAM, Riyadh:

    राजेश जी आप सही कह रहे हैं. जो लोग अन्ना का समर्थन करने सड़कों पर उतरे हैं उनकी संख्या भारत की आबादी के 0.001 फ़ीसदी से भी कम है. भ्रष्टाचार ख़त्म होना चाहिए लेकिन उस तरह नहीं जैसाकि अन्ना हज़ारे चाहते हैं.

  • 21. 13:37 IST, 23 अगस्त 2011 MOHAMMAD KHURSHID ALAM:

    प्रिय राजेश, आप सही हैं. जो व्यक्ति सड़क पर हैं वे पूरे भारत के प्रतिनिधि नहीं हैं. अन्ना के समर्थन में भारत की कुल आबादी के 0.001 प्रतिशत से भी कम लोग नज़र आ रहे हैं, लेकिन टीम अन्ना का दावा 90 फ़ीसदी लोगों के समर्थन का है. ये एक सफ़ेद झूठ है. भ्रष्टाचार का अंत हो सकता है, लेकिन अन्ना के रास्ते से नहीं होना चाहिए. अन्ना का रास्ता भारत और भारतीय संविधान के लिए हानिकारक है.

  • 22. 13:47 IST, 23 अगस्त 2011 BHEEMAL Dildar nagar:

    अपने ब्लॉग को एक पाठक की दृष्टि से पढ़िए. आपके विचार एकदम नकारात्मक हो चुके हैं. शायद आप हम भारतीयों को स्विस बैंक के जमाकर्ताओं को नतमस्तक हो कर प्रणाम करना सीखा रहे हैं.
    प्रार्थना : हे गणपति जी मनमोहन-सोनिया और कंपनी को सद्बुद्धि दो. पत्रकार लोगों को सद्बुद्धि दो.

  • 23. 13:47 IST, 23 अगस्त 2011 ZIA JAFRI:

    राजेश जी, आज़ादी के बाद पहली बार भ्रष्टाचार को लेकर इतना बड़ा आंदोलन हो रहा है और आशा है कि कुछ तो होकर रहेगा. जब गांधीजी ने अंग्रेज़ों से भारत छोड़ने के लिए कहा था तो एक बड़े बुद्धिजीवी वर्ग को ऐसी आशा नहीं थी, लेकिन ऐसा हुआ. इस आंदोलन से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा ये तो अन्ना को भी पता है, लेकिन नकेल ज़रूर पड़ जाएगी ये हम सबको पता है.

  • 24. 14:00 IST, 23 अगस्त 2011 dhananjay tripathi:

    ये बकवास है राजेश, आपने बकवास लिखा है.

  • 25. 14:42 IST, 23 अगस्त 2011 Adil:

    राजेश जी, बढ़िया बात कही है आपने.

  • 26. 15:02 IST, 23 अगस्त 2011 shakil:

    बहुत उत्तम विचार हैं आपके.

  • 27. 15:14 IST, 23 अगस्त 2011 Abhisheka Anand:

    शानदार, शानदार ...बहुत ख़ूब लिखा है आपने राजेश जी. मैं पूरी तरह से सहमत हूं. लोग टैक्स नहीं भरना चाहते और दूसरो की चिंता लगी है. ऐसे कैसे चलेगा. अगर वास्तव में देश से भ्रष्टाचार मिटाना है तो सबको अपनी ज़िमेदारी का एहसास होना चाहिए.

  • 28. 15:22 IST, 23 अगस्त 2011 PRAVEEN SINGH:

    भारतीय समाज में काला धन ही माई-बाप बन गया है. साधारण व्यक्ति के लड़के-लड़की की शादी में ना तो कोई जाना चाहता है और न ही कोई प्रेम से शादी करना चाहता है. लेकिन कालेधन वालों की लीला कुछ और ही है. कम से कम भारत में तो कालाधन भगवान का अवतार बन चुका है. चोर जी, थानेदार जी बन गए हैं.

  • 29. 15:37 IST, 23 अगस्त 2011 mahesh kumar:

    अभी लोगों को मत बताओ राजेश जी वरना लोग पीछे हट जाएंगे.

  • 30. 16:07 IST, 23 अगस्त 2011 Durgesh Tiwari:

    मैंने दो बार देखा है आप लोगों ने अन्ना हज़ारे के ख़िलाफ़ लिखा है, आप सचमुच भ्रष्टाचार के समर्थक हैं या भ्रष्ट व्यवस्था से बीबीसी को कुछ गुप्त लाभ होता है. ये ज़रूर है कि आप लोग कांग्रेस के शुभचिंतक हैं, पाँच करोड़ से अधिक लोग इस आंदोलन से जुड़े हैं वे सभी मूर्ख हैं और आप ही विद्वान हैं. मुझे लगता है कि मुझे बीबीसी की साइट पर आना छोड़ देना चाहिए क्योंकि वो निष्पक्ष नहीं है. लोग अपनी जान पर खेलकर आंदोलन कर रहे हैं और उसका मज़ाक बना रहे हैं, शर्म आनी चाहिए आपको.

  • 31. 16:56 IST, 23 अगस्त 2011 sudhir saini:

    काफ़ी अच्छा लिखा है आपने, ट्विट करने वाले लोगों के बारे में तो लिख दिया लेकिन अपनी तरह ब्लाग लिखने वालों को साफ़ बरी कर दिया. कोई अच्छा काम हो रहा हो तो उसमें कमी निकालने के बदले उसका समर्थन करना चाहिए.

  • 32. 17:05 IST, 23 अगस्त 2011 rajendra kumar gupta:

    मैं खुर्शीद जी और राजेश जी से सहमत हूँ.

  • 33. 17:41 IST, 23 अगस्त 2011 braj kishore singh,hajipur,vaishali:

    कौन कहता है कि आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों.

  • 34. 17:45 IST, 23 अगस्त 2011 bhavtosh pandey:

    वर्त्तमान जनांदोलन ने भ्रष्टाचार के पूरे के पूरे मुद्दे को सिर्फ़ और सिर्फ़ रिश्वतखोरी तक सीमित कर दिया है. पूरे आन्दोलन के दौरान सिर्फ़ घूसखोरी पर चर्चा हो रही है. ये आन्दोलन एक बौद्धिक संकट से गुज़र रहा है हालांकि जनता को इस तरह एकत्रित करने के लिए सामान्यतः वही बातें की जाती हैं जो उसे आसानी से समझ में आ जाएं, लेकिन फिर भी मेरी अन्ना टीम से गुज़ारिश है कि सिर्फ उपचार पर ही नहीं बल्कि परहेज़ पर भी चर्चाएं करें. भ्रष्टाचार के व्यापक कारणों पर चर्चा ज़रूरी है ना कि उसके हो जाने पर कठिन प्रावधानों द्वारा भ्रष्टाचारी के पकड़े जाने पर.

  • 35. 18:06 IST, 23 अगस्त 2011 Ram Maurya:

    हम बहुत दिनों से सुन रहे हैं कि हम सुधरेंगे जग सुधरेगा, लेकिन कौन सुधरा है, कितना सुधरा है, यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रक्रिया है कि जब तक डंडा नहीं पड़ता तब तक उसकी नींद नहीं खुलती. अगर ऐसा होता तो अब तक दुनिया सुधर गई होती और पुलिस-कानून की ज़रूरत न के बराबर रह जाती, गांधी जैसे लोगों को पैदा होने की जरूरत नहीं होती और आपके जैसे लोगों की सोच भी थोड़ी बेहतर होती जिन्हें हर अच्छे काम में कमी नज़र आती है.

  • 36. 18:32 IST, 23 अगस्त 2011 Pramod Shukla:

    मैं आपकी कुछ बातों से सहमत हूँ, हमने अपने जीवन में बस भ्रष्टाचार ही सीखा है, पूरी व्यवस्था में हर जगह भ्रष्टाचार ही है, कई सरकारी और क्या गैर सरकारी हर जगह भ्रष्ट लोग हैं परंतु इसका ये अर्थ नहीं है कि हमें यह व्यवस्था नही बदलनी चाहिए, वैसे भी बहुत हो चुका अब परिवर्तन होना चाहिए. मैं आप पत्रकार भाइयों से आशा करता हूँ कि अगर कुछ लिखना है तो लोकपाल बिल के बारे में लिखिए ताकि लोगों को कुछ ज्ञान मिल सके. लोकपाल बिल सिर्फ़ सरकारी कर्मचारियों के लिए है, उसी तरह कोई कानून होना चाहिए जिसके ज़रिए निजी व्यापारियों को उपभोक्ताओं के प्रति ज़िम्मेदार बनाया जा सके.

  • 37. 18:46 IST, 23 अगस्त 2011 Hussain:

    मिडिल क्लास पर असर ज़रूर होगा लेकिन कुछ सुधार की उम्मीद भी है, अगर ऐसे ही चलता रहा तो स्थिति और बदतर हो जाएगी.

  • 38. 18:49 IST, 23 अगस्त 2011 Sharad Agrawal:

    मैं तो यही सोच रहा हूँ कि कितने लोग हैं जो अन्ना के अनशन में शामिल होने के लिए रेल से आए और रेल का किराया नहीं दिया, यह हास्यास्पद नहीं है क्या?

  • 39. 18:58 IST, 23 अगस्त 2011 Rakesh Kumar:

    राजेश जी ऐसा लगता है आप अप्रत्यक्ष रूप से इस आन्दोलन से खुश नहीं है और कमजोर होने की प्रार्थना कर रहे है. कही आपको कांग्रेस के तरफ से निर्देशन तो नहीं मिला बीबीसी के प्लेटफार्म को उपयोग कर उनके खिलाफ हो रहे आन्दोलन को कम करने की. आप शायद भूल गए है की जनता अब परिपक्व हो गयी है अब आप कोई दूसरा ट्रिक इस्तेमाल कीजिए, हमलोग बदलाव के लिए तैयार हैं आप खुद को तैयार कीजिए, यदि आप अभी से कष्ट महसूस कर रहे है.

  • 40. 19:06 IST, 23 अगस्त 2011 Chandan mishra,delhi:

    निहायत ही बकवास और बेकार ब्लाग जो समझ से परे है.

  • 41. 19:35 IST, 23 अगस्त 2011 pramod kumar:

    राजेश जी, भ्रष्ट उपायों से संपत्ति बनाने वालों का सामाजिक बहिष्कार हो चाहे वो सांसद ,विधायक या नौकरशाह ही क्यों नहीं हो. कल तक के सड़क छाप लोग आज लग्जरी गाड़ियों के मालिक कैसे हो गए. जिस देश के सांसद रिश्वतखोरी में पकड़े गए और राजनीति से सन्यास नहीं लिया वहां जन लोकपाल क्या कर लेगा. जनता चाहती है कि घूसखोर पकड़े जाएँ, उनकी संपत्ति ज़ब्त की जाए. ऐसा बिहार की नीतीश सरकार ने किया है, केंद्र सरकार उसका अनुकरण करे.

  • 42. 20:06 IST, 23 अगस्त 2011 vinod verma:

    अगर यह आंदोलन 1950-55 में शुरु हुआ होता तो आज भारत सुपर पावर होता, अगले दस साल में भारत सुपर पावर बन जाएगा.

  • 43. 20:16 IST, 23 अगस्त 2011 Vipul Seth:

    सभी टिप्पणियाँ नहीं डाली जा रही हैं, बीबीसी बिक चुका है और सबको बहका रहा है, यह न कांग्रेस का है न बीजेपी का, यह अँगरेज़ों का है जो डिवाइड एंड रूल की नीति पर चलते हैं, वंदे मातरम.

  • 44. 20:18 IST, 23 अगस्त 2011 D N Kumar:

    माध्यम वर्ग कितना दिग्भ्रमित है, यह तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन आप पूर्णतः भ्रमित हैं ये साबित हो गया है आपके ब्लॉग से.

  • 45. 20:24 IST, 23 अगस्त 2011 maan singh beesen:

    आपकी सोच बहुत गिरी हुई है और भ्रष्टाचार आप ही जैसे लोगों के कारण देश में पनप रहा है, लगता है कि आप उन भ्रष्टाचारियों से मिले हुए हैं.
    भारत माता की जय
    अन्ना हज़ारे जिंदाबाद

  • 46. 23:16 IST, 23 अगस्त 2011 ALTAF:

    कुछ लोगों को ये कहने में बड़ा मज़ा आ रहा है कि जो लोग आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं वो भारत की आबादी का बहुत छोटा सा हिस्सा हैं और हम इसे पूरे भारत का विचार नहीं मान सकते. तब तो ये लोग ये भी जानते होंगे कि महात्मा गांधी जी के साथ भी बहुत ज़्यादा लोग नहीं थे. तो इसका मतलब तो यही हुआ न कि पूरा भारत आज़ादी के लिए नहीं लड़ा था. कुछ लोग इसे हिंदू-मुसलमान और ऊंची-नीची जाति मामला साबित करने में लगे हैं. ये वही लोग हैं जो लड़वाकर फ़ायदा उठाते हैं . ये चाहते हैं कि किसी तरह लोग बंट जाएं और जो ये चाहते हैं वही होता रहे. और रही बात बीबीसी हिंदी की तो बीबीसी बस सच बोलना जानती है लोगों का उत्साह बढ़ाना नहीं जानती.

  • 47. 23:46 IST, 23 अगस्त 2011 deepak sharma:

    मैं एक बार वाराणसी से आ रहा था. 13 घंटे का सफ़र था. मेरी सीट वेटिंग में थी. टीटीई ने पचास रुपए मांगे. मैंने नहीं दिए और सारी रात बैठे-बैठे आया. भ्रष्टाचार ख़त्म तो हो हम सहयोग करने को तैयार हैं.

  • 48. 23:52 IST, 23 अगस्त 2011 sumit:

    क्षमा कीजिएगा. आपने शीर्षक में प्रश्नचिन्ह ज़रूर लगाया था, परन्तु लेख मैं उसे सिद्ध करने का ही प्रयास किया है. ऐसा लगता है आप वास्तविकता से कोसों दूर हैं एवं स्वयं ही दिग्भ्रमित हैं. मेरे ऐसा कहने के पीछे कुछ कारण हैं. आपको समझना चाहिए कि इस प्रकार की व्यवस्था के पीछे भी भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारण है. पीएचडी को ही ले लीजिए. जब शिक्षण सस्थानों को पैसे के बल पर मान्यता प्राप्त होगी और कम तनख्वाह पर अयोग्य शिक्षक पढ़ाएंगे तो ऐसे वातावरण मैं इसी प्रकार डिग्री मिलेगी. अवश्य ही ये कुछ लोगों के लिए कष्टदायी होगा लेकिन इसका ये अर्थ तो नहीं कि आप समूचे मध्यवर्ग को ही दोष दे दें. जब सूचना के अधिकार एवं लोकपाल के भय से पासपोर्ट समय पर मिलेगा तो आप क्यों रिश्वत देंगे. क्या आपको नहीं लगता कि अगर बड़े से बड़े व्यक्ति को भ्रष्टाचार में लिप्त होने पर तुरंत कड़ी सज़ा मिले तो समाज में ऐसे लोगों का रसूख कम होगा? क्या इसके लिए एक निष्पक्ष और सशक्त जांच आयोग की आवश्यकता नहीं है? क्या आपको नहीं लगता की लड़ाई शुरू तो हुई है?

  • 49. 00:21 IST, 24 अगस्त 2011 Dushyant sharma:

    ईश्वर आपको सद्बुद्धि दे.

  • 50. 01:05 IST, 24 अगस्त 2011 ramanand singh llm bhu varanasi:

    बहुत ही बकवास सोच है आपकी. भारतीय लोग ये जानते हैं कि उनके लिए क्या सही है और भारतीय मध्यवर्ग इस बिल के विषय को भी समझता है.

  • 51. 03:55 IST, 24 अगस्त 2011 Vishal Garg:

    बेहद हास्यप्रद लिखा है आपने. इस डर से कि भ्रष्टाचार से जो भी सुविधाएं आज मिल रही हैं सब ख़त्म हो जाएंगी ये सोचना बेमानी होगा. अगर कभी आपने मेट्रो में सफ़र किया हो तो देखा होगा कि सबकुछ अपने आप हो रहा है. वहां कभी भी भ्रष्टाचार नहीं दिखता. हर जगह सबकुछ व्यवस्थित है. भविष्य में जब सब कुछ भ्रष्टाचार मुक्त होगा तो सब उसको स्वीकार कर लेंगे. और अगर यही डर रहा तो हम ज़िंदगी भर उसे बदल नहीं पाएंगे.

  • 52. 03:57 IST, 24 अगस्त 2011 zafar:

    आपने सही कहा. लेकिन मेरा ये कहना है कि अगर लोग ईमानदारी से सबकुछ हासिल करें तो उसका मूल्य भी अधिक होगा और लोगों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. मैं अमरीका में रहता हूं. यहां मैंने देखा है कि भ्रष्टाचार बहुत कम है और ईमानदारी बहुत ज़्यादा. कई बार तो मैंने देखा है कि सामान रास्ते पर बेचा जाता है और मालिक वहां मौजूद नहीं होता, फिर भी ग्राहक डिब्बे में पैसा डालता है क्योंकि यहां के लोगों को शुरू से ये चीज़ें सीखाई जाती हैं. मुझे लगता है कि अन्ना हज़ारे ने एक सही पहल की है.

  • 53. 05:12 IST, 24 अगस्त 2011 surender deshwal:

    सर, बात तो सही है लेकिन आज हम आप सभी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं और ये हर देशवासी की एक मजबूरी बन गई है. कारण ये है कि सिस्टम मज़बूत और पारदर्शी नहीं है. कोई सुनने वाला नहीं है. इसी वजह से रिश्वतखोरी व भ्रष्टाचार में लिप्त होना पड़ता है. किन्तु मध्यम वर्ग इस आंदोलन से इसलिए भी खुश है कि हमने तो जैसे-तैसे भ्रष्टाचार के इस युग में ज़िंदगी काट ली, परन्तु हमारी आने वाली पीढ़ी इस भ्रष्टाचार के युग में न जिए इसलिए जनता अन्ना के साथ है जनाब.

  • 54. 08:46 IST, 24 अगस्त 2011 vijay joshi:

    आपको हिंदुस्तान की समझ नहीं है. ऐसे समय में इतना घटिया और बकवास ब्लॉग. इस ब्लॉग में आपकी सोच का झुकाव स्पष्ट नज़र आता है.

  • 55. 10:54 IST, 24 अगस्त 2011 Binod goyal:

    इस दुनिया में सभी लोग भ्रष्ट हैं. सिर्फ़ वो भ्रष्ट नहीं जिन्हें मौक़ा नहीं मिला है. सिर्फ़ वही ईमानदार हैं जिन्हें आजतक मौक़ा नहीं मिला है.

  • 56. 11:39 IST, 24 अगस्त 2011 Ramanjaney:

    प्रिय राजेश जी, मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं BBC पढ़ना जारी रखूं या छोड़ दूं. छोटी से छोटी न्यूज़ पढ़ने के लिए भी मैं बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर जाता हूं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं दोबारा इस वेबसाइट को खोलूँगा. आपके विचार बहुत ही घटिया और बेतुके हैं.

  • 57. 13:14 IST, 24 अगस्त 2011 Saraswati Ranchi: Jharkhand:

    राजेश जी आपने सौ फ़ीसदी सही लिखा है, ये मैं नहीं कहूंगी लेकिन काफ़ी हद तक आपने सही लिखा है. ये सच है कि जब तक हमलोग रिश्वत देना बंद नहीं करेंगे, भ्रष्टाचार पर रोक लगाना मुश्किल होगा. यदि हम सभी लोग ये ठान लें कि हम किसी भी काम के लिए रिश्वत नहीं देंगे तो कुछ हद तक इस पर अंकुश लगाया जा सकता है. लेकिन अन्ना हज़ारे ने जो भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी है वो भी बिल्कुल सही है. हम इसे ग़लत नहीं कह सकते. हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अप्रैल महीने में अन्ना के इसी मुहिम के कारण सरकार लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग के लिए तैयार हुई थी. वैसे भी आज पूरा देश अन्ना के इस मुहिम से जुड़ा है. यदि आप शहर से गांव का रुख करें तो गली-गली में आपको अन्ना हज़ारे के समर्थक मिल जाएंगे. आज अन्ना जो भी कर रहें हैं वो सही है और ये भ्रष्टाचार को कम करने में ज़रुर सहायक सिद्ध होगा, ऐसा मैं मानती हूं.

  • 58. 13:42 IST, 24 अगस्त 2011 Awadhesh Narayan Shukla:

    राजेश जी आपने एकदम ग़लत लिखा है. लिखने से पहले सोचें.

  • 59. 13:49 IST, 24 अगस्त 2011 KISHAN SINGH:

    प्रियदर्शी जी, अन्ना हज़ारे लोगों के विरोध का एक प्रतीक हैं. मनमोहन सिंह और उनकी कंपनी भ्रष्ट और चोर लोगों की रक्षा में बंदूक लेकर खड़े हैं. मेरा बस चले तो मैं सरकार में बैठे सभी लोगों को हटा दूं.

  • 60. 13:50 IST, 24 अगस्त 2011 rahul:

    आप जैसे लोग सिर्फ़ कमी निकाल सकते हैं. आप जैसी मीडिया ही है जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है और पैसे कमाने के लिए झूठा समाचार तैयार करती है और लोगों को सच्चाई से दूर रखती है. इस जनलोकपाल से आप जैसे लोगों को डर है कि आपका धंधा बंद हो जाएगा. इसीलिए आपने ऐसा लिखा है.

  • 61. 13:50 IST, 24 अगस्त 2011 navneet:

    ग़लत रास्ते पर आप कितनी भी दूर गए हों वापस लौटने में ही भलाई है.

  • 62. 13:56 IST, 24 अगस्त 2011 PRAVEEN SINGH:

    मैं गैस सिलेंडर घर तक पहुंचाने वाले व्यक्ति को 50 रुपए देता हूं इसलिए नहीं कि घूस देना मुझे पसंद है. मैं ऐसा इसलिए करता हूं क्योंकि एजेंसी के लोग कहते हैं कि गैस सिलेंडर आने में सात से दस दिन लग जाएंगे. अब अगर मैं इतने दिन होटल में खाना खाऊं तो मेरे सात सौ रुपए ख़र्च हो जाएंगे. तो राजेश जी, सरकार और सरकारी लोग हमारा बाज़ू मरोड़ कर रिश्वत लेने की कला जानते हैं. इंसपेक्टर और आईएएस मिले होते हैं और रिश्वत लेने वालों को शह देते हैं.

  • 63. 14:22 IST, 24 अगस्त 2011 JITENDRA:

    मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं, ये देश मिट सकता है, परन्तु यहां से जातिवाद और भ्रष्टाचार कभी नहीं मिट सकता क्योंकि भ्रष्टाचार ऊपर के सारे बड़े पदों पर काबिज़ लोगों के और जातिवाद हर हिंदुस्तानियों के रग-रग में ख़ून बन कर दौड़ रहा है.

  • 64. 15:57 IST, 24 अगस्त 2011 Kiran Kapse:

    राजेश जी, कभी-कभी कुछ बातें सच होती हैं. लिखते, कहते, सुनते या पढ़ते समय कुछ क्षणों के लिए बहुत कटु लगती हैं, बहुत ग़ुस्सा आता है, लेकिन अगर दिल से पूछें तो लगता है कि हो न हो ये तो एकदम सच है. बात में दम है. इसलिए आपका ये लेख किसी को अच्छा तो किसी को बहुत बुरा लगेगा. किसी ने एकदम सच कहा है कि "भारत में भ्रष्टाचार अरबों डॉलर का उद्योग है". इसे कुछ भी करके हटाना होगा और इसके लिए किसी न किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी और आख़िरकार वो हो रहा है.

  • 65. 21:13 IST, 27 अगस्त 2011 abinash kumar:

    राजेश जी ऐसा इसलिए है क्योंकि आप भारत में नही रहते.

  • 66. 10:27 IST, 28 अगस्त 2011 awadhesh:

    राजेश जी आप खुद दिग्भ्रमित हैं.

  • 67. 16:10 IST, 30 अगस्त 2011 Shekhar Rai:

    कुछ अच्छा हो रहा है तो होने दिया जाए न कि उसकी ग़लती निकालकर उसके महत्व को कम किया जाए. ये ब्लॉग बेहद संकुचित सोच को प्रदर्शित करता है. बीबीसी के संवाददाता से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि सस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसा घटिया ब्लॉग लिखेगा.

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