खान और खदान
खान हूं खदान हूं
येदियुरप्पा की आन हूं
कोड़ा की शान हूं
रेड्डी बंधुओं की जान हूं
मैं खान हूं खदान हूं. मेरे नाम के आगे कुछ भी लगा दीजिए कोयला, लोहा, अभ्रक, यूरेनियम काम मेरा वही रहता है. ज़मीन के नीचे ऊपर जहां कहीं लोगों को ज़रुरत होती है वो मुझे खोज लेते हैं फिर खोद डालते हैं. जब मेरी जान निकल जाती है तो मुझे छोड़ जाते हैं.
मुझे इस बात का दुःख नहीं होता था क्योंकि मैं देश के काम आ रही थी. प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री मेरी देख रेख करते थे. अब कहीं कहीं सरकारी हूं और कई जगहों पर निजी कंपनियों के कब्ज़े में हूं. मेरी गोद में कई मज़दूर पले बढ़े और चिरनिद्रा में सोए भी. ये वही मज़दूर हैं जो हमेशा से मजबूर हैं...जंगलों के बीच पड़े. सभ्यता से दूर हैं.
लेकिन अब मैं दुःखी हूं क्योंकि अब मेरा इस्तेमाल देश के लिए नहीं बल्कि कुछ नेताओं के लिए होने लगा है. मुझे भ्रष्टाचार का एक बड़ा ज़रिया बना दिया गया है.चाहे झारखंड हो या कर्नाटक खान और खदान बदनाम हो रहे हैं.
झारखंड में तो मैं बिल्कुल फैली हुई है. ज़मीन के हर टुकड़े में हूं मैं लेकिन राज्य के काम नहीं आती. जिसे जब मन होता है एक पट्टा दे देता है खोद लो और अपना काम निकाल लो.
मैं भ्रष्ट नहीं हूं लेकिन मेरे कारण लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो रहे हैं. पिछले हफ्ते कर्नाटक के लोकायुक्त ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि अवैध खनन हो रहा है और करोड़ों का नुकसान हुआ है.
मुझे इसका दुःख होता है क्योंकि मैं तो देश की संपत्ति हूं किसी की निजी संपत्ति नहीं. मेरा दुःख मीडिया के पल्ले भी नहीं पड़ता. खैर मीडिया के बारे में क्या कहूं. मीडिया के एक बड़े हिस्से को न तो किसान दिखते हैं न गरीब दिखते है तो फिर खान और ख़ान मज़दूर कैसे दिखेंगे.
हां लेकिन मुझे इस देश के लोगों से उम्मीद है कि वो खानों को, किसानों को और जवानों को नहीं भूलेंगे क्योंकि इन तीनों ने देश के लिए बड़ी कुर्बानियां दी हैं.

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खदानों की व्यथा समझने की आज फुर्सत किसे है? इसे समझने के लिए उससे जुड़ने की तकलीफ़ उठानी पड़ती है. आज जब आपके पास पैसा और ताक़त है तो भला किसी भी तरह की तकलीफ़ कोई क्यों उठाये? मुझे आज तक ये समझ में नहीं आया कि भू-गर्भ में पड़ी राष्ट्रीय सम्पत्ति किसी व्यक्ति की कैसे हो सकती है? मेरा तो सुझाव है कि बिना किसी आग लपेट के देश की सभी खदानों का तत्काल प्रभाव से राष्ट्रीयकरण कर दिया जाना चाहिये. साथ ही खनिजों के उत्खनन की मात्रा राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों की जरुरतों के आधार पर तय होनी चाहिये ना ही तथाकथित बाजार की शक्तियों के इशारों पर.
अदभुत,बहुत दिनों के बाद लगता है बीबीसी में एक मुद्दे पर चर्चा हो रही है, नहीं तो सिर्फ़ धर्मनिरपेक्षता ,आतंकवाद ? लेकिन इन सब के बीच जो असली मुद्दा रोटी का था. वो कही गुम हो गया था .आखि़र ये खानें कब तक केवल खाने की तरह इस्तेमाल होगी चाहे वो नेताओ के लिए हो ,अफसरों के लिए हों या .?
खान हूँ , खदान हूँ.
नेताओं के लिए लुट का सामान हूँ.
ठेकेदारों का चाय और जलपान हूँ.
प्रकृति के नयनों से निकलते आंसू के समान हूँ.
जंगलों में तेजी से पसरता रेगिस्तान हूँ.
समय के नब्ज़ पर सूखता हुआ बियाबान हूँ.
बस दो चार दिन का मेहरबान हूँ.
भारत की आन, बांन और शान हूँ.
खान हूँ , खदान हूँ
लेख अच्छा है और कुछ हद तक मार्मिक भी. हाँ, कुछ आंकड़ों की कमी ज़रूर खली.
प्रिय मित्र, आपने फ़ोकस किया तत्कालीन विषय पर लेकिन लेखन एकदम सतही है. कुछ होमवर्क कर लेना था. सार संक्षेप ये कि जनता नेताजी को चुनती है. नेता लोग क़ानून इस तरह से बनाते हैं कि खान-खदान, सोना-चांदी सबकुछ अपने चमचों के पास ही रहे.
झारखंड का संपूर्ण दोहन अभियान चल रहा है. खदान और पहाड़ का अवैध खनन होता हम देख रहे हैं. वन संपदाओं की भी वही दशा है. तिलैया पहाड़ की अंधाधुंध खुदाई से उसका अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ गया है. अब आगे देखते हैं कि कोड़ा, येदियुरप्पा की जगह कौन लेता है.
सुशील जी, इस महान देश भारत के कहने ही क्या. यहां के बेईमान नेताओं ने देश को किसी भी तरह दोनों हाथों से लूटने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी है. मुझे तो इस बीमारी का कोई इलाज नज़र नहीं आता.
बात सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं है. हमें पूरे विकास के विचार पर ही दोबारा सोचने की ज़रुरत है. ज़रा इस ख़बर को भी देखिए..
https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhubaneswar/Orissa-mine-owners-earn-more-than-govt/articleshow/9425141.cms
हां सुशील को इस पोस्ट के लिए शुक्रिया. इन मुद्दों पर बोलने बतियाने और बहस की सख्त ज़रुरत है.
एक ख़बर थी. एपल के पास सरकार से अधिक कैश है.
एक ख़बर भविष्य में छपेगी. भारत के नेताओं ने अफ्रीका में सोने की खानें खरीद लीं और उनके पास भारत सरकार और आरबीआई से अधिक कैश है...
खान ,खनिज,खदान इस देश की आत्मा है .अगर आपने इसकी चोरी की तो बचेंगे नहीं.काला दाग कोयले का ही होता है.अंतुले तुल गए तो औरों की क्या बिसात है.आप धरा से अन्याय करेंगे तो वह माफ नहीं करेगी.सुशील जी आपकी चिंता सही हैआपने हमें झकझोरा है..
भारत का यह दुर्भाग्य है . जहँ हर एक देश आज विकास की ओर गतिशील है. भारत के नेता मंत्री देश को लूटने में लगे है.
भारत की सबसे बड़ी समस्या है किसी ख़ास वर्ग की बढ़ती जनसंख्या.कोई उसके बारे में क्यों नहीं लिखते है.