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प्रधानमंत्री की छवि पर मंडराता साया

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 29 अगस्त 2011, 14:41 IST

कवि विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है कि 'सत्ता का रास्ता जनता को हटाकर बनता है.' लेकिन पिछले पंद्रह दिनों में जनता ने सत्ता को थोड़ा सा हटाकर अपना रास्ता बनाया है.

सत्ता ताक़तवर होती है. उसे अपने होने का बहुत ग़ुरूर होता है. इसलिए शायद वह स्वीकार न करे कि ऐसा हुआ है.

ये बहसें होती रहेंगी कि अन्ना हज़ारे का आंदोलन सही था या ग़लत. इससे जीत मिली या नहीं. अगर जीत मिली तो आधी थी या इसे जीत का एक पड़ाव मानना चाहिए. लेकिन इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकती कि इसने एक ऐसे शख़्स की धज बिगाड़ दी, जो विवादों से और शंकाओं से परे था.

और वो शख़्स प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा कौन हो सकता है.

एक बरस पहले तक वे इस सरकार के माथे के मुकुट थे. सरकार के धुर विरोधी भी इस ऐहतियात के साथ आरोप लगाते थे कि वे प्रधानमंत्री पर आरोप नहीं लगा रहे हैं और वे एक निहायत ही सीधे-सादे और ईमानदार व्यक्ति हैं.

लेकिन पिछले एक बरस ने इस छवि को निर्ममता के साथ बदल दिया है. ऐसा नहीं है कि उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन लोग महसूस कर रहे हैं कि वे बेईमानी को रोक नहीं पाए.

टेलीक़ॉम घोटाले से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले तक जो बयान प्रधानमंत्री ने दिए वे एक-एक करके ग़लत साबित हुए हैं. उन्होंने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम में कोई घोटाला नहीं हुआ लेकिन उन्ही के मातहत काम करने वाली सीबीआई ने उनके एक मंत्री और उनके सहयोगी दल की एक सांसद को जेल में डाल रखा है और उनकी ज़मानत तक नहीं होने दे रही है.

राष्ट्रमंडल खेलों में धांधली पर भी उनकी अपनी पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य अपने कई सहयोगियों के साथ तिहाड़ की रोटियाँ खा रहे हैं.

अगर निकली हुई बात सचमुच दूर तक गई तो नोट के बदले वोट वाले मामले में भी उनकी किरकिरी हो सकती है. भले ही अभी आरोप पत्र अमर सिंह और भाजपा के सांसदों के ख़िलाफ़ हो लेकिन जो कुछ हुआ वह उनकी सरकार को बचाने के लिए ही तो था.

अन्ना हज़ारे के जनलोकपाल के मामले में उनकी सरकार ने एक के बाद एक जिस तरह से फ़ैसले लिए, उसने एकबारगी उनकी राजनीतिक समझ पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.

एक आंदोलन जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ था, उसे मनमोहन सिंह की सरकार ने अपनी नासमझी से अपनी सरकार के ख़िलाफ़ बना लिया. अपने शुरुआती भाषणों में ही अन्ना हज़ारे ने कहा था कि वे किसी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं करते क्योंकि उनका अनुभव है कि अगर ये सरकार भ्रष्टाचार में ग्रैजुएट है तो अगली सरकार डॉक्टरेट होगी. चोर की दाढ़ी में तिनका मुहावरा शायद ऐसे ही मौक़ों के लिए बना होगा.

वर्ष 2009 के चुनाव के बाद विश्लेषकों ने कहा था कि मनमोहन सिंह ही यूपीए के तारणहार साबित हुए हैं. उन्होंने ये भी कहा कि अगर लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें 'निकम्मा प्रधानमंत्री' न कहा होता तो एनडीए को इतना नुक़सान नहीं होता.

अब लालकृष्ण आडवाणी या किसी और नेता में वही पुराना आरोप दुहराने की हिम्मत नहीं है लेकिन अब अगर कोई ऐसा ही आरोप लगाएगा तो शायद जनता बुरा नहीं मानेगी.

वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर ने ठीक ही लिखा है कि मनमोहन सिंह वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसा कि अमरीकी राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में करते हैं. उन्हें पार्टी की तो चिंता होती है लेकिन वे अपनी छवि की बहुत चिंता नहीं करते क्योंकि उन्हें अगला चुनाव नहीं लड़ना होता.

जिस तरह से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की चर्चा गाहे-बगाहे गांधी परिवार के वफ़ादार करते रहते हैं, उससे मनमोहन सिंह को ये समझने में दिक्क़त नहीं है कि ये उनकी आख़िरी पारी है.

मनमोहन सिंह एक सफल नौकरशाह रहे हैं और प्रधानमंत्री की भूमिका भी वे उसी तरह निभाना चाहते हैं. एक राजनीतिक आंदोलन पर लोकसभा में उनका बयान एक राजनीतिक की तरह नहीं आता, किसी नौकरशाह की तरह ही आता है.

उनके फ़ैसले लेने का ढंग ऐसा है कि नारायणमूर्ति तक को ये कहना पड़ा कि इस सरकार में दो शक्तिकेंद्र हैं इसलिए ये ठीक से चल नहीं पा रही है.

अगर उन्होंने शनिवार को हुई बहस ठीक से सुनी हो तो उन्हें थोड़ा समझ में तो आया ही होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आदर के साथ क्यों लिया जाता है.

लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के पद पर लोग एक राजनेता को देखना चाहते हैं. अनिर्णय में फंसे किसी ऐसे नौकरशाह को नहीं तो अपने लिए किसी आदेश की प्रतीक्षा कर रहा हो.

अभी इस सरकार के इतना समय है कि वह अपनी डगमगाती नैया को भँवर से निकाल ले और इतना ही समय प्रधानमंत्री के पास है कि वे अनिर्णय से निकलकर कुछ ठोस राजनीतिक क़दम उठाएँ.

देश का प्रधानमंत्री मज़रूह सुल्तानपुरी का ये शेर नहीं गुनगुनाता रह सकता....

तुझे न माने कोई तुझको इससे क्या निस्बत
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ताचीनों को

क्योंकि इतिहास बहुत निष्ठुर होता है और वह किसी को माफ़ नहीं करता और जनता सबक सिखाने पर उतर आए तो किसी से सहानुभूति नहीं रखती.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:48 IST, 29 अगस्त 2011 Anurag Pare:

    विनोद वर्मा जी का ब्लॉग पढ़ा और पसंद आया , इस देश की दुखती रग है नेताओं का आचरण और उनके लिए यह कहावत है कि मुँह में राम और बगल में छुरी . देश को संकट में जनता नहीं बल्कि नेता खु़द डाल रहे हैं उन्हें गुमान है कि उन्हें कोई भी नहीं हटा सकता और हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी यही है यदि इस कमज़ोरी को दूर करना है तो जनता को राईट टू रीकॉल मिलना ही चाहिए ताकि भविष्य में कोइ भी संसद और सत्ता का दुरुपयोग न कर सके .

  • 2. 16:24 IST, 29 अगस्त 2011 prithvi:

    विनोद जी आपने सही कहा है कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के पद पर लोग एक राजनेता को देखना चाहते हैं, अनिर्णय में फंसे किसी ऐसे नौकरशाह को नहीं . पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री किसी भी ढंग से कुशल नहीं लगे और अब उनके पास बहुत कम ही अवसर हैं.

  • 3. 16:29 IST, 29 अगस्त 2011 sakeel ahamad:

    हम कभी प्रधान मंत्री की छवि की चिंता करते हैं कभी किसी राजनीतिक दल की छवि की लेकिन इन सबका काम देश की छवि बनाने के लिए होना चाहिए जो ये लोग नहीं करते अपनी छवि बनाने के लिए सभी के पास अपने-अपने हथकंडे हैं राजकोष का इस्तेमाल पूरी बेरहमी से राजनीतिक लोग अपनी छवि बनाने के लिए करते रहते हैं. पूरा खेल ही छवियों का है आत्मा जो लगभग सभी दलों की एक सी हो चुकी है. इनसे ये सवाल पूछा जा सकता है कि ये किस बात के लिए उम्मीदवार होते है. उम्मीद का मतलब इच्छा से है और उम्मीदवारी इस इच्छापूर्ति के लिए की जाती है. इसका खुलासा होना चाहिए कि इन्हें इच्छा पद की है, प्रतिष्ठा की है या शासक होने की चाहत है. यदि ऐसा नहीं है तो इन सब को सामाजिक जीवन में होना चाहिए जिसको लोग योग्य समझेगें उसे दायित्व दे देगें उम्मीदवार कोई गलत आदमी भी हो सकता है. तो क्या उसकी उम्मीद पूरा करने लिए ही यह तंत्र बनाया था ? इन उम्मीदवारों पर जिम्मदारी तय होनी चाहिए. अन्यथा ये अपनी उम्मीदें तो पूरी करते ही चले जाऐगें और लोगों को इसी तरह गुमराह करते रहेगें.

  • 4. 17:02 IST, 29 अगस्त 2011 Ajeet S Sachan:

    अतिसुन्दर , बहुत सटीक व्याख्या . अच्छा लगा पढ़ कर . कृपया ऐसा ही स्तर बनाये रखें . पिछले कुछ आलेखों से निराशा ज़रूर हुआ था लेकिन इसने उस निराशा को आशा में बदल दिया.

  • 5. 17:27 IST, 29 अगस्त 2011 SHAHNAWAZ ANWAR,SAHARSA BIHAR:

    दुनिया जानती है कि सरकार किसी की भी हो ,भ्रष्टाचार रोकना नहीं चाहती .ऐसे में भला मनमोहन सिंह की ही क्यूँ न सरकार हो ,संसद में दिख गया कि सभी पार्टियाँ भ्रष्टाचार पर एक मत नहीं थी .लेकिन अन्ना के तीन मुद्दों पर बड़ी मुश्किल से बनी सैद्धांतिक सहमति न अन्ना की जीत है और न ही सरकार की हार .सरकार ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में नहीं लिया जिसे अन्ना खेमा चाहता था .मुझे तो लगता है कि अन्ना के इस आन्दोलन में भले ही भ्रष्टाचार से लड़ने का हथियार था, लेकिन रामलीला मैदान की भीड़ मानो भ्रष्टाचार से कम और कांग्रेस सरकार से ज़्यादा लड रही थी .जैसे बाबा रामदेव के आन्दोलन में था. सरकार ने पूरे मामले को स्थाई समिति के पास भेज कर लडाई का रास्ता अभी काफी लम्बा कर दिया है .

  • 6. 18:11 IST, 29 अगस्त 2011 ZIA JAFRI:

    विनोद जी आप लोग मनमोहन सिंह को ईमानदार का तमगा देतें हैं लेकिन जब उनकी नाक के नीचे बड़े बड़े घोटाले होतें हैं और वो सब जानते है फिर भी मौन रहते हैं तो कैसी ईमानदारी .क्या सिर्फ पैसा नहीं लाने से कोई ईमानदार हो जाता है भले ही उसके सामने सरकारी खज़ाना लुटता रहे .मनमोहन सिंह भी सच्चे गाँधीवादी हैं बुरा न सुनो ,बुरा न कहो बुरा न देखो लेकिन क्या बुरा होने दो ?

  • 7. 19:00 IST, 29 अगस्त 2011 himmat singh bhati:

    भारत सो रहा था और एक बूढ़े शेर अन्ना हज़ारे की दहाड़ ने उसे चौंका कर जगा दिया है. लोग भी आँखें मलते हुए आँखे खोल कर सब कुछ देख रहे हैं. ये एक आँधी थी जिसे रोकने की कोशिश की गई और उसने तूफ़ान का रूप ले लिया. जब अमरीका तूफ़ान को नहीं रोक पा रहा है तो भ्रष्टाचार में लिप्त हमारे नेता इस तूफ़ान को किस तरह से रोक सकेंगे. मनमोहन सिंह ज़रुर दूध के धुले हुए हैं लेकिन उनके अपनों ने दूध में कुछ डाल कर दूध को फाड़ दिया है.

  • 8. 19:56 IST, 29 अगस्त 2011 Mahavidya upadhyay:

    जी हाँ अन्ना के जनलोकपाल मसले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की किरकिरी हुई है. हर पल नागरिकों को ये महसूस हुआ कि पीएम की पोस्ट पर राजनेता हो न कि नौकरशाह. अपनी गलतियों से अन्ना को हीरो बना दिया .एक बात और देखने में आ रही है कि कांग्रेस की टीम में इस समय अदूर्दार्शिता की प्रधानता है.

  • 9. 23:36 IST, 29 अगस्त 2011 Rajesh :

    विनोद जी, आपने बहुत अच्छा लिखा.

  • 10. 00:52 IST, 30 अगस्त 2011 vikas kushwaha, sujgawa, pukhrayan, kanpur.:

    अच्छा ब्लॉग है..

  • 11. 05:18 IST, 30 अगस्त 2011 डॉ. उत्सव कुमार चतुर्वेदी, क्लीवलैंड, �:

    प्रधानमन्त्री के रूप में डा. मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी सफलता यही है की वे पिछले साल तक लोगों के मन में अपनी ईमानदारी का भ्रम पालने में सफल रहे. स्व इंदिरा गाँधी पर कभी " बेईमानी का आरोप" नहीं लगा किन्तु स्वर्गीय राजीव गाँधी को लोग मिस्टर क्लीन और " टेफ्लान कोटेड" का तमगा देते थे. फिर बोफोर्स कांड के रूप में जो भ्रष्टाचार का कच्चा चिठ्ठा खुला, वो जग ज़ाहिर है.
    यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि मनमोहन जी ने स्वयं कितनी सम्पत्ति बनाई. देश उनके सामने और उनकी सहमति से लूटा और इस सारी लूट का सेहरा मनमोहन सिंह के सिवाय और किसी के सर पर नहीं बांधा जा सकता. यदि उनमें थोड़ी सी भी शर्म बाकि होती तो कब के इस्तीफा़ दे चुके होते. हमने देवकांत बरुआ को "इंदिरा इज इंडिया" कहते सुना था, मगर मनमोहन जी तो बरुआ से भी चार हाथ आगे निकल गए.

  • 12. 05:45 IST, 30 अगस्त 2011 Deepak kumar, VA USA:

    विनोद जी,हमेशा की तरह इस बार भी आपका ब्लॉग उतना ही उम्दा है.साहित्यिक, समसामयिक घटनाचक्र और राजनितिक विश्लेषण का अनुपम संगम . धन्यवाद

  • 13. 07:41 IST, 30 अगस्त 2011 kamlesh:

    बिलकुल सही. मुझे ये आलेख पसंद आया, यही सच है.

  • 14. 12:20 IST, 30 अगस्त 2011 BHEEMAL Dildar nagar:

    प्रियवर विनोद जी , धन्यवाद - स्पष्टवादिता के लिए . आपने परोक्ष रूप से उनकी औक़ात बता ही दी कि वे एक रिमोट कंट्रोल हैं और बातों दबाने तक प्रतीक्षा करते हैं .रही बात बुश से तुलना करना कुछ ज़्यादती हो जाएगी , क्योंकि सत्ता के नशे में बेचारे बुश को पादुकायें खानी पड़ी थी , आखि़री दौर देखो कि कितने बे -आबरू हो के निकलते हैं जनाब

  • 15. 15:22 IST, 30 अगस्त 2011 Mahesh:

    इंजीनियरिंग की भाषा में कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अच्छा इंजीनियर है इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि वह अच्छा मैनेजर भी होगा. यही बात डॉ मनमोहन सिंह पर भी लागू होती है. मैं मानता हूँ कि वे एक ईमानदार व्यक्ति हैं. अपनी छवि को लेकर उन्होंने संसद में भी जिस तरह का बयान दिया है वैसा बयान देने की हिम्मत और किसी राजनीतिज्ञ में नहीं हो सकता. मैं अन्ना के आंदोलन का आँख मूंदकर समर्थन करता हूँ लेकिन मैं मनमोहन सिंह पर भी भरोसा करता हूँ. मुझे लगता है कि अगले प्रधानमंत्री से तुलना करने के बाद हम उन्हें बेहतर समझ पाएँगे.

  • 16. 15:43 IST, 30 अगस्त 2011 ARUN:

    मनमोहन सिंह जी केवल भाषणबाजी करते हैं.

  • 17. 18:37 IST, 30 अगस्त 2011 ashish yadav hyderabad:

    मुझे लगता है कि मनमोहन सिंह को भी कुर्सी का रोग लग गया है वरना इतना हो जाने के बाद उन्हें गद्दी छोड़ देनी चाहिए थी. सच तो ये है कि वे आज की राजनीति के लिए फ़िट नहीं हैं. अब तो उनकी ईमानदारी पर भी शक होता है. ऐसी ईमानदारी किस काम की जो बेईमानों को बचाने में ख़र्च की जा रही हो. पता नहीं कि क्या वजह है कि मनमोहन सिंह मात्र रबर स्टैंप की तरह काम कर रहे हैं. आख़िर देश को एक प्रधानमंत्री चाहिए ना कि कठपुतली.

  • 18. 20:10 IST, 30 अगस्त 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    विनोद जी जब भी लिखते हैं सो कुछ खास लिखते हैं, इस बार उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के बहुत सारे राज़ खोले हैं. कौन नहीं जानता कि माननीय प्रधानमंत्री जी नौकरशाह थे नौकरशाह हैं और आगे भी रहेंगे. एक नौकरशाह जितना कर सकता है किया. एक क़िस्सा याद आ रहा है. एक बड़े नौकरशाह किसी सामाजिक नेता से मिलने आये थे. बाद में सामाजिक नेता ने पूछा कि मैं उन्हें कैसे जानता हूँ, मैंने कहा बहुत अच्छे अफसर हैं तपाक से उधर से जवाब आया, ये 'ऐसी गाय हैं जो न बछड़ा देती है और न दूध'. आदरणीय प्रधानमंत्री जी के लिए यह कितना उपयुक्त है यह तो पाठक ही तय करें. विनोद जी ने नेता होने की जिम्मेदारी का जिक्र किया है साथ ही एक नौकरशाह और नेता के फ़र्क़ का. अक्सर नेता और नौकरशाह में यह भ्रम बना रहता कि उनकी वजह से देश चल रहा है. लूट की कला में नौकरशाह माहिर होता है कि नेता, ये एक बड़ा सवाल था तो विनोद जी ने उसका जबाब भी दे दिया है.

  • 19. 21:08 IST, 30 अगस्त 2011 ashish kumar:

    विनोदवर्मा का ब्लॉग पढ़ कर मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि क्यों कांग्रेस मनमोहन सिंह को कंधों पर ढो रही है.

  • 20. 00:45 IST, 31 अगस्त 2011 Sandeep Mahato:

    विनोद वर्मा जी बहुत बहुत धन्यवाद इस सत्य और सटीक ब्लॉग के लिए. हमारे प्रधानमंत्री आज सचमुच में काफी अकर्मण्य और लाचार नज़र आ रहे हैं. उनके सामने कई ऐसे मोड़ आए जब उन्हें राष्ट्रहित में फैसला लेना था पर वह हर बार अपनी असमर्थता ही जताई. और इतना ही नहीं वे हर बार भ्रष्टाचारियों को बचाते हुए नज़र आए. मेरा मानना है जो चोर को आश्रय देता है वह बड़ा गुनाहगार है, चोर से. अगर वह ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं तो वो प्रधानमंत्री की कुर्सी का अपमान कर रहे हैं और अगर किसी दबाव में ऐसा कर रहे हैं तो वो प्रधानमंत्री की कुर्सी के लायक नहीं हैं.

  • 21. 01:16 IST, 31 अगस्त 2011 pramod jain:

    अति सुंदर, बिल्कुल सही भाषा का इस्तेमाल किया आपने.

  • 22. 01:17 IST, 31 अगस्त 2011 pramodkumar:

    प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लोकसभा का चुनाव हार गए थे और प्रसिद्व पत्रकार खुशवंत सिंह को उधार में लिए पैसे लौटाने गए थे.इस तथ्य का खुलासा खुशवंत सिंहजी ने मनमोहन सिंह के प्रधामंत्री बनने के बाद अपने कॉलम में किया था.यह एक मिसाल है.क्योंकि चुनाव हारने वाले बिरले ऐसे होते हैं.विडम्बना थी की मनमोहन सिंह दिल्ली के उस क्षेत्र से चुनाव हारे जहाँ सबसे अधिक बुद्विजीवी थे.वे ईमानदार हैं लेकिन उनके मंत्री घूस लेते थे .मनमोहन सिंह अगर आज भी अटल जी की तरह मज़बूती से फैसले लें तो उनका कद बढ़ जाएगा..

  • 23. 14:17 IST, 01 सितम्बर 2011 dilip kumar:

    प्रियवर विनोद जी, धन्यवाद - स्पष्टवादिता के लिए. आपने परोक्ष रूप से उनकी औक़ात बता ही दी कि वे एक रिमोट कंट्रोल हैं और बातों को दबाने तक की प्रतीक्षा करते हैं.

  • 24. 11:56 IST, 02 सितम्बर 2011 E A Khan:

    आपने कुछ हद तक सही लिखा है कि कांग्रेस के पास एक और मौक़ा है कि वह अपनी डूबती हुई नौका को भंवर से निकाल सकता है. लेकिन क्या कांग्रेस के पास इनती शक्ति है कि कम से कम जन लोकपाल कानून को ठीक ढंग से पास कर उसको सही माएने में अमली जमा पहना सके. इस देश में भ्रष्टाचार का जो हाल है वह उस कार्य प्रणाली से कभी दूर नहीं होने वाला जिस तरीके से यहाँ के मसले सुलझाए जाते हैं. यहाँ की जनता को मैं नमन करना चाहता हूँ कि अब वह भेड़ चाल नहीं चल रही. उसकी निगाह दिनों दिन पैनी होती जा रही है. इस देश से भ्रष्टाचार हटाना होगा उसके लिए सरकार जो भी रास्ता अख्तियार करे यह सरकार का काम है. यहाँ का संविधान जनता के लिए बना है. वह किसी असमान से नहीं उतरा है. इस लिए ज़रूरी संशोधन यदि करना पड़े तो सरकार को तुरंत करना होगा.

  • 25. 13:53 IST, 02 सितम्बर 2011 Rahul Shah:

    प्रधानमंत्री: हम चुन के जो आएं जो मर्ज़ी करेंगे, देश हित में
    घोटाला का रोना रोनेवाले, चुनाव जीत के दिखाओ तो जाने
    बेवजह फ़ालतू का रोना बंद करो.

  • 26. 15:42 IST, 02 सितम्बर 2011 shakil:

    विचार से आयकर विभाग को उन सभी कर्मचारियों के नाम सार्वजानिक किया जाना चाहिए जिन्होंने इस प्रकार की सेवाएं दी है. और नौकरी छोड़ दी या उक्त नियम में आते है. यदि केजरीवाल जी, एक सौ इक्कीस करोड़ जनता में से एक मात्र ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने सम्बंधित विभाग के नियम थोड़े है तो उन पर जो कार्यवाई होगी वह उचित है. लेकिन यदि ऐसे और भी व्यक्ति है जो उक्त नियम में आते हैं और उन पर अब तक कोई कार्यवाई नही हुई तो ये जन लोकपाल अन्दोंलन को दिशाहीन करने का एक प्रयास ही तो है.

  • 27. 18:13 IST, 02 सितम्बर 2011 PRAVEEN SINGH:

    राष्ट्रमंडल खेलों और मान्यवर नेता गण के सदाचार को लेकर बहुत ड्रामा किया हमारी तो नींद हराम कर दी. बाबा लोगों के एक-एक चेलों को कालेपीले धन के चपेटे में तिहाड़ की कॉमन कोठरी में भिजवा देगी हमारी सीबीआई. इन बाबा के शुभचिंतकों को बचाने कोई भी आम या ख़ास बैरिस्टर नहीं आएगा. जो आया उसको भी तिहाड़ में.

  • 28. 22:57 IST, 02 सितम्बर 2011 manoj kumar:

    आप सही कह रहे हैं मगर मनमोहन सिंह कभी भी प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नहीं थे.

  • 29. 20:34 IST, 03 सितम्बर 2011 Sandeep Mahato:

    मगर यह बात भी सच है की छवि पर लगा हुआ दाग़ इतनी आसानी से नहीं धुलता, उसके लिए तो मनमोहन सिंह जी को अपने आपको साबित करना होगा. और अभी वो ये साहस जुटा पाएंगे ऐसा कतई नहीं लगता

  • 30. 10:59 IST, 04 सितम्बर 2011 अवनीश राय:

    विनोद जी, पिछले डेढ़ सालों के प्रकरण के बाद वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री के बारे में लोगों ने जो धारणा बनाई है,उसकी अभिव्यक्ति आपने बहुत ही सटीक तरीके से की है.....साधुवाद। मैने सुना था कि नरसिंहा राव जी फैसले लेने में टालमटोल और देरी करने के आदी थे,शायद बचपन की किसी आदत का नतीजा रहा हो। वर्तमान प्रधानमंत्री भी नौकरशाहों की आदत स्वरूप "ऊपर" के आदेश का इंतजार करते होंगे।

  • 31. 12:01 IST, 04 सितम्बर 2011 BINDESHWAR PANDEY BHU:

    प्रधानमंत्री लोकतंत्र रूपी इमारत का स्तम्भ होता है, और यदि आधार-स्तम्भ ही बहुत कमजोर हो तो एक विशालकाय भवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती .यही आज भारतीय लोकतंत्र के साथ हो रहा है.

  • 32. 15:28 IST, 04 सितम्बर 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    मैं तो बस इतना कहूंगा कि रोज़ -रोज़ मरने से अच्छा है एक बार वीर की भांति सिर उठाकर जीना ! हमारे प्रधानमंत्री जी राजनीति के मकड़ - जाल में फंस कर रह गये हैं ! पता नहीं वो आर्थिक सुधारक कहाँ खो गया है ? मेरे विचार से प्रधानमंत्री जी को त्याग पत्र देकर अन्ना जी की राह पर चलना चाहिए ! कोयले की खदान में बैठकर यह सोचना कि कालिख से बच जाओगे तो हास्यास्पद है ! आज देश को बड़े बड़े भाषण देने वाले करोड़पति , अरबपति ,संसद में सोने वाले व जनता की भावनाओं से खेलने वाले नेताओं की आवश्यकता नहीं है ! प्रधानमंत्री हमारे देश में बहुत ही महत्वपूर्ण पद है लेकिन सरदार जी या तो इस पद की शक्ति को प्रयोग करना नहीं चाहते या जानबूझ कर अनजान बने बैठे हैं ! एक वक्त था दूरदर्शन पर मात्र प्रधानमंत्री दर्शन ही हुआ करते थे लेकिन अब प्रधानमंत्री जी बड़ी मुश्किल से नजर आते हैं ! यूं खामोश रहकर ,दुखी रहकर देश से खिलवाड़ करना भी बहुत बड़ा अपराध है !

  • 33. 23:03 IST, 05 सितम्बर 2011 raghaw:

    ये काफ़ी अच्छा ब्लॉग है. भारत सरकार में जो भी हो रहा है ये उसे देखते हुए बिल्कुल सच है. हमारे प्रधानमंत्री काफ़ी ईमानदार हैं और वह भ्रष्टाचार को बचाने के लिए ठीक ढंग से क़दम नहीं उठा पा रहे हैं.

  • 34. 13:13 IST, 06 सितम्बर 2011 KISHAN SINGH:

    भारत की प्राथमिक पाठशाला में एक महत्त्वपूर्ण कहावत है कि अंधे के हाथ बटेर लग गई. प्रधानमंत्री जी को देखकर भी यही लगता है.

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