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कितने ईमानदार हैं प्रश्न?

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|सोमवार, 05 सितम्बर 2011, 12:48 IST

कोई पाकिस्तानी-श्रीलंकाई-अंग्रेज़ परदेसी, या ख़बरों की दुनिया से दूर रहनेवाला देसी यदि ये बाल सुलभ प्रश्न करता है - कि अन्ना हज़ारे कौन हैं - तो ये सवाल एक सवाल होता हैं, उनमें उत्तर जानने की जिज्ञासा, निश्छलता, ईमानदारी होती है.

पर सचेत सज्जनों की बौद्धिकता से ओत-प्रोत बोली-बात-बहस के बीच जब कहीं ये सवाल आता है - कि अन्ना हज़ारे कौन हैं, या अन्ना हज़ारे हैं कौन, या अन्ना हज़ारे असल में कौन हैं - तो वो सवाल, सवाल नहीं होता, उनमें उत्तर जानने के स्थान पर उत्तर बताने की अभिलाषा होती है. वो सवाल ईमानदार नहीं होता.

पिछले दिनों ऐसे प्रश्न बहुतेरे दिखाई दिए जो एक प्रतिप्रश्न को पैदा करते हैं - कि क्या इस प्रश्न में ईमानदारी है? ये प्रश्न उत्तर जानने की इच्छा से किया गया प्रश्न है? या ये अपनी बात को रखने का एक यत्न भर है.

अन्ना के आंदोलन को लेकर जो प्रश्नों का अंबार लगा रहा, जिनमें एक प्रश्न सर्वत्र छाया रहा - क्या अन्ना की तुलना गांधी से हो सकती है? - अब ये प्रश्न एक प्रतिप्रश्न पैदा करता है. क्या प्रश्नकर्ता को सचमुच नहीं पता कि ये तुलना एक प्रतीक भर है? अन्ना और गांधी की तुलना के इस प्रश्न को लेकर जो भी दिशाहीन बहस होगी, उसका निष्कर्ष कहाँ पहुँचेगा, ये क्या प्रश्नकर्ता को नहीं मालूम?

एक प्रश्न ये भी उठा - क्या अन्ना का आंदोलन, जेपी के छात्र आंदोलन, संपूर्ण क्रांति आंदोलन के जैसा आंदोलन है, या क्या वाकई आंदोलन है भी? - यहाँ अब ये प्रतिप्रश्न आता है - क्या वाकई इस प्रश्न का उद्देश्य ये जानने के लिए किया जा रहा है कि ये आंदोलन है या नहीं? या ये एक प्रयोजन है, ये राय प्रकट करने का कि नहीं अन्ना का आंदोलन, जेपी के आंदोलन जैसा नहीं है.

इन प्रश्नों को भी लीजिए - क्या ये क्रांति है, आज़ादी की दूसरी लड़ाई है? उत्साह और उन्माद में निकले नारों को पकड़कर उछाले गए इस प्रश्न का उत्तर भी पूछनेवाला पहले से जानता है. दिशाहीन मार्ग पर भागती बहस कहीं भी नहीं पहुँचेगी इसका उसे भी अंदाज़ा नहीं होता?

एक बुनियादी प्रश्न ये उठाया गया - क्या एक जन लोकपाल क़ानून से सारी समस्याओं का अंत हो जाएगा, क्या भ्रष्टाचार का निर्मूलन हो जाएगा? - यहाँ फिर प्रतिप्रश्न आता है - क्या वाकई प्रश्न करनेवाला नहीं जानता कि इसका उत्तर नकारात्मक में ही आएगा? स्वयं अन्ना हज़ारे कह चुके हैं इससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी, उसका अंत नहीं होगा. जन लोकपाल विधेयक सरकारी भ्रष्टाचार का सवाल उठाता है, भ्रष्टाचार के सामाजिक-आर्थिक-नैतिक आयामों से जूझने के लिए दूसरे उपाय अपनाने होंगे, क्या ये प्रश्नकर्ता को नहीं मालूम?

प्रश्न ये भी उठा - टीवी-मीडिया-फ़ेसबुक-ट्विटर ना होता तो क्या अन्ना के आंदोलन को ऐसा प्रचार मिलता? - यहाँ प्रश्नकर्ता सिद्ध करना चाहता है कि बिना इन माध्यमों के ऐसा प्रचार नहीं मिलता. पर प्रतिप्रश्न ये भी उठता है - क्या प्रश्नकर्ता नहीं जानता कि संचार माध्यमों के जगत में जो क्रांति हुई है वो स्थापित हो चुकी है? क्या आज गांधीजी या जेपी होते तो मोबाइल फ़ोन नहीं रखते? टीवी पर दिखाई नहीं देते?

प्रश्न आंदोलन के तरीक़े पर भी उठाया जा गया - कि अनशन करना ब्लैकमेल करने के जैसा नहीं है? - प्रतिप्रश्न आता है - क्या प्रश्नकर्ता समेत समाज का हर सचेत व्यक्ति इसका उत्तर नहीं जानता? क्या वो नहीं जानता कि अनशन दबाव डालने का एक प्रभावी अस्त्र है जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी ने कई बार किया, कभी अंग्रेज़ों पर दबाव डालने के लिए, कभी अपनों पर? और क्या सचमुच इस प्रश्न का उत्तर नहीं समझा जा सकता कि आज कोई भी, कहीं भी, किसी भी मुद्दे को लेकर अनशन करने पर तुल जाए तो उसके पीछे भी लोग उसी तरह जा खड़े होंगे, जिस तरह अन्ना हज़ारे के साथ जा खड़े हुए?

अन्ना हज़ारे की असलियत, अरविन्द केजरीवाल-प्रशांत भूषण-किरण बेदी की मंशाओं, उनके आंदोलन के तरीक़े, उनकी भाषा, उनके तेवर, लोकपाल-जन लोकपाल के अंतरों को बिना बूझे नारे लगानेवाली भीड़, वंदे-मातरम, भारत माता की जय जैसे नारों, टीवी-मीडिया के आक्रामक प्रयोग-दुष्प्रयोग, लालू जी की लोकतांत्रिक परंपरा को बचाने की घनघोर चिंता - इन सबपर बहस करने से पहले ईमानदार प्रश्नों का सामना करना ज़रूरी है.
गहराई में उतरें, तो ऐसे अनेक ईमानदार प्रश्न आज खड़े दिखाई देंगे.

पता करना है तो पता ये करिए कि अन्ना हज़ारे के इस आंदोलन की परिणति चाहे जो भी हो, मगर ऐसा क्या हुआ कि भ्रष्टाचार का एक ऐसा प्रश्न, जो चहुँओर दृश्यमान होने के बावजूद दिखता नहीं था, अचानक सारे देश में चर्चा का केंद्र बन गया?

पता ये करिए कि एक ऐसा शब्द जो कि असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, छात्र आंदोलन जैसी टेक्स्टबुक की विषयवस्तु से अधिक कुछ नहीं था और बहुत हुआ तो जिसे राजनीति का औज़ार समझा जाता था, वो आज बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के प्रकट कैसे हो गया और अपने होने का अहसास करा गया?

पता करना है तो बजाय विलाप करने के, कोसने के, जो प्रकट है उसपर संदेह करने के, ईमानदारी से इस प्रश्न की पड़ताल होनी चाहिए कि माओवादियों का विद्रोह, आत्महत्या करते किसानों की बेबसी, इंफा़ल में बरसों से अनशन कर रही बहादुर इरोम शर्मिला का सत्याग्रह, और ऐसे न जाने कितने विकट प्रश्न, क्यों नहीं सारे देश को झकझोर पा रहे है? अन्ना हज़ारे की ताल पर ताल मिलाते जनसमुदाय और मीडिया को दूसरे आंदोलन और विरोध क्यों नहीं लुभा पा रहे? और उसमें नुक़सान किनका हो रहा है?

एक सभ्यता के विकासमान पथ पर अग्रसर रहने के लिए प्रश्न बहुत आवश्यक हैं, मगर उन प्रश्नों में ईमानदारी का तत्व होना चाहिए. जिन प्रश्नों की बुनियाद से ईमानदारी का तत्व ओझल हो, उससे निर्मित होनेवाले उत्तर की इमारत ढुलमुल ही रहेगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:21 IST, 05 सितम्बर 2011 KAILASH GAIRI:

    बहुत बढ़िया लेख है.

  • 2. 14:46 IST, 05 सितम्बर 2011 भीमल, दिलदार नगर:

    भाई अपूर्व जी, कृपया मेरी टिप्पणी की भावना को समझें. प्रेमचंद जी के साहित्य में लेखन का तत्व है, कि लेखक की भाषा और सार एक मज़दूर और किसान की भी समझ में आ जाएँ. किंतु आपने जो ब्लॉग लिखा वो प्रश्नों के जाल में उलझ गया है. आप को सीधी और सच्ची बात कहनी चाहिए.

  • 3. 15:19 IST, 05 सितम्बर 2011 RONI KEREN:

    भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के साथ नारे लगाने वालों का बिलकुल वही अंदाज़ है जो कि गंगा स्नान करके अपने पाप धोने वालों का होता है. दुनिया भर के पापी एक दिन गंगा में डुबकी लगा कर अपनी ओर से स्वर्ग के भागी बन जाते हैं . और वास्तविक जीवन में फिर से पूरे छल और बल से कपट पूर्ण काम करते हैं. अगर वास्तव में हम को सच्चा इंसान बनना है तो सब से पहले शुरुआत अपने घर से करनी चाहिए. सिर्फ नारे लगा कर या फेस बुक पर स्क्रेप्स भेज कर हम भारत को साफ़ और स्वच्छ नहीं बना सकते.

  • 4. 15:24 IST, 05 सितम्बर 2011 भीम कुमार सिंह:

    प्रश्न की सार्थकता और प्रश्न करने वाले की ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए शुक्रिया. मैं समझता हूं कि अन्ना ने मौजूदा परिदृश्य में भी गांधी के दर्शन की सार्थकता साबित कर दी है. अब उनके इस साहस से जिन लोगों को बैचेनी हुई है, वे वास्तव में हमारे समाज और व्यवस्था को कमजोर करने वाले तत्व हैं और चाहते हैं कि यथास्थिति बरकरार रहे. इसलिए वे अन्ना हज़ारे और उनकी मुहिम पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं. संभवत: वे अब भी इस मुगालते में हैं कि आम लोगों को बरगलाना आसान है और लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने की दुहाई देकर उन्हें घर से निकलने से रोका जा सकता है. लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि आख़िरकार अंतिम सत्ता जनता के हाथों में है और उसे साथ लिए बगैर ज्यादा दिन तक सत्ता पर काबिज रह पाना संभव नहीं है.

  • 5. 16:53 IST, 05 सितम्बर 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    अपूर्व जी शुरू का लेख पढ़ कर तो मेरा भी सिर चकरा गया ! मगर एक बात तो तय है कि अन्ना जी के विषय में दिशाहीन जैसा कुछ भी नहीं है ! बस कुछ प्रबुद्धवर्ग अपनी असफलताओं पर खिसियाये हुए हैं ! हाँ प्रश्नकर्ताओं की नीयत में खोट नजर आता है ! क्योंकि जब भी कोई बहस होती है तो पक्ष और विपक्ष में बोलने वालों की कमी नहीं होती ! अगर पक्ष में ही बोला जाता रहे तो वह बहस न होकर प्रवचन हो जाता है ! अन्ना जी की गांधी जी से तुलना बस इतनी हो सकती है कि वे गांधी जी की राह पर चल रहे हैं ! लाठी ,डंडे व् बन्दूक से डरे नहीं और न ही जेल व् पुलिस से डरे ! गांधी जी विदेशी ताकतों के आगे सीना ताने गोली खाने से नहीं डरे तो यहाँ अन्ना जी अपनों के आगे किसी प्रकार के भय के आगे नहीं झुके ! दूसरी बात प्रायोजन सता व् विपक्ष व् अन्य राजनितिक दल कार्यकर्ताओं को नाना प्रकार के प्रलोभन देकर करवाते हैं ! अन्ना जी का आन्दोलन राष्ट्र प्रेम व् राष्ट्र हित से ओतप्रोत रहा है !
    तीसरी बात बेशक यह आन्दोलन क्रांति से कम नहीं था ! आम जन मानस यूं ही देश भर में तिरंगा हाथ में लेकर नहीं निकल पड़े थे ? और किसी नेता के पीछे क्यों नहीं इतना बड़ा जन सैलाब उमडा ? चौथी बात क्या एक जन लोकपाल क़ानून से सारी समस्याओं का अंत हो जाएगा, क्या भ्रष्टाचार का निर्मूलन हो जाएगा? तो ज्बाब है कि एक अच्छी शुरुआत में ही आधा कार्य सफल हो जाता है ! अंतत: चार दशक से ज्यादा अंतराल बाद किसी ने तो एक अच्छी शुरुआत की ! मेरे ख्याल से शनै: -शनै: इन कुरीतियों का निर्मूलन आवश्यक होगा !

  • 6. 17:41 IST, 05 सितम्बर 2011 नवल जोशी:

    दरअसल अन्ना प्रश्न नहीं,पहेली हैं, जिसका कोई जवाब नहीं है. यदि होता तो सत्ता, दिग्विजय सिंह और मनीष तिवारी के पीछे-पीछे चल रही होती. उन्हें माफी मांगने की जरूरत ना पडती, अंत्त में मन मसोस कर ही सही, यदि राहुल गॉधी को अन्ना की तारीफ करनी पडी है तो ज़ाहिर है कि अन्ना के सवाल ऐसे नहीं हैं कि जिनका जवाब दिया जा सकता हो. अन्ना जिस तरह मदांध सत्ता के सामने खड़े हुए उसका क्या जवाब हो सकता है? रामदेव की तरह अन्ना का हाल कर देने की धमकी से लेकर सत्ता ने जिस तरह के हथकंडे अपनाये उससे कहीं भी नहीं लगा कि लोगों को गुलाम समझने की अंग्रेज़ मानसिकता आज भी सत्ता में बैठे लोगों के मन में नहीं है, बल्कि सत्ता संचालन का दर्प अंग्रेजों से इन लोगों में कुछ अधिक ही है, अन्ना ने इसी को तोड़ा है. सत्ताएँ अधिकतर हिंसक,गर्वोन्मत्त,संवेदनहीन और निरंकुश होती हैं, यह उसका स्वभाव है जनआंदोलनों के उपर इस बात की जिम्मेदारी होती है कि सत्ताओं के दॉत और नाखूनों की काट-छॉट होती रहे जिससे कि सत्ता का नशा बीच-बीच में उतरता भी रहे. लोगों को शिकायत सत्ता से तो रही ही है, लेकिन उन स्वनामधन्य क्रान्तिकारियों के प्रति भी लोगों मन में क्षोभ है जो कि क्रान्ति से कम में किसी भी बात के लिए राज़ी ही नहीं होते, बावजूद इसके कि हमारे देश में असंख्य क्रान्तिकारी संगठन है,फिर भी जनआंदोलनों पर किसी को विश्वास ही नहीं है और न ही किसी में इतनी क्षमता है कि लोगों को अपील कर सकें. वास्तव में ये लोग जनआंदोलन से डरते है, क्योंकि मठाधीशी और जनआंदोलन एक दूसरे के विपरीत होते है. अन्ना ने इनको भी आईना दिखाया है. इसी बात से ये लोग अन्ना से नाराज़ हो गए हैं ,और अरूंधती रॉय की अगुआई में इस आंदोलन पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं, इतनी नाराज़गी तो कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह और मनीष तिवारी को भी अन्ना से शायद नहीं होगी. लेकिन यह भी सत्य है कि अन्ना को झुठलाने की जितनी भी कोशिशें की जा रही हैं उससे इस देश में जनआंदोलन के प्रति लोगों का आकर्षण और विश्वास भी बढता ही जा रहा है. अन्ना का जादू जनलोकपाल में नहीं है वह तो ऐसा ही है जैसे कि लोकमान्य तिलक ने गणेश पूजा समारोह को जनचेतना का माध्यम बना दिया था और गॉधी जी ने नमक कानून से लोगों की चेतना को झकझोरा था.

  • 7. 19:01 IST, 05 सितम्बर 2011 राजीव रंजन:

    बहुत ही बढ़िया. प्रश्नों की ईमानदारी ज़रूरी है. रही बात अन्ना जी के आंदोलन की तो ये तो बस शुरूआत है. युवाओं को एक रास्ता दिखा है. देखना ये है कि ये रास्ता जाता कहाँ तक है. फिर से बहुत ही बढ़िया.

  • 8. 21:11 IST, 05 सितम्बर 2011 anand:

    किस तरह की समझदारी है ये जो बिना कोई प्रश्न किए, बिना किसी तर्क के बस अंधों की तरह पीछे चलने के लिए प्रेरित करती है. आप प्रश्नकर्ता की नीयत पर शक़ करते हैं और हम अपने आंदोलन की ईमानदारी पर. गांधी से तुलना इसलिए क्योंकि गाँधी का नाम और उसके नारों का सहारा लेकर अपन प्रवचन कर रहे थे. जनलोकपाल पर सवालिया निशान क्योंकि आप भ्रष्टाचार से मुक्ति का दावा ठोक रहे हैं. लालू की लोकतंत्र की चिंता इसलिए क्योंकि वो अकेला नहीं जिसको लोकतंत्र की परवाह है. देश में एक वर्ग ऐसा है जिसको लोकतंत्र से नुक़सान हुआ है और वो चाहता है कि लोकतंत्र ख़त्म हो. अन्ना क्यों... ये सवाल इसलिए कि वो पूरे देश की आवाज़ बनना चाहते हैं. तो उसे साबित करना होगा कि वो कौन होता है देश का प्रतिनिधित्व करना वाला. बाक़ी 100 करोड़ जनता की कौन कहेगा.
    जी हाँ, व्यवस्था में कमियाँ हैं, तो उसे सुधारा जाना चाहिए. अन्ना का क़ानून उसे ख़त्म करने की दिशा में है. आपकी साँस में तक़लीफ़ हो तो आप साँस लेना बंद तो नहीं कर देंगे. ये संविधान का बात है, इसलिए बिना तर्क किए, बहस किए क्यों मान लेना चाहिए, क्या आप सचमुच पत्रकार हैं. मैं आपकी विद्वत्ता पर शक़ करने की माफ़ी और इजाज़त चाहता हूँ.

  • 9. 09:22 IST, 06 सितम्बर 2011 mahesh gohil:

    लोग अन्ना के आंदोलन में सिर्फ़ इसलिए नहीं शामिल हुए कि वे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हैं ख़ुद पूरी तरह स्वच्छ हैं. इसकी कुछ और वजहें भी हो सकती हैं. एक मेरी तरह के लोग हो सकते हैं जो अभी ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि जीवन का उद्देश्य क्या है, मैं वहाँ देखने गया था कि क्या मैं समाज कार्य अपना सकता हूँ या क्या अगर मैं दूसरों के लिए काम करूँ तो उससे मुझे मानसिक शांति मिलेगी. दूसरा मेरे दिमाग़ में ये बात भी आ रही थी कि अगर मैं अन्ना का समर्थन करूँ और रामलीला मैदान जाऊँ तो वहाँ के समर्थकों की संख्या में एक की वृद्धि करूँगा. इस तरह से सरकार के ख़िलाफ़ दबाव बनेगा और मैं अन्ना की मदद कर पाऊँगा.

  • 10. 13:11 IST, 06 सितम्बर 2011 Saptarshi:

    प्रश्न तो ये भी होना चाहिए कि प्रश्नकर्ता कौन है. अँगरेज़ी न्यूज़ चैनल में आने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, या फिर एसी कमरे में बैठने वाले वे लोग जो ये समझते हैं कि ज़मीनी सच्चाइयों को सिर्फ़ और सिर्फ़ वो ही समझते हैं.

  • 11. 17:04 IST, 06 सितम्बर 2011 हर्ष कुमार:

    मैं गांधीवादी हूँ पर मैं ये भी मानता हूँ कि गांधीजी में भी कई कमियाँ थीं, जैसा वो ख़ुद भी कई बार कह चुके हैं. किसी आंदोलन को उसके नारे से देखना मूर्खता होगी. तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा का अर्थ ख़ून से नहीं है. शाब्दिक अर्थ निकाल कर, यहाँ लेखक ने अपनी मूर्खता का परिचय दिया है. अन्ना, गांधी नहीं हो सकते. इंसान, मैथेमेटिक्स के कॉम्प्लेक्स नंबर की तरह होता है, जिनमें तुलना नहीं होती है. हाँ, उनकी सोच में समानता हो सकती है. गांधीजी भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहते थे और अन्ना भी, और मैं भी. रही बात एक लोकपाल से क्या भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा? क्या दहेज ख़त्म हुआ एक क़ानून बनाकर? आपने ये ब्लॉग तब लिखा था? दलितों का उद्धार हुआ क़ानून बनाकर? आपने ये ब्लॉग तब लिखा था? बीबीसी का बौद्धिक पतन देखकर काफ़ी दुःख हो रहा है. आप सच्चाई ना लिख कर, क्या पता आजक अजीबोग़रीब तर्क दे रहे हैं.

  • 12. 17:40 IST, 06 सितम्बर 2011 ई ए ख़ान:

    इस देश में लोग प्रश्न बहुत करते हैं. कुछ भी नया उनके लिए बड़ा अजूबा लगता है. यहाँ अभी तक यह कथन प्रचलित है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे. यानी किसी काम में हाथ डालने के पहले लोग बात का बतंगड़ बहुत बनाते हैं. नतीजा यह होता है कि असल मुद्दा तो पीछे छूट जाता है. लोग वाद विवाद पर ज्यादा उतर जाते हैं. यही हाल अब अन्ना के आन्दोलन को लेकर हो रहा है. यह बहुत निराशाजनक परिस्थिति है. सरकार के वादे को सही तरीके से लागू कराने के लिये हर वर्ग को उसी जोश खरोश से इस शमा को जलाए रखिये. हालात भयावह हैं. अपूर्व जी आपने बहुत सही लिखा है कि विलाप या प्रश्न करने की जगह देश के विकट प्रश्नों को हल करने कि ज़रुरत है. इन सब के पीछे भ्रष्टाचार एक अहम् दानवी कारण है. अन्ना हजारे द्वारा दिए गए प्लेटफ़ॉर्म को एक वरदान की तरह लीजिये. देश की तकदीर बदलने में योगदान दीजिये. सवाल जवाब से कुछ नहीं होता.

  • 13. 17:49 IST, 06 सितम्बर 2011 Rajesh Tiwari Pathalkhan, Bhagalpur:

    बीबीसी ख़ुद ही इस आंदोलन को समझ नहीं पाई. कभी अल्पसंख्यकों की प्रतिक्रिया, कभी अरूंधति राय आदि जैसे नकारात्मक तत्वों को प्रदर्शित कर इस आंदोलन पर प्रश्न चिह्न लगाए जा रहे हैं. कुछ ब्लॉग के ज़रिए भी नकारात्मक प्रश्नों को इंगित किया गया. बीबीसी पहले अपना अभियान सकारात्मक और निष्पक्ष करे. ब्लॉग बिल्कुल भुक्तभोगी नागरिक की बात करता है. हमने भी ऐसे प्रश्नों का सामना किया है. अन्ना हिंदू आध्यामिकता की अथाह शक्ति श्रोत के प्रतीक हैं. जिन्हें अन्ना के आंदोलन में फ़ासीवादी शक्तियों का भय सता रहा है, उन्हें गांधी के आध्यात्मिक ऊर्जा के श्रोतों में भी फ़ासीवादी सोच झलकनी चाहिए? शुक्र है गांधी के समाधिस्थल निर्माण के समय आरएसएस समर्थित बीजेपी की सरकार नहीं थी अन्यथा उनकी समाधि पर भी प्रश्नचिह्न लगते. आख़िर समाधि पर - हे राम - क्यों लिखा गया? क्या ये भी फ़ासीवादियों की ही चाल है? हमारी हिंदू संस्कृति बेमिसाल है, अतः हमारी क्रांति भी बेमिसाल है. अन्ना अपनी सात्विक संस्कृति के सात्विक पथप्रदर्शक हैं. युवाओं को भ्रष्टाचार के ऐसे तामसी वातावरण में इतनी सात्विक फुहार पहली बार मिली है. इस अनशन को बीबीसी, मीडिया साधारण ना माने. भारतीय राजनीति की नव दिशा शुरू हो गई है. ये आंदोलन नहीं, भारतीय राजनीति की नई रूपरेखा का शिलान्यास है.

  • 14. 18:08 IST, 06 सितम्बर 2011 पारस बिष्ट:

    प्रश्न बहुत हों तो जवाब को मन में प्रवेश की जगह ही नहीं मिलती है. प्रश्नों से भरा चित्त उद्विग्न हो जाता है, जवाब की वास्तविक तलाश हो तो वह हमारे मन के भीतर से ही मिल सकता है कोई दूसरा जवाब दे भी नहीं सकता है. कुछ लोग अन्ना को कानून तोड़ने वाला, लोकतंत्र की कद्र न करने वाला और समाज को अराजकता की ओर ले जाने वाला कह रहे हैं. लेकिन समाज में जो अराजकता है ,जो अलोकतंत्र चल रहा है और जिस तरह कुछ लोग कानून को ठेंगा दिखाने में लगे हैं उससे इनको कोई परेशानी नहीं हैं. शायद मन के किसी कोने में वर्तमान दशा को देखकर ऐसे लोगों को संतोष मिल रहा हो तभी अन्ना से इस कदर नाराजगी है. जो सत्ता के शिखरों पर बैठे हैं वे भी इससे इंकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हैं कि अन्ना के प्रश्न गलत हैं या उनका इरादा गलत है. लेकिन कुछ लोग बेवजह ही सत्ता की वकालत में मैदान पर तलवार भांज रहे हैं, इनमें से एक स्वामी जी का वीडियो सार्वजनिक भी हो चुका है अब ये महानुभाव किन्तु-परन्तु करने में लगे हैं. सत्ता खुद भी मान रही है कि हमारी प्रणाली में गम्भीर खामियां आ गयी हैं इसमें विचार कर लेने में हर्ज ही क्या है। कुछ लोग बेवजह ही सिरीयस होते जा रहे हैं।

  • 15. 19:59 IST, 06 सितम्बर 2011 सुनील:

    सिर्फ़ एक गुज़ारिश है आपसे, लेख प्रकाशित करने से पहले पढ़ भी लेते, कि ये क्या लिखा है? दूसरों को कुछ बताने की कोशिश हो रही है या अपनी विद्वत्ता जताने का प्रयास!!

  • 16. 12:28 IST, 08 सितम्बर 2011 हिम्मत सिंह भाटी:

    जब किसी को चोट लगती है औऱ वो उससे आहत होता है तो उसे दिखनेवाली सभी बातें बेमानी लगती है, वो उस स्थिति को बदलने में लग जाता है. चाहे वो बदल नहीं सकता हो, पर वो कोशिश ज़रूर करता है कि कोई उस कारण से आहत ना हो. इससे उसे शांति मिलती है. ऐसे प्रयास करनेवाले ग़लत नहीं होते पर उनपर प्रतिक्रिया करनेवाले नामचीन लोग अपनी प्रतिक्रिया देकर सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं. ये सच है कि ऐसे लोग जानते हैं कि वे अपनी प्रतिक्रिया देने में ईमानदार नहीं हैं फिर भी वे प्रतिक्रिया देने से नहीं चुकते. कुछलोगों को बातें उठाने की आदत हो जाती है. मगर इसका ये मतलब नहीं कि कोई किसी तरह का मुद्दा उठाए ही नहीं. जो सेवा भाव वाले होंगे वो किसी भी ग़लत बात को ग़लत कहने से नहीं हिचकेंगे क्योंकि यही उनकी सेवा है, यही उनको शांति देती है.

  • 17. 16:54 IST, 10 सितम्बर 2011 Triku C. Makwana:

    बहुत अच्छा लगा.

  • 18. 19:46 IST, 10 सितम्बर 2011 बी के सिंह:

    अपूर्व जी का यह आर्टिकल सचमुच आँखो को खोलने वाला है और अन्ना और उनकी टीम के आंदोलन के तरीके और मकसद पर गहरा सवाल उठता है| आज अब समय आ गया है की भारत की जनता समझदारी से काम ले और लोकतंत्र के मूल्‍यो का आदर करे| हमेशा सरकार और संसद के कार्यो के खिलाफ खड़ा हो जाना हमारे इस लोकतांत्रिक देश के लिए घातक है और वो भी ऐसे समय जब हम सारी कमियों के बावजूद विकास के रास्ते पर तेज़ी से चल रहे हैं और सारी दुनिया हमारे उपर निगाह लगाए बैठी है|

  • 19. 20:26 IST, 10 सितम्बर 2011 आशुतोष:

    भाई एक लेख और लिखिए , कि कितने ईमानदार हैं ब्लॉग? सुशील झा(भ्रष्टाचार और ईमानदारी) , राजेश प्रियदर्शी ( दिग्भ्रमित मध्य वर्ग) के ब्लॉग कुछ ऐसे ही ब्लॉग थे जो ईमानदार नही थे.
    बहुत खुशी हुई कि आपने उनको आईना दिखाया.

  • 20. 13:06 IST, 12 सितम्बर 2011 Pramod Baghel (Sr. Web Developer):

    अच्छा लेख है.

  • 21. 07:49 IST, 14 सितम्बर 2011 कमलेश कुमार दीवान:

    सही लिखा है अपूर्व

  • 22. 15:05 IST, 14 सितम्बर 2011 गोविंद सिंह:

    अपूर्व ने वाकई अच्छी टिप्पणी लिखी है.

  • 23. 15:06 IST, 14 सितम्बर 2011 govind singh:

    बहुत अच्छा लिखा है.

  • 24. 13:58 IST, 17 सितम्बर 2011 विवेक:

    बहुत अच्छा लिखा है अपूर्व जी.

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