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बम हमलों से मिलता क्या है

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|गुरुवार, 08 सितम्बर 2011, 14:19 IST

दिल्ली हाईकोर्ट हमले के बाद कथित रूप से हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी(हूजी) की तरफ़ से एक ईमेल भेज कर इस हमले की ज़िम्मेदारी ली गई.
यह भी धमकी दी गई कि अगर अफ़ज़ल गुरू की फाँसी की सज़ा समाप्त नहीं की जाती तो सुप्रीम कोर्ट पर भी हमले होंगे.
सवाल उठता है कि क्या इस तरह के हमलों से चरमपंथियों का उद्देश्य पूरा होता है ? ज़्यादातर मामलों में ठीक इसका उलटा होता है.
मुम्बई हमलों का मुख्य उद्देश्य भारत के शहरों में रहने वाले लोगों के दिलों में दहशत बैठाना था.लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.बल्कि इन चरमपंथियों के लिए जो थोड़ी बहुत सहानभूति कुछ लोगों के दिलों में थी वह भी जाती रही.हाँ मीडिया कवरेज उन्हें ज़रूर मिला और वह विश्व सुर्ख़ियों में छाए रहे.
पंजाब में भी जब चरमपंथियों ने अंधाधुंध तरीके से बेगुनाह लोगों को मारना शुरू किया जो उन्होंने लोगों का समर्थन खो दिया.
उसी तरह असम में भी जब उल्फ़ा ने भीड़ भरे इलाक़ों में विस्फोट और गोलीबारी शुरू की तो धीरे धीरे जन समर्थन उनसे दूर होता चला गया.
भीड़ भाड़ वाले इलाकों में सॉफ़्ट टारगेटों को निशाना बनाकर मीडिया का ध्यान तो आकृष्ट किया जा सकता है लेकिन इसकी क़ीमत लोगों की हमदर्दी खोकर चुकानी पड़ती है और संगठन की साख दिन पर दिन गिरती चली जाती है.
लेकिन इसके साथ दूसरे पहलू पर भी नज़र डालना ज़रूरी है.इसको भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के ख़िलाफ़ एक टिप्पणी ही माना जाएगा कि मुम्बई हमलों के बाद एक भी चरमपंथी हमले को अब तक हल नहीं किया जा सका है.
वह चाहे पुणे का जर्मन बेकरी धमाका हो,वाराणसी का शिला घाट बम विस्फोट हो,राष्ट्रमंडल खेलों से पहले जामा मस्जिद के सामने हुई फ़ायरिंग हो या फिर बंगलौर के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर हुए सीरियल बम विस्फोट हों.इन सभी मामलों में या तो कोई गिरफ़्तारी हुई ही नहीं और या फिर गिरफ़्तार किए गए लोगों को कुछ दिनों बाद सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया.

आतंक का सामना प्रतिक्रिया से नहीं किया जा सकता.इसके लिए अग्रसक्रियता बहुत ज़रूरी है.

एनआईए जैसे संगठन घटना हो जाने के बाद तस्वीर में आते हैं.घटना से पहले उनकी भूमिका बहुत संकुचित होती है.यही वजह है कि आतंक को रोकने में इसकी भूमिका सवालों के घेरे में है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:12 IST, 08 सितम्बर 2011 Ajeet:

    ये सारी व्यवस्था बिल्कुल सही से काम करना शुरू कर देगी अगर अगला अटैक पार्लिअमेंट /10 जनपथ /7 आरसीआर पर हो आए . वास्तविकता में अभी सिर्फ आम पब्लिक (जो की वैसे भी मरने के लिए ही पैदा हुई है ) मर रही है इसलिए ये सारे ऐजेंसीज़ भी आराम से काम कर रही है . वैसे भी ऊपर बैठे लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि आम पब्लिक के साथ हो क्या रहा है . क्योंकि उनको पास और भी दूसरे ज़रूरी काम जैसे बेमतलब की बहस करवाना , अपने दागी और भ्रष्ट नेताओं को बचाना और अपने काले धन की सुरक्षा निश्चित करना इत्यादी हैं . जब वो सब काम हो जायेंगे तब ही दूसरे ज़रूरी काम जैसे आंतकवाद , अलगावाद , नक्सलवाद पर विचार किया जाएगा .

  • 2. 16:47 IST, 08 सितम्बर 2011 Hari Kishore:

    हमारी सरकार अपनी जनता से खराब व्यवहार और चरमपंथियों से नरम व्यवहार करती है. उनका कहना है कि उन्हें रामदेव के आंदोलन में हिंसा की ख़ुफिया जानकारी थी, लेकिन उन्हें इन हमलों की कोई सूचना नही थी.

  • 3. 17:49 IST, 08 सितम्बर 2011 BHEEMAL Dildar nagar:


    रेहान भाई मिलता क्या है, उत्तर है वोट बैंक. आप ये ना पूछें किसी को मिलता क्या है.मूल कारण है कि आतंकी लोगों की इज्ज़त होती है. हिंसा परमो धर्म हो गया है.

  • 4. 17:57 IST, 08 सितम्बर 2011 Satnam Singh:

    जब दिल्ली में धमाका हुआ तो सुनकर बहुत दुख हुआ. चीख़ते-चिल्लाते लोगों की तस्वीरें देखी तो दिल रो पड़ा. सोचा हमारी सुरक्षा व्यवस्था क्या इतनी कमज़ोर है कि वो अपने देश के लोगों को सुरक्षित नहीं रख सकती. जिन लोगों ने बम धमाके को अंजाम दिया है अगर उन्हें गिरफ़्तार भी कर लिया गया तो क्या हो जाएगा. केस चलता रहेगा. जांच होगी. प्रेस कॉन्फ़्रेंस होगी और ये सब चलता रहेगा. जिस देश में प्रधानमंत्री को मारने वालों का आज 20 साल बाद भी फांसी नहीं मिली है, अफ़ज़ल गुरु और कसाब जैसे लोग जेल में आराम कर रहे हैं. आख़िर इन्हें आज तक सज़ा क्यों नहीं मिली है. इस देश का यही इलाज है कि यहां तानाशाही आ जाए तभी इस तरह की समस्याएं ख़त्म हो सकेंगी.

  • 5. 18:06 IST, 08 सितम्बर 2011 vikas kushwaha, sujgawan, pukhrayan, kanpur.:

    रेहान साहब आपने ब्लॉग अच्छा लिखआ है.परंतु आतंकवादियों के प्रति किसी भी तरह की सहानूभूति वास्तव में चिंता की बात है.

  • 6. 18:43 IST, 08 सितम्बर 2011 पवन कुमार पंकज:

    सामयिक व ज्वलंत विषय पर आपके विचारों का हम स्वागत करते हैं. चरमपंथी घटना सरकार व सुरक्षा तंत्र की नाकामी को दर्शाती है. पर यहां ये भी विचारणीय बिंदु है कि बिना अमूल्य चूल बदलाव के इन घटनाओं पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता. पुराने कानून में संशोधन होना आवश्यक है. पुलिस और सरकार बग़ैर आम जनता के सहयोग के इस पर क़ाबू नहीं पाएगी.

  • 7. 20:11 IST, 08 सितम्बर 2011 naval joshi:

    फांसी किसी भी इंसान को नहीं दी जानी चाहिए. यह सभ्य लोगों के बीच की बहस है लेकिन सही निर्णय लेने में हम बेवजह देरी करते हैं और चरमपंथी इस तरह की भावना का इस्तेमाल अपनी खूनी प्यास बुझाने के लिए करते हैं. हमें धर्म की सही जानकारी नहीं है इसीलिए चरमपंथी धर्म का परचम उठा लेते हैं. हमारी शासन प्रणाली मे गंभीर कमियां हैं लेकिन हम इसे टालते रहते हैं और चरमपंथी, व्यवस्था परिवर्तन का नारा लेकर मैदान में आ जाते हैं. दरअसल जो भी चरमपंथ के सहारे अपनी बात कहेगा वह सही हो ही नहीं सकता है. धार्मिक लोग क्या कर रहे हैं जबकि चरमपंथी धर्म की व्याख्या करने लगते हैं. मानवाधिकारवादी कहां हैं जब फांसी को माफ करवाने के नाम पर चरमपंथी कत्लो-गारद मचा रहे हैं. यह केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं हैं. धर्म, मानवता और व्यवस्था का नारा यदि चरमपंथी दे रहे हैं तो हमें पुलिस कार्यवाही के साथ यह भी सोचना होगा कि हम भी तो कहीं चूक नहीं कर रहे हैं?

  • 8. 10:02 IST, 09 सितम्बर 2011 ashish yadav,hyderabad:

    चरमपंथी हमले करनेवाले आज भी कबीलाई ज़माने में जी रहे हैं. उनको लगता है कि मार-काट मचाकर वो अपना उद्देश्य पूरा कर लेंगे. लेकिन इन हमलों के लिए सरकार की ढुलमुल नीतियां और वोटबैंक की राजनीति ज़िम्मेदार है. हर हमले के बाद पीड़ितों को मुआवज़ा , नेताओं को गालियां, आंसू बहाना और चरमपंथ से डट कर लड़ने का खोखला दावा किया जाता है और आम आदमी को फिर उसकी हालत पर छोड़ दिया जाता है. मुझे नहीं लगता कि आतंकवाद से ऐसे लड़ा जा सकता है.

  • 9. 12:02 IST, 09 सितम्बर 2011 Premal:

    चरमपंथी हमलों में सोनिया गांधी का कुत्ता भी घायल हो जाए तो दो दिन में चरमपंथी पकड़े जाएंगे. लेकिन आज देश की दुर्दशा ये है कि आम आदमी की जान की कीमत सोनिया गांधी के कुत्ते से भी कम है.

  • 10. 12:59 IST, 09 सितम्बर 2011 PRAVEEN SINGH:

    आपने बहुत अच्छा लिखा है. समस्त सुरक्षा व्यवस्था राजनेताओं के कब्ज़े में है और आम आदमी की कोई पूछ नहीं है. चरमपंथियों के साथ नर्मी से और आम आदमी के साथ सख़्ती से पेश आती है ये सरकार.

  • 11. 14:59 IST, 09 सितम्बर 2011 ALTAF, SAUDI ARABIA:

    यहां तो चरमपंथियों से ज़्यादा ख़तरा अनशन करने वालों से है. जिन लोगों से ज़्यादा ख़तरा होगा उन्हें ही तो रोका जाएगा. चरमपंथी हमले में तो आम लोग मारे जाते हैं जिनकी परवाह किसे है. बस नेता लोगों को कुछ नहीं होना चाहिए क्योंकि देश तो वही चलाते हैं. और ये बेवकूफ़ चरमपंथी भी आमलोगों को मारकर खुश हो जाते हैं, ये नहीं जानते कि इसका नेता लोगों और सरकार पर कोई असर नहीं होता. आम लोग मरते हैं तो मरें ये बाद में अस्पताल में जाकर राजनीति कर लेंगे.

  • 12. 17:33 IST, 09 सितम्बर 2011 E A Khan:

    रेहान फज़ल साहब मैं आप से पुरज़ोर सहमति रखता हूं. आपके माध्यम से बम धमाका करने वाले और बेक़सूर लोगों की जान लेनेवालों से पुरज़ोर अपील करना चाहता हूं कि वक़्त रहते सोचें कि वे क्या कर रहे हैं. उनके इन कामों से कुछ फ़र्क पड़ने वाला नहीं है. दुनिया में इस तरह के काम को कहीं भी सही नहीं ठहराया जा सकता है. जिस दिन इस तरह की घटना होती है हर जाति, धर्म और किसी भी आदर्श को मानने वाला उसी दम दांत दबा कर और माथे पर बल देकर बोल उठता है कि 'क्या बेहूदगी है'? आखिर यह लोग चाहते क्या हैं? इन वहशियों का सिरे से सफाया करना दुनिया क़ी पहली प्राथमिकता होना चाहिए. अभी इस दुनिया को सभ्यता और तरक्की के बड़े-बड़े सोपान पार करना है. अगर ऐसे तत्वों से नहीं निपटा गया तो वे इसी तरह की अड़चनें पैदा करते रहेंगे.

  • 13. 02:04 IST, 10 सितम्बर 2011 jane alam :

    रेहान जी इतना अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए कोटी कोटी धन्यवाद. आज हमारे देश में इतने चरमपंथी हमले हो रहें हैं और हमारी जांच एजेंसियां एक दम निश्क्रिय साबित हो रहीं हैं. आख़िर कब तक हमें आतंकवाद का दंश झेलना पड़ेगा क्या हमारी सरकार एक दम निरंकुश हो गई है जो एक के बाद एक चरमपंथी हमले होने का गौरव प्राप्त कर रही है.

  • 14. 09:52 IST, 10 सितम्बर 2011 Amrit:

    जितनी काटो उतनी बढ़ती है नेताओं की नाक.

  • 15. 11:37 IST, 10 सितम्बर 2011 satyanand:

    क्या कहा जाए. सरकार को आम जनता से कोई सरोकार नहीं है.वो वही करती और कहती है जिसमें उसका फ़ायदा हो उसकी कुर्सी बची रहे.

  • 16. 12:53 IST, 10 सितम्बर 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेहान साहिब, अच्छे तरीके से बीबीसी के श्रोताओं को इस मुद्दे को समझाने का प्रयास करने के लिए शुक्रिया. लेकिन आपने बेईमान नेताओं का ज़िक्र नहीं किया, ये पक्षपात सा लगता है. आप इन नेताओं की सच्ची तस्वीर लिखें, जिनकी सरपरस्ती में ये चरमपंथ फैला हुआ है.

  • 17. 14:45 IST, 10 सितम्बर 2011 naseem ahmad:

    मज़हब के नाम पर जो ख़ून ख़राबा करते कट्टरपंथी एक दिन ऐसा होगा कि लोग समझ जाएंगे मज़हब का मतलब निर्दोष लोगों को मारना नहीं है.

  • 18. 12:42 IST, 11 सितम्बर 2011 शकील अहमद :

    रेहान जी, किसी भी हाल में चरमपंथ का समर्थन नहीं किया जा सकता और न ही उसे किसी भी आधार पर ठीक ठहराया जा सकता है. भारतीय मुसलमान शुरू से ही चरमपंथ के विरोध में रहा है और चरमपंथियों की उसने निंदा की है. अगर कहीं भी और किसी भी रूप में चरमपंथियों को समर्थन या उनसे सहानुभूति की बात उभरती है तो उसे हर हाल में दूर किया जाना चाहिए और यह काम मुसलमानों को ही आगे आकर करना चाहिए.

  • 19. 09:07 IST, 12 सितम्बर 2011 muhammad muqeem:

    अरे ये सब नेता लोग करते हैं मुसलमानों को बदनाम करने के लिए.

  • 20. 17:18 IST, 12 सितम्बर 2011 KISHAN SINGH:

    जनाब रेहान भाई, इतिहास में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को बार बार चकमा दिया, लेकिन फिर भी उनकी पराजय हुई. लगता है हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री इतिहास को दोहराने की चेष्टा कर रहे हैं. जनता की बात करना बेमानी है. जनता सदा से मर रही है. अब तो ख़ुदा ही मालिक है.

  • 21. 22:51 IST, 12 सितम्बर 2011 Shivendra sachan:

    ऐसे हमलों से बचने के लिए सरकार को अपनी ख़ुफ़िया व्यवस्था को और चाक चौबंद करना चाहिए. साथ ही दूसरे देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों से भी अहम जानकारियों हासिल करनी चाहिए. सावधानी बरत कर ही ऐसे हमलों से बचा जा सकता है.

  • 22. 00:46 IST, 13 सितम्बर 2011 rockk:

    रेहान भाई ज़रा याद करें वो दिन जब दंगाइयों से बचने के लिए आपको अपना आईकार्ड दिखाना पड़ा था वो भी अपना नाम छुपाकर और अपनी मोहतरमा का नाम दिखाते हुए.
    लेकिन क्या हुआ आज वही नरेंद्र मोदी कोर्ट से लगभग क्लीनचिट पाने में क़ामयाब हो गए हैं. आप इस विषय पर टिप्पणी दें और अपना व्यक्तिगत अनुभव बयां करें तो और अच्छा रहेगा क्योंकि आपने दंगे की कई दिन तक रिपोर्टिंग की थी.

  • 23. 23:41 IST, 13 सितम्बर 2011 Anupam Shrivastava:

    हर चरमपंथी संगठन सुर्ख़ियों में बना रहना चाहता है इसी की वजह से वे ऐसी जगहों पर बम धमाके करते हैं. भारतीए मीडिया भी ऐसी ख़बरों को ख़ूब बढ़ा चढ़ा कर पेश करती है. सरकार हर जगह पुलिस को तैनात नहीं कर सकती है. लोगों को भी जागरूक होना होगा.

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