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इतिहास में दर्ज होने का मौक़ा

विनोद वर्माविनोद वर्मा|बुधवार, 14 सितम्बर 2011, 11:33 IST

इतिहास एक मौक़ा देता है. वह कुछ देर ठहरकर देखता है कि उस मौक़े का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है. इसके बाद वह निष्ठुरता के साथ फ़ैसला करता है.

इन निर्मम फ़ैसले में कभी ये होता है कि एक दुर्बल सा व्यक्ति शिखर पर जा खड़ा होता है. कभी एक सक्षम व्यक्ति गर्त में चला जाता है. और कभी शिखर पर पहुँचता सा दिखता व्यक्ति भी मौक़ा गँवाकर निचली पायदान पर जा खड़ा होता है.

महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब अंबेडकर तक कई उदाहरण हैं जिन्होंने मौक़े को पहचाना और इतिहास रचा. लेकिन ऐसे भी बहुत से उदाहरण हैं जो इसके ठीक विपरीत हैं.

अपने समकालीन इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो चेतावनी देते हैं कि मौक़ा गँवाना कितना ख़तरनाक साबित हो सकता है.

विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास एक मौक़ा था जब वो इतिहास बना सकते थे. चाहे राजनीतिक मजबूरी में सही लेकिन मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करके उन्होंने एक पहल तो की. लेकिन भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे पर वो प्रधानमंत्री बने थे, उस पर उन्होंने कुछ नहीं किया.

पीवी नरसिंहराव के पास मौक़ा पिछले दरवाज़े से आया था. लेकिन मौक़ा तो मौक़ा होता है. वे भी राजनीतिक गुणा गणित में चूक गए. वे बाबरी मस्जिद का विध्वंस नहीं रोक सके और अनजाने ही लालकृष्ण आडवाणी को एक वर्ग का हीरो बनने का मौक़ा दे दिया.

कहा जाता है कि इंद्रकुमार गुजराल ने भी अवसर गँवाया.

अटल बिहारी वाजपेयी ने अगर गुजरात दंगों के समय नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की हिदायत देने भर को ही अपना राजधर्म न माना होता तो वे देश के सांप्रदायिक सद्भाव के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ सकते थे. वे चूक गए.

एक मौक़ा ज्योति बसु के पास था कि वे देश के प्रधानमंत्री बनते. लेकिन उनकी पार्टी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस अवसर को गँवा दिया. बाद में उन्होंने माना कि ये एक 'ऐतिहासिक भूल' थी.

इतिहास ने एक मौक़ा सोनिया गांधी को भी दिया. प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न करने के बाद दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उन्हें 'संत' और 'त्याग की मूर्ति' की उपाधि दे रहा था. लेकिन यूपीए के सात वर्षों के कार्यकाल में वे उम्मीदों के आगे पराजित सी खड़ी दिख रही हैं.

मनमोहन सिंह के पास भी देश के इतिहास में अपने पन्ने जोड़ने का बड़ा अवसर था. एक नौकरशाह से प्रधानमंत्री बनने के बाद वे चाहते तो अपनी साफ़ सुथरी छवि और निर्विरोध नेतृत्व को आधार बनाकर देश को एक नई दिशा दे सकते थे. लेकिन उन्होंने किया इसका बिल्कुल उल्टा. आज की स्थिति तो ये है कि वे इतिहास के पन्नों में हाशिए पर खड़े कर दिए गए हैं.

मायावती को भी इस देश के इतिहास ने एक अवसर दिया. अपने एक मित्र की इस बात से मैं सहमत हूँ कि वे चाहतीं तो पाँच वर्षों में सदियों से चली आ रही कई परंपराओं को उलट सकती थीं लेकिन वे इसे समझ नहीं सकीं. उन्होंने अपने काम की जगह अपनी मूर्तियों से इतिहास में जगह बनाने की चेष्टा की.

एक अवसर राहुल गांधी की प्रतीक्षा में था लेकिन ऐसा दिखता है कि अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता की वजह से वे उस अवसर से लगातार दूर होते जा रहे हैं.

सबसे ताज़ा अवसर अन्ना हज़ारे के पास है. एक बार फिर देश में एक लहर उठी है. इस बात पर विवाद हो सकता है कि ये अवसर उन्होंने हासिल किया है या अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी ने उन्हें उपलब्ध करवाया है. लेकिन अवसर तो अवसर है.

कम से कम इस समय तो नहीं दिखता कि अन्ना हज़ारे के पास ऐसी ठोस योजनाएँ हैं जिससे कि वे इन लहरों पर सवार होकर दूर तक यात्रा कर सकें. अगर वे ये मौक़ा चूक गए तो एक बार फिर इसे लोग जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रांति' की तरह याद करेंगे. आकर गुज़र जाने वाले सैलाब की तरह.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:34 IST, 14 सितम्बर 2011 सत्येंद्र सिंह हांडा:

    आपका ब्लॉग एक पथप्रदर्शक वाक्य के साथ-साथ इस समय के घटनाक्रम को भी दर्शाता है. बहुत बढ़िया.

  • 2. 18:58 IST, 14 सितम्बर 2011 भीम कुमार सिंह:

    इतिहास के फैसले की निष्ठुरता की बात कहकर आपने एक नई बहस छेडऩे की कोशिश की है। हमारे देश की कुछ हस्तियों ने मौके की नज़ाकत को समझने में भूल की और वे चूके भी, अब अन्ना हजारे को लेकर भी ऐसी आशंका आपने जताई है। लेकिन विनोद जी, यह भी उतना ही सच है कि मौके की नज़ाकत को पहचान पाना अक्सर मुश्किल होता है। आपका मानना है कि गांधी और अंबेडकर जैसे लोग ऐसा कर पाए, लेकिन शायद आप भी जानते होंगे कि वे लोग भी कई अहम मौकों से चूक गए थे। इसके अलावा उन्हें जो सफलता मिली थी, उसकी वजह केवल उनकी काबिलियत ही नहीं थी, बल्कि तत्कालीन परिस्थितियों की भी उसमें अहम भूमिका रही थी। बहरहाल, हो सकता है कि हज़ारे चूक जाएं। बावजूद इसके उन्होंने एक सार्थक शुरुआत की है और इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा एक बात और कहना चाहूँगा, हज़ारे की सफलता या विफलता की जिम्मेदारी केवल उनपर नहीं डाली जानी चाहिए। हमारे देश की जनता भी इसके लिए समान रूप से जिम्मेदार होगी, जिसमें हम और आप भी शामिल हैं। केवल बातें करने से कोई परिवर्तन नहीं हो सकता क्योंकि यह ऐसी प्रक्रिया है जिसके लिए तमाम लोगों को ठोस पहल करने की अनिवार्यता होती है।

  • 3. 05:08 IST, 15 सितम्बर 2011 Sandeep:

    बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है. मुझे उम्मीद है कि अन्ना और उनकी टीम अवश्य ही मौके का फायदा उठाएगी.

  • 4. 06:21 IST, 15 सितम्बर 2011 डा o उत्सव कुमार चतुर्वेदी, क्लीवलैंड, :

    --मगर इतिहास के हर मोड़ पर कबीर की यह वाणी भी खुदी होती है, --जो घर फूंके आपना , चले हमारे साथ . ज़ाहिर है, राहुल गाँधी और मनमोहन सिंह इस इतिहास के मोड़ पर अपने घर नहीं फूँक सकते. चालक लोग हैं. उनकी बातों से यदि कोई यह मान ले की वे जनता की समस्याएँ हल करने की लिए अपने घर फूंकेंगे तो हमें उस पर तरस आता है. और यह भी तो हो सकता है की घर फूंकने से लगी आग की रोशनी में वे चेहरे भी बेनकाब हो जाएँ जो सारे भारत को फूँक रहें हैं.? वीपी सिंह ने कबीर की यह वाणी नहीं पढ़ी और अपना घर तो क्या , मंडल के गड़े मुर्दे उखाड़ कर पूरे देश को जातीवाद की आग में झोंक दिया.
    मायावती अगले चुनाव में यदि हार भी जाती हैं तो जो भी उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होगा, कबीर दास की इस इबारत को पढ़कर मायावती को कोई सजा देने से बचेगा.

  • 5. 10:50 IST, 15 सितम्बर 2011 एल. एन. सिंह :

    आपकी अंतर्दृष्टि अतुलनीय है. मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि आप बीबीसी टीम के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर हैं.

  • 6. 12:32 IST, 15 सितम्बर 2011 BHEEMAL Dildar nagar:

    भाई विनोद जी, आप पीएम के पीछे क्यों पड़ गए हैं. आपकी दृष्टि काफ़ी पैनी और गहरी है लेकिन, "पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोई, कह न सके तू अपनी कहानी,तेरी भी पंछी क्या ज़िंदगानी." पीएम के चेहरे से तो लगता है जैसा उनको कोई सख़्त आदेश देता हो. पत्रकारों को क्या पता कि उनकी क्या स्थिति है.

  • 7. 15:39 IST, 15 सितम्बर 2011 satendra singh handa:

    बहुत ही बढ़िया विनोद जी. आपका ब्लॉग ताजा घटनाक्रम को दिखाता है साथ ही ये दर्शाता है कि कैसे लोगों को कई बार कितने ही महत्वपूर्ण मौक़ों को गंवाता है.

  • 8. 16:18 IST, 15 सितम्बर 2011 pramod kumar:

    विनोद जी इतिहास मौका भी देता है और सबक भी देता है.गाँधी की आलोचना करने वाले मिट गए .कांशीराम बाबू जगजीवन राम का स्थान नहीं ले पाए.अन्ना को अपनी भाषा संयमित करनी होगी.बार बार घूसखोरों को फांसी देने की बात कहकर वे हलके हो रहे हैं.अन्ना को समझाना चाहिए कि वे सोनिया-मनमोहन सरकार के सामने अपनी मांगों को लेकर खड़े हैं.ये सरकार परिस्थिति के अनुसार उनकी मांगों पर विचार भी कर रही है.अगर इंदिरा गाँधी से उनका सामना हुआ रहता तब उन्हें पता चलता. 1974 के आंदोलन को 1977 तक पहुँचाने में जेपी और उनके सहयोगियों को कितनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी.

  • 9. 16:53 IST, 15 सितम्बर 2011 anand:

    वाकई प्रशंसनीय ब्लॉग है. आपके ऐतिहासिक उदाहरणों और तर्क से पूरी तरह से सहमत हूँ. हज़ारे की टीम कुछ ऐसी कमज़ोरियों से घिरी है जो उनको बड़ा आंदोलन करने से रोक देगी, उनकी स्वयं की अधीरता, उनकी टीम के लोगों की बदज़बानी आंदोलन को जनआंदोलन के बजाय व्यवस्था परिवर्तन में केंद्रित रखना, राजनीतिक बयानबाज़ी, व्यक्ति विशेष की निंदा..उनके प्रशंसकों को समझने में समय लगेगा.

  • 10. 03:03 IST, 16 सितम्बर 2011 Pradeep Shukla:

    अर्श और फर्श कि बहस मे आप नैतिक मूल्यों और वसूलों कि बात करना भूल गये. भूत के कृत्यों का क्रमबद्ध विवेचन ही इतिहास कहलाता है. जिसको आपने बखूबी इंगित किया है. व्यक्ति का विवेक गणित कि तरह काम नही करता और यही उसे एक पहचान देता है. पहचान ही उसे इतिहास के पन्नो मे दर्ज़ करती है. आप भले ही तमाम लोगों को मौका गवाने वाला समझ रहे है लेकिन आप उनकी पहचान कि वजह से उनकी चर्चा किए विना रह भी नही सकते.

  • 11. 06:29 IST, 16 सितम्बर 2011 KHAGENDRA KUMAR:

    बहुत ही उम्दा टिपण्णी है...हमेशा की तरह पठनीय...

  • 12. 12:23 IST, 16 सितम्बर 2011 ashish yadav hyderabad:

    इतिहास वही लोग बनाते हैं जो ज़माने से अलग हटकर कुछ करते हैं और इतिहास इस बात का गवाह है. मनमोहन को इतिहास बनाने का दो बार मौका मिला, लेकिन अजीब बात है कि संयुक्त राष्ट्र से ईमानदारी के लिए सम्मानित हो चुके इन्सान को देश सबसे भ्रस्त सरकार के मुखिया के रूप में याद करेगा .मनमोहन के पास देश को एक दशा और दिशा देने का अच्चा मौका था जो कि उन्होंने गवां दिया

  • 13. 16:51 IST, 16 सितम्बर 2011 संदीप:

    इतिहास का ऐसा तुलनात्मक विश्लेषण वाकई अतुलनीय है.

  • 14. 22:05 IST, 16 सितम्बर 2011 बिजय कुमार:

    100% सही.

  • 15. 11:30 IST, 17 सितम्बर 2011 ई ए ख़ान:

    इस मुल्क की तथाकथित बड़ी हस्तियों द्वारा गंवाए हुए अवसरों की बात तो आपने उंगलियों पर गिना दिए. आप शायद यह कहना चाहते होंगे कि अगर इन हस्तियों ने अवसर नहीं गंवाए होते तो देश की तकदीर बदल जाती. मैं आप से हरगिज़ सहमत नहीं हूँ. देश की जनता भेड़ बकरी नहीं है कि यहाँ के अदना तथाकथित नेताओं के अवसर गंवाने या नहीं गंवाने से उनकी किस्मत बदल जाएगी. देश की तकदीर जनता के चरित्र से बदलती है. मेरा मानना है कि यों कहिये कि भारत की जनता का चरित्र इतना परिपक्व हो गया है कि वे देश की तकदीर अपने बल बूते पर बदल सकते हैं अगर वे इस अवसर को नहीं गंवाते हैं. जनता को आंदोलित कीजिए कि अपने कर्त्तव्य एवं अधिकार को समझने की जो क्षमता उनमें पैदा हुई है उस अवसर को न गंवाएं. अगर गँवा दिया तो देश की तकदीर हरगिज़ नहीं बदलेगी.

  • 16. 16:28 IST, 18 सितम्बर 2011 Ashok Joshi:

    इसमें कोई शक़ नहीं कि गाधी, नेहरू और अम्बेडकर ने इतिहास रचा. उनमें दूरदर्शिता थी और उन्होंने उसी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. लेकिन इस व़क्त के नेताओं में ना दूरदर्शिता है ना ही इमानदारी, तो वो लोग इतिहास में कैसे जगह बना सकते हैं.?

  • 17. 14:10 IST, 19 सितम्बर 2011 vikram singh:

    आपकी समीक्षा अतूल्यनीए है. लेकिन मैं ऐसा मानता हूं कि राहुल गांधी के पास अभी मौक़ा है अगर चाहें तो इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा सकते हैं. मैं ऐसा मानता हूं कि राहुल गांधी के किसी भी फैसले को कांग्रेस में चुनौती देने वाला नहीं है और कुछ सहयोग पार्टी भी उनके ख़िलाफ़ नहीं जा सकतीं.

  • 18. 19:38 IST, 20 सितम्बर 2011 अजीत कुमार सिंह:

    विनोद जी आप इतिहास के द्वारा मौक़ा दिये जाने की बात कर रहे हैं और उसे भुनाने की बात कर रहे हैं परन्तु आप शायद वर्तमान को भूल गये हैं जोकि मौकों को भुनाने के लिये मौंका नहीं
    देता है।

  • 19. 20:22 IST, 20 सितम्बर 2011 कार्तिक चरण:

    मैं आपके इस लेख का बहुत बड़ा फ़ैन हूँ. आपका लेख अविश्वसनीय है.

  • 20. 20:31 IST, 20 सितम्बर 2011 ख़ालिद:

    आप के ब्लॉग को पढ़ कर ऐसा लगता है कि आप भी किसी विशेष दल का चश्मा पहन कर लिख रहे हैं.

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