पश्चात्ताप और पाखंड
नरेंद्र मोदी उपवास कर रहे हैं, शंकरसिंह वाघेला भी जवाबी उपवास कर रहे हैं, इससे पहले अन्ना हज़ारे कर रहे थे, उससे पहले बाबा रामदेव कर रहे थे.
राजनीति का विद्यार्थी इन सारी घटनाओं को मीडिया के चश्मे से देख रहा है, समझने का प्रयास कर रहा है.
मगर उसे एक प्रश्न पीड़ित कर रहा है. बौद्धिक बहस की रोज़ाना की ख़ुराकें उस पीड़ा का शमन नहीं कर पा रहीं हैं.
वो प्रश्न दो भावनाओं से जुड़ा है - पश्चात्ताप और पाखंड.
दंगों के दौरान एक सरकार का मुखिया रहने की ज़िम्मेदारी को स्वीकार करते नरेंद्र मोदी अगर पश्चात्ताप कर लें तो वो अधिक कारगर होगा या उपवास का पाखंड?
उपवास के पहले ही दिन पौन घंटे बोलकर शारीरिक ऊर्जा को ख़र्च करनेवाले मोदी केवल तीन शब्दों से काम चला सकते थे - आई एम सॉरी - मुझे खेद है - लेकिन वो ऐसा नहीं करते, और ना लगता है कि कभी करेंगे भी.
राजनीति का विद्यार्थी इस प्रश्न से पीड़ित है - कि मोदी को पश्चात्ताप से अधिक पाखंड क्यों प्यारा है?
ऐसा ही एक प्रश्न उस क्षण भी खड़ा हुआ था जब कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने पहले बुज़ुर्ग अन्ना हज़ारे पर हिंदी शब्दबाणों से प्रहार किए और बाद में मजबूरी में उसपर अंग्रेज़ी में मलहम लगाकर मौन हो गए.
राजनीति का विद्यार्थी जानना चाहता था - लुधियाना के स्मार्ट सांसद को क्या पश्चात्ताप और पाखंड का अंतर नहीं पता था?
पश्चात्ताप के स्वर बाबा रामदेव के मुख से भी आ सकते थे. हालाँकि सत्य अभी अस्पष्ट है, लेकिन जिसप्रकार उनके डेपुटी बालकृष्ण सारे परिदृश्य से ओझल हो चुके हैं, उससे सामान्य जनों के मन में संदेह के बीज अवश्य पड़ चुके हैं.
मगर बाबा रामदेव की बोलियों में भी पश्चात्ताप का भाव लुप्त है.
पश्चात्ताप के बोल स्वामी अग्निवेश को भी बोलने चाहिए थे, मगर वो पहले मिथ्याजाल बुनने के प्रयास करते रहे, और अब मूक हैं.
पश्चात्ताप भरी और भी कई वाणियाँ सुनाई दे सकती थीं. अपनी सत्ता में लोकतंत्र की आत्मा का गला घोंटने के बराबर काम करनेवाले मदांध नेता, अन्ना आंदोलन के समय लोकतंत्र की रक्षा की गुहार लगाते रहे, मगर उनकी वाणियों से उनके पिछले कर्मों के लिए अपेक्षित पश्चात्ताप ओझल रहा.
पश्चात्ताप और पाखंड के इस प्रश्न के सामने खड़े राजनीति के विद्यार्थी की सहायता बौद्धिक बहस नहीं कर पाते.
उसकी उलझन को दूर करती है स्कूल की उसकी पाठ्य पुस्तक में राष्ट्रकवि दिनकर की एक कविता की पंक्तियाँ -
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके जब पीछे जगमग है.
पश्चात्ताप भी सहनशीलता, क्षमा, दया की तरह मानव के भीतर की गहराई में बसी एक कोमल भावना है.
तो क्या मोदी, मनीष तिवारी, बाबा रामदेव सरीखे लोग बलशाली नहीं हैं? क्या वे सहनशीलता, क्षमा, दया और पश्चात्ताप जैसी भावनाओं का भार नहीं उठा सकते?
बेशक बलशाली होंगे, मगर उनमें शायद आत्मबल नहीं - वे शायद इसलिए पश्चात्ताप नहीं कर पाते.
आत्मबल होता तो वे उसके दर्प से जगमगाते, और पूजे ना सही, प्रतिष्ठा अवश्य पाते.
सदियों पहले मौर्य साम्राज्य के सम्राट अशोक ने कलिंग के मैदान में हुए रक्तपात को देख पश्चात्ताप का प्रण लिया था, पश्चात्ताप किया था.
उनके कार्यकाल में बना चार शेरों वाला निशान आज भारत राष्ट्र की पहचान है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
टिप्पणी अच्छी थी.
लगता है आप अब्दुला बुख़ारी के प्रवक्ता हैं.
नरेन्द्र मोदी के पीछे हाथ धो कर पड़ने वालों को पश्चाताप का उदाहरण ढूंढने के लिए आज से हज़ारों साल पीछे जाना पड़ेगा. सीता की तरह आग में धकेल कर परीक्षा लेने के बाद भी शायद उन्हें आप जैसों की सद्भावना नहीं मिल सकेगी.
बहुत अच्छा अपूर्व जी. आपने बहुत अच्छी नब्ज़ पकड़ी है. वैसे तो इस ब्लॉग पर ज़्यादातर नकारात्मक टिप्पणियां ही आएंगी पर जो आपने कहा वो सोलह आने सच है, औऱ सच सुनने वाले कम ही है. आजकल पाखंड ही हो रहा है, पश्चाताप तो देखने को भी नहीं मिलता. अशोक का उदाहरण भी बहुत अच्छा लगा.
एक उपवास राष्ट्रपिता गांधी जी किया करते थे जो अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए था, लेकिन आज उपवास भी फ़ैशन बन गया है. जैसे उपवास की दौड़ में आगे निकले की दौड़ हो और उसपर तर्क ये कि गांधी जी के आदर्शों पर चल रहे हैं. एक अन्ना जी के उपवास को छोड़ दें तो हर कोई उपवास के ज़रिए अपने हित सिद्ध करने की कोशिश कर रहा है और वो भी पूरे तामझाम के साथ. लेकिन गंगा नदी की शुद्दता के लिए हरिद्वार में खामोशी से उपवास करने वाले स्वामी निगमानंद कितने लोगों को याद हैं?
अपूर्व जी, मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं.
अपूर्व जी, आप का ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. अगर राजनीतिज्ञों में दया और इमानदारी होती तो हम शायद विश्व के सबसे शक्तिशाली और विकासशील देश होते.
मैं तो बस यही कहूंगा - अति उत्तम.
यह उपवास और कुछ नहीं बस अपराध बोध से ग्रसित बरसाती मेंढकों की टेढ़ी चाल है. कमाल है! ये सब अभी भी जनता को बेवकूफ़ समझ रहे हैं? ये पूर्वाग्रह से प्रेरित घटिया राजनीतिक हथकंडे हैं. राजनीतिक मह्त्वकांक्षा इंसान को ले डूबती है चाहे फिर बाबा जी हों, अग्निवेश हों या फिर और कोई? समझ नहीं आता कि एक उपवास के चक्र में कितने ही नेता हवाई यात्रा कर रहे हैं, कितने ही चमचमाती गाड़ियों में धुंआ उड़ाते फिर रहे हैं? क्षमा याचना ही करनी है तो सीना ठोक कर प्यार के दो बोल बोलकर की जा सकती है. जो कि आम जनता को समझ आती है. बीते कल की गलतियों पर राजनीति करना उन घटनाओं को याद करने जैसा है. और जनता जिसे भूलना चाहती है ये मान्यवर उन्हें याद कराने में जुटे हैं.
आपने बहुत सही कहा अपूर्व जी. अगर राजनीतिज्ञों के दिलों में सही मायने में पश्चाताप की भावना आ जाए तो हमारे देश का भला होगा. ये लोग पहले आम आदमी को ज़ख़्म देते हैं फिर उन ज़ख़्मों पर मलहम लगाकर उसी जनता का विश्वास जीतना चाहते हैं. और इसमें अक़सर वो सफ़ल भी हो जाते हैं.
मुझे नहीं लगता की मोदी को पश्चाताप करने की कोई जरुरत है, वे एक समर्पित राजनीतिज्ञ और मुख्यमन्त्री हैं जिन्होंने गुजरात का नक्शा ही बदल कर रख दिया और जनमत ने इसी लिए उन्हें हर बार बहुमत से जिताया और आगे भी जिताएंगे. कांग्रेस और अन्य इसी तरह की मौकापरस्त पार्टियों का ग़ैर साम्प्रदायिकता का ढोंग ही इस देश को ले डूबा है, कोई इन कांग्रेसियों से इनके 50 साल के शासन का हिसाब क्यों नहीं मांगता, क्या उस समय दंगे नहीं हुए, और जो हुए उनके दोषियों को क्या इन लोगों ने सज़ा दिलवाई?
इनमें से जो भी पार्टी मोदी पर दोष लगा रही है, क्यों नहीं गुजरात जैसा विकास देश के किसी भी कोने मैं कर पाई?
उम्दा ब्लॉग. मेरे जैसा साधारण व्यक्ति भी इस बात से हैरान है कि लोगों के छह करोड़ रूपए खर्च कर उपवास करने का क्या मतलब है.
इंदिराजी इमरजेंसी के दिनों में बीबीसी को डंडे लगा चुकी हैं.... ऐसे में मोदी जैसों और दूसरों का तो विश्लेषण बीबीसी कर सकता है... पर जिन्होंने डंडे चलाए थे उनके बारे में कहने की जुर्रत नहीं... चौरासी के भयावह दंगे जो सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रीय राजधानी में हुए उनका पोस्टमार्टम करने की हिम्मत कतई नहीं करेंगे आप लोग... सबसे बड़ी लूट वर्तमान सत्ताधारी दल के लोगों ने कीं... चाहे बोफोर्स हो या आज कल के घोटाले क्या ये पश्चाताप का विषय नहीं... शरद यादव कहते हैं कि हिंदुस्तान की भूखी जनता रोज ही उपवास करती है तो क्या अरबों के घोटालों में डूबे रुपयों से उनका पेट नहीं भरा जा सकता था... राहुल गांधी का परिवार 60 साल में रोटी नहीं दे सका भूखे को... क्या आप इसके लिए पश्चाताप की बात नहीं करेंगे... देसी मीडिया बिका हुआ है, आप तो विदेशी ठहरे... आपको क्या नैतिक अधिकार है इस तरह की बहस उठाने का.
बिल्कुल सही, मुझे समझ में नहीं आ रहा वे कैसे अपने आप का सामना करेंगे.
आप जैसे लोग ही भारत की समस्या हैं. आप मुझे बताएं कि आख़िर मोदी को किस बात के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने दंगों को रोकने के लिए अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की. आपको ये नहीं दिखाई देता कि 2002 दंगों में 254 हिंदू मारे गए थे और उनमें से 100 पुलिस फ़ायरिंग में मारे गए थे. अगर मोदी और भाजपा ने मुसलमानों की हत्या का समर्थन किया होता तो क्या 100 हिंदू पुलिस के ज़रिए मारे जाते. आप जैसे लोगों ने इतने वर्षों से झूठा प्रचार किया है लेकिन अब भारत की जनता सच्चाई जान चुकी है और वो आपके इस ड्रामे में नहीं फंसेगी.
सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली. मोदी का ये उपवास ख़ून से रगें उनके हाथ कभी नहीं धो सकता. मोदी ने जनता को बेवक़ूफ़ समझा है, लेकिन जनता इतनी बेवक़ूफ़ नहीं है जितना मोदी ने समझ लिया है. बहु संख्यक समाज ने अपनी ख़ुद-ग़र्ज़ी के लिए मोदी का़ साथ ज़रूर दिया है.गुजरात में विकास क्या, शायद गुजरात में सूरज और चाँद भी मोदी ही उगाते हैं , विकास भारत के किस राज्य में नहीं हुआ.यह उपवास का पाखण्ड आगामी चुनावों की तैयारी मात्र है.
अपूर्व जी, मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं.लगता हैं कसाब उपवास कर रहा है.
उपवास का मतलब है ईश्वर से नज़दीक़ी. इससे शुद्धीकरण होता है. और अगर नतीजे नहीं निकलते हैं तो फिर ये पाखंड है. ये उपवास नहीं बल्कि उपहास है.
मोदी ने बहुत मक्कारी से विकास की परिभाषा बदल दी है. क्या कारख़ाना लगाना ही विकास है. क्या टाटा ने नैनो प्रोजेक्ट देशहित में लगाया है या अपने मुनाफ़े के लिए. क्या गुजरात की पुलिस बाक़ी प्रदेशों से अच्छी है. गुजरात की पुलिस नाकाम रही 2002 के दंगों में, 2008 के बम धमाके रोकने में, कसाब को रोकने में( वो गुजरात के रास्ते ही आया था) शराब की तस्करी रोकने में, फिर कैसा विकास, क्या गुजरात सरकार की बनाई सड़कें बाक़ी देश से बेहतर है. क्या विकास किया है मोदी ने, सिर्फ़ निजी कंपनियों के हवाले कर दिया है प्रदेश को मोदी ने.
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अपूर्व जी सबको एक पलड़े पर मत तौलिए. जो आप ने आरोप लगाएं हैं वो किसी पर भी लगाएं जा सकते हैं. राजेश प्रियदर्शी के रास्ते पर चलने की बजाए विनोद वर्मा के रास्ते पर चलिए. सिर्फ़ विवाद पैदा करके कोई बड़ा पत्रकार नहीं हो जाता.
धन्य हों अपूर्व जी, मैं आपको भारत के जनमत को दिगभ्रमित करने के प्रयास करने के लिए हतोत्साहित हूं. क्या मिलता है लेखन को सूक्ष्म और स्पष्ट ना रखकर, जलेबीनुमा ब्लॉग लिखकर राम जाने. ब्लॉग एक तरफ़ा झुकाव सा है और संदेश, कीचड़ उछालो.इस तरह से तो आप भी नेता बन सकते हैं. मेरी एक सलाह है किसी का नाम ना लिया करें.
बेहतरीन
आज की भागम भाग में नेताओं के पास समय ही कहां है. नेतागण कल की नहीं आज का फ़ायदा सोच रहें हैं. इससे कितना नुक़सान हो रहा उन्हें इसकी चिंता नहीं है. इसलिए पाश्चाताप क्यों करेंगे, पाश्चाताप से आत्म मंथन होता है, इसके लिए शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. इसलिए लोग पाखंडी बन गए हैं, पाश्चाताप करने का उनमें साहस नहीं है.
किन-किन बातों के लिए पश्चात्ताप कराओगे अपूर्व जी. मोदी की क्षमायाचना की इतनी ज़रूरत कुछ लोगों को क्यों है? गोधरा के लिए क्षमा क्या दारूल-उरूल देवबंद या बुख़ारी सरीख़े इस्लामी रहनुमाओं ने माँगी है?आज़ादी के समय यही भारतीय मुसलमानों ने जो मौत का नंगा नाच दिखाया था उन लाशों से भरी ट्रेनों के लिए किसने क्षमा माँगी या प्रतिक्रिया में भेजी गई लाशों से भरी ट्रेनों के लिए किसने पश्चात्ताप किया. ये स्वाभाविक प्रतिक्रिया नरेंद्र मोदी की नहीं थी, उन आहत गुजरातियों की थी जो अपनी ही मातृभूमि पर राजनीतिक और सामाजिक उपेक्षा के शिकार होते जा रहे हैं. ट्रेन में जलती लाशों को देख जो रक्त उबाल आया था प्रतिक्रिया फिर भी भारतीय ही रही. इसराइली होती तो आप सोच सकते हैं कि कैसी होती. अशोक के पश्चात्ताप की याद दिलानेवाले को याद होना चाहिए कि गुरूगोविंद सिंह, क्षत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप आदि की प्रतिक्रिया अत्याचार के विरूद्ध युद्ध की थी. मोदी भी इनसे मिलते कर्मों के दोषी हैं.
उपवास से छुपा पाएंगे क्या अपनी दुर्भावना को आप. लाशों पर चढ़के दिखाते हैं सदभावना जनाब.
आज के नेता सत्ता में रहने के लिए किसी हद तक गिर सकते हैं या गोलियाँ चलाकर लोगों को मरवा देते हैं क्योंकि उनमें उनका अपना कोई नहीं होता. इसलिए कोई पश्चात्ताप नहीं करता. पश्चात्ताप वही कर सकता है जिसकी आत्मा उस काम को करने की गवाही नहीं देता हो.
क्या यह ज़रुरी है कि राजनेताओं के हर काम पर टिप्पणी की जाए.
कोई अच्छा काम करता है तो लोगों को क्या परेशानी होती है पता नहीं. एक दम बकवास ब्लॉग, मोदी की जय.
अपूर्व जी आपने बिलकुल सही फ़रमाया है मैं जानता हूँ कि बीबीसी के कुछ श्रोता आप से सहमत नहीं हैं लेकिन आपने सौ फ़ीसदी सच कहा है पर मोदीजी माफ़ी क्यूँ मांगे उन्हें तो अभी प्रधानमंत्री बनना है चाहे और भी अपराध करने पड़े.
मैंने किसी के ऊपर कोई ज़्यादा टिप्पणियाँ नहीं की हैं क्योंकि मैंने एक बार कुछ टिप्पणी की और उसके प्रकाशित ना होने से बहुत दुःख हुआ था. मेरा कहना है कि दुनिया में कोई भी इंसान संपूर्ण नहीं है, नहीं तो वो भगवान बन जाएगा. इसलिए हर ऐसे इंसान को जिसने बहुत-बहुत लोगों का भला किया है, रोज़ी-रोटी दी है, अगर उससे कुछ ग़लती हो जाए उसे ज़रूर माफ़ कर देना चाहिए. भले उसे भगवान माफ़ ना करे. एक भगवान के जैसा इंसान तो मिलना मुश्किल है, और उसकी खोज करते-करते लोग ऐसे इंसान को, जो भगवान तो नहीं पर बहुत कुछ अच्छा है, उसे नज़रअंदाज़ करते चले जाते हैं, और वो इंसान अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाता और उससे भी बुरे लोगों को ग़लत काम करने का मौक़ा हमलोग दे देते हैं.
आपकी बात शत-प्रतिशत ग़लत है अपूर्व जी.
अपूर्व जी, मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं.
ये भारत देश है जहां पंच से भी परमेश्वर होने की अपेक्षा की जाती है. ऐसे में मुख्यमंत्री मोदी से भी जनता की उम्मीदें ऐसी ही थीं. लेकिन मोदी ने ऐसा नहीं किया. पता नहीं कितने लोगों की जानें गई, इसकी ज़िम्मेदारी से वो कैसे बच सकते हैं. मरने वालों में केवल हिंदू या मुसलमान नहीं थे. उपवास की जगह अगर मोदी ने उन परिवारों को बुला कर उन्हें सहारा देते तो शायद ये बड़ी बात होती. शायद इस उपकार से वो हिंसा के दर्दनाक मंज़र को भुलाने की कोशिश करते,लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटे ये दिखाने की कोशिश की गई कि चाहे कुछ भी हो हम राज करते रहेंगे.
नक्शा बदलने से इंसान बेगुनाह नही हो सकता. अगर उन्हें पश्चतावा है तो अपने आपको क़ानून के हवाले करना चाहिए. उसके बाद अदालत फ़ैसला देगी. अभी तो वोह दिन ख़्वाब देख रहें हैं प्रधानमंत्री बनने का. उसके लिए ये सारा नाटक है. लेकिन जनता अब इतनी बेवक़ूफ़ नही रही, वो सब जानती है.
अपूर्व जी काश इसमे बीबीसी के पाखंड की भी चर्चा करते तो अच्छा होता. क्या बीबीसी भी अपने श्रोताओं के साथ पाखंड नहीं कर रहा है और फिर किसी भी तरह का पाश्चाताप भी नहीं करती है. समय निकाल कर किसी दूसरे मुद्दे पर ध्यान लगाएं, इन नेताओं पर लिखना समय की बर्बादी है.
बहुत सही और सटीक शब्दों में आपने हाल फिलहाल के सारे घटनाक्रम पे नज़र डालते हुए इन नेताओं की असलियत बयान कर दिया है . सभी जानते हैं की अगर जनता का दिल जीतना है तो जनता की बात सुनो और दिल से उनसे बातें करो ये पाखंड मत करो. मगर आज सच्चे नेता हैं नहीं और पाखंडी लोग सिर्फ़ पाखंड कर सकते हैं पश्चाताप नहीं. आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा.
मैं आपकी बात समझ नहीं पा रहा हूं. आप स्वामी रामदेव, मनीष तिवारी और मोदी के बीच तुलना क्यों कर सकते हैं. मेरा ख़्याल है कि रामदेव और मोदी ने हमारे देश के लिए कुछ अच्छा काम किया है. मनीष तिवारी कौन है, सिर्फ़ उनकी वजह से मैं कांग्रेस से नफ़रत करता हूं. आपको मोदी के विकास के बारे में लिखना चाहिए और 2002 के दंगों को भूल जाना चाहिए.
मोदी को मुस्लिम टोपी नहीं पहना पाए, तो कौन सी आफ़त आ गई, जब मुसलमान वन्दे मातरम, भारत माता की जय नहीं कहते है, तो कोई सवाल जवाब नहीं, जब मुस्लिम रेल मंत्री एक कार्यक्रम में दीप जलाने को इस्लाम विरोधी कहकर कार्यक्रम करने को मनाकर देता है, तो कोई सवाल जवाब नहीं, जब देश को डायन कहने वाले से कोई सवाल जवाब नहीं, ये मीडिया वाले लगता है सारे हिन्दू विरोधी है, या ये सारे अरब देशो के हाथ बिके हुए हैं.
प्रिय अपूर्व, सबलोग मोदी से माफ़ी माँगने के पीछे पड़े हुए हैं. पर कोई भी गुजरात दंगों के आरंभिक बिन्दु की बात नहीं करता. अगर मुस्लिम लोग कारसेवकों पर हमला नहीं करते, ट्रेन को नहीं जलाते, तो ऐसा कुछ नहीं होता. सभी दंगे किसी एक क्रिया की प्रतिक्रिया होते हैं. क्या आज तक किसी ने भी ट्रेन पर हमला करने के लिए प्रेरित करनेवालों से कहा कि माफ़ी माँगो. क्या कभी किसी ने ये सोचा कि ऐसा क्यों हो रहा है. क्या मुस्लिम ही अल्पसंख्यक में हैं. सिख, जैन, बौद्ध, पारसी सब अल्पसंख्यक हैं पर जितना लाभ मुस्लिम लोगों को मिलता है उतना किसी और अल्पसंख्यक को मिलता है? हमारा महान देश मुस्लिम लोगों को हज़ पर जाने के लिए सब्सिडी देता था. कोई भी इस्लामिक देश नहीं देता. कभी किसी मुस्लिम ने ये प्रश्न उठाया कि कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से क्यों भगा दिया गया. पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ जो होता है कभी उसके ख़िलाफ़ बोले हैं. इन बातों से मैं ये नहीं कहना चाहता कि जो हुआ वो सही था. वो ग़लत था, मगर उसके प्रभाव की बात करने से पहले उसके कारणों की भी बात करो. सिर्फ़ एक तरफ़ की बात कहने से काम नहीं चलेगा. जो दूसरे हिन्दू मारे गए उनकी भी बात करो. एक बात और, आपको शर्म आनी चाहिए जो ऐसा एकतरफ़ा लेख लिखते हो. पहले सारे तथ्य लाओ, उसके बाद लिखो और अपना पत्रकारिता धर्म सही से निभाओ. ऐसा ही चलता रहा कि लोग एकतरफ़ा बात करती रहे तो साध्वी प्रज्ञा जैसे ना जाने कितने लोग बन जाएँगे. मैं आप सबसे आग्रह करता हूँ कि मूल कारणों की चर्चा करें अन्यथा एक और नया देश बनाने की माँगें बढ़ जाएँगी.
आपका ब्लॉग प्रायोजित लगता है. कभी बीबीसी वालों को कश्मीरी ब्राहम्णों के अनाथ बच्चे नहीं दिखते. इस प्रकार सत्ताधारी पार्टी की जय-जय और विपक्ष की हाय हाय करके बीबीसी संस्था की छवि धूमिल होती है. आप भारतीय ही हैं, मुझे तो इस पर शक है.
मोदी को 2014 में प्रधानमंत्री के लिए प्रोमोट करना है इसलिए कुछ नाटक तो ज़रूरी है.
कभी अटल सरीखे नेता और उनकी पूरी टीम सोनिया गांधी के पीछे पड़ी थी कि वो विदेशी मूल की हैं. आजकल कांग्रेस और उनकी चौकड़ी और बीबीसी मोदी के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं. इसका परिणाम मोदी के हक़ में ही होगा.
आपकी सारी बुद्धिजीविता हिन्दू विरोध पर टिकी है। एक भी पंक्ति आपने मोदी के सुशासन पर नहीं लिखी। और गांधी के अल्पसंख्यकवाद को नकारने का साहस जब तक भाजपा नहीं करेगी और गांधी से घोषित रूप से पिण्ड नहीं छुड़ाएगी तब तक मैं नहीं समझता कि वह इस देश का कोई भला करेगी।
गुजरात के विकास का श्रेय नरेंद मोदी ले रहे तो दंगों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा. एक रेल दुर्घटना हो जाने पर रेल मंत्री इस्तीफ़ा दे देता लेकिन लेकिन दंगे करवाने और दंगे रोक न पाने के बावजूद भी नरेंद्र मोदी बेशर्मी के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. नरेंद्र मोदी मुसलमानों के ही नहीं बल्कि इंसानियत के भी दुश्मन है. उन घटनाओं का ज़िक्र करने की हिम्मत नहीं होती जो गुजरात में लड़कियों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं के साथ घटी हैं. देखोगे तो मिल जाएँगी हर मोड पर लाशें, ढूंढोगे शहर में कोई कातिल न मिलेगा. जनाब अफज़ल गुरु और जनाब जनाब अजमल आमिर को नरेंद्र मोदी से सबक सीखना चाहिए, उन्हें भी उपवास रखना चाहिए जिससे भारत सरकार और भारत वासी उनकी सज़ा माफ़ कर दें. मनमोहन सिंह को भी उपवास रख लेना चाहिए जिससे लोग भ्रष्टाचार और महगाई के मुद्दे पर उन्हें न घेरे. अब तो ऐ राजा, मधु कोड़ा और कलमाड़ी अदालत के चक्कर काटने के बजाय उपवास ही रखले तो बेहतर होगा.
क्या मार्मिक टिप्पणियाँ की हैं आपने. जनता जनार्दन हमेशा से ही शब्दों के मायाजाल में भूलती रही है, आपने सवाल तो सही ही किया है कि क्यों ना मोदी को पश्चात्ताप करना चाहिए और एक कौम विशेष से माफ़ी माँगनी चाहिए. आख़िर वो अकेला आदमी देश के लिए सोचता है ना कि गंदी राजनीति को. मोदी को आप किस चीज़ के लिए पश्चात्ताप करवाना चाहते हैं? क्योंकि वो समूह और संस्था से ऊपर उठकर रात दिन देश के लिए काम करता काम करता है? या इसलिए कि सही को सही औऱ ग़लत को ग़लत मानता है? अगर आप पश्चात्ताप ही करना चाहते हैं तो आपको उस दिन के लिए करना चाहिए जब आप जैसे लोग केवल बोल रहे थे और एक आततायी ने हमारी सांस्कृतिक धरोहर का नाश कर दिया. आप या तो आँखें बंद किए हुए हैं या वही ढोंग का चश्मा पहने हुए हैं. कृपा कर कम-से-कम आप तो विकास और अच्छाई की बात कीजिए क्योंकि वही भविष्य है. हम नहीं चाहते कि आपके इन दकियानूसी तर्कों से और कोई दिग्भ्रमित हो.
आप सभी गुजरात का रोना रो रहे हैं, कभी कश्मीर के उन पंडितों का भी रोना रोएँ जो जम्मू और दिल्ली में शरणार्थी बने हुए हैं.
किस बात के लिए माफी ज़नाब? ब्रिटिश न्यायपालिका ने उन्हें दोषी करार दिया है क्या ? भारत में तो वो सर झुकाए न्यायपालिका के सामने हैं. कोई उन्हें माफी मांगने के लिए नहीं कहता. जागो जनाब जागो.
रश्मिकांत जी आपने बिल्कुल ठीक बोला है. मैं आपके साथ हूँ.
मुझे नहीं समझ आ रहा है कि आप लोग नरेंद्र मोदी के पीछे क्यों पड़े हो ? किस बात की माफ़ी ! क्या गोधरा की घटना मोदी ने करवाई ? क्या 2002 के बाद कोई दंगा हुआ ? ठीक है अचनाक किसी व्यवस्था में कमी रह सकती है। लेकिन मोदी विकास के प्रतीक है.आज अमरीका मोदी को महत्व दे रहा है लेकिन लगता है आप किसी पार्टी के प्रायोजित पत्रकार हो और आपको मोदी से जलन है.ऐसी बातें लिखने से लोगों में नफ़रत ही फैलती है.
नरेंद्र मोदी ने स्थानीय लोगों के साथ जो किया उसके लिए वे कभी भी पश्चात्ताप नहीं करेंगे. ईश्वर उनकी माफ़ी स्वीकार नहीं करेगा.
मैं आपसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ. केवल बीबीसी में सच लिखने का साहस है.
मोदी की सद्भावना उनके कुशल प्रशासन और गुजरात के विकास से बनी है, उपवास करने या न करने से नहीं. मौत का यह सौदागर (श्रीमती सोनिया गाँधी के शब्दों में) तो सचमुच विकास, धार्मिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का मसीहा निकला. लौह पुरुष सरदार पटेल की भूमि के इस लौह पुरुष को सलाम !
क्या आपमें हिम्मत है मुस्लिम लोगों को खरी-खोटी सुनाने की.पहले ट्रेन में आग लगाते हैं, जवाबी कार्रवाई में नुकसान उठाते हैं, फिर हाय-हाय करते हैं.
माफ़ी सिर्फ़ मोदी को नहीं बल्कि आडवाणी को भी माँगनी चाहिए जिन्होंने रामजन्मभूमि जैसे मामले में कारसेवा कर उन बेगुनाह हिंदुओं को अयोध्या में मरवा दिया जो धर्म के नाम पर भगवान को भक्ति दिखाने गए थे. सारे हिन्दुस्तान को पता है ये संघ और उसकी दूसरी शाखाएँ देश में ख़ामोश चरमपंथ का ज़हर घोल रहे हैं.
आपने बिल्कुल ही सही बात की है. आख़िर अनशन या उपवास से काला धन वापस आ जाएगा क्या? और ये मोदी के उपवास से सद्भावना तो नहीं पर उनका मुस्लिम विरोधी चेहरा ज़रूर उजागर हुआ है.