भारतीय जनता पार्टी के गाँधी?
लगभग एक दशक बाद दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय 11, अशोक रोड पहुँचा तो कई चीज़ें बदली हुई नज़र आईं.

भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में गोडसे की किताबें.
अब वाहन बाहर फ़ुटपाथ पर ही खड़ा करना होता है. अंदर जाने के लिए मैटल डिटेक्टर से होकर गुज़रना होता है. जिस लॉन में अक्सर नरेंद्र मोदी या गोविंदाचार्य टहलते हुए नज़र आ जाते थे, उसके चारों ओर नए कमरे और पास में एक विशाल ऑडिटोरियम बना दिया गया है.
पार्टी कार्यालय के अंदर किताबों की एक नई दुकान भी खुल गई है जिसमें किताबों के साथ साथ पार्टी के झंडे और पोस्टर भी बिकते हैं.
किताबों को सरसरी तौर पर देखना शुरू किया: अटल बिहारी वाजपेयी का कविता संग्रह, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भाषणों का संकलन, दीनदलाय उपाध्याय की किताबें, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सवाशिव गोलवलकर का साहित्य, लालकृष्ण आडवाणी की किताबें, हिंदुत्व, विभाजन, सावरकर साहित्य.... इन सब किताबों से होते हुए नज़र एक किताब पर जम गई:
'गाँधी वध क्यों?' लेखक: नाथूराम गोडसे.
किताब के कवर पर एक तोप से निकले लाल रंग के विस्फोट के बीच गाँधी का चित्र बना है. विस्फोट के बग़ूले के नीचे रक्त टपकता दिखाया गया है. इस किताब के साथ एक और किताब देखता हूँ:
'गाँधी वध और मैं'. लेखक: गोपाल गोडसे.
काउंटर पर किताबें बेच रहे कार्यकर्ता से बेसाख़्ता सवाल करता हूँ: "ये किताबें... यहाँ?" तुरंत इस प्रश्न की निरर्थकता का एहसास हो जाता है क्योंकि ये किताबें तो कहीं भी हो सकती हैं. भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में भी !
क्या गाँधी के हत्यारे की किताबें छापना या बेचना कोई अपराध है? एकदम नहीं.
किताबें बेच रहे कार्यकर्ता ने ख़ारिज करने के अंदाज़ में मुझे ऊपर से नीचे तक भरपूर घूरा और फिर कहा: "आपने ये सवाल पूछा ही क्यों?"
"हाँ, पूछने का दरअसल कोई अर्थ नहीं है", मैंने क़िस्सा रफ़ा दफ़ा करने के अंदाज़ में कहा.
किताबों की अलमारियों पर एक बार फिर ग़ौर से नज़र दौड़ाता हूँ. क्या महात्मा गाँधी की जीवनी या उनसे जुड़ा साहित्य उपलब्ध होगा बीजेपी कार्यालय में? अगर नाथूराम गोडसे की किताबें यहाँ मिल सकती हैं तो गाँधी की तो मिलेंगी ही. आख़िर भारतीय जनता पार्टी को महात्मा गाँधी से कोई एतराज़ तो है नहीं !
अटल बिहारी वाजपेयी ने ही तो गाँधीवादी समाजवाद को एक ज़माने में भारतीय जनता पार्टी का मूल दर्शन बताया था. हिंदुत्व के नए शिखर पुरुष नरेंद्र मोदी ने अपने आलीशान अनशन स्थल पर न हेडगेवार की तस्वीर लगाई गई थी, न गोलवलकर की. उन्होंने गाँधी की विशाल तस्वीर के नीचे ढाई दिन का "सदभावना" अनशन किया.
किताबें बेच रहे कार्यकर्ता की निगाहें मुझपर ही लगी थीं. मेरी निगाहें भारतीय जनता पार्टी के दफ़्तर में गाँधी साहित्य को ढूँढ रही थीं.
"क्या यहाँ महात्मा गाँधी की जीवनी या उनका साहित्य उपलब्ध है?" मैंने फिर पूछा.
"........", किताबें बेचने वाला कार्यकर्ता चुप रहा और फिर बहुत देर तक सोचने समझने के बाद कुछ व्यस्त सा दिखते हुए बोला, "गाँधी साहित्य लेना हो तो आप गाँधी स्मृति चले जाइए या फिर काँग्रेस के कार्यालय में भी वो किताबें आपको मिल जाएँगी."
नरेंद्र मोदी अपना "सदभाव मिशन" गाँधी की तस्वीर तले शुरू करते हैं, हेडगेवार या गोलवलकर या सावरकर या गोडसे की नहीं. लेकिन उनकी पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में गाँधी की हत्या के पीछे का "तर्क" प्रस्तुत करने वाली किताबें आसानी से मिलती हैं, गाँधी का साहित्य नहीं. आख़िर क्यों?
आपके पास है कोई जवाब?

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ये दुखद है लेकिन उम्मीद से परे नही, मैं कांग्रेस के ख़िलाफ़ या उसका हिमायती नही हूँ. मैं कर्म में विश्वास रखता हूँ,.बीजेपी ने निराश किया है. इस तरह की टिप्पणी पढ़ना अच्छा नही लगता.
लगता है राजेश जी कि पहले भाजपा बिना गांधी के सत्ता पाना चाहती थी पर इतने वर्षों में उसे ख़याल आया है कि वो गांधी का सहारा लिए सत्ता में नहीं आ सकते. इसलिए किसी और का ह्रदय परिवर्तन हो या ना हो मोदी जी का ह्रदय परिवर्तन हो रहा है. इसीलिए गांधी का साहित्य नहीं लेकिन गांधी जी की तस्वीर का सहारा लिया जा रहा है. राजेश जी समय बड़ा बलवान है.
बहुत ही शानदार. गांधीवादी बनने का नाटक करने वालों तथा गांधी के नाम का सहारा ले कर अपने अपराधों पर पर्दा डालने वालो के मुंह पर तमाचा है. एक आदर्श वाक्य अक्सर इनके साहित्यों में मिलता है - "कथनी करनी में फर्क जहाँ धर्म नहीं पाखंड वंहाँ" पर पाखंड को भी सत्य बना कर बेचना इन को बहुत अच्छी तरह आता है. झूठ बोलना, जल्दी जल्दी बोलना और जोर जोर से बोल कर लोगों को गुमराह करने के प्रयत्न तो बहुत बार किये जाते है पर सच और इनके दिल की बात कैसे न कैसे बाहर आ ही जाती है. हर कोई ऐसी जगहों पर नहीं पहुच पाता है और अगर जाता भी है तो ऐसा कड़वा सच सामने लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है. जोशी जी ने जो भारतीय जनता पार्टी का सच सामने लाने का जो प्रयास किया है बहुत शानदार है और खुले दिल से जोशी जी को साधुवाद.
आपका सवाल वाजिब है. महत्वपूर्ण ये नहीं है कि बीजेपी के कार्यालय में गांधी साहित्य नहीं है. महत्वपूर्ण ये है कि मोदी, गांधी के नाम पर अनशन करते हैं फिर भी ऐसा है, शायद ये राजनीति है.
राजेश जी आप को तो पता है कि राष्ट्रपिता बहुत अच्छे हिन्दू और बहुत अच्छे इंसान और उतने ही बढ़िया सेक्युलर इंसान थे. चूँकि वे अहिंसा के पुजारी थे इसलिए इनका लहू उनसे मेल नहीं खाता और यह लोग कितना ही बड़ा ढोंग रचाएं पर ये गाँधी विरोधी हैं, इनके यहाँ गाँधीजी की जीवनी कैसे मिलेगी भाई.
राजेश जी ऐसा लगता है कि आप और बीबीसी ने कांग्रेस पार्टी के शेयर ख़रीद लिए हैं इसलिए आप कांग्रेस पार्टी को गांधीवादी साबित करना चाहते हैं. सच्चाई ये है कि कोई भी पार्टी ग़रीब जनता की कोई हितैषी नहीं है. गांधी के नाम पर अपनी रोटियाँ सेंक रही है.
मज़ा आ गया. क्या ख़ूब. ज़बरदस्त राजेश जोशी जी.
जोशी जी मैं आपसे एक सवाल करना चाहूँगा, अगर विनायक सेन माओवादी साहित्य रखने भर से माओवादी या माओ समर्थक नहीं बन जाते तो किस सिद्धांत से बीजेपी ऑफ़िस के बाहर की दुकान में नाथूराम की किताब रखने से बीजेपी नाथूराम की समर्थक बन जाती है? आपको क्या लगता है 16 अगस्त को अन्ना हज़ारे को गिरफ़्तार करना कांग्रेस का गांधीवादी तरीक़ा था? क्या गांधी का साहित्य पढ़ने और रखने से कोई गांधीवादी बन जाता है.
मुझे लगता है कि यह बहुत ही गलत निष्कर्ष है. किताब मिल जाना सबूत नहीं है कि हम वैसी ही सोच रखते है .ये भी हो सकता है कि हम जिस व्यक्ति से नफरत करते हो और उसको और जानने के लिए हम उसकी बुक को पढ़ते है .मैंने तोगाडि़या और अजहर मसूद के भाषद कई बार यू टियूब पर देखे है और मेरे लैपटॉप में भी है . मैं सिर्फ ये समझने के लिए वीडियो देखता हूँ कि ऐसे लोगो की सोच कैसी होती है .राजेश जी आप यही सोचेंगे की मैं आतंकवादी हूँ .जैसा तर्क आपने प्रस्तुत किया है .राजेश जी आपसे ये अपेक्षित्त नहीं था
भाजपा कार्यालय में यही किताबें मिलेगी. धर्म के नाम पर नफ़रत और हिंसा फैलाने वाली. नरेंद्र मोदी ने तो उपवास कर लिया अब जनाब अफ़ज़ल गुरु और जनाब अजमल कसाब को भी जल्द उपवास कर लेना चाहिए जिससे उनके ऊपर लगे इलज़ाम माफ़ हो जाएँ. प्रधान मंत्री को भी महंगाई और भ्रष्टाचार से निपटने के बजाय एक दिन का उपवास कर लेना चाहिए. कितना आसान हो गया है गुनाहों को धोना.गाँधी की इज्ज़त ये लोग मजबूरी में करते हैं. जनता के बीच गाँधी की इज्ज़त और अपने कार्यालय में गोडसे की इज्ज़त. भाजपा अपना नाम "भारतीय जनता पार्टी" से बदल कर "भारतीय दंगा पार्टी" रखले तो ज्यादा अच्छा होगा.
मेरे जैसे कुछ लोग बीबीसी पर आँख मूंदकर विश्वास करते हैं.लेकिन बीजेपी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों? आपके द्वारा लिखे गए पिछले कुछ लेख या रिपोर्ट कांग्रेस के विरोधियों के विरोध में ही लगी. मुझे उस सत्य से परहेज़ है जिस सत्य से असत्य को लाभ होता हो.
जब मैं इस तरह का लेख पढ़ता हूं तो मुझे लगता है कि भारत में हिंदू होना एक पाप है.
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी भारतीय राजनीति के दो ध्रुव कहे जा सकते हैं. जिस प्रकार कांग्रेस के कार्यालय में हेडगेवार या लालकृष्ण आडवाणी की किताबें नहीं मिल सकती ठीक उसी तरह किसी भी गाँधी की पुस्तक आप भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय मे कैसे पा सकते है. हाँ यदि नेता जी सुभाष या विवेकानंद, विनोवा भावे, सरदार पटेल, लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप, शिवाजी से संबंधित पुस्तके ना मिली हों तो ज़रूर आश्चर्य होना चाहिए. रही बात मोदी की तो उन्होने गाँधी जी के जीवन के सर्वमान्य पहलुओं का समर्थन किया है. देश का विभाजन गाँधी जी के प्रति आक्रोश का कारण हो सकता है लेकिन उनका अहिंसात्मक आंदोलन, सदभावना पूरी दुनिया मे सर्वमान्य है. सर्वमान्यता की तलाश मोदी को भी है जो उन्हें हेडगेवार या संघ के माध्यम से नही मिल सकती .
आपने जिसतरह से पूरा विवरण किया मुझे बहुत पसंद आया लेकिन इस तरह के मुद्दों से लोग थक गए हैं. अब देश से भ्रष्टाचार और ग़रीबी को दूर करना है.
भाजपा का असली चेहरा उजागर करने के लिए आपका बहुत शुक्रिया. भाजपा, संघ का राजनीतिक अंग है और संघ की नीति के बारे में सबको पता है.
राजेश जी आपने भी कांग्रेस का मुखौटा पहन कर अपनी टिप्पणी की है. किताब रखने या बेचने से कोई गांधी या गॉडसेवादी नहीं बन जाता. अगर आप समझते हैं कि गांधी ने आज़ादी दिलाई तो आप ग़लत हैं. सीता राम के भजन गाने से आज़ादी नहीं मिलने वाली थी, ये तो अंग्रेज़ो की एक सोची समझी चाल थी कि कमज़ोर हाथों में सत्ता दी जाए.
पिछले एक दशक से भाजपा का जनाधार कम ही हुआ है. देश का एक तबक़ा अब भी भाजपा को संघ की कठपुतली ही मानता है. आरएसएस की छवि भी जनमानस में सांप्रदायिक ही रही है.अब जबकि संघ के क़दमों तले चलने वाली बीजेपी कैसे तटस्थ हो सकती है.भाजपा मुखौटा बदल भी ले तो अंदरूनी विचारधारा तो वही रहेगी न. सच्चाई तो यह है कि गांधीदर्शन को भाजपा ने समझा ही नहीं है.गांधी की-सी ताकत भाजपा ही क्या किसी भी आज के राजनेता में हो भी नहीं सकती. गोडसे को महिमामंडित करने वाला साहित्य वहाँ पाकर हम सहज ही यह अनुमान लगा भी सकते हैं.
भाजपा का नाटक जगज़ाहिर है. मोदी ने आज तक राज्य में हुए दंगों के लिए नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं ली और ना ही लेने का नाटक ही किया.
राजेश जी भारत में कोई भी पार्टी बिना किसी बड़े महापुरूष के नाम का सहारा लिए राजनीति नहीं करती है. लेकिन ये तो सही है कि सारी पार्टियों का जनता के सामने कुछ और ही एजेंडा होता है. भाजपा का आपने ज़िक्र किया लेकिन कांग्रेस भी वही करती है. अहिंसा की बात करती है लेकिन काम करती है हिंसावादियों की तरह से जैसा कि पार्टी ने अन्ना हज़ारे के साथ किया.
बीबीसी का काम अब देश में सौहार्द बढ़ाने के बजाय घटाने का ज्यादा हो गया है. इस तरह के ब्लॉग लिख कर हमारे बीच फूट डालने के सिवाय और क्या किया जा रहा है ? अच्छा होता किसी और विषय पर लिखा जाता .
जोशी जी आप पूर्वाग्रह के शिकार हैं. हो सके तो सुधार कीजिए.
आपको भाजपा से दुश्मनी है. याद रखें जहां विपक्ष नहीं वहां प्रजातंत्र नहीं. मुझसे पूछें तो प्रजातंत्र का प्राण विपक्ष में होता है.
जिन्होंने गांधी साहित्य रख रखा है क्या वे गांधी के आदर्शों पर चल रहें हैं. लगता है बीबीसी वालों का काम केवल हिंदूत्व और भाजपा की बुराई करना है. उनको भगवा आतंकवाद में कुछ ज्यादा ही रूचि है.
मुझे लगता है कि मोदी के अनशन मे गाँधी कि तस्वीर का होना और भाजपा के कार्यालय मे गांधी साहित्य का ना होना बिलकुल अलग अलग बाते हैं, मोदी के अनशन मे तो पटेल कि तस्वीर भी थी लेकिन हो सकता है कि उनकी जीवनी पर कोई किताब भाजपा ऑफिस मे ना मिले. हमे नहीं भूलना चाहिए कि गाँधी और पटेल गुजरात से थे और उनकी तस्वीरो का उपवास स्थल पर होना बिलकुल तार्किक है, भले ही उनसे जुड़ा हुआ साहित्य भाजपा के पास हो ना हो. गाँधी भाजपा को स्वीकार्य हैं, इस बात मे शायद ही कोई शंका हो और जहाँ तक मुझे याद है, गांधी जयंती को राष्ट्रीय अवकाश भी भाजपा के शासन काल मे ही घोषित किया गया. यह और बात है कि नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की जिसे आम तौर पर संघ का व्यक्ति समझा जाता है. लेकिन गोडसे ने वैचारिक मतभेदों के चलते गांधी की हत्या की थी. कुछ उसी तरह के मतभेद पटेल भी गांधी से रखते थे जिनके चलते उन्होंने गांधी कि बहुत सी बातों को नज़रंदाज़ किया.जोशी जी, बिना मतलब कि बात में से बात निकालने के लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं.
राजेश जी, बस मैं कहना चाहूँगा कि आपकी टिप्पणी से मैं सहमत नहीं हूँ.
अब बीबीसी का मतलब बढ़ बोले कॉंग्रेसी. ऐसा लगता है कि आप और बीबीसी ने कांग्रेस पार्टी के शेयर ख़रीद लिए हैं. जब मैं इस तरह का लेख पढ़ता हूं तो मुझे लगता है कि भारत में हिंदू होना एक पाप है.और बीबीसी का एक ही काम है हिन्दुओं और भारत को नीचा दिखाना. मैं बीबीसी बहुत सालों से सुन देख व पढ़ रहा हूं. अब ये निष्पक्ष नहीं है.
हम लगभग पिछले कई ब्लॉग में देखते आ रहें हैं आप ख़ामख़ा बीजेपी के पीछे पड़े रहते हैं, सब जानते है बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति करती है तो हिंदुस्तान में हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान के लिए जीना क्या पाप हो गया है.
राजेश जी, धन्यवाद आपकी सूचना के लिए
ये देखकर निराशा हुई कि बीबीसी में इस मुद्दे पर ब्लॉग लिखे जाने लगे कि बीजेपी के कार्यालय में क्या बिक रहा है. एक निरर्थक ब्लॉग लिखकर आपने एक निरर्थक बहस को जन्म दिया है. तथाकथित सेकुलर पत्रकारिता कब तक बीजेपी को तरह तरह से अछूत और कांग्रेस को सर्वमान्यता का प्रमाण पत्र देती रहेगी. न तो मै बीजेपी समर्थक हूँ और न ही कांग्रेस विरोधी. अपनी निराशा प्रकट करना चाहता हूँ की बीबीसी हिंदी पर कुछ अच्छा पढने को मिल जाता है, पर इस तरह के लेखन से दोबारा वेब साईट पर आने का मन नहीं होता है. निवेदन है की उत्कृष्ट, स्तरीय एवं तटस्थ पत्रकारिता पर बल दें.
मैं प्रदीप शुक्ल जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ . साथ ही मो . अतहर खान की टिपण्णी पढ़ कर ख़ुशी हुई , क्योंकि अब वो भी मानने लगे है कि अफ़जल गुरु और कसाब गुनाहगार है .
जोशी जी, शायद अपने हिंदुत्व को तुम पाल न पाओ .
फिर भी कोई काफ़िर कहे तो थोड़े रोष में आओ .
क्या हिन्दू हो ? तो थोड़े जोश में आओ .
जोशी जी थोड़े होश में आओ.
धन्यवाद जोशी जी बीबीसी की चाटुकारी पत्रिकारिता का एक और ब्लॉग .
राजेश जोशी जी, वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता है. बीबीसी हिन्दी सेवा भी कितनी बदल गई. भाजपा के लिए उग्र हिन्दू चरमपंथी पार्टी के विशेषण से भारत की मुख्य विपक्षी दल के विशेषण तक का सफर भी बड़ा रोचक रहा. कुछ इस पर भी लिखिएगा कभी , वक्त मिले तो.
लगता है बीबीसी पत्रकारों को बीजेपी विरोधी पत्रकारिता में बहुत ही आनंद आता है.
इस देश में जहाँ गांधी की किताबों को रखना और पढ़ना फैशन और एक अवश्यम्भावी तत्व है. वहीं गांधी के हत्यारे की बात तो कही ना कहीं सामने आनी चाहिए. किसी की आवाज़ को बंद कर देना तो वैसे भी संवैधनिक अधिकारों का हनन है. गांधी की किताबों को कोई रखे उस पर कुछ होने का ठप्पा नहीं लगता है. परन्तु गांधी के आरोपी की किताब रखना क्यों गलत है. आखिर जब अफज़ल की किताब को सामने लाया जा ज़कता है तो मी नाथूराम बोल्तोये को आज भी क्यों बंद करके रखा गया है. अगर किसी की भी गांधी पर दृढ आस्था है तो वह किसी किताब से नहीं बदलेगा. गांधी गांधी हैं उनके विचार अमर है. परन्तु किसी की अभिव्यक्ति को रोकना भी गांधीवाद के विरुद्ध है. गांधी ने अपने विरोधियों को भी बोलने दिया था. तो यह किताबें भी सर्वसुलभ होनी चाहिए.
जोशी और उनके सहयोगियों के लेखनी मानसिक दिवालियापन का घोतक है . वह खुश है कि कुछ मुस्लिम बीजेपी को कोस रहे है . किंतु जोशी जैसे लोगो से कोई अपनी विचारधारा नहीं बदल सकता .
यह बात तो सच है की आज के युग में कोई भी गाँधी के विचारों को नहीं मानता. चाहे वो कांग्रेस के गांधी हों या हो या बीजेपी के. कोई या तो गाँधी के नाम से अपना फयदा निकालता है और कोई अपने विचारों को गांधी के विचार बताकार.
जोशी जी, इसे विडंबना कहूँ या भारत का दुर्भाग्य कि देश के कुछ उच्च शिक्षित किंतु अल्पज्ञानी अभिजात्य वर्ग ने देश की जनता के लिए स्वयं ही नेता, राष्ट्रपति और राष्ट्रनायक नियुक्त कर डाले. उस पर अन्याय ये कि एक ही उपनाम वाले परिवार से ही सभी महानायक लेने के साथ ही उनको विदेशों से भी आयात किया गया है. मुझे बताएँ कि आपने स्वयं नाथूराम गोडसे जी को कितना पढ़ा है? यदि पढ़ा होता तो आप उनको प्रणाम करते और परमपिता से प्रार्थना करते कि इस देश में उनके जैसे और नागरिक पैदा हों. आप जैसे लोगों को सदबुद्धि मिले ये मेरी इच्छा है किंतु काँग्रेस की दी हुई बुद्धि को कुंद करने वाली शिक्षा आपको ऐसा करने नहीं देगी. जय भारत.
आहत लोगो की दुखती रग को छेड़ दिया अपाने .हैरानी है कि खुद के असली चहरे से इतनी शर्म क्यों ....दबे छिपे स्वर में क्यों गोडसे का गुणगान ,हिम्मत है तो खुल के कीजिये ...
अति उत्तम राजेश जी. लगता है यहाँ कई दोस्त राजेश जी के अन्य लेखों को एक साथ नहीं देख रहे हैं. यही राजेश जोशी जो मनमोहन सिंह की बाज़ारीकरण की नीतियों पर उन्हें "मैक मोहन " कहने से नहीं चूकते, तो भाजपा की इस बिचारधरा पर उनके लेख को पक्षपात की नजर से देखना बिलकुल गलत है. सही पत्रकार वही है जो 'दोनो' के बारे में तीसरी जगह खड़ा हो के वही बोले जो उसने देखा. क्या सही - क्या गलत, यह बहस का बहुत बड़ा मुद्दा है लेकिन यह पत्रकारिता काबिलेतारीफ है. राजेश जी
आप बीजेपी कार्यालय पर गाँधी साहित्य रखवाना चाहते है , तो गोडसे के साहित्य को राजघाट और कांग्रेस कार्यालय पर रखवा दें . जहा तक विचारों की बात है , गोडसे ने गाँधी के शरीर की हत्या की . पर उनके विचारों की हत्या तो नेहरु ने की .
राजेश जी, आप को बताऊँ कि मैंने गाँधी और गोडसे दोनों की जीवनी पढ़ी हैं. दोनों अपनी जगह पर ठीक हैं. पर आज के हालात में गाँधी विचार ज़रूरी है. क्या आपको मालूम है कि आज काँग्रेस भी अँग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो की नीति पर चल रही है क्योंकि उसे अँग्रेज़ यही सिखा गए. आज देश के नाम पर क़ुरबान होने वाले क्रांतिकारियों को कोई याद नहीं करता है. काँग्रेस सिर्फ़ नेहरू, इंदिरा, राजीव गाँधी आदि के नाम पर ही राष्ट्रीय योजनाएँ चलाती है. आज मुझे दुख होता है कि मैं किस देश में रहता हूँ. घृणा रहती है.
जोशी भाई , लगता है भारत में विष फैलाने का ठेका ले लिया है , आप लोगों ने - कितने डॉलर मिल होगें . लगता है आप लोग दृष्टिहीन हो गए हैं , 2 लाख कश्मीरी पंडितो के रक्तपात करने वालों की जय जय कार रहे हैं .
राजेश साहब अगर आप ने ऐसे साहित्य देखे जो गाँधी जी की हत्या को उचित ठहराते हैं तो क्या इस से आप यह अंदाज़ा लगाना चाहते हैं कि नरेन्द्र मोदी का उपवास इन्हीं शक्तियों द्वारा प्रायोजित हैं जो इस धारणा के माने वाले हैं जो गाँधी जी की हत्या को उचित समझते हैं. क्या सही में आप को यही दिखाई दिया. क्या आप को यह नहीं दिखाया दिया कि नरेन्द्र मोदी को अपने ऊपर लगे इलज़ाम पर कुछ न कुछ पश्च्याताप अवश्य है उनकी इस मानसिक हलचल को कैसे नाकारा जा सकता है. गलती भावावेश में हर किसी से हो सकती है. लेकिन अगर उसपर उसे पश्चाताप है तो उसपर तो ध्यान देना ही होगा. गुजरात की दशा सुधारने में नरेन्द्र मोदी का प्रयास नाकारा नहीं जा सकता. क्या इस से मुसलमान लाभान्वित नहीं हुए हैं. क्या गुजरात मुसलमानों से खाली हो चुका है. इसलिए अगर कोई पश्चाताप करता है तो उसको इज्ज़त की निगाह से देखिये. एक बात लेकर किसी पर हर समय तलवार लटकाए रहना ठीक नहीं लगता. न्यायिक प्रक्रिया ने अपना काम अभी बंद नहीं किया है. आज देश की जो हालत है उस से हिन्दू मुसलमान सब बुरी तरह त्रस्त हैं. देश के लोगों की सोच में जो बदलाव आ रहा है उसके मद्देनज़र इन बातों को लेकर बाल की खाल निकालने की कोई गुंजाईश नहीं है. देखना है नरेन्द्र मोदी उपवास के बाद देश की दशा सुधारने में कितना योगदान देते हैं. यही उनके पश्चाताप का मूल्याकन होगा.
लेखक के लिए एक सवाल: गाँधी की किताबें रखने से क्या सिद्ध होता है? क्या आज काँग्रेस गाँधी विचार का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है? काँग्रेस के मंत्री और गाँधी परिवार पुराने ज़माने के राजों महाराजों की तरह रहते हैं, ये अलग बात है कि वो बाहर निकलने पर खादी पहनते हैं. महात्मा गाँधी 1947 में ही काँग्रेस को समाप्त कर देना चाहते थे क्योंकि उन्हें महसूस हो गया कि काँग्रेस सत्ता की तलाश में उनके बताए रास्ते से हट रही है. तो विरोधियों की आलोचना करने के लिए मौक़े मत खोजिए. हमें मालूम है कि कई पत्रकार काँग्रेस से पैसा खाते हैं और ऐसे लेख लिखते हैं ताकि काँग्रेस विरोधियों की बेइज़्ज़ती हो सके.
ये लोग देशभक्ति की परिभाषा बदल रहे हैं. मोदी अनशन अपने घर पर भी कर सकते थे. लेकिन उन्हें सब मीडिया को दिखाना था. ये भारतवर्ष के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.
ख़ान साहब, आपको कोटि, कोटि प्रणाम. आपकी टिप्पणी पढ़ कर लगा कि भारत में मानव और मानवता अभी जीवित हैं. ईश्वर, ख़ुदा, प्रभुजी आपको सदा सुखी रखे. धन्यवाद, साधुवाद.
इस प्रकार की जानकारी से देश अपने लक्ष्य से भ्रमित हो रहा है.
मैं समझा नहीं कि गाँधी जी की तुलना किसी और व्यक्ति से क्यों की जा रही है. वो राष्ट्रपिता हैं इसलिए कोई तुलना नहीं हो सकती.
राजेश जी , आपने सच्चाई बयान की है जो कुछ लोगोँ को कड़वी लगी है ।
क्योंकि चिरंतन मुखौटे के पीछे की इनकी यही सचाई है.
हम चाहे जो कहें भारतीय जनता पार्टी और उनके नेताओ का दोहरा चरित्र तो सर्वविदित है. एक तरफ नरेन्द्र मोदी गाँधी जी की तस्वीर के सामने सद्भावना अनशन का दोंग करते हैं, वही दूसरी तरफ उनकी पार्टी कार्यालय में गाँधी के जीवनी के स्थान पर उनके हत्यारों की किताबे सुशोभित हो रहीं हैं. बीजेपी के नेताओं को अगर भारतीय जनमानस का सच्चा नेता बनना है तो ढकोसले की राजनीति के स्थान पर भरोसे की राजनीति करनी चाहिए. इसके अलावा गाँधी के देश ने गाँधी को गाली देने की बात बर्दाश्त के बाहर है.
पढ़ कर दुख हुआ. मैं बीजेपी का समर्थक हूँ. लेकिन ये बहुत ग़लत बात है. बीजेपी शर्म करो. और ईए ख़ान साहब, अगर मोदी दंगे भड़काने के दोषी हैं तो उन्हें सज़ा ज़रूर मिलनी चाहिए, भले ही वो कितने ही महान काम क्यों न करते हों. राजेश तिवारी से मेरा कहना है कि बीजेपी सभी हिंदुओं की पार्टी नहीं है. उसी तरह काँग्रेस भी सभी मुसलमानों की पार्टी नहीं है. जो अपने राष्ट्रपिता को सम्मान नहीं दे सकता वो निश्चित रूप से ग़लत है.
जी बिलकुल जवाब है. भाजपा का चेहरा और है और चाल चलन और, यदि आप को याद हो तो इनके इसी दोगलेपन से जनता पार्टी टूटी थी तब जनसंघ से 'भाजपा' बनी. गाँधी को मारने वाले गोडसे तब भी आर एस एस के थे और आज भी गाँधी के गरीबों को मारने वाले यही आर एस एस के भाजपाई.
अन्यथा यह देश दुनिया पर राज करता.
वैचारिक छुआछूत बुरी बात है. बीजेपी वालों को गाँधी साहित्य और काँग्रेस वालों को गोडसे का साहित्य अपने कार्यालयों में रखना चाहिए. आशा है कि आप इस दिशा में भी प्रयास करेंगे.
अन्य सभी तो गांधी की किताबे बेचते हैं न, राजेश जी. तो क्या? स्वतन्त्र भारत का इतिहास आपने पढा नहीं है, शायद. सन 1947 में विभाजन के समय से हाल में राजस्थान के गोपालपुर तक के दगों का कांग्रेस का एक गौरवपूर्ण इतिहास है. अभी कश्मीर में पाई गयी 2158 अनजान लाशें भी उसी कड़ी की कहानी नहीं कहती क्या? अपनी सत्ता बचाने के लिये आपात काल की घोषणा कर लाखों निर्दोष पुरूष महिलाओं को कारावास भेजना भी गांधी की ही सीख का परिणाम हुआ न और भारत का एक बडा भूभाग पाकिस्तान और चीन के अवैध कब्जे से आजाद नहीं करवा पाना भी. उस पर तुर्रा यह कि उमर अबदुल्ला शान से उसे आजाद कश्मीर कहें. परन्तु उस में उनका दोष नही, ये हमारा दोष है और आप जैसे चाटुकारों का है.
जोशी भाई, आप पत्रकारिता त्याग कर राजनीति में शामिल हो जाइए. कामयाब रहेंगे. इंडियन एक्सप्रेस के एक महानुभाव थे, कैबिनेट मंत्री बन गए हैं. मेरे सुझाव पर ग़ौर कीजिए.
राजेश जी, आप चिंता न करें. गाँधी विरोधी जल्द ही गाँधी को इश्वर भक्त बताएँगे और नाथूराम को इश्वर का अवतार. फिर कोई कहानी बनेगी और ग्रंथ/ धार्मिक ग्रंथ बनाकर वितरण होगा और गाँधी का स्वरूप बदल जाएगा.
क्या गांधी का साहित्य पढ़ने और रखने से कोई गांधीवादी बन जाता है?
आजकल मीडिया में यह प्रचलन हो गया की वह अर्धसत्य ही दिखाते हैं, आपने सभी दलों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया होता और आप अपने पाठकों और श्रोताओं पर छोड़ देते यह निश्चित करने के लिए कौन ज्यादा गाँधीवादी है. वैसे ही जैसे घर में गीता या कुरआन धर्मग्रन्थ रख लेने मात्र से उसे धर्म का ज्ञाता समझ लेना सही नहीं है. ज्यादातर लोग सत्य को जाने बिना ही सुनी सुनाई बातों से अपनी एक धारणा बना लेते हैं.महात्मा गाँधी एक महान आदर्श थे इसका अर्थ ये नहीं की जिसने उसकी हत्या की वो राक्षस था. बीजेपी को कम्युनल और कांग्रेस को सेकुलर कहके प्रचार किया गया है और लोगों ने ऐसी ही धारणा बना ली है परन्तु किन तथ्यों पर कांग्रेस सेक्युलर है यह शायद ही कोई जानने का प्रयास करता हो.
प्रिय राजेश जी,
आपने टिप्पणी समभाव से नहीं लिखी गयी है, ब्लाक की सार्थकता सिद्ध नहीं होती.
भारत के लोगों, एक दूसरे पर इतना कीचड़ न उछालो. पत्रकारों से बचो. राजनीतिबाज़ों से बचो.
मैं तो अब यहाँ सभी पाठको से कहूँगा ब्लॉग देखकर, आप सच्चाई नहीं जान सकते. ये ब्लॉग लोगों को भटकाते भी हैं, क्या बीबीसी के पास दूसरे मुद्दे नहीं हैं,
पिछले दिनों आप ने जितने भी ब्लॉग पढ़े उनपर गौर करें जैसे पंकज प्रियदर्शी, राजेश जोशी, सुशील झा, आप अगर गौर करेंगे तो सब पता चल जाएगा,ये मीडिया अब ऐसा अभिजात्य वर्ग है जो किसी ना किसी तरफ खड़ा है, यह बिलकुल ही तटस्थ नहीं है..राजनीतिज्ञों के साथ-साथ अब पत्रकारों की भाषा और उनके विषयों पर गौर करें.
धन्यवाद राजेशजी इतना अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए है.मुझे उम्मीद है कि लोग ये समझ पाएंगे कि सही मायनों में भाजपा और राजनीति क्या है.
नाथू ने तो गांधीजी को एक ही बार मारा था, मगर हमारे नेता तो उन्हें रोज़ मार रहे हैं, जो बगल में तो गाँधी वांगमय रखते हैं, मगर खुले आम भ्रष्ट्राचार और भ्रष्ट्राचारियों के संरक्षण में लिप्त हैं.
जोशी साहब बस मजबूरी की राजनीति है ! ना तो आप ग़लत हैं और ना ही भारतीय जनता पार्टी.शायद समय के साथ चलना अब राजनितिक दल सीख रहे हैं या दिखावा कर रहे हैं .अगर दिखावा ना होता तो गांधी जी की तस्वीर तले 'सदभावना मिशन' का प्रदर्शन करने वाले मोदी साहब को एक टोपी से परहेज क्यों हुआ ?
क्या बकवास है अगर आपको वहाँ गाँधी की किताबे मिल जाती तो क्या आप बीजेपी को गांधीवादी पार्टी मान लेते?
क्या बकवास है अगर आपको वहाँ गाँधी की किताबे मिल जाती तो क्या आप बीजेपी को गांधीवादी पार्टी मान लेते?
जोशी जी लगता है आप भी कांग्रेस के टिकट पर ग्राम प्रधान का इलेक्शन लड़ना चाहते है.
पहले राम मंदिर का सहारा लिया उससे काम नहीं चला तो गांधी के हत्यारे का सहारा ले रही है भाजपा.