जनसंगठन का कफ़न-दफ़न
पिता के कंधों पर बैठा वो बच्चा अपने हाथों में छोटा सा तिरंगा उठाए था. उसके दोनों गालों पर कूची से तीन रंगों के निशान बनाए गए थे.
ये बच्चा अन्ना हज़ारे के आंदोलन में शरीक था.
लेकिन 'न्यू इंडिया' में इस बच्चे को आप कहीं भी देख सकते हैं: बंबई के वानखेड़े स्टेडियम में आइपीएल मैच की चकाचौंध देखने आई भीड़ में. विश्वकप क्रिकेट का सिरमौर बने इंडिया की जीत का जश्न मनाने सड़कों पर उतरे किसी क्रिकेट प्रेमी पिता के कंधों पर. मदर्स डे या फ़ादर्स डे या फिर जन्माष्टमी के जुलूस में.
अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने कुछ और बदलाव किया हो या नहीं, उत्सव और आंदोलन के बीच के अंतर को मिटा दिया है. उनके अभियान में शरीक लोगों के हाथ में तिरंगा, होठों पर वंदेमातरम् और विचारों में राजनीति के प्रति एक अगंभीर क़िस्म की वितृष्णा महसूस की जा सकती है.
सभी नहीं तो इनमें से बहुत सारे वो लोग भी हैं जो आम तौर पर राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों पर नाक भौं सिकोड़ते हैं और कहते हैं कि हड़तालों और प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए क्योंकि इससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.
इस आंदोलन के समर्थकों में कॉरपोरेट कंपनियों में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं जो सामाजिक मुद्दों पर सड़कों पर उतरना आम तौर पर अपनी तौहीन मानते हैं.
एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी के एक एक्ज़ीक्यूटिव ने मुझे बहुत उत्साहित होकर बताया कि बंगलौर के उनके दफ़्तर में काम करने वाले सभी लोग रोज़ाना शाम को अपने दफ़्तर के बाहर मोमबत्ती जलाकर विरोध प्रदर्शन करते हैं.
मेट्रो ट्रेन में मेरे साथ सफ़र कर रहे एक नौजवान का कहना था कि उसके पिताजी प्रॉपर्टी का धंधा करते हैं और कल ही उन्होंने गैस के दस सिलेंडर रामलीला मैदान पहुँचवाए ताकि 'अन्ना की रसोई' में खाना पकता रहे. यानी प्रॉपर्टी डीलर से लेकर कॉरपोरेट तक सभी अन्नामय हैं.
अन्ना का आंदोलन भारतीय समाज में पिछले बीस वर्षों में आए बदलावों को प्रतिबिंबित करता है. अब जनांदोलनों को जन संगठन नहीं चलाते, 'सिविल सोसाइटी' चलाती है. अब आंदोलन के लिए कंधे पर थैला टाँगे, चना-लाही खाकर दिन-रात लोगों को गोलबंद करने वाले कार्यकर्ता की शायद ज़रूरत नहीं रहेगी. ये काम इंटरनेट, ट्विटर और फ़ेसबुक की मदद से एनजीओ कर रहे हैं. पर्यावरण से लेकर समलैंगिकों के अधिकारों तक और दलित जागरण से लेकर कलाओं के संरक्षण तक - हर सामाजिक गोलबंदी के पीछे एनजीओ होते हैं.
न्यू इंडिया में जनसंगठन या तो ग़ायब हो गए हैं या फिर उनमें से बहुतों ने अपना चेहरा मोहरा और यहाँ तक कि नाम बदल कर एनजीओ का आसान रास्ता अपना लिया है. अब ये संगठन संघर्ष नहीं बल्कि सहकार की वकालत करते नज़र आते हैं. यहाँ तक कि कई संगठनों ने अपने नाम से संघर्ष शब्द ही हटा दिया है. उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी उत्तराखंड लोक वाहिनी बन गई और दिल्ली का झुग्गी झोपड़ी संघर्ष मोर्चा झुग्गी झोपड़ी विकास मोर्चा !
'सिविल सोसाइटी' और जनसंगठन के द्वंद्व में फ़िलहाल जनसंगठन लहूलुहान चित्त पड़ा हुआ है और रामलीला मैदान में उसको गहरा दफ़्न किए जाने का जश्न मनाया जा रहा है.
